हिमकर श्याम का व्यंग्य आलेख - शब्द ही सबकुछ है

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शब्द ही सबकुछ है हिमकर श्याम शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के ...

शब्द ही सबकुछ है

हिमकर श्याम

शब्द क्या नहीं है? शब्द ही ब्रह्मा है, शब्द ही विष्णु है, शब्द ही शिव है, शब्द ही साक्षात् बह्म है, शब्द के इसी निराकार रूप को सादर नमन्। यह कहावत अब पुरानी पड़ गयी है कि हर सफल व्यक्ति की सफलता के पीछे कोई औरत होती है। आज हर सफल व्यक्ति के पीछे शब्द होता है। यानि, मनुष्य की सफलता का राज शब्द में निहित है।

शब्द के बिना भाषा की और भाषा के बिना मनुष्य की परिकल्पना नहीं की जा सकती है। शब्द पर रीझनेवाले लोग पुराने दौर में ही नहीं आज भी अपना योगदान दे रहे हैं। शब्द की महिमा अपरम्पार है। शब्दों में चिकनापन, भारीपन, मीठापन, कड़वापन, लचीलापन जैसे गुण पाये जाते हैं। समय के साथ इसके गुण-धर्म में परिवर्तन होते रहते हैं। भिन्न-भिन्न परिस्थितियों में शब्द विभिन्न रूप धारण करते हैं। आज शब्दों की भीड़ में कोई शब्द दुखी नजर आता है तो कोई सुखी। शब्दों के इसी भीड़ में से कोई शब्द एक दूसरे को धकियाता, लतियाता आगे बढ़ जाता है और बेचारा कमजोर शब्द अपने अस्तित्व के लंगड़ेपन को कोसता हुआ अपनी बारी की प्रतीक्षा करता रह जाता है।

जो शब्द के धनी होते हैं वे जेब से भी धनी होंगे इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। शब्दों के सहारे बड़े-बड़े काम आसानी से हो जाया करते हैं। इतना ही नहीं आज हमारे नेताओं को जब कुछ नहीं सूझता तो वे शब्द के सहारे देश का विकास करते हैं। वैसे भी लोकतंत्र शब्द तंत्र पर ही टिका हुआ है अर्थात् लोकतंत्र की नींव में शब्द ही है। शब्दों के मायाजाल में फंसाकर हमारे नेतागण वोट पाकर थोक के भाव में विधायक और सांसद बनते हैं फिर उन्हें खरीदकर बहुमत की साबित की जाती है। शब्द सरकारें बनाती भी हैं और गिराती भी हैं। सरकार बदल जाती है, मगर शब्द वहीं रहते हैं।

शब्दों की बढ़ती हुई मांग से प्रभावित होकर हमारे मुहल्ले में एक होनहार ने शब्दों का एक स्टॉल खोल रखा है। यहां हर वर्ग के दैनिक उपयोग के शब्द आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं। इस स्टॉल पर अक्सर भीड़ रहा करती है। पास ही एक लड़का चिल्लाता हुआ मिल जाता है- ''आइए मेहरबान, कद्रदान यह शब्दों की दुकान है। यह आपकी अपनी दुकान है। यहां हर प्रकार के शब्द सस्ते और उचित मूल्य पर प्राप्त किए जा सकते हैं।'' ''शब्दों की आवश्कता हर किसी को पड़ सकती है चाहे वह बुद्धिजीवी हो, बाबा हो, लीडर हो या पुलिस महकमे का कोई आदमी या फिर हमारे पथ-प्रदर्शक तो आइए एक बार हमें अवश्य आजमाइये। आपकी संतुष्टि ही हमारी खुशी है।'' यहां लीडरों के लिए नए-नए आश्वासनों, वायदों का अच्छा खासा स्टॉक है (इन्हीं आश्वासनों के बल पर ही तो वे अपनी कुर्सी पर टिके रहते हैं।) बुद्धिजीवियों में शब्दों का इधर अकाल पड़ गया है (भ्रष्टाचार शब्द के अलावा इन्हें दूसरा कोई शब्द सूझता ही नहीं है) इस शब्द रूपी अकाल को दूर करने के लिए भी इस स्टॉल में खासी मेहनत की गई है। राहत साम्रगी अर्थात् नए-नए शब्द बाहरी मुल्क से मंगाए गए है जिन पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। पुलिस महकमे पर यह स्टॉल कुछ ज्यादा ही मेहरबान है। यह तो सर्वविदित है कि इस महकमे के लिए सबसे जरूरी शब्द यदि कुछ है तो वह है गाली और यहां एक गाली के साथ दस गाली फ्री देने की योजना बनायी गयी है। योजना सीमित समय के लिए है। हमारे यहां ऐसी-ऐसी गालियां है, जिसे सुन कोठे की वेश्या भी शरमा जाए। गालियों से थानेदार की और थानेदार से थाने की शोभा बढ़ती है तो आइए और यहां से गालियां ले जाइए और अपने थाने की शोभा बढ़ाइये।

किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि शब्दों का स्टॉल भला चल सकता है मगर यह चल ही नहीं रहा बल्कि दौड़ पड़ा है। कल तक जो मुहल्ले वाले के बीच नाकाबिल, निकम्मा समझा जाता था वहीं उनके आंखों का तारा बना हुआ है। सैकड़ों की भीड़ उसके आगे-पीछे घूमती रहती है इस उम्मीद में की शायद वह उन्हें भी कुछ ऐसा शब्द दे दे जिससे उनके सितारे भी बुलंद हो जाएं। इस दुनिया में कुछ भी बिक सकता है बशर्ते कि उसे बेचने की कला हमारे पास हो। सच ही कहा गया है ''खुदा मेहरबान तो गदहा पहलवान।'' यह होनहार शब्द बेच कर आज ऐश कर रहा है।

आम आदमी और शब्द के बीच दूरी बढ़ती जा रही है। आज आम आदमी शब्दहीन हो गया है। शब्दों के तलाश में भटकता हुआ आम आदमी बड़ी उम्मीद के साथ उस स्टॉल पर पहुंचता है और कहता है- ''भाई मेरे लिए भी कोई शब्द है क्या तुम्हारे पास ? ''यह सुनकर वह खामोश हो जाता है। वह दुकान से बाहर निकल कर कहता है ''भाई यही तो एक वर्ग है जिसके शब्द मेरे पास नहीं है, इसी की तलाश में तो मैं भी हूं, तुम्हे मिल जाए तो मुझे भी खबर करना। तुम्हारे जैसे न जाने कितने भाई रोज मेरे इस स्टॉल से लौट जाते हैं। यह सुन कर उस आदमी की आंखों में पानी भर आता है। शब्द के बिना क्या जीना? आम आदमी के लिए शब्द नहीं है, खास आदमी के लिए शब्द ही शब्द हैं। इस हालत का बखान करने के लिए आपके पास शब्द है क्या?

पत्र-व्यहार का पता : हिमकर श्याम

द्वारा: एन. पी. श्रीवास्तव

5, टैगोर हिल रोड, मोराबादी,

रांची: 8, झारखंड।

ई-मेल पता : himkarshyam@gmail.com

नाम

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श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,550,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,141,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,32,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक 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रचनाकार: हिमकर श्याम का व्यंग्य आलेख - शब्द ही सबकुछ है
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