शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 11 : शोभा रस्तोगी शोभा की कहानी - उधड़ी सीवन

कहानी

उधड़ी  सीवन

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शोभा रस्तोगी शोभा 

कल रक्षाबंधन का दिन था। पल-पल इंतजार में बीता। कितने अरमान पूरे करने थे इस दिन। खीर,छोले, पनीर, बेसनी पूरी, सलाद, सेवइयां -न जाने क्या -क्या बना डाला था उसने। अपने इकलौते भाई का मन पसंद खाना ,वहीं इकलौती ननद की पसंद के राजमा-चावल। पर न राजकुमार- सा भाई आया और न ही परियों-सी ननद। कितने वर्ष व्यतीत हुए राखी बाँधे। एक उदास अनवरत सिलसिला चल रहा था राखी पोस्ट करने का। भाई की कलाई पर राखी सजाने को उसके हाथ तरस गए थे। राखी के दिन उसकी अँगुलियों में कम्पन बंद ही नहीं होता। दिल बैठ-बैठ जाता पर भाई नहीं आता। भेजी गयी राखी का भी कोई जवाब नहीं मिलता। फिर भी वह रिसते रिश्तों के घावों पर मरहम लगाने का अनथक प्रयास करते हुए प्रति वर्ष राखी भेजती रहती।

इस रक्षाबंधन पर भाई के आगमन की पूरी आस थी।

गाँव की ज़मीन का  बंटवारा होना था। भाई माँ से अलग रहता था। माँ अकेली। उसने ही माँ को समझाकर ज़मीन भाई को देने का फैसला लिया था। पिताजी रहे नहीं। कोर्ट से उसके नाम की बात भी उठी थी। भाई ने उसे पत्र लिखा।

'छोटी ! तुम अपने हिस्से की ज़मीन स्वेच्छा से मेरे नाम कर रही हो। इस बाबत अपना बयान लिखकर साइन कर भेज देना। ' दुःख तो बहुत हुआ। कभी न पूछने वाले भाई का पत्र ? दिल ने गुस्से में कहा,'क्यूं कर दूं मै ज़मीन तेरे नाम भाई ? कब तूने भाई का रिश्ता निभाया ? कब बहन के हाथों राखी बंधवाई ? कब बहन की ड्योड़ी पर कदम रखा ? बच्चों को कब मामा का प्यार दिया ? फिर मै क्यों सोचूं तुम्हारे लिए भाई ? '
'नहीं ,नहीं। मुझे क्या करना है ज़मीन का ?  मेरे माँ के घर जाने पर वह मुझसे मिलने तो आता है न। ज़मीन उसे न देने से वह आस भी टूट जाएगी। पहली बार उसने मुझसे कुछ माँगा है। मै उसे निराश नहीं करूंगी।  '

उसने भाई को फ़ोन कर दिया - ठीक है। मेरा लिखित बयान राखी पर आकर ले जाना।  ' भाई ने हामी भर ली थी। किन्तु राखी का दिन तो सूना ही निकल गया। उसके पति की कलाई भी राखी के दिन सूनी रही थी। हर वर्ष तो उसकी ननद राखी पर आया करती थी। इस बार क्यों नहीं ? उसे स्मरण आया।

छोटी देवरानी बता रही थी ,'दीदी ने गाँव की हवेली मे से हिस्सा माँगा था। ' उसके पति के दोनों भाईयों ने साफ कह दिया ,' हवेली में से हिस्सा चाहिए तो हमारे राखी-टीके बंद। अपना हिस्सा ले और रास्ता नाप। '
परन्तु उसने ननद को बुला भेजा था ,'हिस्सा ले लो मगर हमारी राखी सूनी मत करना।’। ननद ने राखी पर आने को भी कहा था। फिर ऐसा क्या हो गया कि उसके दोनों हाथ ख़ाली रह गए ?

' तुम्हें बहुत इंतजार था न अपने भाई और अपनी ननद का ! बना लिए छत्तीस व्यंजन ? उतार ली दोनों की आरती ? तुम्हारा भाई और मेरी बहन - गिरगिट हैं गिरगिट  ! स्वार्थी कहीं के !' दुःख से आहत पति ने ताना मारा था उसे। रात भर आंसुओं से भीगती रही। सुबकती रही। सिसकती रही। भोगती रही पीड़ा उस बचपन की जिसकी यादें उसके कलेजे को चीर -चीर जाती थी। धुंधलके छाने लगे यादों के मन पर।

स्कूल से घर आने तक यही भाई उसका इंतजार करता रहता। कंधे पर बिठाकर सारे मोहल्ले में घूमा करता। उसके बीमार होने पर भगवान की तस्वीर के सामने प्रार्थना किया करता। उसकी डोली उठने के बाद कितने दिन भूखा - प्यासा रहा गोया उसका सब कुछ किसी ने छीन लिया हो।

इतना प्रेम करने वाला भाई, भाभी के आते ही कैसे इत्ता बदल गया ? 

और उसकी ननद ? कितना चाहते थे उसके पति अपनी बहन को ! पैसा न होने पर भी बाज़ार से मोटी ब्याज पर रुपैया उधार लिया। बहन की शादी करवाई। बहन के अपनी पसंद से शादी करने पर कितना बावेला मचा था परिवार में ? पिताजी ने तो साफ मना कर दिया था ,' म्हारी मर्जी से या सादी कतई न हो सके है। मैं फूटी कौड़ी भी न दूं। '  तब उसके पति ने ही घर के विरूद्ध जाकर यह शादी करवाई। परिवार को समझाया। उसके अपने जेवर, बरतन-भांडे ,दहेज़ का सभी सामान अपनी बहन को दे दिया। ननद की बीमारी में उसने ही ननद की सेवा की। अपने घर बुलाकर ननद का इलाज करवाया। खुद पाई-पाई को तरसती रही। फटी धोतियों पर पैबंद लगा-लगाकर पहनती रही। अपने बच्चों को पुराने कपडे पहनाती रही। किन्तु ननद और उसके बच्चों को हर तीज-त्यौहार पर नए -नए कपडे भेजती रही। हवेली के मामले में भी उसने हामी भर ली थी। फिर भी?...... उसकी राखी सूनी रह गयी ?

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रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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तभी कालबेल बजी। डाकिया था। भाई का पत्र था। लिखा था,' राखी पर न आ सका। जरूरी काम आ गया था। ज़मीन मेरे नाम करने सम्बन्धी अपने बयान कोरिअर कर देना। जल्दी करना। '

पत्र पढते ही धम्म से बैठ गयी। राखी पर भाई-बहन के रिश्ते को आवाज देकर उसने कुछ ज्यादा मांग लिया था क्या ? ह्रदय डूबता जा रहा था। आँखों के सामने तारे टिमटिमाने लगे। लगा बेहोश हो जाएगी। उसी क्षण उसे गश आ गया।

बेटे ने संभाला उसे। डा० को बुलाया। होश आने पर देखा कि पति सामने बैठे थे। बेटा सुबक रहा था। बिटिया एक कोने में दुबकी, सहमी सी खड़ी थी।  'क्या तुम्हें अपने परिवार से ज्यादा प्यारा है वो भाई जो तुमसे कोई नाता नहीं रखना चाहता ?' पति की आँखों में नाराज़गी के आंसू छलक रहे थे।  ' हाँ मम्मा ! जब मामा आपकी केयर नहीं करते तो आप भी ठोक दो न अपना दावा। यू शुड टेक योअर शेअर मम्मा ! ' बेटे की आवाज में पिता की प्रतिध्वनि गूँज रही थी।  ' मम्मा! मामा की वजह से हमें छोड़ कर मत जाना। ' बिटिया काँप रही थी। उसने खींचकर दोनों बच्चों को कलेजे से लगा लिया।
तत्काल फोन की घंटी बजी। पति ने रिसीवर उठाया।  ' हैलो भैया ! मै रीना ! '

' हाँ रीना ! कल राखी पर आने वाली थी न। पूरा दिन प्रतीक्षा देखी।‘ पति तनाव में थे।

' ओफ्फोह भैया ! कही कुछ जरूरी काम था। राखी का क्या है हर साल तो आती है। अच्छा सुनो ! हवेली से मेरे शेयर का चेक मुझे कोरिअर कर देना। थेंक्यू । ' और फोन कट गया। पति ने जोर से रिसीवर पटक दिया। रही-सही कसर भी पूरी हो गयी।  ' लो ! देख लो। जिन रिश्तों को निभाने की जिद कर रही हो , उन्हें तुम्हारा कितना ध्यान है ? मेरी बहन अपने शेयर का चेक भिजवाने का और तुम्हारा भाई ज़मीन अपने नाम करवाने का हुकम दे रहा है। बस निभ गए रिश्ते। ये रिश्ते नहीं रिश्तों की जिन्दा लाश है जिन्हें मेरे-तुम्हारे जैसे लोग अपनी टूटी कमर पर उठाये फिरते है। छिटक दो इन लाशों को। सीधी कर लो अपनी कमर। हमें नहीं निभाने ये बदबूदार रिश्ते।  ' पति बोलते जा रहे थे। उनकी आत्मा घायल हो गयी थी। उसे लगा रिश्तों में नागफनी उग आई है।

' हाँ तो इसमें गलत क्या है ? ननद बाई को उनके शेयर का चेक पोस्ट कर दो। मेरे भाई को मेरा स्टेटमेंट लेटर भी भेज दो। वे न निभाए न सही।
हमें इन रिश्तों की डोर तो जोड़नी ही पड़ेगी।
उसकी बिटिया, बेटा और पति उसे विस्फारित नेत्रों से देख रहे थे।

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शोभा रस्तोगी शोभा

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.आत्म परिचय

नाम-   शोभा रस्तोगी  शोभा      mo- 9650267277

शिक्षा - एम. ए. [अंग्रेजी-हिंदी ], बी. एड. , शिक्षा विशारद, संगीत प्रभाकर [ तबला ]        

जन्म - 26- अक्तूबर 1968 ,  अलीगढ [ उ. प्र. ]

सम्प्रति - सरकारी विद्यालय दिल्ली  में अध्यापिका

पता - RZ-D.-- 208, B, डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर - || पालम कालोनी, नई दिल्ली -110077.भारत

मेरी प्रकाशित रचनाएँ.----  पंजाब केसरी, कादम्बिनी,कल्पान्त, राष्ट्र किंकर, हम सब साथ साथ, केपिटल रिपोर्टर,कथा संसार,  बहुजन विकास, न्यू ऑब्जर्वर पोस्ट, शैल सूत्र, जर्जर कश्ती,सुमन सागर आदि   में  लघुकथा, कविता, कहानी, लेख,समीक्षा आदि प्रकाशित | ' खिडकियों पर टंगे लोग ' लघुकथा  संग्रह  में लघुकथाएं संकलित |आकाशवाणी भोपाल से लेख प्रसारित | आकाशवाणी नई दिल्ली से ब्रज भाषा मै कहानियां प्रसारित |

ओंन लाइन पोर्टल पर प्रकाशित -- सृजनगाथा.कॉम , लघुकथा.कॉम , साहित्याशिल्पी.कॉम , शब्दकार.कॉम , रचनाकार.कॉम, स्वर्गविभा.कोम, हिंदी चेतना[कनाडा] पर शेर , लघुकथा व कविता, समीक्षा प्रकाशित|

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सम्मान -युवा लघुकथाकार सम्मन२०१०

पंचवटी राष्ट्रभाषा सम्मान २०११

नारायणी साहित्य सम्मान २०१२

ईमेल - shobharastogishobha@gmail.com

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