शुक्रवार, 8 जून 2012

उमेश मोहन धवन की लघुकथाएँ

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(लघुकथा)

अपना अपना झाग

शाम का समय था . सैकड़ों सैलानी सागर की लहरो का आनंद ले रहे थे.ऊंची ऊंची लहरें तेजी से आतीं और ढेरों सफेद झाग तट पर उड़ेलकर चली जातीं. " पापा देखो सागर देवता टुथपेस्ट कर रहे हैं . यह सारा झाग उसी का है. " एक बच्चा झाग देखकर चहकते हुये बोला. उसके पापा ने उससे पूछा " तुम्हे कैसे पता ? " तो उसने स्कूल में पढ़ा हुआ बोल दिया " जब रामचंद्र जी को क्रोध आया था तो सागर देवता प्रकट हुये थे ".इधर बच्चे की माँ मन में सोच रही थी " ये झाग तो ऐसे लग रहा है जैसे किसी ने कपड़े खंगालकर वाशिंग मशीन खाली कर दी हो. वापस जाकर मुझे भी दो अटैची भर के कपड़े धोने पड़ेंगे. तब जो झाग निकलेगा वो सारी जिंदगी खत्म नहीं होगा. भला चार दिन बीतते पता चलते हैं क्या ? " तभी पास ही बैठे दो जवान लड़कों में से एक बोला " यार ऐसा नहीं लग रहा है जैसे किसी ने सारे संसार की बीयर सागर में उड़ेल दी हो. काश ये सारा झाग उसी का होता और मैं उसमें गोते लगा रहा होता. "

एक तरफ बैठा बूढ़ा नारायणन सूनी धँसी आँखों से लहरों में कुछ ढूंढते हुये बड़बड़ा रहा था " ये सागर नहीं अजगर है, और ये झाग नहीं उसकी लपलपाती जीभ है " चार दिन पहले इसी ने उसके जवान बेटे को निगल लिया था. लाश तक नहीं मिली आजतक. तब से वह रोज यहाँ आता है और घंटों भयावह लहरों को इस उम्मीद में ताकता रहता है कि शायद किसी दिन यह अजगर उसके बेटे को उगल ही दे, पर लगता है आज भी वह निराश ही वापस लौट जायेगा. तभी एक तेज लहर आयी और उन सबको समान रूप से भिगोकर वापस लौट गयी.

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(लघुकथा)

चार दिन बाद

" अरे अरे कहाँ बैठे जा रहे हो ? यह स्लीपर क्लास है और हमारी सीटें रिज़र्व हैं." नंदलाल जी ने यह चेतावनी उस अधेड़ उम्र के यात्री को दे डाली जो अपनी पत्नी के साथ बिना आरक्षण के घुस आया था. उसकी पत्नी ने भी चादर बर्थ पर फैलाकर दावा और मजबूत किया. शाम के सात बजे थे. " भाई साहब, जरा सा बैठ जाने दीजिये. हमारा केवल एक घंटे का ही सफर है." बर्थहीन व्यक्ति ने याचना की. पर नंदलाल जी एक इंच जगह भी देने के मूड में नहीं थे. थोड़ा और किनारे आकर वह बोले " हम लोग एक-एक महीना पहले लाइन में लगकर इसीलिये रिज़र्वेशन कराते हैं कि सफर में थोड़ा आराम मिले. ऐसे ही एक-एक घंटे हम सबको बिठाते रहेंगे तो आराम कब करेंगे ?" " बहन जी थोड़ी देर की तो बात है. " इस बार महिला ने विनती की पर नंदलाल जी भड़क उठे. "अरे भाई, गाड़ी में और भी तो सीटें हैं. आप लोग हमारे ही पीछे क्यों पड़े हैं ? " वे लोग बड़बड़ाते हुये दूसरी जगह चले गये.

चार दिन बाद नंदलाल जी वापस लौट रहे थे. इस बार उनका प्रतीक्षा सूची में पहला व दूसरा स्थान था पर कोई बर्थ कन्फर्म नहीं हो पायी. टी.टी.ई. ने सलाह दी कि आप लोग जनरल डिब्बे में चले जायें. जनरल डिब्बे की कल्पना से भयाक्रांत होकर उन्होंने एक बर्थस्वामी से विनती की. " भाई साहब जरा बैठने की जगह दे दीजिये.सफर लम्बा है, पत्नी साथ में है, महबूरी है." " भाई साहब हमें भी तो सोना है" बर्थस्वामी ने प्रतिवाद किया. " बस हम किनारे ही बैठे रहेंगे आप आराम से सोइये." नंदलाल जी दोहरे हुये जा रहे थे. " क्या बतायें हम तो बिना रिज़र्वेशन के कहीं जाते ही नहीं. पर इस बार प्रतीक्षा सूची में पहला नम्बर भी कन्फर्म नहीं हो पाया. इंसान ही इंसान के काम आता है. भाई साहब, ऐसा कभी आपके साथ भी हो सकता है. बर्थ ना आप घर ले जायेंगे ना मैं." बर्थस्वामी उनका मुँह ही ताक रहा था और नंदलाल जी बिना उत्तर की प्रतीक्षा किये सीट पर स्थापित हो चुके थे.

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उमेश मोहन धवन

(एक परिचय)

नाम : उमेश मोहन धवन

जन्म : 14.02.1959

शिक्षा : एम. काम.

प्रकाशन :अनेक उच्चस्तरीय पत्रों पत्रिकाओं में लघुकथाओं का अनवरत प्रकाशन

कृतियां : लघुकथा संग्रह पीर परायी (प्रकाशनाधीन)

संप्रति : यूनियन बैंक आफ इंडिया में प्रबंधक के पद पर कार्यरत

संपर्क : 13 / 134, परमट, कानपुर 208001 (उ.प्र)

मोबाइल नं. : 9897237230

फोन नं. : 0512 2533751

e-mail um.dhawan@yahoo.com

umdhawan@gmail.com

2 blogger-facebook:

  1. सार्थक और समसामयिक यथार्थ पर आधारित सुन्दर कथा !

    उत्तर देंहटाएं
  2. जो व्यवहार खुद लोग पसन्द नहीं करते वह व्यवहार दूसरों के साथ नहीं करना चाहिए। कथा का अन्त बड़ा ही सुन्दर है।

    उत्तर देंहटाएं

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