सोमवार, 30 अप्रैल 2012

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - किस्मत

किस्मत

रानू पार्क में बैठा हुआ एक बूढ़े से बात कर रहा था। वह इतनी ऊँची आवाज में बोल रहा था कि पार्क में आये हुए अन्य लोग उसे देखने व सुनने लगते थे। वह कह रहा था कि हमारे गाँव का सोनू और मैं एक ही कक्षा में पढ़ते थे। सोनू पढ़ने में बहुत तेज था। वह रोज स्कूल जाता था और बहुत मेहनत करता था। मेरा मन पढ़ाई में नहीं लगता था।

घर से तो मैं भी रोज जाता था। लेकिन स्कूल कभी-कभी ही पहुँचता था। कभी सिनेमा देख कर और घूम-घाम कर वापस आ जाया करता था। किसी-किसी दिन जंगल में बैठ कर ताश खेलते थे। और पेड़ पर चढ़कर सिनेमा वाला गाना गाते थे।

पिता जी अक्सर डाँटते थे कि सोनू को देखो कितना मेहनत करता है। रात में दस बजे तक पढ़ता है और सुबह भी जल्दी उठ जाता है। और तुम सूरज उगने के बाद तक सोते रहते हो। जब किस्मत में खेत जोतना ही लिखा है तो दिमांग में पढ़ाई-लिखाई क्यों बैठेगी ? देख लेना सोनू कोई साहेब बनेगा।

इतना कहकर रानू ठहाका लगाकर हँसा। फिर कई लोग उसे देखने लगे। वह बोला कि आज सोनू खेत जोतता है और मैं अठारह हजार महीने की सरकारी नौकरी करता हूँ। बूढ़ा बोला बेटा तुम्हारी किस्मत में सरकारी नौकरी और सोनू के खेती-बारी ही थी तो कोई क्या करता ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

ब्लॉग: http://www.sriramprabhukripa.blogspot.com/

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