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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 6 : राकेश कुमार ‘अयोध्‍या’ की कहानी - आहुति

आहुति

राकेश कुमार ‘अयोध्‍या’

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परमा गांव का ठेठवार था, पुरखे कभी गाय चराया करते किंतु अब जिंदगी ऐशो-आराम से कट रही थी। बाप ने अपनी मेहनत के बल पर खाने-पीने लायक दो चार बीघा जमीन बना एक नींव रखी, तो परमा ने उस पर अमीरी की इमारत खड़ी कर दी। परमा के हाथों जब कारोबार आया तो उद-सूद के रकम से उसने खूब धन बटोरा। इधर -उधर से धन आया तो पाप का भार कम करने चित्‍त धर्म पर आ टिका, लिहाजा पूजा-पाठ की ओर झुकाव बढ़ता गया। भगवान शिव के दर्शन होते रहें तो पाप कुछ कमतर हो, यही सोंच घर के पास शिव का एक मंदिर बनवा लिया।अब तो रोज सुबह नहा-धो शिवलिंग को दूध से स्‍नान करा दो-चार मंत्र पढ़ लेता या फिर चार दोहे रामायण के पढ़ जिव्‍हा को पवित्र कर लिया करता। समय बच जाता तो शाम के समय नौकर-चाकर के साथ मंदिर की चौखट पर बैठ कभी मंजीरे तो कभी थपौड़ी की थाप पर भजन-पूजन कर लिया करता। कोई ऐसा ग्रहण, त्‍यौहार खाली ना जाता जब घर पर अनुष्‍ठान या यज्ञ-हवन ना होते रहे हों। पाप के धन की बढ़ोतरी भी पपीते के पेड़ की तरह होती है, परमा का कारोबार दिन-दूना, रात-चौगुना बढ़ने लगा।

किसी ने कह दिया कि पाप के धन का दशांश गरीब, पुरोहित और अपाहिज को दान करने से धन की शुद्धि होती है, बस फिर क्‍या था तीज-त्‍यौहारों और ग्रहण मुक्‍ति के उपरांत अन्‍न-वस्‍त्र और अन्‍यान्‍य वस्‍तुओं के दान कर अपने धन को पवित्र करने यत्‍न किया करता। भले ही वह सूद-ब्‍याज के पैसे से रकम इकट्‌ठा करता पर दान-पुण्‍य करने में आस-पास में उसका कोई सानी ना था। परमा ठेठवार के इसी लक्षण को देख सब उसे परमा साधु कहा कहते, वह इस नाम से फूला ना समाता। वह चाहता भी था कि लूट-खसोट का कारोबार चलता रहे और उधर महात्‍मा का चोला भी साथ ना छूटने पाये। कभी पत्‍नी चंदा कहे देती कि ये सूद ब्‍याज के रकम से आदमी का बाढ़ रूक जाता है, चार लोगों की बद्‌दुआयें मिलती है सो अलग, तो परमा चिढ़ जाता, कहता-अरे। ये सब बकवास की बात है और इतने सारे पुण्‍य जो करता है वो?

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रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html 

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एक बार ऐसे ही गांव में साधु संतों की टोली आयी। सारे साधु शाम ढोलक मंजीरे की थाप पर गलियों में फेरी लगा सुबह के भिक्षाटन के लिये इत्‍तला कर किसी के चबुतरे पर आसमान के नीचे रात सो गये। पूस की कड़कड़ाती दांत कटरने वाली ढंड थी, एक वृद्ध संत को यह बर्दाश्‍त ना हुई और सुबह होते-होते भारी ठंड सें उनका शरीर ऐंठ गया। सुबह जब परमा ठेठवार को पता लगा तो उससे रहा ना गया। उसने आव देखा ना ताव और अपना घर, गांव आने वाले साधु-महात्‍माओं के लिये दान कर दिया। चंदा को जब मालूम चला तो ऐतराज करते कहने लगी- अरे। ये क्‍या सनकीपन है, कौन सा यहां साधु-संत बारहों महीने डेरा जमाये होते हैं। कभी-कभार के लिये तो उनका ठहरना होता है, उसमें पूरा घर देने की क्‍या जरूरत? बहुत हुआ तो एक कमरा दे देते। साधु संतों को जब पता चला तो उन्‍होंने भी हैरानी जतायी और इस दिये हुये दान को वापस लेने को कहा पर परमा तैयार ही नहीं हुआ। एक बार दे दिया सो दे दिया।

चंदा सुलक्षणी थी, पीली-पीली काया, चित्‍ताकर्षक नैन-नक्‍श, सुंदर गोल मुखड़़ा, बिल्‍कुल अपने नाम की तरह। वैसे तो उसके दो बच्‍चे थे पर बन-संवरकर निकल जाये तो मजाल है कोई कह दे कि ब्‍याह हो गये हैं। जितना सुंदर उसका चेहरा था, स्‍वभाव में भी वह उतनी ही सौम्‍य और सुशील थी। परमा के निर्णयों पर उसे कभी कोई ज्‍यादा एतराज नहीं होता था। वह जिसे चाहे जितना चाहे दे। ज्‍यादा हुआ, मन ना माना तो विरोध भी कर लिया, लेकिन गृहस्‍थी के सुख-चैन की कीमत पर नहीं। वैसे परमा का निर्णय ही सभी मामलों में अंतिम होता था। कुल मिलाकर चंदा आज्ञाकारी पत्‍नी थी और उनका वैवाहिक जीवन बड़े मजे से कट रहा था।

एक दिन परमा को घर पर सत्‍यनारायण की कथा सुनने का मन हुआ। उसने चंदा से कहा-चलो ना! घर में सत्‍यनारायण भगवान की कथा सुन लें, वैसे भी पंडितजनों का कहना है कि घर पर साल में एक बार सत्‍यनारायण भगवान की कथा जरूर सुननी चाहिये, इससे घर शुद्ध होता है, शांति मिलती है। पंडित बुलाये गये, गांव के सब लोग को निमंत्रित किया गया, घर पर कथा का आयोजन हुआ। पड़ेास के गांव के कुछ गण्‍यमान्‍य लोगों को भी निमंत्रित किया गया। यज्ञ, हवन-पूजन के उपरांत दक्षिणा की बारी आयी। जी भरकर दक्षिणा दी गयी।दक्षिणा पाकर पंडित अघा गया। वह परमा के गुण गाते नहीं थक रहा था। दक्षिणा देने को लेकर उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी। लोग कहते- क्‍या हुआ ब्‍याज से पैसे कमाता है, पर दान भी तो खुले हाथ देता है। कोई भी साधु-संत घर से वापस नां जाने पाते। पड़ोस के गांवों के पंडित उनके घर पूजन-हवन को जाने ललसायी उम्‍मीद लगाये बैठे होते, बस एक बार बुलाने की देर होती, गठरी बांधे चले आते।

एक बार परमा ठेठवार को भगवतपुराण सुनने का मन हुआ, पड़ोस के वृद्धजनों से सलाह ली तो सबने कहा कि भई यह तो पुण्‍य का काम है। कहते हैं कलियुग में मोक्ष पाना हो तो घर में एक बार भागवत-पुराण जरूर सुननी चाहिये। चंदा से सलाह लेने पर वह तो तुरंत खुशी-खुशी राजी हो गयी। पंडितों के नाम सुझाये गये, पर उसे एक भी रास ना आया। परमा चाहता था कि किसी ऐसे पंडित के मुखारविंद से भगवतपुराण का श्रवण करे जो परम विद्वान और गुणी हो। किसी ने बताया कि पड़ोस के गांव बलवानपुर के भद्रकाली महाराज का बेटा पंडित दीनदयालजी काशी से संस्‍कृत में विशारद है, परम विद्वान और गुणी है। संस्‍कृत के श्‍लोकों की इतनी सुंदर व्‍याख्‍या करते है कि सुनने वाले स्‍तब्‍ध होकर बस सुनते रह जाते हैं। परमा ने भी पंडित जी का नाम बहुत सुन रखा था। मुलाकात हुई, प्रणाम कर अनुनय-विनय किया तो थोड़े ना-नुकुर के बाद वे परमा के घर कथा वाचन को राजी हो गये।

पंडित दीनदयाल संस्‍कृत के उद्‌भट विद्वान थे, उनकी ख्‍याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। छः फीट का गोरा-नारा, उंचा-पूरा व्‍यक्‍तित्‍व था। उनके चमकते ललाट से उनकी विद्वत आभा साफ-साफ झलकती थी। वे जब कथा वाचन करते तो श्रोता सुध-बुध खो, मुग्‍ध होकर कथा श्रवण करते। उन्‍हे आसन पर विराजमान हो कथा कहते देख ऐसा लगता जैसे स्‍वयं सुकदेव मुनि पंडितजी के मुखारविंद पर विराजमान होकर उन्‍हें निमित्‍त बना कथावाचन कर रहे हों। बीच-बीच में पंडित जी मसखरे भी कर लिया करते, कहानियां तो पंडितजी की नसों में था। हर एक व्‍याख्‍या के पश्चात आस-पड़ोस से मेल खाती कुछ सुनी-सुनायी कहानियां जरूर कहते। कुल मिलाकर पंडित दीनदयाल को भलीभांति ज्ञान था कि कैसे श्रोताओं को बांधकर रखा जा सकता है। वे अन्‍य कथा वाचकों से काफी भिन्‍न थे, बीच-बीच में संस्‍कृत के लंबे-चौडे़ श्‍लोकों से श्रोंताओं को स्‍नान करा तालियों की गड़गड़ाहट से पंडाल को प्रतिध्‍वनित होने को मजबूर कर देते।

परमा ने भगवतपुराण के इस महायज्ञ को बड़े धूमधाम से करने पूरे गांव को दुल्‍हन की तरह सजाया, एक भव्‍य पंडाल पर मखमली सेज का आसन बनाया गया। कथावाचन के पूर्व पंडित जी ने परमा से साफ-साफ कह दिया कि वे दूसरे के हाथों से पका भोजन ग्रहण नहीं करते, सो उन्‍हें कक्ष पर केवल कच्‍चे भोजन सामग्री परोस दिये जावें। लिहाजा उनकी इच्‍छा को ध्‍यान में रखते हुये ईंधन के रूप में कंडे और लकड़ी उपलब्‍ध करा दी गयी। चंदा प्रतिदिन सायं स्‍वयं अपने हाथों से आटा, घी, दाल, नमक और तरकारी लेकर पंडित जी के कक्ष तक जाती और बड़ी श्रद्धा से प्रणाम कर वापस लौट आती। पंडितजी को परमा द्वारा दान किये गये उसी मकान पर ठहराया गया था।

पंडितजी कथा वाचन के पूर्व एक घण्‍टे तो माथे पर तिलक सजाने में लगाया करते। चंदन की लकड़ी को घिस कर लेप इकट्‌ठे करते, फिर माचिस की तीली से दोनों ओर एक ऋजु रेखा खींचते जिसे नीचे अधिक कोण पर मोड़ देते। बीच में केसर का लेप लगाते और फिर उस तिलक को फिनिंशिंग टच देते हुये कुंकुम की एक पतली रेखा से बाह्‌य रेखाओं को आवरण प्रदान करते। कहीं से थोड़ा भी भद्‌दा हुआ तो दस बार उन रेखाओं को मिटाया करते। उसके बाद झक सफेद धोती और कुर्ता पहनते। गले पर नारंगी रंग का एक फेंटा होता, जिसे बीच-बीच में सामने की ओर ठीक किया करते।

पंडित दीनदयाल बडे़ ही प्रभावपूर्ण ढंग से कथावाचन कर रहे थे, श्रोता भी बड़ी श्रद्धा से कथा श्रवण कर रहे थे। पंडितजी को कथावाचन करते हुये तीन दिन बीत गये थे। चंदा सोलह श्रृंगारों से सजी-संवरी अपने पति के साथ प्रतिदिन मंच पर ठीक नीचे पंडित जी के सम्‍मुख करबद्ध किये कथा-श्रवण किया करती। पंडित जी, कथा वाचन करते हुये यूं तो बीच-बीच में सभी श्रोताओं की ओर नजरें फेरा करते, पर अंत में उनकी निगाहें चंदा पर ही आकर टिक जाती। कथा के विभिन्‍न प्रसंगों पर उसके चेहरे की भावाभिव्‍यक्‍ति, बड़े लगन और श्रद्धा से कथा श्रवण करना उसे बेहद प्रभावित करता। और अंत में किसी विषय पर मसखरी के उपरांत उसके सकुचाते मधुर मुस्‍कान के समक्ष तो जैसे उसकी निगाहें अनायास समर्पण कर जातीं। उसकी सजी हुई गुलाबी पलकों से उभरे हुये नेत्रों को देखकर ऐसा लगता जैसे मानों झील में कमल खिले हों। उसके अधरों का रक्‍तिम सौंदर्य, सुर्ख कुमकुम आवरण लिये उसके गालों पर जब सांझ के सूर्य की रष्‍मियां पड़ती तो पूरे चेहरे पर इंद्रधनुषी आभा निर्मित कर देती। अद्‌भुत और अप्रतिम सौंदर्य की धनी थी वह।

ऐसा नहीं था कि पंडित दीनदयाल ने अपने जीवन में कभी ऐसी रूपवान स्‍त्री देखा ही नहीं था, अवश्य देखा था लेकिन वे ज्ञानार्जन के दौरान अपने भीतर विकारों की क्षुधा का पूरी तरह दमन करने में समर्थ नहीं हो सके थे। काशी में अध्‍ययन करते हुये वे महज कोरा ज्ञान तो अर्जित करते रहे किंतु उन्‍हें यह स्‍मरण ही ना रहा कि एक आचार्य के लिये शास्‍त्रों के अध्‍ययन के पूर्व इंद्रियों पर स्‍वनियंत्रण की आवश्यकता कहीं ज्‍यादा होती है। पंडित दीनदयाल गुणी और जाने-माने विद्वान थे, तर्कशास्‍त्र में उनका कोई जवाब नहीं था, पर ह्‍दयस्‍थल में उठती तरंगित वासनात्‍मक हलचल के समक्ष मानों वे नतमस्‍तक थे। उन्‍हें स्‍वयं भी इस बात पर आश्चर्य था कि उनकी इंद्रियां चाहकर भी उनसे नियंत्रित क्‍यों नहीं हो रही। काशी के संस्‍कृत विद्यालय में अध्‍ययन के पश्चात वे गुमान में यह भूल गये कि इ्रद्रियों पर मनुष्‍य का नियंत्रण संस्‍कृत के चंद श्‍लोकों को रटने-घोंटने और उसकी व्‍याख्‍या करने से नहीं होता बल्‍कि उसके लिये मनुष्‍य में स्‍वयं के भीतर दृढ़ आत्‍म संयम और चारित्रिक विकास की आवश्यकता होती है।

मनुष्‍य जब इंद्रियों के समक्ष समर्पण कर देता है तो वह और अधिक उन्‍मुक्‍त होकर उस पर हावी होने लगती हैं। अब तो सायंकाल चंदा जब कभी भोजन सामग्री लेकर आती तो पंडितजी के हदय में ज्‍वार सा आ जाता। एकांत पाकर उसके धड़कनों की गति सामान्‍य से ज्‍यादा बढ़ जाती। वह बड़ी मुश्किल से स्‍वयं पर नियंत्रण करते, फिर भी एकाएक कोई गंभीर प्रतिक्रिया चंदा की ओर से ना आ जाये, इसलिये वह बातों में मधुरता लिये हुये कुछ देर तो भूमिका बनाते। एक दिन चंदा का उसने हाथ पकड़कर कहा- अखण्‍ड सौभाग्‍यवती भव! तुम सचमुच लक्ष्‍मी हो, तुम्‍हारे पुण्‍य प्रताप से ही परमा के घर पर संपत्‍ति लक्ष्‍मीरूपेण विराजमान है, नहीं तो ...। उनकी बातें सुनकर चंदा विनम्रता से सकुचा गयी। पंडित दीनदयाल जी को शास्‍त्रों के अध्‍ययन के साथ इस बात का भी ज्ञान था कि स्‍त्रियां परम मूर्ख होती हैं। उन्‍हें मालूम था कि स्‍त्रियां अपनी प्रशंसा सुन उसी तरह अपना समर्पण कर देती हैं जैसे जलते हुये प्रकाश के समक्ष कीट-पतंगे अपना सर्वस्‍व गंवा बैठती हैं।

वह उस दिन पंडित जी के हाथों के स्‍पर्श को महज साधु-संतों की सद्‌भावना और कृपा समझती रही। उसे पंडितजी के मनोभावों का बिलकुल भी अंदाज नहीं था। एक ओर जहां उसके आशीर्वचन से वह अघा जा रही थी वहीं दूसरी ओर पंडित दीनदयाल चंदा के किसी प्रकार के प्रतिरोध ना करने को उसकी मौन स्‍वीकृति समझने लगे। उनका साहस धीरे-धीरे दुःसाहस में परिवर्तित होने लगा।

दूसरे दिन वह पुनः जब भोजन सामग्री लेकर पहुंची तो पंडित जी ने चंदा को समीप बिठाया और अपनी प्रशंसा में पींगे पढ़ने लगे। कहने लगे- जानती हो चंदा, बनारस से संस्‍कृत में विशारद करना और शास्‍त्री की पदवी हासिल करना कोई हंसी-ठट्‌ठा का खेल नहीं। वहां से अध्‍ययन पूरी कर लेने के बाद व्‍यक्‍ति देवदूत की तरह हो जाता है। उसकी जिस पर कृपा हो जाती है, समझो साक्षात्‌ ईश्वर की उस पर दया हो जाती है क्‍योंकि इस मर्त्‍यलोक पर विशेषकर कलियुग में देवता जन्‍म नहीं लेते बल्‍कि साधु-संतों और विद्वान पुरोहित को अपने प्रतिनिधि के रूप में जन्‍म देकर अपने अंश का अस्‍तित्‍व बनाये रखते हैं। इसलिये अपना हित चाहने वाले किसी भी सभ्‍य व्‍यक्‍ति को इनकी इच्‍छा के विरूद्ध ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिये जो शाप का कारण बने।

चंदा उनकी बातें बड़े ध्‍यान से सुन रही थी, वह बीच-बीच में जी-महाराज, जी-महाराज कहे जा रही थी।

पंडित दीनदयाल जी अपनी बात पूरी करते हुये कहने लगे- कल मैं कथा वाचन में कृष्‍ण के वंश के पतन का कारण बताउंगा कि कैसे एक संत का शाप उनके सर्वनाश का कारण बन गया।

चंदा, पंडितजी के मुंह से यह सुनकर कांप सी गयी। पंडित दीनदयाल जी जानते थे कि औरतें धर्मभीरू होती हैं, उन्‍हें धर्म की आढ़ लेकर बरगलाना बेहद आसान होता है। चंदा की धर्म पर दृढ़ आस्‍था थी लेकिन वह धर्म के पर्याय को पूरी तरह नहीं समझ सकी थी। उसे मालूम ही नहीं था कि सामने खड़े व्‍यक्‍ति के मन में पल रही दुर्भावना को भांपकर स्‍वयं की सुरक्षा करना इंसान का पहला धर्म होता है। वह उठकर जाने लगी तो पंडितजी ने फिर से उसका हाथ पकड़ लिया। इस बार तो वह ठिठक सी गयी अनायास कुछ समझ में ना आया, बस धीरे से चरण स्पर्श करते हुये वापस घर को लौटने लगी।

रास्‍ते भर चंदा के मन में कई तरह के विचार उमड़़ने-घुमड़ने लगे। वह सोचने लगी कि क्‍या इस तरह उसका हाथ पकड़ना, लुब्‍ध नेत्रों से उसकी ओर निरंतर टकटकी लगाये देखना पंडितजी की आसक्‍ति है या फिर महज उसकी खुद की नासमझी और गलतफहमी। फिर थोड़ी देर में खुद को देाष देते हुये कोसने लगी। नहीं-नहीं.... वह केवल इंटर ही तो पास की है, गांव -देहात में रही है, इसीलिये शायद उसकी संकीर्णता अभी तक गयी नहीं है। मंच पर आसन में विराजमान होकर काम, क्रोध और लोह-मोह को नरक का द्वार बताने वाले किसी विद्वान पुरूष के मन में ऐसे विचार भला कैसे आ सकते हैं? उसे खुद पर गुस्‍सा आने लगा, उसका मन स्‍वयं से कहने लगा- छी चंदा! किसी के प्रति बेवजह मन में ऐसे विचार लाना महापाप है, घोर पाप। उसमें फिर पंडित जी जैसे विद्वान, देवता तुल्‍य पुरूष के प्रति...। वह पश्चाताप करते हुये मन ही मन कहने लगी- हे शिव, हे दयानिधान मुझ जैसे अज्ञानी, मूर्ख को ऐसे विचारों के लिये क्षमा करना।

इधर पंडित दीनदयाल के मन में काम की आसक्‍ति और तेजी से कुलबुलाने लगी, वह कामांध हो गये। चंदा के स्पर्श का कोमल अहसास उसे पहर दर पहर व्‍यथित करने लगी। कई बार पंडितजी के मन में भी इस पाप के विरूद्ध विद्रोह सा हो जाता, सोचते कि वाकई कहीं वह गलत तो नहीं कर रहा? इस तरह उसका कामातुर होना क्‍या उसकी विद्वता को शोभा देता है?लेकिन अगले ही क्षण कामभाव से दग्‍ध मन उसके समक्ष ढेर सारे तर्क उपस्‍थित कर देता और वह उसी आवेग में बिना पतवार के नाव की भांति बहने लगते। हर अपराध अपने साथ तर्क की विशाल श्रृंखला उपस्‍थित करता है और स्‍वयं के भीतर के अपराध को हर तरह से न्‍यायोचित ठहराने का प्रयत्‍न करने लगता है। उसका मन तर्क देने लगा कि स्‍वयं भगवान इंद्र ने एक ऋषि की पत्‍नी के साथ छल किया था, विश्वामित्र जैसा पहुंचा हुआ ऋषि भी तो एक सुंदरी के समक्ष स्‍वयं को नियंत्रित नहीं कर पाया था। फिर वह तो काशी का पढ़ा एक सामान्‍य पंडित है। यदि उसकी इंद्रियां अपने पिपासु नेत्रों की प्‍यास बुझाने कामातुर हैं तो इसमें क्‍या बुराई है। फिर चंदा जैसी खूबसूरत औरत...? इसका कोमल अहसास जब इतना सुखद है तो पता नहीं इनके व्‍यक्‍तित्‍व का संपूर्ण उपभोग कितना सुखदायी होगा? वह मन ही मन ढेर सारी कल्‍पनायें करने लगता, कभी भगवान को कोसता-हे भगवान! इस अनपढ़, गंवार, ठेठवार के घर में ऐसी रत्‍न औरत, यह तेरा कैसा न्‍याय है? वह चंदा से कैसे अपने मन के भावों का इजहार करे, इसी उधेड़बुन में अब दिन-रात रहने लगा। किसी धर्माचार्य के मन में जब पाप पलता है तो वह अजीब सा अनुभव करने लगता है। वह स्‍वयं के भीतर ना तो मनुष्‍यगत्‌ कमजोरियों का पूर्णरूपेण दमन करने का साहस ही जुटा पाता है और ना ही सामान्‍य लोगों की तरह अपने भेाग विलास को सरेआम ही कर सकता है।

दो-एक दिनों के पश्चात पंडितजी ने चंदा को कच्‍चा भोजन सामग्री देने की बजाय अपने हाथों का ही बना भोजन खिलाने का आग्रह करने लगे, इसके लिये उन्‍होंने ढेर सारी असुविधाओं का बहाना बनाया। परमा को इससे बेहद खुशी हुई, वह स्‍वयं पर इसे संतों की कृपा मानने लगे।

चंदा अब रोज शाम भोजन से सजे हुये थाल लेकर जाती। पंडितजी का दुःसाहस दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। अब तो वह जब भी प्रणाम करने झुकती तो उसे पंडितजी स्‍वयं अपने हाथों का स्पर्श देकर उठाते और एक नजर गौर से देखा करते। पंडितजी के इन्‍हीं क्रियाकलापों को देख कभी-कभी चंदा का संदेह क्षण भर को पुख्‍ता सा हो जाता, लेकिन अगले ही क्षण फिर धर्मांध हो स्‍वयं को दोष देती हुई कोसने लगती। लेकिन फिर भी सुरक्षा की दृष्‍टि से अब वह अकेले भोजन सामग्री लेकर जाने से डरने लगी। पति से साथ चलने का आग्रह की तो मना करते हुये परमा कहने लगा- मुझे सब तरफ तो देखना है चंदा! मेहमानों का आवभगत, कौन से सामान कम पड़ रहे, किसी को कुछ कमी तो ना रह गयी। अब तुम इतना भी नहीं कर पाओगे तो...। अब इसमें डरने की क्‍या बात हो गयी। मंदिर में देवता के समक्ष जाते हुये तो नहीं डरते, बस इन्‍हें भी उसी रूप में देखो। देवताओं के पास जाने से ताकत मिलती है।

चंदा को लगने लगा कि शायद वह ही गलत है। उसके विचार सचमुच ज्‍यादा खुले नहीं हैं, इसलिये ऐसा हो रहा। कथा वाचन का सातवां दिन था। सायं भोजन के थाल को विभिन्‍न तरह के पकवानों, फल और मेवे से सजा वह निकल पड़ी। रोज के पंडितजी के कृत्‍यों से मन भयांक्रांत जरूर था लेकिन किसी तरह खुद को ढाढस बंधाती वह उस दिन उनके कक्ष में पहुंच गयी। पंडितजी, चंदा का एकांत में नेत्रपान करने व उसके स्पर्श से फिर अपनी इंद्रियों का प्‍यास बुझाने आतुर थे। देखते ही पंडित दीनदयाल की बांछे खिल गयी। उस दिन चंदा अपने श्‍वेत मिश्रित नीले परिधान में दुग्‍ध रोशनी से नहाती ऐसे प्रतीत हो रही थी जैसे स्‍वयं आकाश अपने सौंदर्य को समेटे हुये उसकी सेवा-सुश्रूषा करने धरती पर उतर आये हों।

पंडित दीनदयाल ने अभिलाषी और पिपासु नेत्रों से उसकी ओर देखते हुये कहा- कितनी देर कर दी चंदा, आज भूख से बहुत व्‍यथित हूं।

चंदा ने क्षमा मांगते हुये कहा- महाराज जी, कुछ ज्‍यादा ही पकवान बना रखे थे, सो देर हो गयी, चखियेगा! अच्‍छी बनी है।

तुमसे भी अच्‍छी? पंडितजी ने अपनी ललसायी आंखों को और लुब्‍ध करते हुये कहा।

महाराज जी, मैं तो ठहरी एक ग्‍वालन। ईश्वर की कृपा से बस दो वक्‍त की रोटी मिल जाती है। कभी कभार आप जैसे देवताओं की दया से यज्ञ हवन करने को मिल जाता है। वह उस क्षण जैसे विनम्रता के बोझ से दबी हुई प्रतीत हो रही थी।

आज आसन पर बैठे हुये घुटने बहुत दुख रहे चंदा। पंडित दीनदयाल ने ललसायी नेत्रों से देखते हुये कहा।

महाराज जी, आज नाई नहीं आया? चंदा, उनकी बातों को बड़ी सहजता से लेते हुये कहने लगीं।

अरे वो गंवार ? उसे तो पैर भी दबाना नहीं आता, और उसके हाथ तो इतने कठोर हैं, बाप रे ... परसों तो पूरा पैर लाल हो गया था।

ठीक है महाराज, मैं जाकर इनके बापू को आज जल्‍दी भेज दूंगी।

देखों तो जरा... घुटने के पीछे सूजन तो नहीं हो गया? नहीं तो ... कथा वाचन में विघ्‍न ना आ जाये। वे लेटे हुये धोती को जरा उपर उठाने लगे।

चंदा दूर से ही पैरों को देख कहने लगीं- महाराज ऐसा कुछ दिखायी तो नहीं दे रहा।

पंडित दीनदयाल कामावेश में लोक-लाज मान-मर्यादा सब भूल चुके थे। उसने धोती जंघा तक उपर उठाते हुये कहा - चंदा! लगता है , यहां गांठ पड़ गये हैं, छूकर देखो जरा, उनकी धृष्‍टता बढ़ते जा रही थी। वे धोती को अब और उपर तक उठा चुके थे, उनका अधोवस्‍त्र अब थेाड़ा-थोड़ा दिखने लगा था।

चंदा शर्म से पानी-पानी हुये जा रही थी। पंडित दीनदयाल बार-बार कराहने का नाटकीय प्रयत्‍न करने लगे। चंदा पसोपेश में पड़ गयी, उसे लगने लगा कि कहीं वास्‍तव में पंडितजी को दर्द तो नहीं हो रहा? उसकी इस तरह उपेक्षा कहीं पंडितजी के नाराजगी का कारण तो नहीं बन जायेगी। और कहीं नाराज होकर उल्‍टा-पुल्‍टा शाप दे बैठे तो... फिर तो अनर्थ हो जायेगा। देवताओं की सेवा में तो बुराई नहीं है ना! वह यह सब सोच ही रही थी कि पंडितजी ने चंदा का हाथ पकड़ा और पैरों का स्पर्श कराने लगे। इधर चंदा असमंजस में आंख बंद कर ईश्वर का मनन कर रही थी उधर पंडितजी, चंदा के हाथों का स्पर्श पा कृतार्थ महसूस कर रहे थे।

चंदा के देर तक घर ना लौटने से परमा परेशान हो गया। उसे जब कुछ नहीं सूझा तो वह पंडितजी को ठहराये हुये कक्ष की ओर निकल पड़ा। कमरे पर दूर से सन्‍नाटा सा था, ना रोज की तरह पंडित जी के भजन की आवाज आ रही थी और ना ही राम-राम जैसे शब्‍द गूंज रहे थे। सिर्फ धीमे-धीमे खुसुर-पुसुर की आवाजें आ रही थी। परमा के मन में शंका उत्‍पन्‍न हो गयी। पंडित जी को जिस कक्ष पर ठहराया गया था उसकी एक खिड़की गली की ओर खुलती थी, जिस पर कठफोड़वा पक्षी ने कुछ छेद बना रखे थे। परमा ने जब खिड़की से झांककर अंदर का दृष्‍य देखा तो हतप्रभ सा रह गया। उसे क्षणभर को तो सहसा अपनी आंखों पर यकीन ही नहीं हुआ। उसके तन-मन में आग सी लग गयी। उसने झट से अपना मुंह फेर लिया। और कहने लगा- हे भगवान! यह दिन भी दिखाना था। वह उल्‍टे पांव घर लौट आया और पेट दर्द का बहाना बना बिस्‍तर पर लेट गया। चंदा ने बहुत पूछा, क्‍या हुआ? वैद्य को दिखाने की जरूरत तो नहीं, पर परमा ने कह दिया कि उसे अकेले विश्राम करने दिया जाये। सुबह तक सब ठीक हो जायेगा।

परमा के मन में कई तरह के विचार आने लगे, वह सोचने लगा- शायद इसीलिये चंदा उसे साथ चलने का बहाना कर रही थी ताकि शक की कोई गुँजाईश ना रहे और वह उस पर आंख मूंदकर भरोसा करता रहे। बिस्‍तर पर लेटे हुये मन ही मन विचार कर रहा था, वाकई औरत कभी भरोसे के काबिल नहीं होती, शायद जीवन के अंतिम क्षण तक नहीं। उस पर जितना भरोसा करो वह उतनी ही दगा देती हैं। ये कामांध हो जायें तो पाप-पुण्‍य सब उसके लिये कोई अर्थ नहीं रखते। पति चाहे लाख सम्‍मान दे, समाज में उसे उसकी पहचान कराये, उस पर जान न्‍यौछावर कर दे पर समय आने पर सब नमक भूल जाती है।

वह क्रोध की आग में रात भर जलता रहा। दूसरे दिन कथा समापन व हवन पूजन का दिन था। परमा दिन भर खेाया-खोया सा था, माथे पर शिकन साफ-साफ दिख रही थी पर वह उसे दबाना चाहता था। चंदा ने बहुत पूछा, पंडित दीनदयाल ने भी खामोशी का कारण जानना चाहा पर परमा ने कुछ ना कहा। पंडित जी को शक होने लगा कि कहीं उसके मलिन विचार परमा भांप तो नहीं गया।

कार्यक्रम संपन्‍न होने को था, हवन-पूजन के पश्चात दान-दक्षिणा की बारी आयी। पहले तो पंडित जी आशंकित मन से कुछ विशेष मांगने का साहस नहीं जुटा पा रहे थे लेकिन जब दान दी हुई सामग्री को देखा तो गदगद हो गये। मन फिर से उतावला हो उठा, सोचने लगे- परमा को यदि यह सब मालूम होता तो वह भला इतना कैसे देता? बर्तन-भाड़े से लेकर बोरे भर चांवल, गेहूं, टोकनी भर सब्‍जी, गद्‌दा, तकिया, पलंग, सोने-चांदी से लेकर सब कुछ तो दान में था। इतने सारे दान सामग्री को देख थोड़ी पिपासा और बढ़ गयी, कहने लगे- परमा, तुम्‍हारे दान के बारे में बहुत सुन रखा है। क्‍या कुछ और नहीं दोगे?

महाराज, ये सब दान तो सामान्‍य है, अभी मैने संकल्‍पित दान तो दिये ही नहीं हैं। परमा ने पंडितजी की ओर देखते हुये कहा।

पंडितजी फूले ना समा रहे थे। उन्‍होंने झट से हाथ में अक्षत और फूल दे दिये। परमा की ओर देख उच्‍चारित करते हुये कहने लगे- मैं... परमा ... अहीर जाति, हवन कुण्‍ड को साक्ष्‍य मान अपना पांच बीघा जमीन और ....

पांच बीघा जमीन का नाम सुनते ही पंडितजी के मन में खयाली पुलाव पकने लगे, वे आगे के शब्‍द सुनने को और अधिक व्‍याकुल हो उठे। परमा ने पांच बीघा जमीन के बाद और शब्‍द भी लगा दिया था, उसे लगने लगा कि परमा कहीं अपना आधा जायदाद तो उसके नाम नहीं कर देगा। जरूर कुछ हीरे -जवाहरात होंगे, नहीं -नहीं जरूर कुछ भैंसे होंगी। उसने सुन रखा था कि उसके कछार में पचास भैंसे पलती हैं।वह मन ही मन विचार करने लगा कि परमा जरूर एक से अधिक भैंसे देगा, एक देगा तो क्‍या देगा? यदि पांच भैंसे दान कर दे तो वह घर पर एक ग्‍वाला रखेगा, जो दूध निकलेगा उसे शहर में बिकवाया करेगा। दो लीटर तो दिन भर में वह खुद ही पी जायेगा। पंडिताईन भी तो कितनी कमजोर हो गयी है, घर में जब से दूध ही नहीं हो रहा।

लेकिन जैसे ही परमा ने आगे के वाक्‍यों को पढ़ा, पंडितजी के हाथों से पूजन सामग्री छूट गयी, किताब हवन कुण्‍ड में गिरकर जलने लगा। सुनते ही वहां बैठे सभी के मुंह खुले के खुले रह गये। चंदा अवाक सी बस देखती रह गयी, सिर चकराने लगा। वह बेहोश होकर गिर पड़ी। वहां बैठे कुछ रिश्तेदार परमा पर भड़क गये, कहने लगे- परमा! ये क्‍या सनकीपन है? सब परमा से अनुनय- विनय करने लगे, लेकिन परमा अंत तक दिये हुये दान को वापस लेने तैयार ही नहीं हुआ। परमा ने पंडित दीनदयाल को अपनी पत्‍नी चंदा दान कर दी थी।

चंदा को जब होश आया तो वह स्‍तब्‍ध थी। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि आखिर उसका क्‍या दोष है ? उसे किस अपराध की सजा दी गयी है ? लोक-लाज से कुछ प्रतिकार करने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रही थी, सिर्फ गिड़गिड़ाते हुये सिसक-सिसक कर रो रही थी। लेकिन परमा पर उसकी आंसुओं का कोई असर नहीं हो रहा था। चंदा अब भी समझ रही थी कि इतने सालों के वैवाहिक जीवन के विश्वास के धागे इतने पतले नहीं है, जरूर परमा का पत्‍थर हदय पिघलेगा। पर उसे मालूम ना था कि किसी पुरूष का दंभ औरत के आंसुओं की आंच से नहीं पिघला करता। परमा ने ना उसे कुछ बोलने का मौका दिया और ना ही उसके बिखरे हुये सामानों को समेटने का। वह परमा के पैरों पर गिरकर किसी अन्‍जाने त्रुटि के लिये क्षमा मांगती रही लेकिन परमा ने एक ना सुनी। उसे जाने का आदेश मिला, थोड़ी ना-नुकुर की लेकिन परमा उस समय बेहद सख्‍त था। परमा, उसकी बांहों को पकड़ घसीटते हुये जब बाहर का रास्‍ता दिखाने लगा तो वह टूट गयी और सीधे गठरी उठाकर पंडित जी के पीछे-पीछे चलने लगी। पीछे मुड़कर परमा को देखते हुये क्षण भर को रह-रह विलाप करती। उसका समूचा वस्‍त्र आंसुओं से भीग चुका था। बच्‍चे रोते-बिलखते मां-मां कर रहे थे पर परमा ने उसे अपनी भुजाओं में जकड़ रखा था।

चंदा कभी प्रलाप करते हुये देवताओं से अपना दोष पूछती तो कभी ललसायी आंखों से जमीन की ओर निहारती कि शायद उसके दर्द को देखकर धरती फट जाये लेकिन ऐसा कुछ भी ना हुआ। जब द्वापरयुग में पतियों के हाथों बहिष्‍कृत और बेइज्‍जत होती द्रौपदी को देखकर धरती का हदय नहीं पिघला तो चंदा के लिये उसे कहां रहम आता। धरती तो बस मूक होकर हर बात की गवाह बनना चाहती है।

(2)

पंडित दीनदयाल दान से भरा गाड़ी लेकर जब घर पहुंचे तो पंडताईन देखकर बाग-बाग हो गयी। खुशी के मारे वह फूली ना समा रही थी। इतने सारे दान उसने कभी देखे ना थे। गठरी खोलते-खोलते हाथ दुखने लगे। वह कभी ईश्वर का शुक्रिया अदा करती तो कभी परमा की उदारता के कसीदे पढ़ती। मन ही मन बुदबुदाते हुये कहती-वाकई, ये इंसान तो इस कलियुग में धर्मात्‍मा है, पिछले जन्‍म में जरूर कोई साधु-संत रहा होगा। अचानक इसी बीच उसकी नजर पास ही मुंह औंधायें बैठी चंदा पर पड़ गयी। पहर बीत चुका था, पर चंदा की आंखों से आंसू रूकने का नाम नहीं ले रहे थे, वह बस सिसक रही थी।

पहले तो उसे कुछ समझ में ना आया, कुछ क्षण के लिये लगा जैसे कोई भिखारन हो। लेकिन पास जाकर देखा तो वह किसी धनाड्‌य औरत की तरह आभूषणों से लदी थी। चेहरे किसी मुरझाये पुष्‍प की भांति मलिन और धुल-धुसरित अवष्‍य लग रहे थे किंतु संपूर्ण परिधान में अभी भी वह आभा विद्यमान थी, जो पंडिताईन की आंखों को उस क्षण चौंधियाने के लिये काफी थी। उसने चंदा से कुछ पूछने का प्रयत्‍न की लेकिन कोई प्रत्‍युत्‍तर नहीं मिला। बस रह-रहकर आंखों से आंसू किसी अविरल धारा की तरह अधरों पर पड़ती और मुंह से सिसकते हुये यदा-कदा वेदना में स्‍वर फूट पड़ते। पति से पूछने का प्रयत्‍न की तो वह जैसे मूक हो अपराधों को दान की गठरियों में समटने का उपक्रम करते हुये सामानों को घर के भीतर ले जाने लगे। उसकी उत्‍सुकता बढ़ते जा रही थी कि उसी क्षण पास खड़े गाड़ीवान ने कहा- पंडिताईन दीदी! पाय लागू। अरे! ये परमा की लुगाई है, उसने इसे पंडितजी को दान कर दी।

गाड़ीवान के मुंह से इतना सुनना था कि पंडिताईन की जिव्‍हा पर आग लग गई। हृदय किसी हवनकुण्‍ड में धधकते अग्‍नि की भांति प्रज्‍जवलित हो उठी।

वह फुफकारते हुये कहने लगी-अरी डायन, नीच औरत, कुल्‍टा ! तुझे यह सब करते हुये लाज ना आयी। जरूर तूने मेरे पति पर डोरे डाली होगी, तभी तो...। अरे बेह्‌या, हरजाई, मेरे पति जैसे देवता को क्‍या समझेंगे लोग? दुनिया को थोड़े ही मालूम कि तुझ कुल्‍टा का पाप उफन रहा था। किसी ने सही कहा है कि औरतें ही नीच होती हैं, इनका बस चले तो ये तो पत्‍थर के देवता को भी अपनी करनी से पथभ्रष्‍ट कर दें। लगता है... तभी हनुमान जी अपने मंदिर में किसी औरत को अपनी मूरत छूने तक नहीं देते। अरे नीच! तेरे जैसी पापन के कारण ही पंडित लोग औरतों की छाया तक से दूर रहते हैं। वो तो खुद ही औरतों से कोसों दूर रहते हैं, पर मेरी ही मति मारी गयी थी। मैं ही कहने लगी थी कि लोग तुम्‍हें देवता की तरह समझते हैं। मुझे क्‍या मालूम था कि तुझ पापन की नजर मेरे पति पर लग जायेगी।

चंदा खामोश थी, लेकिन उसकी खामोशी पंडिताईन को बार-बार खल रही थी। उससे जब रहा नहीं गया तो झाड़ू पकड़कर चिल्‍लाते हुये कहने लगी- अरे बोलती क्‍यू नहीं हरजाई! तुझे कीड़े पड़े, तेरे वंश पर शनि की छाया लग जाय। तूने मेरी गृहस्‍थी पर नजर डाली, जा तुझे नरक में भी जगह ना मिले। जा रे पापन! मुझ सुहागन का शाप है, तू घुट-धुट के मर।

चंदा मन ही मन विचार कर रही थी कि वाकई औरत दुखों की गठरी है, उसका जन्‍म ही कष्‍ट पाने के लिये होता है। वह तो जंगल-झाड़ियों में फैली लताओं की तरह है जिसका खुद का कोई वजूद नहीं। वह तो जैसे हर क्षण मरने और बेइज्‍जत होने के लिये ही पैदा होती है। इस संसार में और कोई जीव भले ही अपने जीवनकाल में एक बार मरता हो पर औरत तो जैसे एक जन्‍म में ही सैकड़ों बार मरती है। जन्‍म के समय मां के चहरे की उदासी हो, भाई के दूध पीते गिलास को टकटकी लगाये देखने की पीड़ा हो या फिर विवाह के वक्‍त पिता के मुरझाये चेहरे की मूक व्‍यथा का दर्द... सचमुच, कितनी बार मौत को जीती है वह...। विवाह के बाद भी उसे चैन कहां मिलता है? पुरूष एक अभिशाप की तरह परछाई की भांति उम्र भर उसका पीछा करता है और फिर औरत तो दुश्मन ही ठहरी। सचमुच इस सारे संसार से एक औरत अकेले जूझती है, तनहा लड़ती है। एक औरत, निन्‍यानबे दुश्मन। औरत क्‍या हुई, जैसे हर कदम पर अग्‍निपरीक्षा। हे प्रभु ! तू अगले जन्‍म में मुझ अभागन को लड़की का जन्‍म मत देना। वह उस समय ईश्वर से गिड़गिड़ाते हुये प्रार्थना कर रही थीं।

पंडित दीनदयाल का गांव के बाहर गोठान में एक गोशाला थी, पंडिताईन ने उसे गांव के बाहर वहीं ठहरा दिया। सुबह-शाम पशुओं को चारा देते बखत रोटी के दो टुकड़े डाल आती और घर पर झाड़ू-पोंछा के वक्‍त अधिकार से घसीट लाती।

चंदा ने कुछ भी प्रतिकार करना उचित ना समझा। वह इन सबको अपना प्रारब्‍ध मान खामोश हो भोगती रही । पति ने साथ छोड़ा, बेटों के सुख से वंचित किया, समाज में सर उठा जीने लायक ना छोड़ा। अब इसके बाद बचा ही क्‍या था? बस एक जिंदा लाश की तरह जी रही थी।

इस घटना के बाद पंडित दीनदयाल की सामाजिक प्रतिष्‍ठा लगातार घटने लगी। अब लोग उसे उलाहना देते हुये अहीर पंडित कहा करते। पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन में उसका बुलाया जाना निरंतर कम होने लगा। पंडित दीनदयाल के जीविकोपार्जन का साधन यही पूजा-पाठ मात्र था। अब तो उसके समक्ष जीविकोपार्जन की समस्‍या खड़ी हो गयी। काम ही आदमी को धन और सम्‍मान दिलाता है और काम ही इंसान से सब कुछ छीनकर उसे प्रतिष्‍ठाविहीन बना पशुओं की कतार में खड़ा कर देता है।

इतना सब कुछ होने के बाद भी पंडित दीनदयाल की अतृप्‍त वासना कुम्‍हलायी नहीं थी। वैसे तो पंडिताईन चारों पहर चंदा पर नजर रखा करती कि कहीं वह पंडित दीनदयाल को फांसकर उसकी गृहस्‍थी में आग ना लगा दे। लेकिन एक दिन नजरें चुराकर पंडित दीनदयाल रात्रि के एकांत में चंदा के पास पहुंच ही गये। जैसे वह सोच चुके हों कि समाज से आधे-अधूरे कर्म का दण्‍ड उसे जिस अपमान के रूप में अकारथ ही मिला हो, उसे पूरा भोगने में क्‍या बुराई है।

उस रात चंदा बिस्‍तर पर अकेली पड़ी कुछ गुन रही थी। अतीत से लेकर वर्तमान तक के पृष्‍ठ मस्‍तिष्‍क पर उभर रहे थे। अब ना तो उसके मुख पर तेज था और ना शरीर में कोई दम। पंडित दीदनयाल को देखते ही हड़बड़ाकर उठ बैठी।

चंदा! अब तो तुम सिर्फ मेरी हो। ऐसा कहते हुये पंडित दीनदयाल उसके स्‍पर्श को आगे बढ़ने लगे।

चंदा क्रेाध से तमतमा गयी। पूरा शरीर क्रोध से लाल हो गया। ऐसा लग रहा था कि जैसे किसी समुद्र तट पर सूनामी ने तबाही की दस्‍तक दे दी हो या फिर ज्‍वालामुखी अचानक फूटकर धधक पड़ी हो। उसने पास ही पड़े हंसिये को उठा, जोर से चिल्‍लाते हुये कहा- खबरदार! यदि तूने मुझे अपनी वासना का शिकार बनाया तो, अब ना तो मैं जीवित रहूंगी और ना तुझे इस लायक छोड़ूंगी कि तुम कभी पुरूष कहलाने लायक ...।

दीनदयाल चंदा की क्रोधाग्‍नि देखकर सहम गये, पग भर भी आगे बढ़ने ही हिम्‍मत नहीं हुई। उसने किसी स्‍त्री का ऐसा क्रोध पहली बार देखा था। आज उसे पहली बार महसूस हुआ था कि स्‍त्रियां सहती हैं तो गायों की तरह होती हैं, लेकिन हिंसक हो जायें तो शेरनी भी इनके सामने पनाह मांगती है।

चंदा दुत्‍कारते हुये कहने लगी- छी! लानत है, तेरी विद्वता और शास्‍त्र ज्ञान पर। तुझसे लाख गुना अच्‍छे तो अनपढ़ और जाहिल लोग हैं ...। मैंने सुन रखा था कि शास्‍त्रों के अध्‍ययन से इंसान के सारे विकार मिट जाते हैं पर तू तो.... छी! तू देवता के भेष में राक्षस है, तेरे जैसे पापी दस-बीस हो जायें तो इस धरती से लोगों का भरोसा उठ जायेगा... तू पंडित और आचार्य के नाम पर पाप है, धब्‍बा है । जा भाग यहां से, वरना कहीं क्रोध में पागल होकर तुझे मार ना डालूं?

चंदा का यह रौद्र रूप देख पंडित दीनदयाल वहां से भाग खड़ा हुआ।

कुछ ही दिनों में पंडित दीनदयाल के समक्ष रोजी-रोटी की समस्‍या खड़ी हो गयी। आस-पास के लोग अब उसे तिरस्‍कार की दृष्‍टि से देखने लगे। पंडिताईन को यह सब बर्दाश्त ना हो रहा था। वह इन सबके लिये चंदा को दोष देते हुये कोसती। अब जब रहा ना गया तो पंडित दीनदयाल और उसकी पत्‍नी ने वहां से दूर कहीं अन्‍यत्र रहने का निर्णय ले लिया, जहां से वह फिर से नयी जिंदगी की शुरूवात कर सके। वे दोनों अपना घर-द्वार सब बेच चंदा को उसके हाल पर वहीं छोड़ कहीं दूर चले गये।

चंदा के सामने अब तो दो वक्‍त की रोटी की समस्‍या खड़ी हो गयी। वह पास के शहर आ गयी और किसी तरह मांग-जांच फुटपाथ पर गुजर करने लगी।

इधर परमा के दोनों बेटे बड़े होते गये। मां के अभाव में ना तो उनका चारित्रिक विकास हो सका और ना ही वे सुसंस्‍कारित ही हो सके। क्‍या करना है? क्‍यों करना है? इसका अधिकार वे दोनों बेटे धीरे-धीरे अपने हाथों में लेते गये। कुछ दिनों में ही समूचा कारोबार उससे छीन गया। सुबह-शाम दो रोटी के अलावा परमा का अब किसी बात पर अधिकार ना रहा। वह अपने ही घर में उपेक्षित सा महसूस करता कुंठा का शिकार हो गया। कुछ दिनों के अंतराल पर जब परमा को पता चला कि चंदा निर्दोष और पवित्र थी, जो कुछ उसने देखा वह पूरा सच ना था तो वह दिन-रात पश्चाताप की आग में जलने लगा। उसे अपने निर्णय पर ग्‍लानि होने लगी। वह क्षमा याचना को आतुर हो गया और एक दिन व्‍यथित होकर चंदा की खोज में निकल पड़ा।

पंडित दीनदयाल गांव छोड़कर कहीं जा चुके थे, चंदा के बारे में पतासाजी करने पर पता चला कि वो पास के शहर में फुटपाथ पर घूमती हुई कभी-कभार दिख जाती है। परमा दिन-रात एक कर चंदा को ढूढ़ने लगा और आखिर एक दिन वह फुटपाथ पर बदहाल हालत में मिल ही गयी। उसका संपूर्ण शरीर सूखी अरहर की लकड़ी की तरह सौंदर्यविहीन हो चुका था, चेहरे पर जगह-जगह दाग-धब्‍बे दिखने लगे थे। परमा ने देखते ही पहचान लिया और अपराधबोध से रो पड़ा।

चंदा, परमा की ओर देखना भी नहीं चाहती थी लेकिन खुद से भी बुरे हाल में जब पति को देखा तो मन पसीज गया। वह जीवन में कभी अपने पति का मुंह ना देखने के संकल्‍प पर दृढ़ ना रह सकी। चंदा ने पूछते हुये कहा- ये, तुमने क्‍या हाल बना लिया। चुन्‍नू और मुन्‍नू ठीक तो हैं ना?

परमा रोने लगा, एक पुरूष की आंखों से आंसुओं की जब धार निकलती है तो स्‍त्री के मन में पूर्णिमा के ज्‍वार सा उफान आ जाता है, वह सब कुछ भुला बैठती है। उसने परमा को अपनी बांहों में समेट ली।

परमा ने चंदा से पूछते हुये कहा- क्‍यों चंदा? तुमने क्‍यों नहीं बताया कि तुम निर्दोष हो। तुम्‍हारा कोई दोष नहीं था। तुम उस पापी के हाथों पीस गये...। एक बार कह देते कि चुन्‍नू के बापू जो तुमने देखा था... वह पूरा सच नहीं था.. तो ..।

चंदा खामोश थी... वह फिर अपने घावों को हरा नहीं करना चाहती थी।

जब परमा बार-बार कुरेदने लगा तो चंदा ने धीमे से सिसकते हुये सिर्फ इतना कहा- तुमने मौका ही कहां दिया... और ऐसा कहते हुये फिर रो पड़ी।

थेाड़ी देर में जब दोनों के आंखों से बहते हुये आंसुओं की धार सूख गयी, मन तनिक हल्‍का हुआ तो वह कारण जाने बिना ना रह सका । वह उसे बार-बार कुछ कहने के लिये जैसे जोर डालने लगा।

जब परमा का आग्रह कुछ ज्‍यादा हो गया तो चंदा ने सिर्फ इतना कहा- मैं नहीं चाहती थी कि मुट्‌ठी भर पाखण्‍डियों के कारण लोगों का धर्म पर से भरोसा उठ जाये, बस इसलिये मैंने अपने जीवन की आहुति दे दी। ऐसा कहते हुये वह गठरी उठाकर वहां से जाने लगी।

परमा बस टकटकी लगाये उसके संपूर्ण व्‍यक्‍तित्‍व को देर तलक निहारता रहा ।

--

राकेश कुमार ‘अयोध्‍या’

कार्मिक अनुभाग

भिलाई इस्‍पात संयंत्र

हिर्री डोलोमाईट माइंस

जिला-बिलासपुर

छ.ग.

पिन-495222

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अपने अपने कर्म ।

शंका ने डुबाया ।

अच्छी कथा ।।

पती पुरोहित पाप को, वह स्त्री नादान ।

कायर सा क्यूँ भोगती, यह सारा अपमान ।

यह सारा अपमान, जुबाँ पर जड़ के ताले ।

सह ली धुर अपमान, पका के पाप निवाले ।

द्रुपद-सुता तो द्यूत, भागवत का यह मसला ।

पापी पंडित दुष्ट, पती शंकालू पगला ।।

हृदयस्पर्शी कथा।

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 6 :
राकेश कुमार ‘अयोध्‍या’ की कहानी - आहुति

एक अच्छी कहानी !

धन्यवाद डाक्टर साहब, आपका आभार.

धन्यवाद रविकर जी,

आपने अपनी पंक्तियो के माध्यम से बड़े ही सुन्दर ढंग से प्रतिक्रया दी.

आभार आपका.

सादर
राकेश

सबसे खूबसूरत बात जो मन को छू गयी देशीयता की गंध.देसी शब्दों का प्रयोग लाजवाब है.बधाई हो राकेश जी रचना अच्छी है.

उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

चन्द्रकान्ता जी आपका आभार , आपने कहानी के लिए अपनी बहुमूल्य सामाजिक कार्यो एवं लेखन में से समय निकाला एवं अपनी बहुमूल्य टिप्पणी देकर उत्साहवर्धन किया ,

पुनः आभार

सादर
राकेश

rakesh ji
sadar pranam
ye bahut hi dukh ki baat hai ki nari ko aaj ke yug me bhi kai parikshae deni padati hai chahe wah usake charitra ko lekar ho ya samajik aadhar par ya mansik ...
aisa kyu hota hai pata nahi jabki aurate akele jindagi apane charitra ko sambhalkar bita sakti hai par ek purush akela kabhi nahi rah sakta hai
phir bhi aurato ko har prashna ke uttar ke liye badhya kiya jata hai ...............
mujhe chanda ka swabhiman bahut achchha laga ..
badhiya kahani ..........

I like the end of the story. Its true a lady first try a man understand her and give respect. A trust in relation. But she saw that this is not respect and a blame, she leave all relation and went away her own way.

Munshi Prem chand Seva Sadan is like that. Situation is different but mean is same.

So respect the women and trust with heart.

आदरणीय रविकर जी, आपने मेरी कहानी आहुति को चर्चा मंच में स्थान देकर उसके लिए एक विशाल पाठक समुदाय प्रदान कर अधिकाधिक लोगो के लिए पाठ्य बनाया, आपका ह्रदय से आभार.

सादर
राकेश

आदरणीय रविकर जी, आपने मेरी कहानी आहुति को चर्चा मंच में स्थान देकर उसके लिए एक विशाल पाठक समुदाय प्रदान कर अधिकाधिक लोगो के लिए पाठ्य बनाया, आपका ह्रदय से आभार.

सादर
राकेश

साक्षी जी

आपको मेरा सादर प्रणाम,

आपने कहानी के लिए समय निकाल सदैव की भांति अपनी उत्कृष्ट समालोचना से मेरा मार्गदर्शन कर उत्साहवर्धन किया, ह्रदय से आभार.

सादर
राकेश

बबीता जी

सादर नमस्कार ,

आपने सदैव मेरा उत्साहवर्धन कर मुझे सतत लेखन की प्रेरणा दी है , कहानी के लिए आपने वक्त निकाल उत्कृष्ट समालोचना से मेरा मार्गदर्शन कर उत्साहवर्धन किया, ह्रदय से आभार.

सादर
राकेश

धन्यवाद सर

धन्यवाद सर

सादर
राकेश

पोस्ट बहुत अच्छी और बहुत अच्छी तरह से लिखा

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

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