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हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव

हिन्दी का गौरवशाली अध्यायः हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ - कृष्ण कुमार यादव
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डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा द्वारा संपादित हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (प्रथम खण्ड) से प्रथम परिचय तब हुआ, जब अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में पदस्थ रहने के दौरान पहली बार इसकी समीक्षा पढ़ी थी। तभी से मन में चाह थी कि इस ग्रंथ को मंगवाना सुनिश्चित करूंगा और इसी बहाने अपने ज्ञान में कुछ और वृद्धि कर सकूंगा। कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह। अंडमान से इलाहाबाद में स्थानांतरण को एक माह भी नहीं बीते होंगे कि डा0 मेहरोत्रा का फोन आया। उन्होंने मेरे द्वारा संपादित पुस्तक, ”क्रांति यज्ञः 1857-1947 की गाथा” की प्रशंसा की और इसी क्रम में हिन्दी-विश्व गौरव ग्रंथ की भी चर्चा की। फिर क्या था, अगले तीन दिनों में यह ग्रंथ मेरे सामने था। पहली बार इसे देखकर लगा कि यह किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन द्वारा प्रकाशित है पर अगले ही पल महसूस हुआ कि यह एकला चलो की राह पर डा0 मेहरोत्रा जी के अथक प्रयास का मीठा फल है।


अतीत की श्रृंखलाओं को वर्तमान से जोड़ते एवं वर्तमान के आधार पर भविष्य की हिन्दी का सुन्दर खाका खींचता यह ग्रंथ अपने में एक समग्र शोध कार्य है। देश-विदेश के विभिन्न कोनों में निरपेक्ष भाव से हिन्दी का परचम फैला चुके एवं फैला रहे मनीषियों-विदुषियों के सुंदर चित्रों से सुसज्जित इस ग्रंथ में हिन्दी को न सिर्फ राष्ट्रीयता की भावना से जोड़ा गया है बल्कि एक साथ भगवती सरस्वती, भारत माता की आराधना के साथ-साथ राष्ट्रगीत वंदेमातरम, राष्ट्रगान एवं राष्ट्रध्वज के बारे में सारगर्भित जानकारियां समाहित कर इसे भारतीयता के प्रतीक से भी जोड़ा गया है । इस ग्रंथ में हिन्दी को सिर्फ भारत तक नहीं बल्कि विदेशों तक व्याप्त हिन्दी की वर्तमान परिदृश्य में भाषा चिंतन के नजरिये से विश्लेषित किया गया है। बकौल संपादक, ''इस ग्रंथ का प्रकाशन मेरे अनुसार केवल भाषायी उत्थान से संबंधित न होकर राष्ट्र की भाषायी एकता द्वारा राष्ट्रोत्थान का सर्वोच्य महायश है।''


इसके प्रथम अध्याय में हिन्दी भाषा चिंतन, द्वितीय अध्याय में हिन्दी की भाव-भूमि के प्रति काव्य संग्रह एवं तृतीय अध्याय में हिन्दी की विकास यात्रा शामिल है। हिन्दी एवं भाषा के संबंध में संत बिनोबा भावे, महात्मा गाँधी, रवीन्द्र नाथ ठाकुर, सुभाष चन्द्र बोस, महादेवी वर्मा, फादर डा0 कामिल बुल्के, ज्ञानी जैल सिंह, काका कालेलकर इत्यादि के विचार इस ग्रंथ की गरिमा में और भी वृद्धि करते है। डा0 लक्ष्मीमल सिंघवी (संविधान में हिन्दी), डा0 वेद प्रताप वैदिक (अंग्रेजी विश्व-भाषा नहीं है), डा0 जयंती प्रसाद नौटियाल (विश्व में सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा हिन्दी), इत्यादि आलेख हिन्दी भाषा चिंतन की समृद्ध परंपरा को दर्शाते हैं। द्वितीय अध्याय में संकलित हिन्दी की भाव-भूमि के प्रति काव्य रचनाओं को जिस तरह मोतियों की तरह एक कड़ी में गूंथा गया है, वह इसे रोचक एवं सारवान बनाती है। हिन्दी की विकासयात्रा के क्रम में विभिन्न प्रान्तों में हिन्दी की स्थिति, हिन्दी एवं, प्रौद्यागिकी विकास, यूनीकोड, वैश्विक संदर्भ में नागरी लिपि का तथात्मक विश्लेषण करते आलेख इस गं्रथ के नाम की सार्थकता को ही सिद्ध करते नजर आते हैं।


ग्रंथ में सुदूर अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और अ-हिन्दी भाषाई राज्यों में हिन्दी की समृद्ध पंरपरा, इन्टरनेट के इस दौर में ब्लॉग एवं सोशल नेटवर्किंग, साइबर जगत में हिन्दी की दशा और दिशा जैसे आलेख यदि आगामी संस्करणों में शामिल किये जा सकें तो इस ग्रंथ को और भी व्यापक बनाया जा सकता है।
इस गौरव ग्रंथ के संपादक डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा पेशे से इंजीनियर एवं सैन्य अधिकारी हैं और यही कारण है कि उन्होंनें इस ग्रंथ के एक-एक पृष्ठ को बड़े सुनियोजित एवं अनुशासनबद्ध रूप में प्रस्तुत किया है। आज जबकि हमारी युवा पीढ़ी पाश्चात्य सभ्यता से प्रेरित होकर अंग्रेजी के पीछे भाग रही है, वहाँ हिन्दी विश्व गौरव-ग्रंथ जैसे उत्कृष्ट ग्रंथ भारतीय संस्कृति, हिन्दी की भाषाई चेतना एवं समृद्ध परंपरा को उल्लिखित करते हुए इसके भविष्य के प्रति आश्वस्त करते हैं।


पुस्तक : हिन्दी-विश्व गौरव-ग्रन्थ (प्रथम खण्ड)
संपादक: डा0 राजेन्द्र नाथ मेहरोत्रा
प्रकाशकः कर्मण्य तपोभूमि सेवा न्यास प्रकाशन, ग्वालियर, मध्यप्रदेश
संस्करण: वर्ष 2011
मूल्य: रू 400/- (विदेश में 25 डालर/15 पौण्ड)
समीक्षक: कृष्ण कुमार यादव, निदेशक डाक सेवाएँ, इलाहाबाद परिक्षेत्र, इलाहाबाद-211001
kkyadav.y@rediffmail.com, www.kkyadav.blogspot.in/, www.dakbabu.blogspot.in/
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कृष्ण कुमार यादव : 10 अगस्त, 1977 को तहबरपुर, आजमगढ़ (उ. प्र.) में श्री राम शिव मूर्ति यादव और श्रीमती बिमला यादव के प्रथम सुपुत्र के रूप में जन्म. परिवार में मेरे अलावा बहन किरन यादव और अनुज अमित कुमार यादव शामिल. आरंभिक शिक्षा जवाहर नवोदय विद्यालय, जीयनपुर-आजमगढ़ में एवं तत्पश्चात इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वर्ष 1999 में राजनीति शास्त्र में परास्नातक. वर्ष 2001 में भारत की प्रतिष्ठित ‘सिविल सेवा’ में चयन। सम्प्रति ‘भारतीय डाक सेवा’ के अधिकारी। सूरत, लखनऊ, कानपुर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में नियुक्ति के पश्चात फिलहाल इलाहाबद परिक्षेत्र के निदेशक डाक सेवाएँ पद पर पदस्थ। 28 नवम्बर, 2004 को आकांक्षा यादव से विवाह। दो पुत्रियाँ: अक्षिता (जन्म- 25 मार्च, 2007) और अपूर्व (जन्म-27 अक्तूबर 2010)। प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लाॅगिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त। देश की प्राय: अधिकतर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं और इंटरनेट पर विभिन्न वेब पत्रिकाओं एवं ब्लॉग पर रचनाओं का निरंतर प्रकाशन. व्यक्तिश: 'शब्द-सृजन की ओर' और 'डाकिया डाक लाया' एवं युगल रूप में सप्तरंगी प्रेम, उत्सव के रंग और बाल-दुनिया ब्लॉग का सञ्चालन. इंटरनेट पर 'कविता कोश' में भी कविताएँ संकलित. 50 से अधिक पुस्तकों/संकलनों में रचनाएँ प्रकाशित. आकाशवाणी लखनऊ, कानपुर व पोर्टब्लेयर, Red FM कानपुर और दूरदर्शन पर कविताओं, लेख, वार्ता और साक्षात्कार का प्रसारण. अब तक कुल 5 कृतियाँ प्रकाशित- 'अभिलाषा' (काव्य-संग्रह,2005) 'अभिव्यक्तियों के बहाने' व 'अनुभूतियाँ और विमर्श' (निबंध-संग्रह, 2006 व 2007), 'India Post : 150 Glorious Years' (2006) एवं 'क्रांति-यज्ञ : 1857-1947 की गाथा' . व्यक्तित्व-कृतित्व पर 'बाल साहित्य समीक्षा' (सं. डा. राष्ट्रबंधु, कानपुर, सितम्बर 2007) और 'गुफ्तगू' (सं. मो. इम्तियाज़ गाज़ी, इलाहाबाद, मार्च 2008) पत्रिकाओं द्वारा विशेषांक जारी. व्यक्तित्व-कृतित्व पर एक पुस्तक 'बढ़ते चरण शिखर की ओर : कृष्ण कुमार यादव' (सं0- दुर्गाचरण मिश्र, 2009) प्रकाशित. विभिन्न प्रतिष्ठित साहित्यिक-सामाजिक संस्थानों द्वारा विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु 50 से ज्यादा सम्मान और मानद उपाधियाँ प्राप्त। विक्रमशिला हिन्दी विद्यापीठ, भागलपुर, बिहार द्वारा डाक्टरेट (विद्यावाचस्पति) की मानद उपाधि। अभिरूचियों में रचनात्मक लेखन व अध्ययन, चिंतन, ब्लाॅगिंग, फिलेटली, पर्यटन इत्यादि शामिल.

 

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