रचनाकार में खोजें -
 नाका में प्रकाशनार्थ  रचनाएं इस पते पर ईमेल करें : rachanakar@gmail.com अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें.

राकेश भ्रमर की कहानी - प्रतिदान

SHARE:

पूरे गांव जवार के बाबू साहब, यानि कि बाबू जगदीश नारायण श्रीवास्तव... रिटायर्ड जिला जज, आज निरुपाय और असहाय गांव की सबसे बड़ी हवेली के एक बड...

राकेश भ्रमर की कहानी प्रतिदान hindi kahani

पूरे गांव जवार के बाबू साहब, यानि कि बाबू जगदीश नारायण श्रीवास्तव... रिटायर्ड जिला जज, आज निरुपाय और असहाय गांव की सबसे बड़ी हवेली के एक बड़े कमरे में चारपाई पर पड़े हुए थे. आरामदेह बिस्तर होते हुए भी उन्हें चारपाई पर लिटाया जाता था, यह उनका दुर्भाग्य नहीं तो और क्या था? उनकी आंखों की कोरों में अश्रु बिंदु झलक रहे थे. वे वहीं अंटके रहते हैं. हर रोज ऐसा होता है, जब रामचन्द्र उन्हें नहला-धुला कर साफ कपड़े पहना कर अपने हाथों से उन्हें खाना खिला कर अपने घर के काम निपटाने चला जाता है.

बाबू साहब के आंसू पोंछने वाला उनका अपना कोई नहीं था... उनके आस-पास. जब तक सेवा में थे, सब कुछ था उनके पास. सम्पन्नता, वैभव, सफल दाम्पत्य-जीवन, सुखी और व्यवस्थित बच्चे. दो ही लड़के थे उनके. बड़ा लड़का उनकी तरह ही प्रादेशिक न्यायिक सेवा में भर्ती होकर मजिस्ट्रेट हो गया था और आजकल मिर्जापुर में तैनात था. छोटे लड़के ने सिविल सेवा की तैयारी की और भारतीय राजस्व सेवा में नियुक्त होकर आजकल मुंबई में सीमा शुल्क विभाग में बतौर डिप्टी कलक्टर लगा हुआ था. दोनों के बीवी बच्चे उनके साथ ही रहते थे.

वह बलिया से रिटायर हुए तो बच्चों ने कहा जरूर था कि बारी-बारी से उनके साथ रहें, परन्तु उनका दिल न माना. दो लड़कों के बीच में बंटकर कैसे रहते? एक प्रादेशिक सेवा में था तो दूसरा केन्द्र सरकार में. कोई मेल-मिलाप नहीं था. इधर-उधर दौड़ने की अपेक्षा उन्होंने एकान्त जीवन पसन्द किया और आ बसे अपने पुश्तैनी गांव में, जो अब कस्बे का स्वरूप धारण कर चुका था. चारों तरफ पक्की सड़कें बन चुकी थीं. घरों में बिजली लग चुकी थी. गांव का पुराना स्वरूप कहीं देखने को नहीं मिलता था. न गांव की चौपालें थीं, न खेत-खलिहान का जमघट, न शाम को कुएं की जगत पर लगने वाली भीड़. गांव में आधुनिकता पूरी तरह से छा गयी थी. गांव अब गांव नहीं लगता था.

पुराने कच्चे खपरैल मकान को ध्वस्त कर हवेलीनुमां मकान बनवा लिया था. पत्नी तभी जीवित थीं. वह खुद सशक्त और अपने पैरों पर चलने-फिरने लायक थे. सुबह-शाम खेतों की तरफ जाकर काम देखते थे. पिता के जमाने से घर में काम कर रहे रामचन्द्र को अपने पास रख लिया था. बाहर का ज्यादातर काम वहीं देखता था. मजदूर अलग से थे, जो खेतों में काम करते थे. दो भैंसे भी पाल ली थीं, घर में घी-दूध की कमी न रहे इसलिए.

पति-पत्नी सुख से रह रहे थे. जीवन में गम क्या होता है, तब बाबू साहब को शायद पता भी नहीं था. छुट्टियों में दोनों लड़के आ जाते थे. घर में उल्लास छा जाता. दोनों बेटों के भी दो-दो बच्चे हो गए थे. वे सब आते, तो लगता उनसे ज्यादा सुखी और सम्पन्न व्यक्ति दुनिया में और कोई नहीं है.

परन्तु खुशियां कभी किसी एक की होकर रही हैं? पांच साल पहले पत्नी का देहान्त हो गया था. बेटे आए. तेरहवीं तक रहे. जब चलने लगे तो बेमन से कहा कि गांव में अकेले कैसे रहेंगे? बारी-बारी से उनके पास रहें. गांव की जमीन-जायदाद बेंच दें. यहां उसका क्या मूल्य है? परन्तु उन्होंने देख लिया था कि किस तरह बहुएं अपने पतियों से मुंह छिपाकर और ओट से बातें करके इशारा कर रहीं थीं कि बुढ़ऊ को अपने साथ रखने की कोई जरूरत नहीं है. आज की बहुओं की सारी हकीकत उन्हें ज्ञात थी. उनकी अपनी बहुएं उनसे ठीक से बात तक नहीं करती थीं. करतीं तो क्या वह स्वयं नहीं कह सकती थी कि बाबूजी चलकर आप हमारे साथ रहें. परन्तु दिल से वह नहीं चाहती थीं कि बूढे ठाठ को अपनी भरी जवानी में ढोएं और महानगर की चमकदार दुनिया को बेरंग कर दें.

बेटों को उन्होंने साफ मना कर दिया कि उनमें से किसी के साथ नहीं रहेंगे. गांव से, खासकर अपनी कमाई से बनाई सम्पत्ति से उन्हें खासा लगाव हो गया था. घर छोड़कर जाने का मन न हुआ. उन्होंने मना कर दिया. बच्चे चले गये. एक बार मना करने के बाद दुबारा बच्चों ने चलने के लिए नहीं कहा. सोचते होंगे, कहीं मान न जायें. परन्तु क्या इतने बुद्धिहीन और अशक्त हैं कि दूसरों पर बोझ बन कर जीवन व्यतीत करें, चाहे उनके अपने लड़के ही क्यों न हों? वह स्वाभिमानी व्यक्ति थे. जीवन में किसी के सामने झुकना नहीं सीखा था. कभी किसी के दबाव में नहीं आए थे. आज बेटों के सामने क्यों झुकते?

घर में वह और रामचन्द्र रह गए. रामचन्द्र की बीवी आकर खाना बना जाती. जब तक वह बिस्तर पर न जाते, रामचन्द्र अपने घर न जाता. पूर्ण-निष्ठा के साथ देर रात तक उनकी सेवा में जुटा रहता. दिन भर खेतों में मजदूरों के साथ काम करता, फिर आकर घर के काम निपटाता. भैंसों को चारा-सानी करता. हालांकि उसकी बीवी भी घर के कामों में उसकी मदद करती थी, परन्तु उसका ज्यादातर काम रसोई तक ही सीमित रहता था. बाहर के काम रामचन्द्र खुद ही निपटा लेता.

यहां तक तो सब ठीक था. बाबू साहब को मधुमेह की बीमारी थी. उसकी दवाइयां लेते रहते थे. परन्तु अचानक न जाने क्या हुआ कि उनके हाथों और पांवों में अक्सर दर्द रहने लगा. घुटनों तक पैर जकड़ जाते. और हाथों की उंगलियां कड़ी हो जातीं. मुट्ठी तक न बांध पाते. सुबह नींद खुलने पर बिस्तर से तुरन्त नहीं उठ पाते थे. सारा शरीर जकड़ सा जाता, आध-पौन घण्टे तक इधर-उधर करवट बदलते, तब कहीं जाकर बिस्तर से उठने लायक हो पाते. उन्होंने पहले आस-पास ही छिटपुट इलाज करवाया. कोई फायदा नहीं हुआ तो जिला अस्पताल जाकर चेक-अप करवाया. डाक्टरों ने बताया कि नसों के टिशूज मरते जा रहे हैं. नियमित टहलना, व्यायाम करना, कुछ चीजों से परहेज करना और नियमित दवाइयां खाने से फायदा हो सकता है. कोई गारण्टी नहीं थी. फिर भी डाक्टरों का कहना तो मानना ही था.

जब जिला अस्पताल में भर्ती थे तो दोनों बेटे एक-एक करके आए और डाक्टरों से परामर्श करके तथा रामचन्द्र को हिदायतें देकर चले गए. किसी ने छुट्टी लेकर उनके पास रहना जरूरी नहीं समझा. उनकी बीवियां तो आई भी नहीं. बताया गया कि बच्चों की परीक्षाएं सर पर थीं, उनकी पढ़ाई का हर्जा होता. इसलिए नहीं आईं. उन्हें सुनकर धक्का सा लगा. क्या बुढ़ापे में अपने सगे ऐसे ही हो जाते हैं. वे जवान हैं, अतएव उन्हें बुढ़ापा क्या होता है, इसका एहसास नहीं है. या वह समझने की कोशिश नहीं करते कि बूढे+ लोगों की क्या परेशानियां होती हैं और उन्हें कैसे दूर किया जाये.

कुछ दिन अस्पताल में भर्ती रहकर वह गांव आ गए. इलाज चल ही रहा था. परन्तु कोई फायदा होता नजर नहीं आ रहा था. उनके पैर धीरे-धीरे सुन्न और अशक्त होते जा रहे थे. रामचन्द्र उन्हें पकड़ कर उठाता, तभी बिस्तर से उठकर बैठ पाते. चलना-फिरना दूभर होने लगा. उन्होंने बड़े बेटे को लिखा कि वहीं आकर उनको लखनऊ के के.जी.एम.सी. या संजय गांधी इन्स्टीट्यूट में दिखा दे. बड़ा लड़का आया तो जरूर और उन्हें के.जी.एम.सी. में भर्ती भी करवा गया. परन्तु इसके बाद कुछ नहीं. भर्ती करवाकर चला गया. रामचन्द्र को बोल गया कि जब तक इलाज चले, वहीं रहे. उसकी बीवी को भी लखनऊ में छोड़ दिया. बेचारे गरीब अनपढ़ आदमी... किस तरह उन्होंने बाबू साहब की देखभाल की और कितने प्रकार के कष्ट उन दोनों ने खुद सहे, उनके सिवा भगवान भी न जानता होगा. बाबू साहब तो खैर निःसहाय ही थे. वह कुछ कहने या करने की स्थिति में ही नहीं थे. रामचन्द्र उनके लिए भगवान था.

रामचन्द्र अपनी बीवी के साथ तन-मन से बाबू साहब की सेवा में लगा रहा. धन तो बाबू साहब लगा ही रहे थे. उसकी कमी उनके पास नहीं थी. परन्तु न जाने उनके मन में कैसी निराशा घर कर गई थी कि किसी इलाज का उन पर असर ही नहीं हो रहा था. अपनों के होते हुए भी उनका अपने पास न होने का एहसास उन्हें अन्दर तक साल रहा था. यह दुःख उनके इलाज में बाधक था और डाक्टरों की लाख कोशिश के बावजूद वह ठीक न हो सके और लखनऊ से वह अपाहिज होकर ही गांव लौटे.

अब स्थिति यह हो गई थी कि बाबू साहब चारपाई से उठने में भी अशक्त हो गये थे. अपने आप उठ भी न पाते थे. रामचन्द्र अभी अधेड़ था. शरीर से बलवान तो था ही. अपने बूते पर उन्हें उठाकर बिठा देता था तो वह तकियों के सहारे या बिस्तर पर पैर लटका कर बैठे रहते थे.

एक दिन नौबत ये आ गई कि वह पाखाने में बैठने में भी अशक्त हो गये. उन्हें बिस्तर से उतारकर चारपाई पर डालना पड़ा. बीचो-बीच चारपाई के बान का एक गोल हिस्सा काट दिया गया. नीचे एक बड़ा बर्तन रख दिया गया, ताकि बाबू साहब उस पर मल-मूत्र त्याग कर सकें.

रामचन्द्र भी जीवट का आदमी था. जाति का लोध, परन्तु कोई घिन व अनिच्छा नहीं. पूरी लगन, निष्ठा और निःस्वार्थ भाव से उनका मल-मूत्र उठाकर बाहर फेंकने जाता. बाबू साहब ने उसे कई बार मना किया कि खुद वह यह काम न किया करे. गांव में मेहतरों की कमी नहीं थी. कई घर थे उनके. बुलाने पर सभी दौड़े चले आते. रामचन्द्र से कहा कि वह कोई मेहतर बुला लिया करे. सुबह-शाम आकर गंदगी साफ कर दिया करेगा, परन्तु रामचन्द्र, चाहे उसकी ढिठाई कह लें, ने बाबू साहब की बातों को अनसुना कर दिया और खुद ही उनका मल-मूत्र साफ करता रहा. उन्हें नहलाता-धुलाता और साफ-सुथरे कपड़े पहनाता. उसकी बीवी उनके गन्दे कपडे+ धोती, उनके लिए खाना बनाती. रामचन्द्र खुद स्नान करने के बाद उन्हें अपने हाथों से खाना खिलाता. अपने सगे बहू-बेटे क्या उनकी इस तरह सेवा करते? शायद नहीं... कर भी नहीं सकते थे. वह मन ही मन सोचते.

बाबू साहब उदास मन लेटे-लेटे जीवन की सार्थकता पर विचार करते. मनुष्य क्यों लम्बे जीवन की आकांक्षा करता है, क्यों वह केवल बेटों की कामना करता है? लम्बा जीवन क्या सचमुच सुखदायक होता है? बेटे क्या सचमुच मनुष्य को कोई सुख प्रदान करते हैं? उनके अपने बेटे अपने जीवन में व्यस्त और सुखी हैं. अपने जन्मदाता की तरफ से निर्लिप्त होकर अपना जीवन व्यतीत कर रहे हैं, जैसे अपने पिता से उन्हें कुछ लेना-देना नहीं है.

और एक तरफ रामचन्द्र है, उसकी बीवी है. इन दोनों से उनका क्या रिश्ता है? उन्हें नौकर के तौर पर ही तो रखा था उन्होंने, परन्तु क्या वह नौकर से बढ़कर नहीं हैं? वह तो उनके अपने सगे बेटों से भी बढ़कर हैं. बेटे-बहू अगर साथ होते, तब भी उनका मल-मूत्र नहीं छूते. पास तक न फटकते. तब क्या रामचन्द्र उनके लिए भगवान स्वरूप नहीं है?

जब से वह पूरी तरह अशक्त हुए हैं, रामचन्द्र अपने घर नहीं जाता. अपनी बीवी के साथ बाबू साहब के मकान में ही रहता है. उन्होंने ही उससे कहा था. रात-बिरात पता नहीं कब क्या जरूरत पड़ जाए? वह भी मान गया. घर में उसके बच्चे अपनी दादी के साथ रहते थे. दोनों पति-पत्नी दिन रात बाबू साहब की सेवा में लगे रहते थे. भैंसों का दूध बाबू साहब के लिए बचाकर बाकी अपने घर भेज देता. खेतों में कितना गल्ला-अनाज पैदा हुआ, कितना बिका और कितना घर में बचा है, इसका पूरा-पूरा हिसाब भी रामचन्द्र ही रखता था. पैसे भी वहीं तिजोरी में रखता था. बाबू साहब बस पूछ लेते कि कितना क्या हुआ? बाकी माया-मोह से वह भी अब छुटकारा पाना चाहते थे. उसकी तरफ ज्यादा ध्यान न देते. रामचन्द्र को बोल देते कि उन्हें कुछ बताने की जरूरत नहीं है. उसे जो करना हो, करता रहे. रुपये-पैसे खर्च करने के लिए भी मना नहीं करते थे. जोर देकर कहते कि वह अपने घर के सामान के लिए पैसे निकाल लिया करे. बच्चों को कपड़े-लत्ते बनवा दिया करे. तो भी रामचन्द्र उनका कहना कम ही मानता था. बाबू साहब का पैसा अपने घर में खर्च करते समय उसका मन कचोटता था. हाथ खींचकर खर्च करता. बेकार में एक पाई भी खर्च न करता. ज्यादातर पैसा उनकी दवाइयों पर ही खर्च होता था. उसका वह पूरा-पूरा हिसाब रखता था.

बीती रात तक उन्हें नींद न आती. रामचन्द्र उनके पास जमीन पर बैठा रहता. वे कहते, ‘‘रमुआ, ये जीवन क्या है? क्या कभी किसी की समझ में आया है? नहीं, इसे कोई नहीं समझ पाया है. हम सभी मिथ्या भ्रम में जीते हैं. कहते हैं कि ये हमारा है, धन-सम्पदा, बीवी-बच्चे, भाई-बहन, बेटी-दामाद, नाती-पोते... परन्तु क्या सचमुच ये सब आपके अपने हैं? नहीं रे रमुआ, कोई किसी का नहीं होता. सब अपने-अपने स्वार्थ के लिए जीते हैं और मिथ्या भ्रम में पड़कर खुश हो लेते हैं कि ये सब हमारा है. अपने अहम् की तुष्टि करके खुश होते हैं.’’ और वह एक आह् भरकर चुप हो जाते.

रामचन्द्र मनुहार भरे स्वर में कहता, ‘‘मालिक, आप मन में इतना दुःख मत पाला कीजिए. हम तो आपके साथ हैं, आपके चाकर. हम आपकी सेवा मरते दम तक करेंगे और करते रहेंगे. आपको कोई कष्ट-तकलीफ नहीं होने देंगे.’’

‘‘हां रे रमुआ, एक तेरा ही तो आसरा रह गया है, वरना तो कब का इस असार संसार से कूच कर गया होता. इस लाचार-बेकार और अपाहिज शरीर के साथ कितने दिन जीता. यह सब तेरी सेवा का फल है कि अभी तक संसार से मोह खतम नहीं हुआ है. अब तुम्हारे सिवा मेरा है ही कौन? लड़के आने का नाम ही नहीं लेते. अब तो छुट्टियों में भी इधर का रुख नहीं करते. पहाड़ों पर चले जाते हैं बच्चों के साथ मौज-मस्ती करने. इधर आकर बूढ़े लाचार बाप की सेवा करने के लिए क्यों आएं? बच्चे उनके बड़े हो गए हैं. शहर में पैदा हुए, वहीं बडे+ हुए. उनको गांव क्यों अच्छा लगेगा? बाप को बेटे के सुख के लिए ही सब कुछ करना पड़ता है. मैंने भी अपनी जवानी में उन्हीं के लिए सब कुछ किया था. अब वह अपने बच्चों के लिए कर रहे हैं तो मुझे गिला नहीं करनी चाहिए. परन्तु बूढ़ा मन, स्वार्थी तो होता ही है कि कुछ दिन के लिए ही आ जाते. देखकर मन भर जाता. परन्तु नहीं... उनको गर्मी में कुल्लू-मनाली की शीतल वादियों में सैर करने दीजिए. यहां आकर मेरे शरीर पर भिनकती हुई मक्खियां थोड़े उड़ाएंगे. मुझे अपने बेटों से कोई आशा या उम्मीद नहीं है कि मरते समय मेरे मुख में गंगाजल की दो बूंदे डालेंगे. एक तेरे ऊपर ही मुझे विश्वास है कि जीवन के अन्तिम समय तक तू मेरा साथ देगा, मुझे धोका नहीं देगा. अब तक निःस्वार्थ-भाव से मेरी सेवा करता आ रहा है. बंधी-बंधाई मजदूरी के सिवा और क्या दिया है मैंने? बस कभी-कभार घी-दूध और अन्न ही तो ले जाता है मेरे यहां से. वह भी तो पेट भरने के लिए जरूरी है. मेरे पैसे से तू कोई विलासिता तो नहीं कर रहा है, फिर भी सेवा में लगा हुआ है.’’

‘‘मालिक, आपकी दया-दृष्टि बनी रहे और मुझे क्या चाहिए? दो बेटे हैं, बडे+ हो चुके हैं, कहीं भी कमा खा लेंगे. एक बेटी है, उसकी शादी कर दूंगा. वह भी अपने घर की हो जाएगी. रहा मैं और पत्नी तो अभी आपकी छत्रछाया में गुजर-बसर हो ही रही है. आपके न रहने पर आबंटन में जो दो बीघा ऊसर-बंजर मिला है, उसी पर मेहनत करूंगा, उसे उपजाऊ बनाऊंगा और पेट के लिए कुछ न कुछ तो पैदा कर ही लूंगा.’’

‘‘तेरी बेटी कितनी बड़ी हो गयी है?’’

‘‘चौदह साल की हो गयी है. एक दो बरस में शादी लायक हो जाएगी. लड़का देख रहा हूं. अच्छा घर-वर मिलते ही उसके हाथ पीले कर दूंगा. जमाना बहुत खराब चल रहा है. जवान बेटी जितनी जल्दी अपने घर-वर की हो जाए, उतना ही अच्छा है. मां-बाप को कलंक तो न लगेगा.’’

‘‘तू ठीक कहता है, रमुआ... जमाना वाकई बहुत खराब आ गया है.’’ कहते समय उनके मस्तिष्क में अपने बहू-बेटों का खयाल उभर रहा था.

एक तरफ था रामचन्द्र... उनका पुश्तैनी नौकर, सेवक, दास या पुत्रवत्... जो भी चाहे कह लीजिए. दूसरी तरफ उनके अपने सगे बेटे-बहू और नाती-पोते. उनके साथ खून के रिश्ते के अलावा और कोई रिश्ता नहीं था जुड़ने के लिए. मन के तार उनसे न जुड़ सके थे. दूसरी तरफ रामचन्द्र ने उनके सम्पूर्ण अस्तित्व पर कब्जा कर लिया था. अपनी सेवा और दासत्व भाव से. उसकी कोई चाहत नहीं थी. वह जो भी कर रहा था, कर्तव्य-भावना के साथ कर रहा था. वह इतना जानता था कि बाबू साहब उसके मालिक हैं, वह उनका चाकर है. उनकी सेवा करना उसका धर्म है और वह अपना धर्म निभा रहा था.

बाबू साहब के पास उनके अपने नाम कुछ तीस बीघे पक्की जमीन थी. बीस बीघे पुश्तैनी और दस बीघे उन्होंने स्वयं खरीदी थी. घर अपनी बचत के पैसे से बनवाया था. उन्होंने मन ही मन तय कर लिया था कि सम्पत्ति का बंटवारा किस तरह करना है.

उनके अपने कई दोस्त वकील थे. उन्होंने अपने एक विश्वस्त मित्र को रामचन्द्र के माध्यम से घर पर बुलवाया और चुपचाप वसीयत कर दी. वकील को हिदायत दी कि उसकी मृत्यु पर अन्तिम संस्कार के पूर्व उनकी वसीयत खोलकर पढ़ी जाए. उसी के मुताबिक उनका अन्तिम संस्कार किया जाए. तत्पश्चात संपत्ति का बंटवारा हो.

फिर उन्होंने एक दिन तहसील से लेखपाल तथा एक अन्य वकील को बुलवाया और अपनी कमाई से खरीदी दस बीघे जमीन का बैनामा रामचन्द्र के नाम कर दिया. साथ ही यह भी सुनिश्चित कर दिया कि उनकी मृत्यु के पश्चात इस जमीन पर उनके बेटों द्वारा कोई दावा-मुकदमा दायर न किया जाये. इस तरह का एक हलफनामा तहसील में दाखिल कर दिया.

यह सब होने के बाद रामचन्द्र और उसकी बीवी उनके चरणों पर गिर पड़े. वह जार-जार रो रहे थे, ‘‘मालिक, यह क्या किया आपने? यह आपके बेटों का हक था. हम तो गरीब-जान, आपके सेवक. जैसे आपकी सेवा कर रहे थे, आपके बेटों की भी करते. आपने हमें जमीन से उठाकर आसमान पर बिठा दिया. एक चमकता हुआ तारा बना दिया.’’

वह हल्के से मुस्कराए और रामचन्द्र के सिर पर हल्का सा स्पर्श कर बोले, ‘‘रमुआ, अब क्या तू मुझे बताएगा कि किसका क्या हक है. तू मेरे अंश से नहीं जनमा है, तो क्या हुआ? किसी जनम में तू अवश्य मेरा पुत्र रहा होगा. मुझे नहीं पता, प्राचीन काल में पुत्र पिता की कितनी और किस तरह सेवा करता था, परन्तु आज के युग में देख लिया कि पुत्र पिता के प्रति कितना समर्पित होता है. मैं तो इतना जानता हूं कि मनुष्य के अन्तिम समय में उसको एक अच्छा साथी मिल जाए तो उसका जीवन सफल हो जाये. तू मेरा पुत्रवत ही नहीं, सच्चा दोस्त भी है. क्या मैं तेरे लिए मरते समय इतना भी नहीं कर सकता?’’

उनकी आंखों में आंसू झिलमिला आये, ‘‘मैं अपने किसी भी पुत्र को चाहे कितनी भी सम्पत्ति दे देता, परन्तु वह मेरा इस तरह गूं-मूत नहीं उठाता. उसकी बीवी तो कदापि नहीं. मेरी देखभाल के लिए कोई नौकर जरूर रख देते, परन्तु वह नौकर भी मेरी इतनी सेवा न करता, जितनी तूने की है. मैं तुझे कोई प्रतिदान नहीं दे रहा. तेरी सेवा तो अमूल्य है. इसका मूल्य तो भगवान भी नहीं आंक सकता. बस तेरे परिवार के भविष्य के लिए कुछ करके मरते वक्त मुझे मानसिक शांति प्राप्त हो सकेगी.’’ वह आंखें बन्द करके चुप हो गए.

मनुष्य का अन्त समय आता है तो बचपन से लेकर जवानी और बुढ़ापे तक के सुखमय चित्र उसके दिलो-दिमाग में छा जाते हैं और वह एक-एक कर बाइस्कोप की तरह गुजरते जाते हैं. वह उनमें खो जाता है और कुछ क्षणों तक असंभावी मृत्यु की पीड़ा से मुक्ति पा लेता है.

बुढ़ापे की अपंगता को छोड़कर उन्हें नहीं लगता कि कभी किसी दुःख से उनका आमना-सामना हुआ हो. पिता सम्पन्न किसान थे. साथ ही साथ उस जमाने के पटवारी भी थे. दो बहनों के बीच अकेले भाई थे. लाड़-प्यार से पालन-पोषण हुआ था. किसी चीज का अभाव नहीं था, परन्तु वह बिगड़ैल नहीं निकले जैसा कि सम्पन्न घरों के इकलौते पुत्रों को जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार मिलने से हो जाता है. मां समझदार थीं. अच्छे संस्कार डाले उनमें. बुद्धि के तेज थे. पाठशाला में हमेशा अव्वल आते. पांचवीं के बाद उन्हें कस्बे के इण्टर कालेज भेज दिया गया पढ़ने के लिए. वहां भी प्राध्यापकों के चहेते रहे. विज्ञान पसंदीदा विषय थे. आगे भी इसी में पढ़ाई की. उच्व शिक्षा के लिए इलाहाबाद गए. वहां हास्टल में रहकर पढ़ाई की. अच्छे अंको से बी.एस.सी. उत्तीर्ण की. तभी उनका मन साइंस से उचट गया.

बातों-बातों में एक दिन उनके किसी मित्र ने कह दिया था, ‘‘यार जगदीश, तू क्यों साइंस के फामूर्लों में उलझा हुआ है. तेरी तो तर्क-वितर्क की शक्ति बड़ी पैनी है. बहस जोरदार कर लेता है. एल.एल.बी. करके वकालत क्यों नहीं करता?’’

कहां तो वह आई.ए.एस. बनने का सपना देख रहे थे, कहां उनके मित्र ने उनकी राह की दिशा बदल दी. बात उनको जम गई. बी.एस.सी. कर ही चुके थे. तुरन्त ला कालेज में दाखिला ले लिया. पढ़ने में जहीन थे ही. कोई दिक्कत नहीं हुई. तीन साल में वकालत पास कर ली और इलाहाबाद में हाई कोर्ट के एक बड़े वकील के साथ प्रैक्टिस करने लगे. साथ ही साथ न्यायिक परीक्षा की तैयारी भी करने लगे. पहली बार बैठे और पास हो गए. न्यायिक मजिस्ट्रेट बनकर पहली बार उन्नाव गए. तब से 35 साल की नौकरी में प्रदेश के कई जिलों में विभिन्न पदों पर तैनात रहे. अन्त में बलिया से जिला जज के पद से सेवानिवृत हुए. न्यायिक सेवा में अपनी कर्तव्य-निष्ठा और ईमानदारी से नाम कमाया तो आलोचनाओं के भी शिकार हुए; परन्तु उन्हें जो सच लगा, उसी का पक्ष लिया. जान-बूझकर अन्तर्मन से किसी का पक्षपात नहीं किया.

और आज जीवन के अन्तिम क्षणों के वह अपनों के होते हुए भी, अपनों से दूर अपने घर में एकान्त जीवन व्यतीत कर रहे थे. जो सगे नहीं थे. वे उनके साथ थे. कहते हैं कि जीवन अपना हिसाब-किताब बराबर रखता है. अधिकांश जीवन में अगर उन्हें सुख ही सुख नसीब हुआ था, तो अब अन्त समय में दुःख की बारी थी. इसे भी उन्हें इसी जीवन में भुगतना था, वरना जीवन का खाता अधूरा रह जाएगा. आय और व्यय का पूरा विवरण आना ही चाहिए उसमें. सुख अगर आय है तो दुःख व्यय.

उनका शरीर दिन-ब-दिन क्षीण होता जा रहा था. मानसिक संताप से वह उबर नहीं पा रहे थे. बेटे बिला नागा दूसरे-तीसरे फोन पर उनकी कुशलता की जानकारी हासिल कर लेते थे. परन्तु क्या जीवन के अन्तिम क्षणों में बच्चों की कुशल-क्षेम पूछने भर से उनका कष्ट और संताप कम हो सकता था.

फोन पर ही बेटों को उन्होंने बता दिया था कि पुश्तैनी जमीन-जायदाद और खुद की कमाई सम्पत्ति की उन्होंने वसीयत कर दी है. उसको पंजीकृत भी करवा दिया है. वसीयत वकील अमरनाथ वर्मा के पास रखी है. जीते-जी देखने तो क्या आओगे? मेरी मृत्यु पर ही तुम लोग आओगे; परन्तु अन्तिम संस्कार करने के पहले वसीयत पढ़ लेना. तत्पश्चात मेरा अन्तिम संस्कार करना.

और वो दिन ज्यादा दूर नहीं था. हवेली के विशाल आंगन में उनका पार्थिव शरीर रखा था. एक तरफ परिजन बैठे थे, उनके बीच सफेद कुर्ते-पायजामें में बाबू साहब के दोनों बेटे बैठे थे. महिलाएं अन्दर थीं. वकील साहब को खबर कर दी गयी थी. बस पहुंचने ही वाले थे.

वकील साहब के पहुंचते ही सबकी उत्सुक नजरें उनके चेहरे पर टिक गयीं. उन्होंने बारी-बारी से सबको देखा. एक कोने में दीन-हीन रामचन्द्र बैठा था. केवल उसकी आंखों में आंसू थे, परन्तु वह रो नहीं सकता था. इतने लोगों के बीच में, जब सभी धीर-गंभीर मुद्रा अपनाए हुए थे, तब क्या उसका रोना किसी को अच्छा लगता?

वकील साहब ने अपने ब्रीफकेस से एक फाइल निकाली और उसे खोलकर पहले बाबू साहब के दोनों बेटों की तरफ देखा; फिर रामचन्द्र को अपने पास बुला दिया. गंभीर वाणी में बोले, ‘‘मैं वसीयत पढ़ने जा रहा हूं. आप तीनों लोग उसे ध्यान से सुनना, क्योंकि यह केवल आप ही तीन लोगों से सम्बन्धित है.’’ फिर उन्होंने वसीयत पढ़नी प्रारम्भ की, ‘‘मैं जगदीश नारायण श्रीवास्तव, निवासी- ग्राम व पोस्ट, हरचन्दपुर, जिला- रायबरेली अपने पूरे होशो-हवास और संज्ञान में शपथपूर्वक अपनी सम्पत्ति की निम्नलिखित वसीयत करता हूं-

‘‘भोरवा खेड़ा में स्थिति बीस बीघा जमीन जो अलग-अलग चार चकों में हैं, मेरे दोनों पुत्रों के बीच बराबर-बराबर बांट दी जाए. इसी तरह बैंक में जमा धन-राशि के भी वह बराबर के हिस्सेदार होंगे. सोने-चांदी के जेवरात इनकी दोनों बहुओं को बराबर-बराबर सुनार की मध्यस्ता में उनकी कीमत आंककर बांट दिए जाएं.

‘‘रही दस बीघा जमीन जो मैंने उनकी बचत और मेहनत की कमाई से खरीदी थी, उसका बैनामा मैं पहले ही अपने पुत्रवत् सेवक रामचन्द्र के नाम कर चुका हूं. वह मेरा सगा बेटा नहीं है, परन्तु मैं उसको अपने बेटों से भी बढ़कर मानता हूं. संतान सुख क्या होता है? वह मैंने अपने दोनों पुत्रों के पालन-पोषण में प्राप्त कर लिया है, परन्तु जीवन के अन्तिम समय में संतान आपको क्या सुख देती है, यह मुझे अपने पुत्रों से तो नहीं प्राप्त हो सका. वह सुख मुझे मिला तो केवल रामचन्द्र से, उसकी पत्नी और बच्चों से. मेरी सेवा करते समय उनके मन में कभी यह लालसा न रही होगी कि मजदूरी के अलावा उन्हें कुछ और प्राप्त होगा. बचपन में हम अने बच्चों का मल-मूत्र साफ करते हैं. हमें उससे घृणा नहीं होती, क्योंकि बच्चों को हम अपना अंश समझते हैं और यह समझते हैं कि वह हमारे बुढ़ापे की लाठी हैं, परन्तु क्या सचमुच...?

‘‘रामचन्द्र के शरीर में मेरा खून नहीं है. वह मेरे घर-परिवार का भी नहीं है. है तो बस मात्र एक नौकर, परन्तु उसकी सेवा में नौकर-भाव नहीं है. इससे कहीं कुछ ज्यादा है. वह मेरा गूं-मूत उठाता है ऐसे जैसे अपने निर्बोध-अबोध बच्चे का उठा रहा हो. कोई घृणा नहीं उपजती है उसके मन में. उसी पितृ-भाव से मुझे नहलाता-धुलाता है. मुझे साफ कपड़े पहना कर अपने हाथों से खाना खिलाता है. उसकी पत्नी मातृ-भाव से खाना बनाती है. मेरी सेवा करने में उन्होंने कभी कोताही या उफ नहीं की. कभी थकान या ऊब का भाव परिलक्षित नहीं किया. यह सब करते हुए क्या उनके मन में किसी प्रतिदान की आकांक्षा या लालसा रही होगी... कभी नहीं. इन दोनों ने तो मुझसे पूछे बिना कोई चीज इधर से उधर नहीं रखी.

‘‘ऐसे स्वामिभक्त दीन रामचन्द्र को मैं इससे ज्यादा दे भी क्या सकता था कि उसके बच्चों का भविष्य सुनिश्चित कर दूं. दस बीघे जमीन में मेहनत से खेती करेंगे तो उन्हें कभी एक रोटी के लिए दूसरे के आगे हाथ नहीं पसारना पड़ेगा. मेरे बेटे सुखी-सम्पन्न और नौकरी पेशा वाले हैं. आशा है, मेरे इस निर्णय से उनके दिल को चोट नहीं पहुंची होगी.’’

वकील साहब थोड़ी देर के लिए रुके. सारे लोग मंत्र-मुग्ध थे. वकील साहब ने आगे पढ़ा-

‘‘इसके बाद यह मकान बचता है. इसे भी मैंने अपने खून-पसीने की कमाई से बनवाया है. हर ईंट में मेरा खून झलकता है और बालू-सीमेंट के हर कण में मेरी पसीने की बूंदें. मैं जानता हूं, मेरे बेटे-पोते मेरी मृत्यु के बाद गांव का रुख नहीं करेंगे. इस मकान को औने-पौने दाम में किसी बनिये को बेंच देंगे. अतः यह मकान भी मैं रामचन्द्र को दान करता हूं. मेरी मृत्यु के बाद वह सपरिवार इस मकान को अपने रहने के लिए उपयोग करे. दोनों भैंसे भी उसी की होंगी तथा खेती में काम आने वाले सारे यन्त्रों और औजारों को वह अपने उपयोग में ला सकेगा.’’

सन्नाटा... सन्नाटा... गहन सन्नाटा. लाखों की सम्पत्ति बाबू साहब एक नौकर को दे कर चले गए. क्या उनके बेटे इस वसीयत को मानेंगे और यूं ही चुप बैठे रह जायेंगे? सबकी नजरें उनके बेटों की तरफ उठीं और एकटक उन्हें ही ताकने लगीं. वह क्या प्रतिक्रिया प्रकट करेंगे? परिचित तथा परिजनों का विश्वास था कि अन्तिम संस्कार के पहले ही कोई न कोई हंगामा खड़ा हो जाएगा.

उधर रामचन्द्र जार-जार रो रहा था.

दोनों बेटों ने एक दूसरे की तरफ देखा. चंद क्षणों तक एक दूसरे से कुछ कानाफूसी की और फिर बड़े बेटे ने खडे होकर कहा-

‘‘हमें अपने पिताजी पर गर्व है. उन्होंने जो कुछ किया, बहुत अच्छा किया. हमें उससे कोई शिकायत नहीं है. सच तो यहीं है कि हम उनके पुत्र होते हुए भी उनकी कोई सेवा न कर सके. उन्हें अकेला छोड़ कर हम अपने बीवी-बच्चों में मस्त रहे. वृद्धावस्था का अकेलापन और अपनों के पास न होने का बाबू जी का गम हम महसूस न कर सके. उन्हें अकेला मरने के लिए छोड़ दिया. परन्तु हम रामचन्द्र को अपना बड़ा भाई मानते हुए उसे यह अधिकार देते हैं कि बाबूजी का अन्तिम संस्कार भी उसी के हाथों से संपन्न हो. इन्हीं हाथों ने बाबू जी की अन्तिम दिनों में सेवा की है. यहीं उनका असली पुत्र है और उसे यह अधिकार मिलना ही चाहिए.’’

सबकी नजरों में रामचन्द्र के लिए अथाह आदर और सम्मान था.

--

(राकेश भ्रमर)

ई- 15, प्रगति विहार हास्टल,

लोधी रोड, नई दिल्ली-110003

09968020930

COMMENTS

BLOGGER: 2
Loading...

विज्ञापन

----
.... विज्ञापन ....

-----****-----

|नई रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$count=6$page=1$va=0$au=0

विज्ञापन --**--

|कथा-कहानी_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts$s=200

|हास्य-व्यंग्य_$type=blogging$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|लोककथाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|लघुकथाएँ_$type=list$au=0$count=5$com=0$page=1$src=random-posts

|काव्य जगत_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

-- विज्ञापन --

---

|बच्चों के लिए रचनाएँ_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$count=6$page=1$src=random-posts

|विविधा_$type=complex$tbg=rainbow$au=0$va=0$count=6$page=1$src=random-posts

 आलेख कविता कहानी व्यंग्य 14 सितम्बर 14 september 15 अगस्त 2 अक्टूबर अक्तूबर अंजनी श्रीवास्तव अंजली काजल अंजली देशपांडे अंबिकादत्त व्यास अखिलेश कुमार भारती अखिलेश सोनी अग्रसेन अजय अरूण अजय वर्मा अजित वडनेरकर अजीत प्रियदर्शी अजीत भारती अनंत वडघणे अनन्त आलोक अनमोल विचार अनामिका अनामी शरण बबल अनिमेष कुमार गुप्ता अनिल कुमार पारा अनिल जनविजय अनुज कुमार आचार्य अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ अनुज खरे अनुपम मिश्र अनूप शुक्ल अपर्णा शर्मा अभिमन्यु अभिषेक ओझा अभिषेक कुमार अम्बर अभिषेक मिश्र अमरपाल सिंह आयुष्कर अमरलाल हिंगोराणी अमित शर्मा अमित शुक्ल अमिय बिन्दु अमृता प्रीतम अरविन्द कुमार खेड़े अरूण देव अरूण माहेश्वरी अर्चना चतुर्वेदी अर्चना वर्मा अर्जुन सिंह नेगी अविनाश त्रिपाठी अशोक गौतम अशोक जैन पोरवाल अशोक शुक्ल अश्विनी कुमार आलोक आई बी अरोड़ा आकांक्षा यादव आचार्य बलवन्त आचार्य शिवपूजन सहाय आजादी आदित्य प्रचंडिया आनंद टहलरामाणी आनन्द किरण आर. के. नारायण आरकॉम आरती आरिफा एविस आलेख आलोक कुमार आलोक कुमार सातपुते आशीष कुमार त्रिवेदी आशीष श्रीवास्तव आशुतोष आशुतोष शुक्ल इंदु संचेतना इन्दिरा वासवाणी इन्द्रमणि उपाध्याय इन्द्रेश कुमार इलाहाबाद ई-बुक ईबुक ईश्वरचन्द्र उपन्यास उपासना उपासना बेहार उमाशंकर सिंह परमार उमेश चन्द्र सिरसवारी उमेशचन्द्र सिरसवारी उषा छाबड़ा उषा रानी ऋतुराज सिंह कौल ऋषभचरण जैन एम. एम. चन्द्रा एस. एम. चन्द्रा कथासरित्सागर कर्ण कला जगत कलावंती सिंह कल्पना कुलश्रेष्ठ कवि कविता कहानी कहानी संग्रह काजल कुमार कान्हा कामिनी कामायनी कार्टून काशीनाथ सिंह किताबी कोना किरन सिंह किशोरी लाल गोस्वामी कुंवर प्रेमिल कुबेर कुमार करन मस्ताना कुसुमलता सिंह कृश्न चन्दर कृष्ण कृष्ण कुमार यादव कृष्ण खटवाणी कृष्ण जन्माष्टमी के. पी. सक्सेना केदारनाथ सिंह कैलाश मंडलोई कैलाश वानखेड़े कैशलेस कैस जौनपुरी क़ैस जौनपुरी कौशल किशोर श्रीवास्तव खिमन मूलाणी गंगा प्रसाद श्रीवास्तव गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर ग़ज़लें गजानंद प्रसाद देवांगन गजेन्द्र नामदेव गणि राजेन्द्र विजय गणेश चतुर्थी गणेश सिंह गांधी जयंती गिरधारी राम गीत गीता दुबे गीता सिंह गुंजन शर्मा गुडविन मसीह गुनो सामताणी गुरदयाल सिंह गोरख प्रभाकर काकडे गोवर्धन यादव गोविन्द वल्लभ पंत गोविन्द सेन चंद्रकला त्रिपाठी चंद्रलेखा चतुष्पदी चन्द्रकिशोर जायसवाल चन्द्रकुमार जैन चाँद पत्रिका चिकित्सा शिविर चुटकुला ज़कीया ज़ुबैरी जगदीप सिंह दाँगी जयचन्द प्रजापति कक्कूजी जयश्री जाजू जयश्री राय जया जादवानी जवाहरलाल कौल जसबीर चावला जावेद अनीस जीवंत प्रसारण जीवनी जीशान हैदर जैदी जुगलबंदी जुनैद अंसारी जैक लंडन ज्ञान चतुर्वेदी ज्योति अग्रवाल टेकचंद ठाकुर प्रसाद सिंह तकनीक तक्षक तनूजा चौधरी तरुण भटनागर तरूण कु सोनी तन्वीर ताराशंकर बंद्योपाध्याय तीर्थ चांदवाणी तुलसीराम तेजेन्द्र शर्मा तेवर तेवरी त्रिलोचन दामोदर दत्त दीक्षित दिनेश बैस दिलबाग सिंह विर्क दिलीप भाटिया दिविक रमेश दीपक आचार्य दुर्गाष्टमी देवी नागरानी देवेन्द्र कुमार मिश्रा देवेन्द्र पाठक महरूम दोहे धर्मेन्द्र निर्मल धर्मेन्द्र राजमंगल नइमत गुलची नजीर नज़ीर अकबराबादी नन्दलाल भारती नरेंद्र शुक्ल नरेन्द्र कुमार आर्य नरेन्द्र कोहली नरेन्‍द्रकुमार मेहता नलिनी मिश्र नवदुर्गा नवरात्रि नागार्जुन नाटक नामवर सिंह निबंध नियम निर्मल गुप्ता नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’ नीरज खरे नीलम महेंद्र नीला प्रसाद पंकज प्रखर पंकज मित्र पंकज शुक्ला पंकज सुबीर परसाई परसाईं परिहास पल्लव पल्लवी त्रिवेदी पवन तिवारी पाक कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार श्रीवास्तव मनोज दास ममता सिंह मयंक चतुर्वेदी महापर्व छठ महाभारत महावीर प्रसाद द्विवेदी महाशिवरात्रि महेंद्र भटनागर महेन्द्र देवांगन माटी महेश कटारे महेश कुमार गोंड हीवेट महेश सिंह महेश हीवेट मानसून मार्कण्डेय मिलन चौरसिया मिलन मिलान कुन्देरा मिशेल फूको मिश्रीमल जैन तरंगित मीनू पामर मुकेश वर्मा मुक्तिबोध मुर्दहिया मृदुला गर्ग मेराज फैज़ाबादी मैक्सिम गोर्की मैथिली शरण गुप्त मोतीलाल जोतवाणी मोहन कल्पना मोहन वर्मा यशवंत कोठारी यशोधरा विरोदय यात्रा संस्मरण योग योग दिवस योगासन योगेन्द्र प्रताप मौर्य योगेश अग्रवाल रक्षा बंधन रच रचना समय रजनीश कांत रत्ना राय रमेश उपाध्याय रमेश राज रमेशराज रवि रतलामी रवींद्र नाथ ठाकुर रवीन्द्र अग्निहोत्री रवीन्द्र नाथ त्यागी रवीन्द्र संगीत रवीन्द्र सहाय वर्मा रसोई रांगेय राघव राकेश अचल राकेश दुबे राकेश बिहारी राकेश भ्रमर राकेश मिश्र राजकुमार कुम्भज राजन कुमार राजशेखर चौबे राजीव रंजन उपाध्याय राजेन्द्र कुमार राजेन्द्र विजय राजेश कुमार राजेश गोसाईं राजेश जोशी राधा कृष्ण राधाकृष्ण राधेश्याम द्विवेदी राम कृष्ण खुराना राम शिव मूर्ति यादव रामचंद्र शुक्ल रामचन्द्र शुक्ल रामचरन गुप्त रामवृक्ष सिंह रावण राहुल कुमार राहुल सिंह रिंकी मिश्रा रिचर्ड फाइनमेन रिलायंस इन्फोकाम रीटा शहाणी रेंसमवेयर रेणु कुमारी रेवती रमण शर्मा रोहित रुसिया लक्ष्मी यादव लक्ष्मीकांत मुकुल लक्ष्मीकांत वैष्णव लखमी खिलाणी लघु कथा लघुकथा लतीफ घोंघी ललित ग ललित गर्ग ललित निबंध ललित साहू जख्मी ललिता भाटिया लाल पुष्प लावण्या दीपक शाह लीलाधर मंडलोई लू सुन लूट लोक लोककथा लोकतंत्र का दर्द लोकमित्र लोकेन्द्र सिंह विकास कुमार विजय केसरी विजय शिंदे विज्ञान कथा विद्यानंद कुमार विनय भारत विनीत कुमार विनीता शुक्ला विनोद कुमार दवे विनोद तिवारी विनोद मल्ल विभा खरे विमल चन्द्राकर विमल सिंह विरल पटेल विविध विविधा विवेक प्रियदर्शी विवेक रंजन श्रीवास्तव विवेक सक्सेना विवेकानंद विवेकानन्द विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक विश्वनाथ प्रसाद तिवारी विष्णु नागर विष्णु प्रभाकर वीणा भाटिया वीरेन्द्र सरल वेणीशंकर पटेल ब्रज वेलेंटाइन वेलेंटाइन डे वैभव सिंह व्यंग्य व्यंग्य के बहाने व्यंग्य जुगलबंदी व्यथित हृदय शंकर पाटील शगुन अग्रवाल शबनम शर्मा शब्द संधान शम्भूनाथ शरद कोकास शशांक मिश्र भारती शशिकांत सिंह शहीद भगतसिंह शामिख़ फ़राज़ शारदा नरेन्द्र मेहता शालिनी तिवारी शालिनी मुखरैया शिक्षक दिवस शिवकुमार कश्यप शिवप्रसाद कमल शिवरात्रि शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी शीला नरेन्द्र त्रिवेदी शुभम श्री शुभ्रता मिश्रा शेखर मलिक शेषनाथ प्रसाद शैलेन्द्र सरस्वती शैलेश त्रिपाठी शौचालय श्याम गुप्त श्याम सखा श्याम श्याम सुशील श्रीनाथ सिंह श्रीमती तारा सिंह श्रीमद्भगवद्गीता श्रृंगी श्वेता अरोड़ा संजय दुबे संजय सक्सेना संजीव संजीव ठाकुर संद मदर टेरेसा संदीप तोमर संपादकीय संस्मरण संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018 सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन सतीश कुमार त्रिपाठी सपना महेश सपना मांगलिक समीक्षा सरिता पन्थी सविता मिश्रा साइबर अपराध साइबर क्राइम साक्षात्कार सागर यादव जख्मी सार्थक देवांगन सालिम मियाँ साहित्य समाचार साहित्यिक गतिविधियाँ साहित्यिक बगिया सिंहासन बत्तीसी सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध सीताराम गुप्ता सीताराम साहू सीमा असीम सक्सेना सीमा शाहजी सुगन आहूजा सुचिंता कुमारी सुधा गुप्ता अमृता सुधा गोयल नवीन सुधेंदु पटेल सुनीता काम्बोज सुनील जाधव सुभाष चंदर सुभाष चन्द्र कुशवाहा सुभाष नीरव सुभाष लखोटिया सुमन सुमन गौड़ सुरभि बेहेरा सुरेन्द्र चौधरी सुरेन्द्र वर्मा सुरेश चन्द्र सुरेश चन्द्र दास सुविचार सुशांत सुप्रिय सुशील कुमार शर्मा सुशील यादव सुशील शर्मा सुषमा गुप्ता सुषमा श्रीवास्तव सूरज प्रकाश सूर्य बाला सूर्यकांत मिश्रा सूर्यकुमार पांडेय सेल्फी सौमित्र सौरभ मालवीय स्नेहमयी चौधरी स्वच्छ भारत स्वतंत्रता दिवस स्वराज सेनानी हबीब तनवीर हरि भटनागर हरि हिमथाणी हरिकांत जेठवाणी हरिवंश राय बच्चन हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन हरिशंकर परसाई हरीश कुमार हरीश गोयल हरीश नवल हरीश भादानी हरीश सम्यक हरे प्रकाश उपाध्याय हाइकु हाइगा हास-परिहास हास्य हास्य-व्यंग्य हिंदी दिवस विशेष हुस्न तबस्सुम 'निहाँ' biography dohe hindi divas hindi sahitya indian art kavita review satire shatak tevari undefined
नाम

 आलेख ,1, कविता ,1, कहानी ,1, व्यंग्य ,1,14 सितम्बर,7,14 september,6,15 अगस्त,4,2 अक्टूबर अक्तूबर,1,अंजनी श्रीवास्तव,1,अंजली काजल,1,अंजली देशपांडे,1,अंबिकादत्त व्यास,1,अखिलेश कुमार भारती,1,अखिलेश सोनी,1,अग्रसेन,1,अजय अरूण,1,अजय वर्मा,1,अजित वडनेरकर,1,अजीत प्रियदर्शी,1,अजीत भारती,1,अनंत वडघणे,1,अनन्त आलोक,1,अनमोल विचार,1,अनामिका,3,अनामी शरण बबल,1,अनिमेष कुमार गुप्ता,1,अनिल कुमार पारा,1,अनिल जनविजय,1,अनुज कुमार आचार्य,5,अनुज कुमार आचार्य बैजनाथ,1,अनुज खरे,1,अनुपम मिश्र,1,अनूप शुक्ल,14,अपर्णा शर्मा,6,अभिमन्यु,1,अभिषेक ओझा,1,अभिषेक कुमार अम्बर,1,अभिषेक मिश्र,1,अमरपाल सिंह आयुष्कर,2,अमरलाल हिंगोराणी,1,अमित शर्मा,3,अमित शुक्ल,1,अमिय बिन्दु,1,अमृता प्रीतम,1,अरविन्द कुमार खेड़े,5,अरूण देव,1,अरूण माहेश्वरी,1,अर्चना चतुर्वेदी,1,अर्चना वर्मा,2,अर्जुन सिंह नेगी,1,अविनाश त्रिपाठी,1,अशोक गौतम,3,अशोक जैन पोरवाल,14,अशोक शुक्ल,1,अश्विनी कुमार आलोक,1,आई बी अरोड़ा,1,आकांक्षा यादव,1,आचार्य बलवन्त,1,आचार्य शिवपूजन सहाय,1,आजादी,3,आदित्य प्रचंडिया,1,आनंद टहलरामाणी,1,आनन्द किरण,3,आर. के. नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी खूबचंदाणी,1,बकर पुराण,1,बजरंग बिहारी तिवारी,1,बरसाने लाल चतुर्वेदी,1,बलबीर दत्त,1,बलराज सिंह सिद्धू,1,बलूची,1,बसंत त्रिपाठी,2,बातचीत,1,बाल कथा,326,बाल कलम,23,बाल दिवस,3,बालकथा,48,बालकृष्ण भट्ट,1,बालगीत,8,बृज मोहन,2,बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष,1,बेढब बनारसी,1,बैचलर्स किचन,1,बॉब डिलेन,1,भरत त्रिवेदी,1,भागवत रावत,1,भारत कालरा,1,भारत भूषण अग्रवाल,1,भारत यायावर,2,भावना राय,1,भावना शुक्ल,5,भीष्म साहनी,1,भूतनाथ,1,भूपेन्द्र कुमार दवे,1,मंजरी शुक्ला,2,मंजीत ठाकुर,1,मंजूर एहतेशाम,1,मंतव्य,1,मथुरा प्रसाद नवीन,1,मदन सोनी,1,मधु त्रिवेदी,2,मधु संधु,1,मधुर नज्मी,1,मधुरा प्रसाद नवीन,1,मधुरिमा प्रसाद,1,मधुरेश,1,मनीष कुमार सिंह,4,मनोज कुमार,6,मनोज कुमार झा,5,मनोज कुमार पांडेय,1,मनोज कुमार श्रीवास्तव,2,मनोज दास,1,ममता सिंह,2,मयंक चतुर्वेदी,1,महापर्व छठ,1,महाभारत,2,महावीर प्रसाद द्विवेदी,1,महाशिवरात्रि,1,महेंद्र भटनागर,3,महेन्द्र देवांगन माटी,1,महेश कटारे,1,महेश कुमार गोंड हीवेट,2,महेश सिंह,2,महेश हीवेट,1,मानसून,1,मार्कण्डेय,1,मिलन चौरसिया मिलन,1,मिलान कुन्देरा,1,मिशेल फूको,8,मिश्रीमल जैन तरंगित,1,मीनू पामर,2,मुकेश वर्मा,1,मुक्तिबोध,1,मुर्दहिया,1,मृदुला गर्ग,1,मेराज फैज़ाबादी,1,मैक्सिम गोर्की,1,मैथिली शरण गुप्त,1,मोतीलाल जोतवाणी,1,मोहन कल्पना,1,मोहन वर्मा,1,यशवंत कोठारी,8,यशोधरा विरोदय,2,यात्रा संस्मरण,16,योग,3,योग दिवस,3,योगासन,2,योगेन्द्र प्रताप मौर्य,1,योगेश अग्रवाल,2,रक्षा बंधन,1,रच,1,रचना समय,72,रजनीश कांत,2,रत्ना राय,1,रमेश उपाध्याय,1,रमेश राज,26,रमेशराज,8,रवि रतलामी,2,रवींद्र नाथ ठाकुर,1,रवीन्द्र अग्निहोत्री,4,रवीन्द्र नाथ त्यागी,1,रवीन्द्र संगीत,1,रवीन्द्र सहाय वर्मा,1,रसोई,1,रांगेय राघव,1,राकेश अचल,3,राकेश दुबे,1,राकेश बिहारी,1,राकेश भ्रमर,5,राकेश मिश्र,2,राजकुमार कुम्भज,1,राजन कुमार,2,राजशेखर चौबे,6,राजीव रंजन उपाध्याय,11,राजेन्द्र कुमार,1,राजेन्द्र विजय,1,राजेश कुमार,1,राजेश गोसाईं,2,राजेश जोशी,1,राधा कृष्ण,1,राधाकृष्ण,1,राधेश्याम द्विवेदी,5,राम कृष्ण खुराना,6,राम शिव मूर्ति यादव,1,रामचंद्र शुक्ल,1,रामचन्द्र शुक्ल,1,रामचरन गुप्त,5,रामवृक्ष सिंह,10,रावण,1,राहुल कुमार,1,राहुल सिंह,1,रिंकी मिश्रा,1,रिचर्ड फाइनमेन,1,रिलायंस इन्फोकाम,1,रीटा शहाणी,1,रेंसमवेयर,1,रेणु कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,224,लघुकथा,806,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1880,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
ltr
item
रचनाकार: राकेश भ्रमर की कहानी - प्रतिदान
राकेश भ्रमर की कहानी - प्रतिदान
http://lh3.ggpht.com/-yUtx0a3K78k/T9RABLb-06I/AAAAAAAAMf4/sHYDbSyDPjE/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
http://lh3.ggpht.com/-yUtx0a3K78k/T9RABLb-06I/AAAAAAAAMf4/sHYDbSyDPjE/s72-c/image%25255B2%25255D.png?imgmax=800
रचनाकार
http://www.rachanakar.org/2012/06/blog-post_10.html
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/
http://www.rachanakar.org/2012/06/blog-post_10.html
true
15182217
UTF-8
सभी पोस्ट लोड किया गया कोई पोस्ट नहीं मिला सभी देखें आगे पढ़ें जवाब दें जवाब रद्द करें मिटाएँ द्वारा मुखपृष्ठ पृष्ठ पोस्ट सभी देखें आपके लिए और रचनाएँ विषय ग्रंथालय खोजें सभी पोस्ट आपके निवेदन से संबंधित कोई पोस्ट नहीं मिला मुख पृष्ठ पर वापस रविवार सोमवार मंगलवार बुधवार गुरूवार शुक्रवार शनिवार रवि सो मं बु गु शु शनि जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जून जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर जन फर मार्च अप्रैल मई जून जुला अग सितं अक्तू नवं दिसं अभी अभी 1 मिनट पहले $$1$$ minutes ago 1 घंटा पहले $$1$$ hours ago कल $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago 5 सप्ताह से भी पहले फॉलोअर फॉलो करें यह प्रीमियम सामग्री तालाबंद है चरण 1: साझा करें. चरण 2: ताला खोलने के लिए साझा किए लिंक पर क्लिक करें सभी कोड कॉपी करें सभी कोड चुनें सभी कोड आपके क्लिपबोर्ड में कॉपी हैं कोड / टैक्स्ट कॉपी नहीं किया जा सका. कॉपी करने के लिए [CTRL]+[C] (या Mac पर CMD+C ) कुंजियाँ दबाएँ