सोमवार, 30 जुलाई 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 13 - कैस जौनपुरी की कहानी : मिट्टी के खिलौने

- कहानी -

- मिट्टी के खिलौने -

- कैस जौनपुरी -

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रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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“इन्सान मिट्टी का बना है...” ऐसा सभी कहते हैं. कुछ लोग इस बात से इत्‍तफाक नहीं रखते. न सही, लेकिन ‘मटिहार’ इस बात को मानता था. क्‍योंकि वो भी मिट्टी के खिलौने बनाता था. उसके बनाए हुए मिट्टी के खिलौने बहुत पसंद किए जाते थे. लोग कहते थे “वाह मटिहार! तुम्हारे हाथों में तो जादू है.” तब मटिहार कहता था “जादू तो उसके हाथों में है जिसने हम सबको बनाया है. मेरे खिलौने तो बेजुबान हैं. बोल नहीं सकते. लेकिन हमलोग तो बोल सकते हैं. इसलिए तारीफ़ उसकी होनी चाहिए जिसने इतने सारे खिलौने बनाए और उसमें जान फूंक दी और हम ‘मिट्टी के खिलौने’ होकर भी चल-फिर सकते हैं.”

लोग तारीफ़ करके चले जाते थे. मटिहार अपने काम में लग जाता था. मिट्टी के खिलौने बनाने का शौक उसे बचपन से था. जब उसके पिताजी खिलौने बनाते थे तब वो अपने पिताजी का हाथ बटांता था. उसके पिताजी उसकी लगन देखकर कहते थे, “देखना....एक दिन तुम्हारे बनाये हुए मिट्टी के खिलौने बोलने लगेंगे...”

पिताजी की कही हुई बात अभी तक तो सच नहीं हुई थी. होती भी कैसे? भला कभी मिट्टी का खिलौना भी बोलता है? मटिहार के पिताजी तो बस यूँ ही उसका मन रखने के लिए कह देते थे. एक बार तो उन्होंने ये भी कह दिया था, “अगर तुम इसी तरह सच्‍चे मन से खिलौने बनाते रहे तो एक दिन ये खिलौने खुद तुमसे कहेंगे कि “मेरी शकल थोड़ी अच्छी बनाना...” एक बच्‍चे को बहलाने के लिए तो ये सब ठीक था मगर जब मटिहार के पिताजी की मौत हो गई और मटिहार अकेला रह गया तब उसे अपने पिताजी की कही हुई बातें बहुत परेशान करती थीं.

मटिहार अपने खिलौनों से बातें करता था. उसकी जिन्दगी में अब सिर्फ ‘मिट्टी के खिलौने’ ही सबकुछ थे. पिताजी के जाने के बाद कुछ दिनों तक तो मटिहार पिताजी की बातों को सही मानता रहा लेकिन जब लोग उसकी बातों का मजाक उड़ाने लगे तब मटिहार को लगा “शायद...लोग सही कहते हैं...मिट्टी के खिलौने कभी बोल नहीं सकते...चल-फिर नहीं सकते...पिताजी सिर्फ मेरा मन बहलाने के लिए ऐसा करते थे...”

मटिहार ने खुद को समझा लिया था कि “ये मिट्टी के खिलौने सिर्फ उसकी रोजी-रोटी का साधन मात्र हैं, और कुछ भी नहीं....” मटिहार ने खुद को तो समझा लिया था मगर दूर कहीं उसके मन के अन्दर एक छोटा बच्‍चा अभी भी मौजूद था जो चाहता था कि ‘ये खिलौने बोलें...ये खिलौने मेरी बात मानें...मैं लोगों को दिखाऊं कि “देखो...लोगों...देखो..! मेरे मिट्टी के खिलौने बोलते हैं...”

मगर जब बड़े और समझदार लोग बीच में आ जाते हैं तब एक बच्‍चे का भोलापन जो ‘कुछ भी’ कर सकता है... ‘कुछ भी’ नहीं कर पाता है...मटिहार को किसी ने भी कभी झूठी तसल्‍ली के लिए भी नहीं कहा कि, “...ठीक है...तुम बनाओ...हम भी देखना चाहेंगे...तुम्हारे...बोलते हुए...मिट्टी के खिलौने...” सिर्फ एक उसके पिताजी ही थे जो उसे बच्‍चा समझ के बहकाते रहते थे.

लेकिन मटिहार अब बड़ा हो चुका था. उसने मिट्टी के खिलौनों के अलावा अपनी जिन्दगी में कुछ सोचा ही नहीं. यहाँ तक कि अभी तक कुंवारा ही रहा. लोग कहते थे “शादी कर लो मियां...नहीं, कुंवारे रह जाओगे...फिर मिट्टी की ही एक दुल्हन बनानी पड़ेगी....” लोग हँसते थे मटिहार के ऊपर.

मगर मटिहार लोगों की बातों का जवाब नहीं देता था. सारा गुस्सा पी जाता था. मटिहार लोगों के लिए मजाक जरूर बन चुका था मगर उसके खिलौने सचमुच के जिन्दा इंसान लगते थे. कमी थी तो बस इन खिलौनों में जान नहीं थी. लगता तो था कि “ये खिलौने बस अभी बोल पड़ेंगे...मगर सच तो यही था कि ये मिट्टी के खिलौने थे.” मगर फिर भी, जो भी मटिहार के खिलौने खरीदता था, तारीफ़ किए बिना नहीं रह पाता था.

मटिहार मिट्टी से जिन्दगी के हर पहलू को दिखाने की कोशिश करता था. हंसी, खुशी, दुःख, दर्द, सबकुछ एकदम साफ़ झलकता था उसके खिलौनों में. मगर फिर भी मटिहार के मन में शान्ति नहीं थी. वो रोज खिलौने बनाता था और रोज सोचता था...”एक दिन मेरे खिलौने मुझसे बात करेंगे...” और “मटिहार आसमान की तरफ देखकर कहता था...वो दिन कब आएगा..?” आसमान से कोई जवाब नहीं आता था.

एक दिन वो खिलौने बेचने जा रहा था. रास्ते में उसकी बैलगाड़ी एक गड्‍ढ़े में फंस गई. बहुत कोशिशों के बावुजूद उसके बैल, गाड़ी को खींच नहीं पा रहे थे. तब मटिहार खुद नीचे उतर गया. उतरते हुए उसकी नज़र एक बार अपने खिलौनों पर पड़ी. उसे दिखा कि उसके खिलौनों में एक पहलवान भी है...

मटिहार को लगा जैसे वो मिट्टी का पहलवान कह रहा हो... “मालिक! मैं मदद करूँ...?” फिर मटिहार अपने खयालों की दुनिया से बाहर आया और मुस्कुराता हुआ गड्‍ढ़े को देखने लगा. वो खुद पहिए को गड्‍ढ़े से बाहर निकालने कि कोशिश करने लगा. उसे फिर लगा कि “उसका कोई खिलौना बैलों को हांक रहा है ताकि गाड़ी जल्दी से बाहर निकल जाए...” उसने अपना ध्यान खिलौनों से हटाकर गड्‍ढ़े पर लगाया और थोड़ी मेहनत के बाद पहिया गड्‍ढ़े से बाहर आ गया था. मटिहार वापस अपने खिलौनों की तरफ देखकर मुस्कुराता हुआ गाड़ी हांकने लगा.

उस दिन उसका मन बाज़ार में नहीं लग रहा था. उसे बार-बार ऐसा लग रहा था...कि आज उसके पहलवान खिलौने ने उसकी सच में मदद की थी. जब गाड़ी गड्‍ढ़े में थी और वो नीचे उतरकर पहिये को निकालने की कोशिश कर रहा था तब बैलों को किसने हांका...? यही सवाल उसके मन में बार-बार आ रहा था. फिर उसकी नजर उस पहलवान खिलौने पर पड़ी, वो हमेशा की तरह मुस्कुराता हुआ खड़ा था.

तभी एक ग्राहक आया. उसे वो पहलवान खिलौना बहुत पसन्द आया. उसका खड़े होने का अन्दाज निराला था. उस ग्राहक ने वो पहलवान खरीद लिया. अब वो पहलवान उस ग्राहक की गोद में था और वो ग्राहक उसे लेकर जा रहा था. मटिहार को लगा उसका पहलवान अब उदास लग रहा था. मगर उसने सोचा ये उसके अपने मन का ख्याल है. फिर शाम हो गई और मटिहार वापस आ गया.

अगली बार जब मटिहार खिलौने बेचने गया तब वही ग्राहक जो पहलवान खरीद कर ले गया था, वापस आया और शिकायत करने लगा, “तुमने मुझे दिखाया कुछ...और दिया कुछ और...!” मटिहार ने कहा, “मैं समझा नहीं.” उस ग्राहक ने कहा, “जो पहलवान तुमने मुझे दिखाया था वो हंसता हुआ था, था कि नहीं...?” मटिहार ने कहा, “हां, लेकिन हुआ क्‍या...?” तब उस ग्राहक ने कहा, “लेकिन जो खिलौना तुमने मुझे दिया उसका मुंह तो लटका हुआ है.” मटिहार ने कहा, “क्‍या कहते हैं...! मेरे पास तो एक ही पहलवान था, वो भी हंसता हुआ. और वही मैंने आपको दिया था.” उस ग्राहक ने अपने थैले में से वो मिट्टी का पहलवान बाहर निकाला और मटिहार को देते हुए कहा, “तुम अपने इस पहलवान को अपने पास रखो, और मेरे पैसे मुझे वापस करो. लोगों को ठगते हुए तुम्हें शरम नहीं आती...?” मटिहार ने उसके हाथ से पहलवान वापस लेकर खिलौनों के बीच रख दिया. मटिहार ने भी देखा, वो पहलवान उदास था. उसका मुंह लटका हुआ था. उसे यकीन नहीं हो रहा था. उसने उस ग्राहक से कहा, “आप नाराज न होइए. आप कोई दूसरा खिलौना देख लें.” ग्राहक झुंझलाते हुए बोला, “अच्छा, अब मिट्टी के खिलौनों में भी फेर-बदल होने लगी...! लोगों को बेवकूफ बनाते हो...?” मटिहार ने उस ग्राहक से माफी मांगी, “माफ कीजिए, मुझसे गलती हो गई. ये लीजिए आपके पैसे.”

पैसे वापस करते हुए मटिहार ने उस पहलवान खिलौने को एक बार फ़िर देखा. मगर ये क्‍या...? वो तो फ़िर से हंसता हुआ दिख रहा था. ग्राहक उसके हाथ से पैसे पकड़ने ही वाला था कि मटिहार ने कहा, “देखिए जनाब, यही खिलौना आपने वापस किया है अभी. ये तो अभी भी हंस रहा है. ग्राहक ने भी देखा. उसे यकीन न हुआ. वो मिट्टी का पहलवान सच में खुश हो गया था. ग्राहक ने अपना सिर झटका. मगर पहलवान फ़िर भी हंस रहा था. उसने कहा, “ये क्‍या तमाशा है...? दिखाते कुछ हो और बेचते कुछ हो...!!! देखो, तुमने जो मुझे दिखाया था वो पहलवान ये है. ये पैसे वापस रखो और मुझे मेरा पहलवान वापस कर दो.”

मटिहार को बड़ी खुशी हुई कि ग्राहक इस तरह वापस नहीं जा रहा है. उसने जैसे ही उस पहलवान खिलौने को ग्राहक के हाथ में दिया उसका मुंह फ़िर से लटक गया. ग्राहक ये देखके चकरा गया. इस बार उसने साफ़-साफ़ देखा था कि वही पहलवान है जिसे उसने पसन्द किया है. जब वो अपनी जगह पर था तो हंस रहा था. अब वो उसके हाथ में है तो उदास हो गया है. वो सोचने लगा, “भला, मिट्टी के खिलौने भी उदास होते हैं कहीं....!”

मगर उसने जब अपनी आंखों से देख लिया तो उसे यकीन न करने का कोई बहाना न मिला और इस बात से उसे इतना गहरा चक्‍कर आया कि वो गश खा के गिर पड़ा. मटिहार ने उसके मुंह पे पानी मारा तब उस ग्राहक को होश आया. और होश आते ही उसकी नजर उस मिट्टी के पहलवान पर पड़ी. अब वो पहलवान मुस्कुरा रहा था. ग्राहक को लगा अब वो पागल ही हो जाएगा, “भला मिट्टी के खिलौने भी कहीं हाव-भाव दिखाते है...? उस ग्राहक को अपनी आंखों पर यकीन न हुआ. वो सरपट दौड़ के भागा. मटिहार ने कहा, “साहब अपने पैसे तो लेते जाइए. मगर उसे इस वक्‍त पैसे कहां सूझ रहे थे.

फिर ये बात आग की तरह फैल गई. मटिहार ने अपने पहलवान को देखा और समझ गया कि उस दिन इसी पहलवान ने गड्‍ढ़े से गाड़ी निकालने में मेरी मदद की थी. इसका मतलब...??? इसका मतलब...मेरे खिलौनों में जान आ गई है...!!! मटिहार की खुशी का ठिकाना न रहा.

इसके बाद मटिहार बहुत संभल-संभल के खिलौने बनाने लगा. और उन्हें बहुत ध्यान से रखने लगा क्‍यूंकि उसके सारे खिलौने इन्सानी किरदारों से लिए गए थे. उसे डर लगने लगा कहीं किसी दिन ये आपस में लड़ न बैठें. मटिहार को अब किसी की बात की परवाह न थी. वो अपने खिलौनों में मस्त रहने लगा. अपने खिलौनों के साथ खेलने लगा. उसका जो मन करता वो खिलौना बना लेता और उसी से खेलने लगता.

उसे अपने पिताजी की कही हुई बात याद आने लगी. उसके पिताजी की कही हुई बात सच हो गई थी. उसकी लगन रंग लाई थी. उसने ऊपरवाले का शुक्रिया अदा किया क्‍योंकि ये सब उसकी ही वजह से मुमकिन हो सका था. उसे लोगों की बातें याद आने लगीं, लोग कहते थे, एक दिन अपने लिए मिट्टी की दुल्हन भी बना लेना. मटिहार ने सोचा, “चलो, लोगों के तानों का कुछ तो फायदा हो.”

फिर उसके बाद उसने एक मिट्टी की दुल्हन बनानी शुरू की. वो हैरान हुआ कि उसे मिट्टी की दुल्हन बनाते देखते हुए उसके सभी खिलौने देख रहे थे. कुछ खिलौने जिनका मुंह दूसरी तरफ़ था, अब वो भी घूम कर मटिहार की दुल्हन को देखने लगे थे. मटिहार मुस्कुराया और कहा, “ये मेरी दुल्हन है, तुम लोग नज़र मत लगाओ.” सभी खिलौने दूसरी तरफ घूम गए. मटिहार को यकीन न हुआ. उसके खिलौने उसकी बात भी मान रहे थे. मटिहार खुशी से फूला न समाया. उन्हीं खिलौनों में एक छोटा बच्‍चा भी था जो अब भी मटिहार की बन रही दुल्हन को घूर रहा था.

मटिहार उसके पास आया और बोला, “तुमको क्‍या तकलीफ़ है?” वो मिट्टी का छोटा बच्‍चा मुस्कुराया और बोला, “कुछ नहीं, मैं बस देख रहा हूं.” वो मिट्टी का बच्‍चा कुछ ऐसा बना था जैसे एक बच्‍चा पेट के बल लेटा हुआ हो और अपने दोनों हाथ अपने गालों पे रखके अपनी कुहनियां जमीन पे टिका रखी हों. और वो टकटकी लगाये बस देख रहा था. मटिहार ने मस्ती में एक बार फिर कहा, “क्‍या चाहिए तुम्हें?”

उस बच्‍चे ने कहा, “कुछ नहीं. मैं इससे दोस्ती करूंगा. आप पहले बना तो लो.”

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