गुरुवार, 26 जुलाई 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - प्रविष्टि क्र. 9 : सुमित सक्सेना की कहानी - नीरसता

नीरसता

सुमित सक्सेना

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दोपहर के २ बज रहे थे. आसमान में कुछ बादलों के टुकड़े सूरज से आंख मिचोली खेल रहे थे. मौसम जैसे आज नहा कर आया था. दोपहर ने जैसे शाम की चादर ओढ़ रखी थी. निलय चुपचाप अपने कमरे में बिस्तर पर पड़ा हुआ था. उसको देख कर ऐसा लगता था जैसे मेज कुर्सी और अलमारी की तरह कोई सामान पड़ा हो. वो ऊपर की दीवार पर उधडे हुए प्लास्टर में कोई आकृति गड़ रहा था. कभी कोई घोडा लगता तो कभी उल्टा पड़ा एक कंघा. बीच बीच में दीवार पर हाथों से तबले की एक थाप दे देता, जैसे दीवार को नींद से जगाना चाहता हो. फिर दूर से आती मोर की आवाज सुनता और उसकी बांग को गिनने की कोशिश करता.

पीछे की खुली खिड़की से हवा आकर उसके बालों को सहला रही थी जैसे दो प्रेमी आलिंगन कर रहे हों. हवा में कुछ ठण्ड सी घुली हुई थी. लगता था कहीं दूर बारिश हुई है और उसी बारिश में भीग कर हवा छोटे बच्चे की तरह कमरे में यहाँ वह दौड़ रही थी. कभी सामने टंगे शीशे को छेड़ देती तो कभी रोशनदान में लगे पुराने अखबार को गुदगुदा देती.

 
रसोई की नल से गिरती बूँद नीचे पड़ी थाली के साथ लय ताल मिला रही थी. ऐसा लग रहा था जैसे दूर किसी मंदिर में घंटी बज रही हो. निलय कभी सोचता की उठ कर नहा ले लेकिन फिर आलस्य उसे ऐसे रोक लेता जैसे प्रेमिका हाथ पकड़ कर कह रही हो कुछ देर और रुक जाओ. कुछ देर और उसी तरह पड़े रहने के बाद निलय उठा और रसोई की और चल दिया. अचानक चाय पीने की इच्छा जाग गयी थी. जाकर देखा तो चाय का बर्तन गन्दा पड़ा हुआ था. वो वापस कमरे में आ गया. अब बर्तन कौन धोये? अभी सुबह ही पी थी चाय. सामने की मेज पर रखी किताबें और उन पर पड़ी धूल ऐसे लग रहे थे जैसे किसी किले का दरवाज़ा बहुत सालों से बंद पड़ा हो और मटमैला हो गया हो. निलय ने सोचा चलो इन्हें साफ़ कर दूं फिर सोचा क्या फायदा, कुछ दिनों में फिर धूल जम जाएगी.

कुछ देर खड़ा हो कर सोचने के बाद वो आईने के पास चला गया. दाढ़ी कुछ बड़ी हो गयी थी. कुछ कुछ सफ़ेद भी हो रही थी. अपनी उंगलियों से वो उन्हें फेरने लगा जैसे कोई किसान अपनी लहलहाती फसल को हाथों से छू कर अपनी मेहनत को महसूस कर रहा हो.


फिर नजर अलमारी पर चली गयी. ना जाने क्या सोच कर निलय ने अलमारी खोली. लकड़ी की वो पुरानी अलमारी अचानक यूं खोले जाने से कुछ नाराज से हो गयी और किसी महिला बुजुर्ग की तरह कराह कर कांपने लगी.

अन्दर के हालत देख कर कुछ दिन पहले टीवी पर देखे भूकंप के हालत ताजा हो गए. कमीजें, पाजामों के साथ कुश्ती लड़ रही थीं. जुराबें और बनियान चोरों की तरह चादरों के ढेर के ऊपर खड़े हो कर बगल में टंगे कोट को निहार रहे थे. निलय मन ही मन सोचने लगा जब आराधना घर में रहती थी तो सब कुछ कितना साफ़ रहता था. सचमुच शादी के बाद औरत पति को कुछ मामलो में फिर से बच्चे जैसा बना देती है. अगर शादी से पहले का समय होता तो शायद निलय कबका पूरा घर साफ़ कर चुका होता. मगर अब जैसे लगता था ये मेरा काम नहीं है. पीछे कोने में हाथों से बुना हुआ एक सफ़ेद काले रंग का स्वेटर मुंह छुपाए पड़ा था.

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रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन में आप भी भाग ले सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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ये स्वेटर अनु ने अपनी माँ से पूछ कर उसके लिए बनाया था. अनु की माँ ने बिलकुल वैसा ही स्वेटर उसके बाबा के लिए बुना था. अनु का बड़ा मन था की निलय भी वैसा ही स्वेटर पहने. निलय को आज भी याद था जब पहली बार उसने वो स्वेटर पहना था, अनुराधा कुछ देर उसे देखती रही थी और फिर उसके आखों में आंसू आ गए थे, आंसू पोंछ कर उसने धीरे से मुस्कुरा के कहा था बिलकुल बाबा लग रहे हो. उसके बाबा की मौत कुछ ही महीनों पहले हुई थी.

निलय कमरे से बाहर आ कर बालकनी में बैठ गया. दोपहर के समय सड़क बिलकुल खली थी. सामने स्कूल के मैदान में दो बच्चे मिटटी से कुछ बनाने की कोशिश कर रहे थे. शायद पास की रिक्शे वालों की बस्ती के बच्चे थे. कुछ दूर एक घर की मुडेर पर बैठा एक कबूतर अपनी चोंच से अपने पंखों से कुछ नोच रहा था. एक दूसरे घर की छत पर लगे एंटीने पर एक पतंग फंसी हुई थी. लाल सफ़ेद रंग की वो पतंग हवा में ऐसे फडफडा रही थी जैसे कोई पंछी पिंजरे से अपने आजाद साथियों को देख कर अपने पंख फड़फड़ा रहा हो.


ऊपर बालकनी की छत पर टंगा विंड चाइम हवाओं के साथ बहुत मधुर संगीत बजा रहा था. निलय को याद आया की कैसे शादी के बाद अनु ने कितने बाज़ार घूमने के बाद इसे पसंद किया था. सामने डाकघर की दीवार पर राजेश खन्ना की पुरानी फिल्म का पोस्टर लगा हुआ था. कुछ दूर एक मोची बैठा हुआ ऊंघ रहा था.


यहाँ भी वही नीरसता थी जो कमरे के अन्दर थी. कुछ देर बैठने के बाद निलय उठा और ऊपर छत की तरफ चला गया. कितने महीनों के बाद वो छत पर आया था. छत की मुडेर बारिश की पानी से हलकी काली पड़ गयी थी. कोने में एक बाल पड़ी हुई थी. शायद किसी बच्चे ने गलती से यहाँ फेंक दी होगी. कुछ आधे खाए फल पड़े थे. शायद बंदरों ने यहाँ फेका होगा. महीनों की धूल जम कर जमीन के रंग जैसे हो गयी थी.
बीच में टंगा झूला हलकी हवा में वैसे ही झूल रहा था जैसे नदी के किनारे बंधी कोई नाव हिचकोले खा रही हो. कितना बदरंग हो गया था वो झूला. अनु ने कितनी जिद करके और महीने खर्च से बचा बचा कर वो झूला लगवाया था. गर्मियों की शाम वो और निलय रोज़ इस झूले पर आ कर बैठा करते थे. तब शाम को बिजली का कटना भी नहीं अखरता था.

यहाँ आ कर तो मन और भारी हो गया था. निलय नीचे उतरने लगा तो सीढ़ियों पर बनी दुछत्ती पर नज़र चली गयी. कुछ सोच कर वो उसके अन्दर चला गया. उसकी छत इतनी नीची थी की सीधा खड़ा होना भी मुश्किल था. अन्दर कुछ पुराने बक्से पड़े थे. ऐसा लगता था जैसे घर में अकेले पड़े वो बुजुर्ग हो अपने मने में न जाने कितने तजुर्बे और यादें छुपाए हो मगर उन्हें सुनने वाला कोई न हो. कोने में एक पुराना हारमोनियम पड़ा था. कुछ पुराने खाली दफ्ती के डिब्बे भी पड़े हुए थे. दूसरे कोने में मच्छरदानियो के डंडे खड़े थे. अनु को मच्छरदानी में सोना बिलकुल पसंद नहीं था. कहती थी मैं कोई मछली नहीं हूं जो इस जाल में पड़ी रहूं. ये बात यादकर निलय के होठों पर मुस्कान आ गयी.


दुछत्ती बंद कर वो वापस कमरे में आ गया. मन में बड़े सवाल उठ रहे थे. छोटी सी तो बात थी. उस दिन शाम को दोस्तों ने मजबूर कर दिया था पीने के लिए. पता ही नहीं चला की काफी ज्यादा पी गया हु. वापस घर लौटने पर अनु ने हंगामा मचा दिया था. कहने लगी थी या शराब पिए या उसके साथ रहे. नशे में निलय ने भी कह दिया कि वो उसका गुलाम नहीं है और ये उसका घर है, अगर दिक्कत है तो वापस चली जाए अपने घर. अब नशे में कही गयी बात इतनी बुरी क्यों लग गयी उसे की रात ही रात चली गयी अपने माँ के घर. आखिर उसे पहले से पता था की हर शाम काम की थकान उतारने के लिए मैं थोड़ी पीता हूं. हर किसी की किस्मत उसके बाबा जैसी तो नहीं होती की शराब नकली निकल जाए और किडनी फ़ैल होने की वजह से मौत हो जाए. और तो और गुस्सा इतना की इतने महीने हो गए मगर कोई खबर नहीं. निलय ने भी कसम खायी थी की गलती अनु की है और वो उसे मनाने नहीं जाएगा. लेकिन अब अकेला घर काटने को दौड़ता था.


चलो ऐसा करता हूं कि कल चला जाऊंगा उसके माँ के घर. थोडा डाटूंगा और वापस ले आऊंगा. शराब हफ्ते में केवल ४ दिन पिऊंगा. चलो ३ दिन ही सही. मगर कभी दावत हो गयी तो बात दूसरी है. क्या साथ में कुछ ले जाऊं उसके लिए. उसे सिल्क की साड़ी बहुत पसंद है. कढ़ाई वाली. वही ले जाऊंगा. यह सब सोचते सोचते निलय की आंख लग गयी.


बाहर सड़क पर दो लोग जा रहे थे. एक ने दूसरे से पूछा "अरे भाई ये घर किसका है, काफी महीनों से आ जा रहा हूं मगर कोई दिखा नहीं. हमेशा ताला लगा रहता है.?"
दूसरा बोला "अरे ये निलय बाबू का घर है. बड़े मिलनसार आदमी, बैंक में मेनेजर. नयी नयी शादी हुई थी. किसी दिन बीबी से झगड़ा हो गया. रूठ कर बीबी घर से निकली और अपने माँ के शहर जाने वाली बस में बैठ गयी. रास्ते में बस का एक्सिडेंट हो गया. किसी ट्रकवाले ने दारू पी कर टक्कर मार दी. सारे लोग मारे गए. जब खबर निलय बाबू को मिली तो बेचारे सह न पाए, उसी समय दिल का दौरा पड़ा और प्रभु को प्यारे हो गए. तब से ये घर ऐसे ही बंद पड़ा है. कुछ लोग कहते है की उन्होंने निलय बाबू की आत्मा को अक्सर घूमते देखा है इस घर में. पता नहीं कब मुक्ति मिलेगी बेचारे को मौत के बाद की इस नीरसता से."

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