शनिवार, 28 अप्रैल 2012

एक शख्सियत…....डॉ. नवाज़ देवबन्दी - विजेंद्र शर्मा का आलेख

डॉ. नवाज़ देवबन्दी

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बद-नज़र उठने ही वाली थी किसी की जानिब

अपनी बेटी का ख़याल आया तो दिल काँप गया

एक शख्सियत…....डॉ. नवाज़ देवबन्दी

1986 की बात है विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर संसद में शाहबानो प्रकरण से सम्बंधित क़ानून बदलने की प्रक्रिया चल रही थी राज्य मंत्री ज़िया उल रहमान अंसारी ने एक घंटे का लंबा भाषण दिया और आख़िर में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी को मुख़ातिब हो नवाज़ देवबन्दी का ये मतला पढ़ा :--

मेरे पैमाने में कुछ है उसके पैमाने में कुछ

देख साक़ी हो न जाए तेरे मैखाने में कुछ

ये मतला सुन कई सांसदों ने कहा कि अंसारी साहब इतनी बड़ी तक़रीर की क्या ज़रूरत थी बस ये शे'र ही काफी था। अभी चंद रोज़ पहले लोकपाल बिल पे बहस के दौरान उसी संसद में जब कपिल सिब्बल बोल रहे थे तो पूरे विपक्ष ने इतना हंगामा किया कि उनका बोलना मुहाल हो गया आख़िर विवश हो उन्होंने नवाज़ देवबन्दी के दो मिसरों का सहारा लिया और ये शे'र पढ़ के बैठ गये :--

ऐसी - वैसी बातों से तो अच्छा है ख़ामोश रहो

या फिर ऐसी बात कहो जो ख़ामोशी से अच्छी हो

न जाने शाइर ने ज़हन में क्या सोच कर ये शे'र कहें होंगे मगर अपनी बात कहने के लिए लोग कहाँ - कहाँ उसे कोट करते हैं, यही शाइरी का हुस्न है। चाहे कॉलेज की कैंटीन हो, अदब की कोई महफ़िल हो ,संसद का गलियारा हो या मुरारी बापू की कथा ग़ज़ल के हुस्न को संवारने वाली एक शख्सियत के शे'र बहुत ज़ियादा इस्तेमाल किये जाते हैं और उस शख्सियत का नाम है डॉ. नवाज़ देवबन्दी।

हिन्दू-मुस्लिम प्यार की सरज़मीं और दुनिया में इस्लामी शिक्षा के मरकज़ देवबंद में 16 जुलाई 1956 को नवाज़ देवबन्दी का जन्म जनाब अब्दुल सुबहान ख़ान साहब के यहाँ हुआ और घर के इस चराग़ का नाम मोहम्मद नवाज़ ख़ान रखा गया। नवाज़ साहब की शुरूआती पढ़ाई देवबंद में हुई । पहली मरतबा जब दुअन्नी में आनेवाली बाल-पोथी लेकर नवाज़ अपने अब्बू की उंगली पकड़ कर स्कूल जा रहे थे तो वालिद ने ज़िन्दगी का वो सबक सिखाया जिसे आज तक नवाज़ साहब भूले नहीं है, अब्बा ने कहा कि बेटे अपने बड़ो से दो क़दम पीछे चलना चाहिए जिस से रिश्तों का भी पता रहता है और मन्सब का भी। अपने स्कूल के जीवन में पहली जमात से लेकर इंटर तक नवाज़ साहब पूरे स्कूल को प्रार्थना करवाते रहे इसमें एक दुआ "लब पे आती है दुआ बनके तमन्ना मेरी " रोज़ वे मांगते थे और ख़ुदा ने उनकी ये दुआ कुबूल कर ली।

देवबंद यूँ तो इस्लामी तालीम की तीर्थ-स्थली है मगर वहाँ शाइरी का भी माहौल था। हर महीने एक नशिस्त होती थी जिसमें नवाज़ साहब शिरकत करते थे ,शे'र सुनते - सुनते नवाज़ शाइर हो गये और अपने स्कूल के दिनों में ही उन्होंने इस शे'र से अपनी शाइरी का सफ़र शुरू किया :--

शबनम तो रो के दे गई अपना सुबूते ग़म

आँखों में हो न अश्क तो बतलाओ क्या करें

जब घर में ही शाइरी के उसूल बताने वाला मिल जाए तो कहना ही क्या नवाज़ साहब इस मामले में ख़ुशनसीब रहे उन्हें उस्ताद के रूप में बड़े भाई उम्र दराज़ साहब मिले। शाइरी को नवाज़ साहब ने अपने शौक़ तक ही महदूद (सीमित ) रखा उसे जुनून नहीं बनाया उन्होंने अपनी पहली प्राथमिकता अपनी तालीम को दी। उन्होंने 1976 में मुज्ज़फर नगर से एम्. कॉम किया फिर 1978 में मेरठ से एम्.ऐ उर्दू में। कुछ न कुछ सीखते रहने और पढ़ते रहने की चाह में 1990 में उर्दू पत्रकारिता पे शोध कर चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय ,मेरठ से उन्होंने पी.एच.डी की और नवाज़ देवबन्दी डॉ. नवाज़ देवबन्दी हो गये।

70 के दशक के आख़िर से नवाज़ साहब मुशायरों में शिरक़त करने लगे और 80 के बाद तो वे अखिल भारतीय मुशायरों और कवि सम्मेलनों का एक अहम् नाम हो गये।

मज़हब के नाम पर होने वाले दंगो ,समाज में पनप रहे बैर-भाव ,राग- द्वेष , बढती हुई नफरतों ने नवाज़ साहब को आहत किया । नवाज़ साहब का मानना है की दंगो की वज़ह से लगा एक दिन का कर्फ्यू समाज को कई सौ साल पीछे धकेल देता है उन्होंने सियासत की लगाई इस आग को अपनी शाइरी से बुझाने का काम किया :--

जलसा करके दंगा वो करवाते हैं

हमको फिर एक जलसा करना पड़ता है

****

वो भाषण से आग लगाते रहते हैं

मैं ग़ज़लों से आग बुझाता रहता हूँ

इन्सान को संस्कारों की पहली किताब माँ ही पढ़ाती है , माँ दुनिया का सबसे पाक लफ़्ज़ है। माँ पे शे'र कहना कभी रिवायत को दरकनार करना माना जाता था क्यूंकि ग़ज़ल तो महबूब से गुफ़्तगू करने का नाम है पर जब आदमी अपनी माँ को महबूब से भी ऊंचा दर्ज़ा दे तो फिर माँ पे कही ग़ज़ल की तस्वीर रवायत के फ्रेम में ख़ूबसूरती से आ जाती है। माँ पे कहे नवाज़ साहब के अशआर बहुत कोट किये जाते हैं :-

ज़न्नत की कुन्जी है मेरी मुठ्ठी में

अपनी माँ के पाँव दबाता रहता हूँ

**

उसकी एड़ी दूर कि चोटी लगती है

माँ के पाँव से जन्नत छोटी लगती है

***

बुझते हुए दीये पे हवा ने असर किया

माँ ने दुआएँ की तो दवा ने असर किया

****

धूप को साया ज़मीं को आसमाँ करती है माँ

हाथ रखकर मेरे सर पर सायबाँ करती है माँ

मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़िद्द उसके क़दमों पर निसार

हाँ की गुंज़ाइश न हो तो फिर भी हाँ करती है माँ

एहसास के पतीले में लफ़्ज़ों को जब जज़्बात की आँच पे पकाया जाए और फिर इसे काग़ज़ के बिछौने पे बिछाया जाए तो यक़ीनन शाइरी बनती है मगर हर शे'र का अपना मुक़द्दर होता है। कुछ काग़ज़ की क़ब्र में दफ़न हो जाते हैं और कुछ अशआर इतने आवारा हो जाते हैं कि उनका लाख पीछा करो तो भी वो हाथ नहीं आते। डॉ. नवाज़ देवबन्दी ने अदब को आवारा शे'र बहुत दिये हैं जिनमें से कुछ मुलाहिज़ा हो :--

अंजाम उसके हाथ है आग़ाज़ करके देख

भीगे हुए परों से ही परवाज़ करके देख

***

सफ़र में मुश्किलें आएँ तो जुर्रत और बढ़ती है

कोई जब रास्ता रोके तो हिम्मत और बढ़ती है

मेरी कमज़ोरियों पर जब कोई तनक़ीद करता है

वो दुशमन क्यों न हो उस से मुहव्बत और बढ़ती है

अगर बिकने पे आ जाओ तो घट जाते हैं दाम अक़सर

न बिकने का इरादा हो तो क़ीमत और बढ़ती है

**

जो झूठ बोलके करता है मुतमईन सबको

वो झूठ बोलके ख़ुद मुतमईन नहीं होता

**

मौसमों की साज़िश से पेड़ फल तो देते हैं

नफरतों के फल लेकिन ज़ायका नहीं देते

***

आंधी ने रौशनी कि हिमायत तो कि बहुत

लेकिन कोई चराग जलाने नहीं दिया

राज़ी था मैं भी और मेरा दुश्मन भी सुलह पर

कुछ दोस्तों ने हाथ मिलाने नहीं दिया

नवाज़ देवबन्दी ने ग़ज़ल से नफरत और मुहब्बत के बीच के फ़ासले को कम करने का काम लिया है ,उन्होंने नफ़रत के कमरे में भी अपनी शाइरी से एक रौशनदान बनाया है जिससे कि मुहब्बत की किरण अन्दर दाखिल हो सके तभी तो राम कथा करने वाले संत मुरारी बापू अपनी कथा में नवाज़ साहब के अशआर अपनी मधुर आवाज़ से तरन्नुम में गाते हैं । जिस सूबे को मुल्क की सियासत ने सबसे ज़ियादा बदनाम किया उसी सूबे की ज़बान गुजराती में नवाज़ देवबन्दी की ग़ज़लों का संग्रह " ख़बर महके " पिछले बरस मंज़र- ए- आम पे आया और मुरारी बापू जी ने ही उसका लोकार्पण किया।

नवाज़ देवबन्दी मानते हैं कि हमारे मुल्क में सबसे बड़ी चीज़ है हमारी अनेकता में एकता अगर हमारे सामाजिक रिश्तों में मिठास नहीं है तो फिर तरक्की के इमकान कहाँ से नज़र आयेंगे। मज़हब की बुनियाद पे बनी नफरत की दीवार को गिराने में नवाज़ देवबन्दी की शाइरी कामयाब हुई हो या नहीं पर इनकी शाइरी ने नफरत की इस दीवार में मुहब्बत का सुराख ज़रूर किया है :---

दीपक जुगनू चाँद सितारे एक से हैं

यानी सारे इश्क़ के मारे एक से हैं

दरिया हूँ मैं भेद-भाव को क्या जानू

मेरे लिए तो दोनों किनारे एक से हैं

जिसके दिल में तूं है मौला उसके लिए

मंदिर मस्जिद और गुरुद्वारे एक से हैं

शाइरी ख़ुश्बू की तरह फैलती है उसका ज़रिया चाहे कोई भी हो अदब की महफ़िल हो, मुशायरे हो या किताबें मगर जब कोई खनकती आवाज़ अगर ग़ज़ल को मिल जाए तो शाइरी की ख़ुश्बू को फैलने में आसानी रहती है और उसे सुनने वाले कानों की तादाद सैंकड़ों -हज़ारों से लाखों -करोड़ों में तब्दील हो जाती है। नवाज़ साहब की एक ग़ज़ल पिछले तीन -चार बरस से यूँ ही फिज़ां में घुल गई है। किसी भी कॉलेज के होस्टल के कमरे या कैंटीन में झाँक के देखो तो नौजवान लड़के -लडकियां अपने लैपटॉप या मोबाइल पे बस जगजीत सिंह की गायी ये ग़ज़ल सुनते हुए मिलते हैं :--

तेरे आने कि जब ख़बर महके

तेरी खुश्बू से सारा घर महके

नवाज़ साहब की ग़ज़लों में रूमानियत का दीदार भी होता है। उनकी छोटी बहर की ये ग़ज़ल भी ग़ज़ल से मुहब्बत करने वालों की ज़बान पे चढ़ी हुई है ,इसे भी जगजीत साहब ने अपनी आवाज़ दी है :--

उसकी बातें तो फूल हो जैसे

बाकी बातें बबूल हो जैसे

उसका हँसकर नज़र झुका लेना

सारी शर्तें क़ुबूल हो जैसे

छोटी -छोटी सी उसकी आँखें

दो चमेली के फूल हो जैसे

इसी सिलसिले के ये अशआर भी क्या खूब है :-

कुछ इस तरहा से उसे प्यार करना पड़ता है

के अपने प्यार से इनकार करना पड़ता है

कभी कभी तो वो इतना क़रीब होता है

के अपने आप को दीवार करना पड़ता है

***

हमने इश्क कि सबसे पहली मुश्किल को आसान किया

दिल ख़ुद को दाना कहता था दाना को नादान किया

(दाना = समझदार )

नवाज़ देवबन्दी अपनी ज़िन्दगी में रिश्तों के मूल्यों को बहुत तवज्जो देते हैं । इस तथाकथित आधुनिक ज़माने में रिश्तों में आई खटास और यहाँ तक कि बाप बेटे के रिश्ते में मजबूर बाप की बेबसी को भी नवाज़ साहब ने शाइरी बनाया है :--

ख़ुद को कितना छोटा करना पड़ता है

बेटे से समझौता करना पड़ता है

जब औलादें नालायक हो जाती हैं

अपने ऊपर ग़ुस्सा करना पड़ता है

जब सारे के सारे ही बेपर्दा हों

ऐसे में खु़द पर्दा करना पड़ता है

*****

दो बूढ़े चरागों का उजाला न चला जाय

आये जो बहू हाथ से बेटा न चला जाय

इस शौक़ में हम धूप से लिपटे रहे दिनभर

ये धूप चली जाए तो साया न चला जाय

डॉ. नवाज़ देवबन्दी से जुड़ा एक संस्मरण है ,21 मई 1992 को संसद में स्व.राजीव गांधी जी की पहली बरसी के मौके पे एक मुशायरा मुनअकिद किया गया वहां नवाज़ साहब ने अपनी एक मक़बूल ग़ज़ल सुनाई :--

वो रुलाकर हँस न पाया देर तक

जब मैं रो कर मुस्कुराया देर तक

भूखे बच्चों की तसल्ली के लिये

माँ ने फिर पानी पकाया देर तक

गुनगुनाता जा रहा था एक फ़क़ीर

धूप रहती है ना साया देर तक

ये ग़ज़ल सुनते ही तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव बोल उठे कि नवाज़ साहब आपने तो सराबोर कर दिया और फिर अगले दिन उन्होंने सोनिया जी के यहाँ उन्हें आमंत्रित किया ,नवाज़ साहब को राजीव जी की लाइब्रेरी दिखाई गई ,उनका सब लिखने पढ़ने का सामान दिखाया गया उस वक़्त सोनिया गांधी , प्रियंका ,राहुल और नरसिम्हा राव साहब वहां मौजूद थे और नवाज़ साहब से वही ग़ज़ल सुनाने को कहा गया जो उन्होंने संसद में सुनाई थी। जैसे ही नवाज़ साहब ने ग़ज़ल का ये शे'र सुनाया तो माहौल ग़मगीन हो गया सब की आँखें बहने लगी :---

भूलना चाहा अगर उसको कभी

और भी वो याद आया देर तक

डॉ. नवाज़ देवबन्दी का पहला मज़्मुआ - ए -क़लाम "पहला आसमान " (उर्दू)1995 में आया और नागरी में दूसरा ग़ज़ल संग्रह "पहली बारिश "2000 में , नवाज़ साहब की ग़ज़लों का गुजराती में संग्रह "ख़बर महके 2011 में मंज़रे- आम पे आया।

किसी शाइर के लिए सब से बड़ा एज़ाज़ वो है जब आम आदमी की अकादमी उसके क़लाम को सर आँखों पे बैठाए और इस एज़ाज़ से नवाज़ साहब हमेशा नवाज़े गये । नवाज़ साहब को कैफ़ी आज़मी अवार्ड , लखनऊ ,उर्दू -अदब अवार्ड , लखनऊ , ग़ालिब अवार्ड , झांसी, फिराक़ अवार्ड ,दिल्ली .मिलेनियम अवार्ड रोटरी इंटरनैशनल और रोटरी इंटरनैशनल द्वारा ग़ज़ल श्री के सम्मान से भी नवाज़ा गया।

अपने बड़ों का एहतराम ,अपने बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करने के भी क्या आदाब होते हैं इन सब चीज़ों को सिखने के लिए नवाज़ देवबन्दी अपने आप में एक मदरसा है। 2007 की बात है इंडियन हेबिटेट सेंटर, दिल्ली में एक कवि-सम्मेलन था पवन दीक्षित भाई के तुफ़ैल से नवाज़ साहब से मिलने का मौक़ा मिला जब इनके कमरे में हम पहुंचे तो क़दम बोसी के बाद नवाज़ साहब ने कहा तशरीफ़ रखिये ,पवन भाई तो ये सब आदाब जानते थे वो नवाज़ साहब के पांवों की तरफ़ बैठ गये ,मैं इस अदब से ना-वाकिफ़ था सो नवाज़ साहब के सरहाने की तरफ़ दूसरे बेड पर बैठ गया पवन भाई ने मुझे इशारा भी किया पर मैं न समझा फिर पवन दीक्षित ने मुझे नवाज़ साहब का एक शे'र वहीं सुनाया और फिर बुज़ुर्गों/ बड़ों के जब साथ हो तो किस तरह बैठना चाहिए का सबक मैंने ज़िन्दगी भर के लिए सीख लिया वो शे'र यूँ था :---

गो वक़्त ने ऐसे भी मवाक़े हमें बख़्शे

हम फिर भी बज़ुर्गों के सिरहाने नहीं बैठे

उसके ठीक बाद कमरे में कन्हैया लाल जी नंदन आये तब मैंने देखा कि नवाज़ साहब ने किस तरह उनका एहतराम किया ,फिर नवाज़ साहब ने अपने हाथों से नंदन जी को चाय बना के पिलाई वाकई अदब का मतलब सिर्फ़ कविता ,नज़्म,ग़ज़ल ,अफ़साने ही नहीं है अपने बड़ों से, अपने छोटों से आप किस तरह पेश आते हैं इस बात के आदाब ही सही मायने में अदब है तभी तो नवाज़ साहब कह्ते हैं कि जो पेड़ अपनी जड़ों से जुड़े रहते हैं वो ही हरे रहते हैं।

नवाज़ देवबन्दी साहब ने अपनी शाइरी में हमेशा सच की हिमायत की है मगर सच के नफ़े -नुक्सान को भी उन्होंने बड़ी साफ़गोई से बयान किया है :---

सच्चाई को अपनाना आसान नहीं

दुनिया भर से झगड़ा करना पड़ता है

सच बोलने के तौर-तरीक़े नहीं रहे

पत्थर बहुत हैं शहर में शीशे नहीं रहे

वैसे तो हम वही हैं जो पहले थे दोस्तो

हालात जैसे पहले थे वैसे नहीं रहे

***

मज़ा देखा मियाँ सच बोलने का

जिधर तुम हो उधर कोई नहीं है

डॉ. नवाज़ देवबन्दी की ज़िन्दगी का अहम् पहलू सिर्फ़ शाइरी ही नहीं है शाइरी को तो उन्होंने सिर्फ़ अपना शौक़ रखा है। उनका जुनून तो तालीम है और वो भी बेटियों की तालीम। इस कार्य को उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का मकसद बनाया है और मुसलसल इस यज्ञ को अपनी निष्ठा की समिधा से किये जा रहे हैं। उन्होंने मुज्ज़फर नगर में लड़कियों के एक प्राइमरी स्कूल (नवाब अज़मत अली खान गर्ल्स स्कूल )से अपना ये सफ़र शुरू किया,उसके बाद मुज्ज़फर नगर में लड़कियों के लिए इंटर कॉलेज, डिग्री कॉलेज ,वोकेशनल कॉलेज और अब "नवाज़ गर्ल्स कॉलेज" देवबंद में भी शुरू कर रहे हैं। तक़रीबन 4500 लड़कियां इन संस्थानों में आधुनिक शिक्षा और संस्कारों की तालीम हासिल कर रही हैं। नवाज़ साहब की समाज को ये देन भी शाइरी से कम नहीं है और समाज इसके लिए सदैव डॉ. नवाज़ देवबन्दी का एहसानमन्द रहेगा ।

नवाज़ साहब का शे'र कहने का अंदाज़ इतना सादा है कि वो आम गुफ़्तगू को भी ग़ज़ल बना देते हैं। उनके अशआर सुनने के बाद लगता है कि क्या ऐसे भी कहा जा सकता है। ऐसे ही उनके कुछ शे'र मुलाहिज़ा हो :---

जो सफ़र इख्तियार करते हैं

वो ही दरिया को पार करते हैं

चलके तो देखिये मुसाफिर का

रास्ते इंतज़ार करते हैं

*****

तुम नज़र से नज़र मिलाते तो

बात न करते मुस्कुराते तो

आ भी जाओ के हम बुलाते हैं

तुम बुलाते जो हम न आते तो

***

दोस्ती लाख कीजिये लेकिन

सांप को बे-ज़हर न समझा जाय

आह का राब्ता ख़ुदा से है

आह को बे-असर न समझा जाय

इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं कि डॉ. नवाज़ देवबन्दी ने ग़ज़ल के ज़रिये रिवायत के दायरे में रह के इंसानियत की दीवार में आई दरारों की मरम्मत करने का काम किया है और काफी हद तक वे इसमें कामयाब भी हुए है। मुशायरा हो या काग़ज़ ,नवाज़ देवबन्दी का क़लाम दोनों सतहों पर अपने होने का एहसास करवाता है। उनकी फ़िक्र एक तरफ़ दरख्त में फूल , फल , छाया ,बसेरा, शाख़ें एक साथ तलाश करती है और दूसरी तरफ़ अपने हुनर में एब तलाश कर उसे फिर से हुनर में तब्दील करने का काम भी।

सियासत कुर्सी के खेल में चाहें इंसानियत को लाख ज़ख़्म दे दे मगर नवाज़ देवबन्दी की क़लम अपनी शाइरी से मरहम का काम करती रहेगी और ख़ुदा करे उनकी क़लम इस काम को करते - करते न तो कभी थके न उसकी रौशनाई कभी कम हो। ...आमीन

आख़िर में नवाज़ साहब के इसी मतले और शेर के साथ अगले हफ्ते फिर एक शख्सियत से मिलवाने का वादा ..

जलते घर को देखने वालों फूस का छप्पर आपका है

आपके पीछे तेज़ हवा है आगे मुकद्दर आपका है

उस के क़त्ल पे मैं भी चुप था मेरा नम्बर अब आया

मेरे क़त्ल पे आप भी चुप है अगला नम्बर आपका है

--

विजेंद्र शर्मा

vijendra.vijen@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. mohtram dr nawaz deobandi aek maqbool tareen shaier hai'n,unke ash'aar mushaiero'n me sun kar samaien ki dilo'n ki dhadkane badh jati ha'n aur dad o tehseen ka wo na'ara bulland hota hai ki khuda ki panah.....bilashubha bhai vijendra sharma ne unke o'oper lekh likh kar urdu shaieri se apni mohabbto'n ka suboot fraham kiya hai,mai khud dr nawaz deobandi ke kalam se bahut muttasir hoo'n,allah ta'ala sei meri dua hai ki dr nawaz deobandi ki umr daraz kare,taqi wo urdu shaieri ki zulfei'n sanwarte rahei'n aur hamare adab me unke ashaar sitaro'n ki manind roshan rahei'n.

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