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जर्मन कहानी - स्टीफन ज्विग की कहानी - लेपोरैला

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जर्मन कहानी स्‍टीफन ज्‍विग अग्रेजी से अनुवादः अनुराधा महेंद्र लेपोरैला क्रेसेंज अन्‍ना फिंकेनहूबर की उम्र उनतालीस बरस थी। उसका जन्‍म ना...

अनुमति से साभार प्रकाशित - रचना समय - संपादक : हरि भटनागर - सहयोग - बृजनारायण शर्मा

जर्मन कहानी

स्‍टीफन ज्‍विग

अग्रेजी से अनुवादः अनुराधा महेंद्र

लेपोरैला

क्रेसेंज अन्‍ना फिंकेनहूबर की उम्र उनतालीस बरस थी। उसका जन्‍म नाजायज़ संतान के रूप में एक पहाड़ी गांव में हुआ था। यह जगह इंसब्रुक से ज़्‍यादा दूर नहीं थी। उसके नौकरानी के परिचय-पत्र में ख़ास विशेषता के ख़ाने में एक लक़ीर खींच दी गई थी जिसका मतलब था कोई ‘ख़ास विशेषता नहीं' पर इस क़िस्‍म के कागज़ात भरने वाले अफसरों को यदि उसके लक्षणें को दर्ज़ करना ही पड़ता तो इस ख़ाने में वे यक़ीनन लिखते, “थके-मांदे, हठीले, मरियल पहाड़ी टट्‌टू की माफ़िक।” वाकई नीचे का थुलथुल होंठ, लंबी अंडाकार भूरी मुखाकृति, बिना बरौनियों की बुझी-बुझी आंखें, और सबसे बढ़कर तेल से माथे पर चिपकाए रूखे बालों की वजह से उसे देख खच्‍चर की ही छवि जे़हन में उभरती थी। खच्‍चर की भांति उसकी चाल भी अड़ियल और अनमनी थी। कुदरत का एक ऐसा दुखी प्राणी जिसे बारह मास सर्दी हो या गर्मी लकड़ी की भारी-भरकम गट्‌ठर लादे उसी ऊबड़-खाबड़, पथरीले या दलदली रास्‍ते से ऊपर-नीचे आना-जाना पड़ता है। दिनभर की कड़ी मेहनत से छुट्‌टी पाकर क्रेसेंज भी अपनी कठोर उंगलियों को बांध बड़े फूहड़ ढंग से कुहनियां फैलाकर पसर जाती और ऊंघने लगती थी। ऐसे वक़्‍त उसमें उन खच्‍चरों से अलग बुद्धिमानी को कोई लक्षण दिखाई नहीं देता था, जो दिनभर की मेहनत के बाद बड़े धीरज से अस्‍तबल में मुक खड़े रहते हैं। इसका समूचा रंग-ढंग कठोर, काठ-सा बेजान ओर जड़ था। सोच-विचार उसके बूते से बाहर की बात थी। कोई भी नया विचार उसके दिमाग़ में बमुश्‍किल ही घुसता, लगता जैसे विचार को छलनी

के बंद सुराखों से गुज़रकर आना पड़ा हो परएक बार घुस जाए तो उसे यूं पकड़कर रखती जैसे कंजूस कौड़ी को। वह पढ़ती-वढ़ती कुछ नहीं थी अख़बार या इबादत-पुस्‍तिका तक नहीं। लिखना उसके लिए टेढ़ी खीर था। बाज़ार के हिसाब-किताब की डायरी में भद्‌दी और टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट उसकी भौंडी और दुबली-पतली आकृति की ही याद दिलाती, जिसमें नारी-सुलभ आकर्षण का कोई चिह्‌न नहीं था। उसकी सख्‍़त हडि्‌डयों, माथे, कूल्‍हों और उंगलियों के जोड़ों की तरह ही उसकी आवाज़ भी भारी-भरकम थी जो कंठ के भीतर से ठेठ तिरौली उच्‍चारण के बावजूद यूं खड़खड़ाती जैसे जं़ग लगे फाटक की चूलें। उसकी आवाज़ में ज़ंग लगना कोई अचरज की बात नहीं थी। वह कभी एक भी लफ्‍ज ज़रूरत से ज़्‍यादा नहीं बोलती थी। किसी ने उसे कभी हँसते हुए नहीं देखा था। इस मामले में भी वह ढोर-डंगरों से मेल खाती थी, क्‍योंकि इन ‘मूक-पशुओं' का बोलने से वंचित रहने से भी दुःखद होता है ‘हँसी' से वंचित रहना, जिसकी मार्फत भावनाओं का उन्‍मुक्‍त और आह्‍लादित होकर इज़हार किया जा सकता है।

नाजायज़ संतान होने की वजह से उसका पालन-पोषण कम्‍युनिटी ने किया था। बाहर बरस की उम्र में ही उसे एक रेस्‍त्रां मेंकाम करने के लिए भेज दिया गया था। वहाँ दिन-रात कड़ी मेहनत से उसने अच्‍छा नाम कमा लिया इसलिए उसे मुख्‍य सड़क पर स्‍थित एक बेहतर होटल में रसोई के काम के लिए भेज दिया गया। क्रेसेंज सवेरे पांच बजे उठ जाती और झाडू-पोछा, कमरों की साफ़-सफ़ाई, अंगीठी, जलाना, खाना पकाना, कपड़े-लत्त्ो धोना, इस्‍त्री करना, आदि तमाम कामों में देर रात तक जुटी रहती । बाहर जाने या सैर-सपाटे के लिए कभी छुट्‌टी नहीं माँगती थी। गली-मुहल्‍ले में भी नहीं जाती। चर्च जाती और फौरन लौट आती। रसोई की आगही उसका सूरज थी। जंगल से उसका एकमात्र वास्‍ता अंगीठी के लिए ढेर सारी लकड़ियां बीनकर लाना था।

कोई पुरुष उसके आस-पास नहीं फटकता था, वह शायद इसलिए कि जैसा पहले ही बताया गया है कि रोबोट की तरह गुज़ारे पच्‍चीस बरसों ने, जो थोड़ी -बहुत नारी-सुलभ सुंदरता कुदरत ने बख्‍शी थी, उसे पूरी तरह निचोड़ लिया था। कभी कोई उन नज़रों से उसे देखता भी तो वह घोर प्रतिरोध करती। हाँ, एक चीज़ से उसे असीम सुख मिलता था - वह था पैसा जमा करना! देहातियों की-सी जमाखोरी प्रवृत्ति उसमें भी थी, दूसरे इस ख्‍़याल मात्र से वह सिहर उठती कि बुढ़ी होने परउसे दोबारा कम्‍युनिटी पर निर्भर रहने के लिए लाचार न होना पड़े। दूसरों की दान-दया पर वह नहीं जीना चाहती थी। धन कमाने की यह लालसा ही इस नीरस जीव को, जब वह सैंतीस बरस की थी तो अपनी तिरौली जन्‍मभूमि से बाहर ले आई थी। रोज़गार दफ़्‍तर की मैनेजर साहिबा गर्मियों की छुटि्‌टयों में तिरौल आई थीं।

क्रेसेंज की जी-तोड़ मेहनत और काम के प्रति उन्‍माद देखकर वह चकित थीं उसने क्रेसेंज से कहा कि इतनी मेहनत से तो वह वियना में दुगनी कमाई कर सकती है।

रेल के सफ़र में क्रेसेंज हमेशा की तरह ख़ामोश रही। अखंड चुप्‍पी धारण किए उसने अपने खपची के बक्‍से को अपनी गोद में ही रख लिया जिसमें उसने जरूरत का सारा सामान ठूंस रखा था, उसके बोझ से हालांकि उसके घुटने दर्द करने लगे थे पर मज़ाल है कि वह उसे नीचे उतारती। कुछ अच्‍छे व भलमानस मुसाफिरों ने बक्‍से को रैक में रखने की पेशकश भी की, पर इस हठी स्‍त्री ने तुरंत इंकार कर दिया। उसके देहाती दिमाग़ में यह बात घर कर गई थी कि जिस बड़े शहर वह जा रही है वहाँ ठगी और चोरी-चकारी बहुत आम बात है। वियना पहुंचकर अकेले बाज़ार आने-जाने में उसे कुछ दिन लगे, क्‍योंकि पहले-पहल तो ट्रैफिक देखकर उसका कलेजा मुंह को आ जाता था। पर एक बारगी जब वह उन चार सड़कों से भली-भांति वाकिफ़ हो गई जहाँ उसे रोज़ आना-जाना लगी। इस नई जगह पर भी वह पहले की ही तरह झाडू-पोंछा, कमरों की साफ़-सफ़ाई, अंगीठी जलाना आदि काम करती थी। तिरौल में रात नौ बजे ही लोग सोने चले जाते हैं। उसी रिवाज़ के मुताबिक वह नौ बजे सो जाती और सुबह पुकारे जाने तक पशुओं की तरह पूरा मुंह खोलकर बेसुध पड़ी रहती। किसी के लिए भी यह कहना वाकई मुश्‍किल था कि यह नई जगह उसे पसंद थी या नहीं, शायद वह खुद भी नहीं जानती थी। उसकी एकांतता जस-की-तस थी। हर हुक्‍म की तामील वह बस एक शब्‍द ‘अच्‍छा' कहकर करती। कभी जब चिड़चिड़े मूड में होती तो कंधे उचका देती। अपने साथी नौकरों को नज़रअंदाज़ करती। चिढ़ाने या उसकी खिल्‍ली उड़ाने की उनकी किसी भी हरक़त पर कोई ध्‍यान नहीं देती थी। महज़ एक मर्तबा एक खुशमिजाज़ वियनाई नौकरानी जब उसके ख़ास तिरौली लहज़े की नकल करते हुए लगातार खिल्‍ली उड़ाती रही तो वह आपा खो बैठी। गुस्‍से से उसने चूल्‍हे से एक जलती लकड़ी उठाई और इस ख़तरनाक हथियार को लहराते हुए तंग करने वाली उस लड़की के पीछे लपकी जो भय और विस्‍मय से चीखती हुई भाग गई। उसके बाद कभी किसी ने उसे छेड़ने की हिम्‍मत नहीं की।

हर इतवार सुबह-सवेरे बड़े घेरे वाला स्‍कर्ट और तिरौली टोपा पहनकर वह गिरजाघर जाती थीं उसे एक दिन की छुट्‌टी मिलती थी। पर सिर्फ़ एक बार उसने वियना में घूमने की कोशिश की। ट्राम न पकड़कर वह पैदल ही वियना की सड़कों पर निकल पड़ी। घुमावदार सड़कों पर भटकते-भटकते आिख़रकार डेन्‍यूब नदी के किनारे आ पहुंची। नदी के तेज़ बहाव को वह यूं घूरती रही मानो वह उसकी घनिष्‍ठ मित्र हो। फिर वह पलटी और भीड़-भाड़ वाली सड़कों से बचती-बचाती लौट आई। अपनी इस पहली सैर से उसे निराशा ही हुई होगी क्‍योंकि उसने इसे कभी नहीं दोहराया। इतवार की छुट्‌टी के दिन बुनाई-कढ़ाई करना या फिर खिड़की के पास निठल्‍ले बैठे रहना उसे भाता था। इस तरह शहर आने के बावजूद उसकी एकरस ज़िंदगी में कोई ख़ास बदलाव नहीं आया, सिवाय इसके कि माह के अंत में अब दो की बजाय चार नीले नोट उसके मेहनतकश, थके और सख्‍़त हाथों में आ जाते थे। इन नोटों को देर तक वह संशय से जांचती-परखती। हरेक को सलीके से तहकर दूसरे नोटों के साथ काठ के नक्‍काशीदार पीले बक्‍से में सहेजकर रखती, जिसे वह गांव से लेकर आई थी। इस छोटे से बहुमूल्‍य संदूक से उसकी ज़िंदगी का गहन मकसद जुड़ा था। रात में वह चाबी हमेशा तकिए के नीचे दबाकर रखती। दिन के वक़्‍त चाबी कहाँ रहती है इसकी घर में किसी को भी ख़बर नहीं थी।

इस अज़ीबोग़रीब मानव (हालांकि उसमें मानवीय गुण नहीं के बराबर थे फिर भी मानव तो कहना पड़ेगा) की कुल मिलाकर यही विशेषताएं थीं। सामान्‍य क़िस्‍म की कोई भी स्‍त्री शायद ही नौजवान बैरन वॉन लेडरशीम के उस विचित्र घर में नौकरानी के रूप में इतने दिन टिक पाती। घर में आए दिन होने वाले लड़ाई-झगड़ों के कारण नौकर एकाध दिन में ही काम छोड़ भाग जाते थें मालकिन की तीखी डांट-फटकार को बर्दाश्‍त करना उनके बस की बात नहीं थी। वह एक बेहद अमीर व्‍यापारी की सबसे बड़ी बेटी थी। बैरन के साथ उसकी पहली मुलाक़ात एक पहाड़ी रिसार्ट में हुई थी। हालांकि वह उससे कई बरस छोटा था, किसी बड़े अमीर परिवार से भी नहीं था और गले तक कर्ज़ में डूबा था पर बेहद मिलनसार व ख़ूबसूरत था जिसे दौलत के साथ ब्‍याह रचाने में कोई परहेज़ न था। लड़की के माँ-बाप के भरसक विरोध के बावजूद दोनों ने सब कुछ तुरत-फुरत तय कर लिया। लड़की के माता-पिता दरअसल ऐसा वर चाहते थे जो बैरन वॉन लेडरशीम के मुकाबले ज़्‍यादा साधन-संपन्‍न हो। हनीमून पूरा होने से पहले ही श्रीमती वॉन लेडरशीम  को लगने लगा कि उसके माता-पिता ही ठीक थे। उसका युवा पति घर की जिम्‍मेदारियां निभाने से ज़्‍यादा एय्‍याशी करने में मगन रहना चाहता था। कर्ज़ में वह किस कदर डूबा है इसका भी उसने कभी खुलाता नहीं किया।

यूं वह अच्‍छे स्‍वभाव का था और इस क़िस्‍म के रसिकों की तरह एक दिलकश साथी की सभी ख़ूबियां उसमें थीं पर उसका कोई उसूल नहीं था। खर्च पर अंकुश रखना या हिसाब-किताब करना उसे ज़ाहिल क़िस्‍म के पूर्वाग्रह की उपज लगता था। विवाह के बाद भी वह पहले की ही तरह फाकामस्‍त, उड़ाऊ बना रहना चाहता था। बीवी एक व्‍यवस्‍थित सुखी घरेलू जीवन चाहती थी जिसकी वह अपने माँ-बाप के घर में आदी थी। बीवी का यह मध्‍यवर्गीय बर्ताव उसके विलासपूर्ण मिज़ाज को खटकता था। हालांकि वह अमीर थी पर पैसों को यूं उड़ाने नहीं देना चाहती थी। उसने घुड़साल बनाने और घुड़दौड़ के लिए घोड़े ख़रीदने की उसकी पसंदीदा योजना पर रुपए लगाने से साफ़ इंकार कर दिया। उसकी इस कंजूसी के जवाब में पति लेडरशीम ने पति-पत्‍नी सम्‍बन्‍धों को दरकिनार कर अपनी इस उत्तरी जर्मन बीवी की उपेक्षा करना शुरू कर दिया। बीवी की तीखी आवाज़ ओर मनमाने बर्ताव से उसकी चिढ़ दिनोंदिन बढ़ती गई। ज़ाहिर तौर पर वह उसे कोई चोट नहीं पहुंचाता था पर दिन-रात वह पत्‍नी की उपेक्षा करात जिससे वह घोर निराशा से भर उठती। जब भी वह अपना दुखड़ा रोने या समझाने के लिए पति के पास जाती, वह पूरे अदब और सहानुभूति से उसकी बात सुनता पर उसके पलटते ही उसकी बातों को सिगरेट के धुएं की तरह लापरवाही से उड़ा देता था। उसका यह बनावटी बर्ताव उसके खुले विरोध से कहीं ज़्‍यादा यातनादायी था। चूंकि पति की अचूक भलमनसाहत के आगे वह निरस्‍त्र हो जाती थी इसलिए उसके भीतर दबा हुआ क्रोध दूसरे तरीकों से अभिव्‍यक्‍त होता था। उसके कहर की सबसे ज़्‍यादा वजह-बेवजह मार झेलनी पड़ती नौकरों को। दो बरसों से भी कम अरसे में 16 नौकर बदले जा चुके थे। एक मर्तबा तो उसने इस कदर मार-पिटाई कर दी कि मुकदमेंबाज़ी और बदनामी से बचने के लिए ख़ासी रक़म चुकानी पड़ी।

क्रेसेंज ही एकमात्र ऐसी नौकरानी थी जो चुपचाप उसकी डांट-फटकार सह लेती थी और मालकिन की गालियों की बौछार को झेलते हुए यूं मूक खड़ी रहती जैसे बारिश में भीगते हुए घोड़े खड़े रहते हैं। कभी किसी की तरफ़दारी नहीं करती थी। आए दिन नौकरों के बदल जाने का उस पर रत्ती भर भी असर नहीं पड़ता था। दरअसल इस बात पर उसका ध्‍यान ही नहीं जाता था कि साथ में रहने वाले नौकरों के नाम, सूरत-शक्‍ल और काम लगातार बदलते रहते हैं, क्‍योंकि दिन का वक़्‍त की खुसर-पुसर और अपनी मालकिन के बेहोशी भरे दौरों और वहशी चीख-पुकार के प्रति वह पूरी तरह उदासीन ही बनी रहती। रोज़ बाज़ार जाकर सामान लाना और रसोई में जुटे रहना, इस दिनभर की मेहनत को छोड़ बाहर क्‍या चल रहा है इससे उसका कोई वास्‍ता नहीं थ। मूसल की तरह सख्‍़त ओर भावशून्‍य रोज़-ब-रोज़ वह पिसती रहती। इसी तरह इस विराट शहर में उसके जीवन के दो बरस गुज़र गए पर उसकी मानसिकता में रत्तीभर भी बदलाव नहीं आया। हाँ, भौतिक चीज़ों के लिहाज़ से एकमात्र फ़र्क यह आया कि अब उसके बक्‍से में नीले नोटों की गड्‌डी एक इंच मोटी हो गई थी। जब दूसरे बरस के आखिर में उसने उंगली पर थूक लगा-लगाकर गिनती की तो पाया कि एक हजार रुपया जमा करने के अपने मक़सद के वह बहुत क़रीब पहुंच चुकी थी।

पर भाग्‍य की महिमा निराली है ओर कभी-कभार संयोग ऐसा खेल खेलता है कि सख्‍़त से सख्‍़त स्‍वभाव में अज़ीबोग़रीब बदलाव आ जाता है। क्रेसेंज में आए बदलाव की वजह भी उतनी ही मामूली थी जितनी वह खुद! हर दस बरस बाद सरकार नए सिरे से जनगणना करती थी, जिसके लिए हर घर को एक जटिल-सा दस्‍तावेज़ भरकर देना पड़ता था। बैरन बख़ूबी जानता था उसके ज़्‍यादातर नौकर-चाकर लिखने के मामले में एकदम पैदल हैं। सो उसने सबके फ़ार्म खुद ही भरना मुनासिब समझा। इसी बाबत्‌ सही वक़्‍त पर उसकी मेज़ पर क्रेसेंज को भी बुलाया गया। जब उसका नाम, उम्र और जन्‍मस्‍थान पूछा गया तो पहली और तीसरी मद के बारे में जानकर घर के मालिक की अचानक दिलचस्‍पी बढ़ गई। एक उम्‍दा शिकारी होने के नाते बैरन अक़्‍सर अपने कॉलेज के मित्र के साथ रहने चला जाता था, जो तिरौल के शिकारगाह का मालिक था। एक मर्तबा तो सांभर की खोज में पंद्रह दिनों तक वह पहाड़ों में भटकता रहा। साथ में फिंकेनहूबर नाम का गाइड था जो संयोगवश क्रेसेंज का चाचा निकला। लेडरशीम को वह शख्‍़स अच्‍छा लगा था। इस घटना और रसोईदारिन के जन्‍मस्‍थान की जानकारी होने की वजह से मालिक और नौकरानी के बीच बातचीत चल पड़ीं बातों ही बातों में पता चला कि जिस सराय में क्रेसेंज ने पहले काम किया था वहाँ लेडरशीम क्रेसेंज के हाथों से पका बेहद लजीज़ गोश्‍त खा चुका था। बेशक बेहद मामूली पर एक के बाद जिस तरह से संयोग जुड़ते गए वह क्रेसेंज के लिए वाकई असाधारण था। पहली बार वियना में उसका एक ऐसे व्‍यक्‍ति के साथ साबका हुआ था जो उसके घर और गांव से वाकिफ़ था। वाक़ई कितनी अद्‌भुत बात थी। एक अनोखे उत्‍साह से उसका चेहरा दमकने लगा। गर्दन व शरीर झुकाकर बड़े फूहड़ ढंग से वह बैरन के पास खड़ी थीं जब बैरन ने मज़ाक करते हुए तिरौली लहज़े में पूछा कि क्‍या वह गाना-वाना भी जानती है तो उसका दिल गुदगुदाने लगा। फिर इसी हँसी-मज़ाक के मूड में बैरन ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा “मेरी प्‍यारी सेंजी अब तुम जाओ, मुझे काम करना है, पर ये दो अतिरिक्‍त क्राउन लेती जाओ, क्‍योंकि तुम जिलटराल की रहने वाली हो।”

हालांकि मालिक ने कोई गहरी अंतरंगता नहीं दर्शाई थी। ऐसी तो कतई नहीं कि एक अधेड़ नौकरानी का दिल भीतर तक मचलने लगे पर उन चंद मिनटों की बातचीत का उसके नीरस और कोरे मन पर कुछ वैसा ही असर हुआ जैसा किसी शांत, स्‍थिर तालाब में कंकड़ फेंकने से होता है। गोलाकार लहरें उठीं और धीरे-धीरे फैलकर छपछपाते हुए उसकी चेतना में घर कर गईं। सालों-साल इस चुप्‍पे क़िस्‍म के जीव का अपने किसी भी साथी के संग कभी कोई निजी संबंध नहीं रहा था। उसके लिए वाकई यह अकल्‍पनीय था कि इमारतों के इस जंगल में रहने वाले सैकड़ों-हज़ारों लोगों में से पहली बार उसमें दोस्‍ताना दिलचस्‍पी दिखानेवाला एक ऐसा शख्‍़स है, जो उसके गांव के पहाड़ों से वाकिफ़ है और जिसने उसके हाथों से पका गोश्‍त खाया है। इस सबसे ज़्‍यादा रोमांचक थी पीठ पर पड़ी वह थपकी-जो उसके देहाती मन के मुताबिक उसके भीतर की नारी को जगाने का एक अर्थपूर्ण न्‍यौता था। हालांकि क्रेसेंज में उतना दुःसाहस नहीं था कि यह भरम पाल बैठे कि इस कदर शानदार पोशाकवाला खूबसूरत नौजवान उसकी कुम्‍हलाई, थकी देह के प्रति आकर्षित हो सकता है, फिर भी इस रू-ब-रू जान-पहचान ने उसकी सुप्‍त चेतना को झकझोर दिया था।

भला हो उस मुलाकात का जिसकी बदौलत उस स्‍त्री के अंतर्मन में तब्‍दीली आने लगी, शुरुआत में हालांकि यह अदृश्‍य थी पर हौले-हौले यह निश्‍चित आकार लेने लगी ओर फिर एक नई भावना में बदल गई । एक ऐसी भावना जो स्‍वामिभक्‍त कुत्ते में देखी जाती है जो अपने आस-पास के अनगिनत लोगों में से किसी एक को चुनकर उसे ही अपना स्‍वामी बल्‍कि देवता समझने लगता है। इस भावना के वशीभूत कुत्ता हर वक़्‍त अपने स्‍वामी के पीछे लगा रहता है और कुछ दिनों की जुदाई के बाद मिलने पर उछलने ओर पूंछ हिलाकर खुशी का इज़हार करने लगता है। दास की-सी प्रवृत्ति के चलते उसके हर हुक्‍म का पालन करता है। क्रेसेंज के दिमाग़ के तंग खानों में जिसमें आज तक पैसा, बाज़ार, अंगीठी, गिरजाघर और बिस्‍तर जैसे महज़ आधा दर्जन ख्‍़याल ही हावी रहते थे, अब अचानक उसमें एक नया अंकुल फूट पड़ा था, जो अपने लिए जगह चाहता था और इसने दूसरे तमाम कब्‍ज़ेदारों को परे धकेल दिया। पकड़ में आई किसी चीज़ को हर देहाती छोड़ने से हिचकिचाता है, यह देहातिन स्‍त्री भी अपने सुप्‍त आवेगों की विस्‍मय भरी दुनिया में इस नए अंकुर का पूरी मेहनत से पोषण करने लगी। उसमें आई इस तब्‍दीली को जग-ज़ाहिर होने में कुछ वक़्‍त लगा, उसके बदलाव के शुरुआती संकेत धुंधले थे, पर फिर उसकी आदतों में आई तब्‍दीली साफ़ दिखने लगी। मसलन वह बैरन के कपड़ों और जूतों को बड़े जतन और सावधानी से साफ़ करती जबकि मालकिन के कपड़ों और जूतों की साफ़-सफ़ाई दूसरी नौकरानी पर छोड़ देती। बैरन के ताले में चाबी घुमाने की आवाज़ सुनते ही तेज़ी से भागकर हॉल में आती ओर झटपट टोप, कोट और छड़ी उसके हाथ से ले लेती ताकि वह आराम कर सके। रसोई में भी अब वह पहले से कहीं ज़्‍यादा मेहनत से काम करती। कभी-कभार तो सांभर के गोश्‍त के लिए कई-कई बार बाज़ार के चक्‍कर काटती। अब वह अपने कपड़ों पर भी ध्‍यान देने लगी थी।

एक-दो हफ़्‍ते गुज़रने के बाद उसकी नई भावनाओं के अंकुर में पत्तियां उगकर ज़मीन से ऊपर दिखाई देने लगीं। कुछ और हफ़्‍ते गुज़रने के बाद पत्तियों की दूसरी खेप फूटने लगी और उनके रंग भी निखरने लगे। यह दूसरी भावना पहली की पूरक थी यानी एक ओर मालिक के प्रति अटूट श्रद्धा और दूसरी और मालकिन के प्रति असीम नफ़रत। उसकी बीवी के लिए नफ़रत जो बैरन के साथ रह सकती थी, सो सकती थी, चाहे जब बात कर सकती थी, जबकि इस सबके बावजूद वह मालिक के साथ उस तरह आदर से पेश नहीं आती थी जिस तरह वह खुद यानी सेंजी। इसकी एक वजह यह थी (अब उसने ध्‍यान देना सीख लिया था) एक मर्तबा वह यह देखकर दंग रह गई कि गुस्‍से से आगबबूला होकर पत्‍नी अपने पति को बड़ी बेरहमी से लताड़ रही थी। दूसरी बात यह कि पति -पत्‍नी के स्‍वभाव में ज़मीन-आसमान का जो फ़र्क़ था उसे वह जान चुकी थी। कहाँ वियनाई मालिक का जिंदादिल मिजाज़ और कहाँ उत्तरी जर्मन मालकिन का सर्द अक्‍खड़ रवैया।

चाहे जो हो, तमाम तरीकों से क्रेसेंज यह ज़ाहिर करने लगी थी कि मालकिन के प्रति उसमें नफ़रत भरी हुई है। ब्रिगेटा लेडरशीम को दो-तीन बार घंटी बजानी पड़ती, तब कहीं जाकर क्रेसेंज जवाब देती और फिर इतने बेमन और सुस्‍त चाल से आती कि कोई भी झुंझला उठे। उसके उठे हुए कंधे किसी अड़ियल और चिड़चिड़े घोड़े का ही आभास देते जिसे चाहे जितना पीटो उसके कान पर जूं नहीं रेंगती। उसमें प्रतिद्वंद्विता साफ़ झलकती जिसे लांघना असंभव दिखता। मालकिन के आदेशों को सुनकर वह हाँ या ना में कोई जवाब नहीं देती। बात दोहराई जाती तो क्रेसेंज बड़ी बेरुखी से गर्दन हिला देता या फिर अपने देहाती लहज़े में लंबा खींचकर कहती, “मैंने सुन लिया है।” मालकिन कभी बाहर जाने के लिए तैयार हो रही होती तो उसे दराज़ की चाभी नहीं मिलती जिसमें जेवरात रहते। आधे घंटे तक काफ़ी खोजबीन के बाद कमरे के किसी कोने में चाभी पड़ी मिलती। क्रेसेंज ने मालकिन को टेलीफोन से संदेश तो कभी न देने की मानो क़सम ही खा रखी थी। जब वह डांटती तो ढिठाई से कह देती “मैं भूल गई।” वह मालकिन के साथ कभी आंखें मिलाकर बात नहीं करती थी। शायद मन के भीतर डर था कि उसके प्रति उसमें जो नफ़रत भरी है वह उजागर न हो जाए।

इन तमाम घरेलू परेशानियों के चलते पति-पत्‍नी के बीच लड़ाई-झगड़ा बढ़ता ही गया। ज़ाहिर है कि नौकरानी की इस नफ़रत और बदसलूकी से मालकिन अनजान नहीं थी जिसकी वजह से उसका दिमाग़ी असंतुलन बढ़ता ही गया। लंबे अरसे तक कुंवारी रहने से उसकी नसों पर यूं भी बहुत ज़्‍यादा दबाव रहा था और पति की उपेक्षा से भी उसकी कड़वाहट में इज़ाफा हुआ था तिस पर नौकरों का यह बर्ताव और उन्‍हें बनाए रखने में खुद की नाकामी ने उसे और ज्‍यादा चिड़चिड़ा ओर असंतुलित बना दिया था। अनिद्रा से बचने के लिए वह जो दवाइयां लेती थी उसने रही-सही कसर पूरी कर दी थी। उसकी हालत दिनों दिन बदतर होती जा रही थी, पर संकट की इस घंउ़ी में ऐसा कोई न था जो बेचारी स्‍त्री के साथ हमदर्दी दिखाए और जीवन को सही नज़रिए से जीने या ख्‍ुाद पर काबू रखने में उसकी मदद कर सके। उसने एक डॉक्‍टर को भी दिखाया, जिसने कुछ माह हवा-पानी बदलने के लिए सेनिटोरियम में रहने की सलाह दी। जब उसने पति को बताया तो उसने इतने बेतुके जोश से इस प्रस्‍ताव पर हामी भरी कि बीवी ने जाने से इंकार कर दिया। पर आिख़रकार वह जाने के लिए राज़ी हो गई। अपनी एक नौकरानी को साथ ले जाने और इस बड़े मकान में बैरन की देखभाल के लिए क्रेसेंज को छोड़ने का उसने इरादा किया।

ज्‍यूं ही क्रेसेंज ने यह ख़बर सुनी कि उसके प्‍यारे मालिक की देखभाल का ज़िम्‍मा अब उसके हाथों में होगा, उसमें बिजली की-सी उत्त्ोजना आ गई। जैसे उसे कोई जादू की शीशी मिल गई हो। एक ऐसा अमृत जिसने उसकी तंद्रा ओर सोई इंद्रियों को झकझोर कर उसका तो जैसे कायाकल्‍प कर दिया। उसके अंग जो पहले सख्‍़त, कड़े ओर भद्‌दे जान पड़ते थे, अब उनमें एक नई चुस्‍ती-फुर्ती और लचीलापन आ गया था। जब मालकिन के जाने का समय आया तो किसी के हुक्‍म का इंतज़ार किए बग़ैर ही पूरे घर में दौड़ लगाकर उसने सारा सामान तैयार किया और फिर कुली की तरह कंधे पर लादकर गाड़ी में रख दिया। बीवी को गाड़ी में बैठाकर देर शाम जब बैरन घर लौटा, तो बेताबी से इंतज़ार कर रही क्रेसेंज को अपना कोट और टोप उतारकर दिया और फिर एक लंबी सांस खींचकर बोलाः “मैं उसे सही-सलामत आसानी से भेज सका।” तभी असाधारण बात घटी। जैसे पहले ही बताया गया था कि क्रेसेंज पशुओं से मेल खाती थी यानी कभी हँसती नहीं थी। पर अब अचानक एक अनजानी अनुभूति से उसके होंठ सजीव हो उठे। मुस्‍कराते वक़्‍त उसका मुंह खुलकर इतना चौड़ा हो गया कि लेडरशीम को नौकरानी के चेहरे की इस अभिव्‍यक्‍ति से दुखद आश्‍चर्य हुआ और नौकरानी के साथ इतना खुल जाने पर उसे शर्म भी महसूस हुई। इसलिए आगे एक लफ़्‍ज भी कहे बग़ैर वह अपने बेडरूम में चला गया।

यह बेचैनी कुछ पल ही रही। अगले कुछ ही दिनों में मालिक ओर नौकरानी इस एकांतवास में अनोखी अनुभूति से भर उठे और चैन से रहने लगे। बीवी के चले जाने से पूरा माहौल बदल गया था। रूडोल्‍फ भी ज़िम्‍मेदारी के बोझ से हल्‍का महसूस करने लगा और हर वक़्‍त अपनी हरकतों के लिए सफ़ाई देने को जो खटका बना रहता था उससे मुक्‍त होकर अगले ही दिन देर से घर लौटा। क्रेसेंज ने जिस तरह मौन भक्‍ति से स्‍वागत किया वह उसकी बीवी ब्रिगेटा की बकबक से एकदम उलट था जो घुसते ही सवालों की झड़ी से उसका स्‍वागत करती थी।

क्रेसेंज अब अपना काम सामान्‍य उत्‍साह से कहीं ज़्‍यादा जोश से करने लगी थी। सबेरे बहुत जल्‍दी उठ जाती थी। फर्नीचर को इतना रगड़ती कि उसमें चेहरा दिखने लगे, दरवाज़े के हत्‍थों को चमकाते-चमकाते थक जाती फिर भी उसे संतोष नहीं मिलता था, खाने के स्‍वाद का तो खैर जवाब ही नहीं था। हालांकि बैरन यह सब देखकर वाकई दंग था। हालांकि बैरन की इन बातों में ध्‍यान देने की आदत नहीं थी पर इस अज़ीबोग़रीब नौकरानी द्वारा बरते गए ख़ास एहतियात और तवज्‍जों को अनदेखा करना असंभव था। भले स्‍वभाव को होने के नाते उसने कृतज्ञता व्‍यक्‍त की। उसकी पाक-कला की तारीफ़ भी की। फिर एकाध दिन बाद जब उसका जन्‍मदिन पड़ा तो क्रेसेंज ने उसके लिए ख़ास पेस्‍ट्री बनाकर उसके नाम से उसे सजाया। यह देख वह मुस्‍कराकर बोलाः “सेंजी, तुम तो मेरी आदतें बिगाड़ दोगी और तब मैं क्‍या करूंगा, जब मालकिन लौट आएगी?”

दूसरे देशों के लोगों को मालिक का नौकरानी के साथ इस तरह सहज व खुला बर्ताव, ऐसी उन्‍मुक्‍त बातें अविश्‍वसनीय लग सकती है। पर युद्ध के पहले के आस्‍ट्रिया में यह सब बहुत आम था। कुलीन अभिजात वर्ग आम जन को जिस हिका़रत से देखता था यह सब उसकी का इज़हार था, मसलन ग्‍लैशिया के किसी नामालूम से कस्‍बे में रहने वाला बड़ा ज़मींदार वेश्‍यालय से लड़की बुलाने के लिए अपने अर्दली को भेजता और अपनी हवस पूरी करने के बाद लड़की को अपने कारिंदों के हवाले कर देता... बिना इस बात की परवाह किए कि उसकी इस एय्‍यासी की ख़बर जब फैलेगी तो लोग कैसी रसदार बातें बनाएंगे। शिकार का शौक़ीन रौब-रुतबे वाला आदमी, यूनिवर्सिटी प्रोफेसर या कारोबारी रईस के साथ उठने-बैठने की बजाय अपने साइस या बंदूकची के साथ बैठ गप्‍प लड़ाना या शराब पीना ज़्‍यादा पसंद करता था।

पर बाहर से जनतांत्रिक दिखनेवाले ये संबंध हालांकि सहज दिखते थे पर ऐसे थे नहीं, मालिक हमेशा मालिक ही रहता और खाने की मेज़ से उठते ही नौकर के साथ कैसे फासला रखा जाए यह वह ख़ूब जानता था। छोटे-मोटे लोग हमेशा अभिजात वर्ग के तौर-तरीकों की नकल करने के लिए लालायित रहते हैं इसलिए बैरन भी देहातिन नौकरानी के साथ अपनी बीवी की बुराई करने में कोई परहेज़ नहीं करता था। उसे यक़ीन था कि वह उससे कभी दग़ा नहीं करेगी पर उसकी ये बातें उस अज्ञानी देहातिन के मन पर कितना गहरा असर कर रही हैं इस पर उसने कभी ग़ौर नहीं किया।

कुछ दिनों तक तो उसने अपनी जुबान पर काबू रखा और अपने व्‍यवहार में संयम भी रखा, पर एक मर्तबा यक़ीन होने पर कि वह इस नौकरानी पर पूरा भरोसा कर सकता है, उसने भावी ख़तरों की परवाह किए बग़ैर विवाह के पहले वाली आदतों में रमना शुरू कर दिया। घर अपना था ही, बीवी बाहर थी इसलिए मनमाफिक मज़े लूट सकता था। हफ़्‍ता भर तो वह छड़ा ही रहा। हफ़्‍ते के आिख़री दिन उसने क्रेसेंज को बुलाया और बिल्‍कुल सहज ढंग से शाम को दो लोगों का भोजन मेज़ पर लगाने की हिदायत दी और कहा कि उसके लौटने का इंतज़ार न कर वह सो जाए, बाकी इंतज़ाम वह खुद देख लेगा।

“बहुत अच्‍छा मालिक,” सब कुछ समझने के बावजूद चेहरे पर हल्‍का-सा आभास दिए बगै़र क्रेसेंज ने हामी भरी। पर देर रात जब बैरन ऑपेरा की एक जवान युवती के साथ लौटा तो यह देखकर प्रसन्‍न हो उठा कि क्रेसेंज जैसी दिखती है उससे कहीं ज़्‍यादा अक्‍लमंद है। उसने खाने की मेज़ को फूलों से सजा रखा था। बेडरूम में गया तो देखता क्‍या है कि न केवल उसका बिस्‍तर हमेशा की तरह ठीक-ठाक करके रखा था, बल्‍कि साथ का पलंग भी आकर्षक ढंग से बिछाकर रखा था और उसकी बीवी का सिल्‍क का गाउन और चप्‍पलें भी पास में ही रखी थीं। जिस पति के लिए विवाह की रस्‍मों का कोई ख़ास महत्‍व नहीं था, यह सब देख मुस्‍करा उठा कि इस असाधारण सेविका का ख्‍़याल रखने के मामले में वाकई जवाब नहीं। उसके बाद से वह उसकी पक्‍की विश्‍वासपात्र बन गई। अगले दिन क्रेसेंज से अपनी प्रेमिका के लिए काम करवाने में बैरन को ज़रा भी झिझक महसूस नहीं हुई।

ऐसे ही एक मौक़े पर क्रेसेंज का नया नामकरण हुआ। डोना अल्‍वीरा के किरदार के लिए एक उदीयमान गायिका तैयारी कर रही थी। उसी के मुताबिक अपने प्रेमी को डॉन जुआन कहकर बुलाना उसे मौजूं लगा। अगले दिन जब वह बैरन के घर आई तो चहकते हुए बोलीः

“डॉन जुआन, मैं चाहती हूँ कि तुम अपनी उस लेपोरैला को बुलाओ।”

रूडोल्‍फ को यह नाम जंच गया। शायद इसकी इकलौती वजह यह थी कि उस फूहड़ तिरौली देहातिन के लिए यह नाम हास्‍यास्प‍द ढंग से बेमेल था। उस दिन के बाद से वह उसे ‘लेपोरैला' के नाम से ही बुलाता। अपना यह नया नाम सुनकर पहले-पहल तो क्रेसेंज चौंकी पर बाद में उसे लगा ज़रूर इसमें उसकी प्रशंसा ही होगी। हालांकि इसके मतलब या संदर्भ का उसे सिर-पैर भी मालूम नहीं था मगर उसके अनगढ़ कानों को यह नाम मधुर जान पड़ता था। इससे उसके अहं की तुष्‍टि होती और यह सोचकर वह पुलकित थी कि उसके मालिक ने उसे प्‍यार का नाम दिया है। जब भी ‘लेपोरैला' की निर्लज्‍ज पुकार सुनती तो उसके पतले होंठ मुस्‍कराहट में खुल जाते और घोड़े जैसे दांत दिख पड़ते। फिर वह यक-ब-यक अपने आका का हुक़्‍म बजाने दौड़ पड़ती।

यह नाम यूं ही मज़ाक में चुना गया था और ऊपर बताया भी गया है कि यह कितना बेमेल था। फिर भी यह सटीक बन चुका था। ‘लेपोरैला' नाम की स्‍त्री की तरह यह ‘लेपोरैला' भी अपने मालिक के जुर्म की सहानुभूतिपूर्ण साथिन बन गई थी। अधेड़ उम्र की यह नौकरानी जिसे प्रेम का कोई अनुभव नहीं था, अपने कामुक युवा मालिक की एय्‍यासी में साथ देने में गर्व महसूस करती थी। मालकिन, जिससे वह नफ़रत करती थी, उसका बिस्‍तर तक़रीबन हर रात किसी दूसरी स्‍त्री द्वारा दाग़ी होता था, यह बात उसे सुख देती थी या उस भोगविलास में उसकी काल्‍पनिक भागीदारी, क्रेसेंज को इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था, पर उसे सुख मिलता ज़रूर था। सालों के कड़े श्रम से उसकी हठीली देह कुम्‍हलाकर इस कदर बेजान और बेदम हो चुकी थी कि उसमें काम-आकर्षण का कोई चिह्‌न नहीं बचा था। मालकिन की जगह पर एक के बाद एक लगातार दूसरी औरतों को मालिक का हमबिस्‍तर होते देख एक छिछोर क़िस्‍म की उत्त्ोजना से वह रोमांचित हो उठती थी। इस पाप में साझेदारी और अनचीन्‍हें कामुक माहौल ने उसकी सुप्‍त वृत्तियों को भड़का दिया था। क्रेसेंज अब सचमुच की लेपोरैला बन गई थी। डॉ. पोंटे के ऑपेरा पाठ की मानिंद वह आनंद और उत्‍साह से भर उठी थी। इस प्रगाढ़ व उत्त्ोजक साझेदारी से तमाम अनजाने गुण भीतर ही हिलोरें लेते हुए सतह पर आ गए-छल, दांवपेंच, तांकझांक करने और कनसुई लेने में अब उसकी दिलचस्‍पी बढ़ने गली। दरवाज़ें पर कान लगाकर सुनती। चाबी के सुराख से भीतर झांकती, फुर्ती से इधर-उधर दौड़ लगाती। पड़ोसी भी उसके इस बदले रूप को देखकर चकित थे। अब वह लोगों से मिलने-जुलने लगी थी। नौकरों के साथ यहाँ-वहाँ की गप्‍प लड़ाती। एक शाम तो कमाल ही हो गया जब नौकरों के क्‍वार्टरों की सारी बुत्तियां बुझा दी गई थीं तो क्रेसेंज की खिड़की के सामने रहने वाली नौकरानियों ने हमेशा शांत रहने वाली उस खिड़की से एक अनोखी गुनगुनाहट सुनी, अपने बेढ़ंगे, अनगढ़ स्‍वर में वह एक लोकगीत गा रही थी, जो आल्‍पस के चरागाहों में ग्‍वालिनें गाती हैं। उसके अनभ्‍यस्‍त होंठ और गले से एक ही तरह की लय निकल रही थी जैसे कौने में उपेक्षित पड़े पिआनो पर कोई बच्‍चा उंगलियां फिराता है तो जो स्‍वर निकलता है वह एक ही साथ दिल को छूता है और अरुचि भी पैदा करता है। छुटपन से अब तक उसने कभी गाने की कोशिश नहीं की थी पर अब उन भूले-बिसरे बरसों के अंधकर में से कुछ उभरकर रोशनी की ओर लपकने के लिए जूझ रहा था।

जिस शख्‍़स की वजह से यह असाधारण कायाकल्‍प उसमें हुआ था वह खुद इससे पूरी तरह बेख़बर था- क्‍योंकि अपनी ही परछाई पर ध्‍यान देने की ज़हमत भला कौन उठाता है? बेशक हम अधखुली आंख से देखते हैं कि कैसे वह ठीक हमारे क़दमों के पीदे या कभी-कभार आगे भी चलती है (किसी ख्‍़वाहिश की तरह जिससे हम खुद पूरी तरह वाकिफ़ नहीं होतेद्ध मगर हम अपने रूप की नकल पर कभी ध्‍यान ही नहीं देते और न ही अपने व्‍यक्‍तित्‍व के व्‍यंग्‍य-चित्र (कार्टून) को पहचान पाते हैं। लेडरशीम ने बस क्रेसेंज की एक बात पर ग़ौर किया कि वह पूरी निष्‍ठा, ख़ामोशी और आत्‍म-त्‍याग से हर वक़्‍त उसकी सेवा के लिए तत्‍पर रहती है। उसकी यह मूक आराधना उसे सुखद लगती थी। वक़्‍त-बेवक़्‍त जैसे हम कुत्ते को थपथपा देते हैं वैसे वह भी एकाध मीठे बोल कह देता था। कभी-कभार उसके साथ मज़ाक भी कर लेता या हँसते हुए कान मरोड़ता, चलते-फिरते कभी थिएटर का टिकट जैसी मामूली-सी चीज़ें जेब से निकालकर उसे थमा देता। मामूली होते हुए भी यह क्रेसेंज के लिए बेशकीमती ख़जाने से कम नहीं थीं जिन्‍हें वह बतौर यादगार अपनी संदूचकी में सहेजकर रख लेती।

धीरे-धीरे अपने दिल की बात खुलकर उसे बताने की बैरन को आदत पड़ गई। एक से एक मुश्‍किल ज़िम्‍मेदारी वह उसे सौंपने लगा। जैसे-जैसे उसका भरोसा बढ़ता गया क्रेसेंज की स्‍वामिभक्‍ति भी उतनी ही बढ़ती गई। वह उसकी इच्‍छाओं को भांपने की कोशिश करती। चाहती कि उसकी हर कामना के कारसाज़ के रूप में वह उसके भीतर पैठ जाए, ताकि उसके हर भोगविलास और आनंद को उसी की आंखों से देख सके, कानों से सुन सके, उसके सुख को भोग सके और हर कामयाबी को बांट सके। रात को जब किसी नई लड़की के साथ लौटता तो वह चहक उठती और उसे अकेला लौटते देख वह बुझ जाती। पहले जैसे उसके हाथ अनवरत तेज़ी से चलते थे, अब दिमाग़ भी चलने लगा था और आँखों में अक्‍लमंदी की एक नई किरण कौंधने लगी थी। आठों पहर बोझ से लदा पशु अब एक इंसान बनने लगा था। हालांकि अब भी वह अलग-थलग और ख़ामोश रहती। वह धूर्त, ख़तरनाक, ध्‍यानमग्‍न और पहले से कहीं ज़्‍यादा आक्रांत, बेचैनी और विद्वेष से भरी रहती।

एक दिन बैरन हमेशा से कुछ जल्‍दी घर लौट आया। हाल से भीतर जाते वक़्‍त वह हैरानी से भर उठा जब उसने रसोई के किवाड़ के पीछे, जहाँ अक्‍सर अखंड ख़ामोशी पसरी रहती थी, अस्‍फुट हँसी की आवाज़ सुनी। किवाड़ बस भिड़ा हुआ था और झिर्री में से लेपोरैला एप्रन से हाथ पोंछती दिखाई दे रही थी, चेहरे पर एक ही साथ धृष्‍टता और उलझन साफ़ दिख रही थी।

“इस गुस्‍ताख़ी के लिए माफ़ करें मालिक,” निगाहें नीची किए उसने कहा, “पर मैं पेस्‍ट्री बनाने वाले रसोइए की बेटी को यहाँ लाई हूँ, वह कितनी ख़ूबसूरत है मैं क्‍या बताऊं, आपसे मिलकर बहुत खुश होगी।”

लेडरशीम पहले पहल तो क्रेसेंज को घूरता रहा। उसे समझ नही आ रहा था कि उसकी इस निर्लज्‍ज पेशकश को फौरन ठुकरा दे या फिर हाथ आए इस सुनहरे मौके को फायदा उठाए। वासना भीतर मचलने लगी और उसी की जीत हुई।

“ठीक है, इस सुंदरी को देख ही लेते हैं,” वह बोला।

सोलह बरस की भूरे बालों वाली फूहड़-सी बाला रसोई से सकुचाती-शर्माती बाहर आई जिसकी लेपोरैला ने बढ़ा-चढ़ाकर तारीफ़ की थी। अज़ीब ढंग से लहराती, बेवजह खीं-खीं करती उस रसिक नवयुवक को अपनी ख़ूबसूरती से रिझाने लगी, जिसे कई मर्तबा सड़क पार दुकान से देख मन-ही-मन उस पर लट्‌टू हो गई थी। बैरन उसकी सुंदरता पर रीझ गया और चाय पीने के लिये अपने कमरे में आने के लिए कहा। इशारे के लिए वह क्रेसेंज की ओर मुड़ी पर वह तो गायब हो चुकी थी। जिज्ञासा और उत्तेजना से भरी (क्‍योंकि चेहरे पर झेंप और उलझन ज़ाहिर थी) उस बाला ने उस निमंत्रण को क़बूल करना मुनासिक समझा।

पर व्‍यक्‍ति का स्‍वभाव पूरी तरह बदल नहीं सकता। हालांकि गुमराह आवेग के वशीभूत इस जड़ व्‍यक्‍तित्‍व में थोड़ी बहुत रुहानी गतिशीलता ज़रूर आई थी पर उसके सोच-विचार की यह नई शक्‍ति अब भी सीमित थी जिससे क्रेसेंज बहुत दूर की सोचने में असमर्थ थी। अब भी जड़ पशुओं की तरह उसमें कल्‍पनाशीलता और सूझ-बूझ की कमी थी। उसकी बस एक ही चाहत थी कि अपने मालिक की जी-जान से सेवा करे, जिससे कुत्ते की-सी स्‍वामिभक्‍ति से वह पे्रम करती थी, इसमें वह इस कदर खोई थी कि कुछ अरसे के लिए बाहर गई बीवी को पूरी तरह भुला बैठी थी।

एक सुबह अचानक जब बैरन नाक-भौं चढ़ाए हाथ में चिट्‌ठी लिए रसोई में आया और लेपोरैला से कहा कि आज मा पूरा दिन वह घर की अच्‍छी तरह साफ़-सफाई कर ले, क्‍योंकि अगली दोपहर उसकी बीवी सेनिटोरियम से वापस आ रही है तो यह सुनकर उस पर मानो आसर्मा टूट पड़ा। मुहँ खोले वह अवाक्‌ खड़ी रही। उसकी हालत ऐसी थी मानो सीने में छुरा भोंक दिया हो। मूक खड़ी बैरन कोदेर तक एकटक देखती रही और जब उसे सहज बनाने के लिहाज़ से बैरन ने समझायाः

“सेंजी क्‍या बात है, तुम ज़रा भी खुश नहीं दिख रही हो? पर बताओ हम कर भी क्‍या सकते हैं।”

यह सुन उसके सख्‍़त चेहरे पर हल्‍की-सी हरकत हुई मानो भीतर कु पक रहा हो। लगा जैसे अंतस में कोई लहर उठी हो और उसके कुम्‍हलाए गालों पर सुर्ख लालिमा दौड़ गई, गला रुंध गया और बमुश्‍किल चंद लफ़्‍ज मुंह से निकलेः

“आख़िर... कयों नहीं... कोई...”

लफ़्‍ज गले में ही अटककर रह गए। द्वेष से चेहरा विकृत हो उठा। हाव-भाव इस कदर डरावना हो गया कि एक बारगी लेडरशीम खुद भी कांप उठा और चौकन्‍ना होकर ठिठक गया। पर दूसरे ही पल क्रेसेंज काम में जुट गई। एक पतीली को उठाकर इस कदर ज़ोर-ज़ोर से रगड़ने लगी मानो उंगलियों की खाल को ही उधेड़कर रख देगी।

मालकिन के लौटते ही, सुख-चैन का जो माहौल उसकी गै़र मौजूदगी में पूरे घर में व्‍याप्‍त था, काफूर हो गया। दरवाज़ों का ज़ोरों से पीटना-पाटना, बेवजह की डाँट-फटकार फिर शुरू हो गई।

कुछ पड़ोसियों ने शायद उसके पीछे चल रही रंगरलियों की ख़बर अनाम ख़त के ज़रिए बीवी को कर दी थी या फिर जिस सर्द ढंग से उसने बीवी का स्‍वागत किया वह उसके मन की भावनाओं को ज़ाहिर करने के लिए काफ़ी था। खैर, चाहे जो हो दो महीने के इलाज़ के बावजूद उसकी हालत सुधरने की बजाय बिगड़ गई थी। पहले का रोना-धोना अब धमकियों और उन्‍मादी दौरों में बदल गया था। पति-पत्‍नी संबंधों में दिनोंदिन कडुवाहट बढ़ती गई। कुछ हफ़्‍तों तक तो बैरन अपनी भलमनसाहत के चलते पत्‍नी के तानों, उलाहनों की बौछार को पूरे धीरज से नज़रअंदाज़ करता रहा या उसे दिलासा देता रहा, पर वह लगातार तलाक के लिए उसे अदालत में घसीटने या फिर माँ-बाप को सब कुछ लिखने की धमकियां देती रहती। वह अमूमन चुप ही रहात। उसके इस उपेक्षापूर्ण रवैए का उस पर और बुरा असर पड़ता। धीरे-धीरे उसे लगने लगा कि वह गुप्‍त दुश्‍मनों से घिरी हुई है। इस घबराहट भरी उत्त्ोजना से उसे पागलपन के दौरे पड़ने लगे।

क्रेसेंज ने अपनी पहले वाली चुप्‍पी का कवच ओढ़ लिया था। अलबत्ता अब उसकी यह चुप्‍पी डरावनी और आक्रामक लगती थीं जब मालकिन लौटी तो वह रसोई में ही बनी रही। बुलाने पर भी मालकिन के स्‍वागत के लिए बाहर नहीं आई। काठ की मूरत बनी खड़ी रही। बेहयाई से कंधे उचकाकर मालकिन के हर सवाल का जवाब इतनी बेरुखी से दिया कि वेसब्र मालकिन कुछ और पूछे बग़ैर मुड़कर चली गई, जबकि क्रेसेंज नफ़रत और द्वेष से भरी उसकी पीठ को घूरती रही, जिसका मालकिन को कोई अंदाज़ा नहीं था। ईर्ष्‍या से भरी उसे लगने लगा कि मालकिन के घर लौट आने से सहचरी बन सेवा करने के सुख से वह वंचित हो गई है और उसे सिर्फ़ रसोई में खटने के लिए झोंक दिया गया है। उसे सबसे ज़्‍यादा दुख इस बात का था कि उसका प्‍यार नाम लेपोरैला भी छिन गया है, क्‍योंकि बैरन पूरी सावधानी बरतता कि बीवी की मौजूदगी में क्रेसेंज के प्रति कोई सहानुभूति ज़ाहिर न होने दे। हालांकि यदा-कदा बीवी के उलाहनों से थक-हारकर थोड़ी देर उनसे निजात पाने की मंशा से रसोई में चुपके से चला आता, कोने में पड़ी तिपाई खिसकाकर बैठ जाता और बेज़ार होकर गहरी सांस लेकर कहताः

“अब और बर्दाश्‍त नहीं होता।”

यही कुछेक पल लेपोरैला के लिए बेहिसाब खुशी से भरे होते, जब उसका देवतास्‍वरूप मालिक हमदर्दी पाने के लिए उसकी शरण में आता था। वह कभी जवाब देने या दिलासा देने की जुर्रत नहीं करती थी, बस दासी की तरह देवता को करुणा से ताकते हुए ख़ामोश बनी रहती। इस निःशब्‍द सहानुभूति से लेडरशीम को कुछ पल राहत मिलती पर रसोई से बाहर आते ही सारी परेशानियां फिर उसे घेर लेतीं। यह सब देख क्रेसेंज बेबसी भरे गुस्‍से से भर अपने हाथ मरोड़ती या फिर सारा गुस्‍सा बर्तनों पन निकालती ओर पूरे आवेश और ताक़त से उनहें रगड़ने और चमकाने में जुट जाती।

श्रीमती बैरन के आने से माहौल में जो उमस आ गई थी, आखिरकार एक भंयकर तूफान में फट पड़ी। एक दिन लड़ाई-झगड़े के दौरान बैरन का धीरज जवाब दे गया और शिष्‍टाचार के नाते हर ज़्‍यादती को नज़रअंदाज़ करने के अपने स्‍वभावगत रवैए को इस मर्तबा उसने ताक पर रख दिया, दरवाज़े को इतनी जोर से बंद करते हुए कमरे से बाहर निकला कि फ़्‍लैट की हर खिड़की का पुर्जा-पुर्जा खड़खड़ाने लगा, फिर चीखाः

“मैं इस ज़िंदगी से तंग आ गया हूँ।”

गुस्‍से से चेहरा एकदम नीला पड़ गया था। दनदनाते हुए रसोई में घुसा और थरथराती क्रेसेंज को चिल्‍लाकर बोलाः

“फौरन मेरा सामान बांधो और बंदूक की पेटी भी नीचे ले आओ। मैं हफ़्‍ते भरके लिए शिकार पर जा रहा हूँ। इस नरक में तो शैतान भी नहीं टिक सकता।”

क्रेसेंज ने नज़रें उठाकर उसकी तरफ़ देखा। उत्‍साह से उसकी आंखें चमकने लगीं। अब जाकर उसने इस घर के असली स्‍वामी का रूप धरा था। फटे स्‍वर में हँसते हुए वह बोलीः

“ठीक है मालिक वक़्‍त आ गया है कि इस सबका खात्‍मा हो ही जाना चाहिए।”

जोश से लरजते हुए एक कमरे से दूसरे में भाग-भागकर उसने वह सारा सामान इकट्‌ठा किया जिसकी मालिक को शिकार पर जाने के लिए ज़रूरत पड़ सकती थी। सामान और बंदूक का बक्‍सा उठाकर गाड़ी में रखा। कृतज्ञता व्‍यक्‍त करने के लिए वह शुक्रिया कहना चाहता था कि तभी उसका हाव-भाव देखकर काँप उठा। उसके निचुडें़ होंठ कुटिल मुस्‍कान में खुल गए थे, जिसे देखकर यूं भी वह हमेशा चौकन्‍ना हो उठता था, क्‍योंकि उसे देख अनायास ही ज़ेहन में झपटने क लिए आतुर शिकारी जानवर की तस्‍वीर उभर आती थी। बाहर से वह शिष्‍ट बनी रही ओर जैसे ही गाड़ी चलने को हुई उसने आत्‍मीयता भरी ढिठाई से फुसफुसाकर कहाः

“आपका वक़्‍त मज़े से गुज़रे। यहाँ की चिंता मत करिएगा, मैं सब संभाल लूंगी।”

तीन दिन बाद बैरन को एक तार मिला-

“फौरन घर लौट आओ।”

जिस चचेरे भाई ने तार भेजा था वह उसे लेने स्‍टेशन पर आया। उसके चेहरे को देखते ही बैरन ने भांप लिया कि कुछ अनहोनी घटी है। बड़ी मुश्‍किल से वह रूडोल्‍फ को वह ख़बर सुना सका। उसने बताया कि “श्रीमती बैरन वॉन लेडरशीम आज सुबह बिस्‍तरे पर मृत पाई गई, कमरा बुझे गैस-हीटर की गैस से भर गया था। दुर्घटना का सवाल ही नहीं उठता। यह सब किसी की साजिश लगती है, क्‍योंकि पूरी गर्मियों में गैस-हीटर का इस्‍तेमाल ही नहीं किया गया था और मौसम अब भी गर्म ही था। अलावा इसके मृत स्‍त्री ने रात भर में दर्जन या उससे भी ज़्‍यादा नींद की गोलियां खा रखी थीं। खाना बनाने वाली नौकरानी क्रेसेंज, जो मालकिन के साथ घर में अकेली थी, ने बयान दिया है कि उसने मालकिन के ड्रेसिंग-रूम में जाने की आवाज़ सुनी थी, संभवतः गैस स्‍टोव के मुख्‍य स्‍विच को चाले करने के लिए वहाँ गई थी जिसे सुरक्षा के लिहाज़ से बेडरूम की बजाय वहाँ लगाया गया है। इन तमाम तथ्‍यों के मद्‌देनज़र पुलिस ने इसे आत्‍महत्‍या का मामला तसदीक किया है।”

बैरन के हाथ कांपने लगे। चचेरे भाई ने जब क्रेसेंज के बयान का ज़िक्र किया तो उसके रोंगटे खड़े हो गए। जे़हन में अनायास एक दुखद ख्‍याल कौंधा। मगर उसने इस यातनादायी ख्‍़याल को झटक दिया और अर्नेस्‍ट के साथ चुपचाप घर की तरफ़ चलता रहा। शव हटाया जा चुका था। रिश्‍तेदार ड्राईंग रूम में इंतज़ार कर रहे थे। उनके हाव-भाव में विरोध साफ झलक रहाथां उनकी संवेदनाएं भी सर्द थीं। उस पर इल्‍ज़ाम मढ़ने के अंदाज़ में ही वे बोले कि यह सब बताना हम अपना फर्ज़ समझते हैं, “बदनामी से बचना अब नामुमकिन है क्‍योंकि सुबह-सवेरे ही नौकरानी ने जीने पर खड़े होकर एलान कर दिया कि “मालकिन ने खुदकुशी कर ली है।” अंतिम-संस्‍कार को शांति से निपटाने की पूरी तैयारी की गई थी पर लोग तो अभी से उल्‍टी-सीधी बातें करने लगे हैं।”

रूडोल्‍फ लेडरशीम दुविधा में सारी बातें सुनता रहा, अनजाने में ही उसकी नज़रें बैठक के दरवाज़े से होती हुई बेडरूम तक गईं और फिर फौरन उसने नज़रें झुका लीं। वही ख्‍़याल उसे साल रहा था जिसकी तर्कपूर्ण तह तक वह पहुंचना चाहता था। पर इन बेतुकी और लांछनभरी बकबक के बीच सही ढंग से सोच पाना नामुमकिन था। आध घंटे तक रिश्‍तेदार वहाँ रुके और लगातार निंदा और भर्त्‍सना करते रहे। फिर एक-एक कर सब विदा हो गए। उस अंधेरे कमरे में रूडोल्‍फ अकेला रह गया। इस अनपेक्षित सदमे की मार से उसका सिर दुखने लगा था और शरीर थक गया था। फिर भी वह-खड़ा रहा, इस कदर बेजान कि बैठने की भी सुध नहीं थी।

तभी दरवाजे़ पर किसी ने दस्‍तक दी।

“आ जाओ!”

पीछे से दरवाज़ा खुला। हिचकते, लड़खड़ाते क़दमों की आवाज़ उसने सुनी-जिन्‍हें वह पहचानता था। वह दहल उठा। उसे लगा जैसे कोई उसका गला घोंट रहा हो, अंग-अंग में सिहरन-सी महसूस हुई। उसने मुड़ने की कोशिश की पर उसके शरीर ने साथ नहीं दिया। इस तरह वह कमरे के बीचो-बीच कांपता, ख़ामोश कितनी घृणित थी। तभी पीछे से शुष्‍क, उदासीन, नीरस स्‍वर में कुछ पूछा गयाः

“मैं सिर्फ़ यह पूछने आई थी कि मालिक घर पर खाएंगे या बाहर।”

बैरन की कंपकंपी बढ़ गई और एक सर्द लहर ने उसके दिल को जकड़ लिया। जवाब देने के लिए उसे तीन बार कोशिश करनी पड़ी।

“शुक्रिया मुझे कुछ नहीं खाना है।”

इससे पहले कि वह पीछे मुड़ने की हिम्‍मत करता, वे लड़खड़ाते क़दम लौट गए थे। तब कहीं उसकी जड़ता टूटी। वह सूखे पत्त्ो की तरह कांप रहा था फिर भी इतनी ताक़त बची थी कि लपककर दरवाज़े तक जाए ओर सिटकनी लगा दे। उसने फैसला कर लिया कि उन घृणित और दुष्‍ट क़दमों को दोबारा भीतर नहीं आने देगा। फिर वह सोफे पर कटे वृक्ष की तरह गिर पड़ा। उस घिनौने ख्‍़याल को झटकने की कोशिश करता रहा। पर रात भर वह ख्‍़याल उस पर हावी रहा और सोने नहीं दिया। सुबह उठने पर भी वही ख्‍़याल उसे कचोटता रहा। यहाँ तक कि रिवाज़ के मुताबिक काले सूट में जब वहअपनी मृत पत्‍नी के ताबूत के सिरहाने मुख्‍य विलापी के रूप में खड़ा था तब भी उस ख्‍़याल ने उसका पीछा नहीं छोड़ा।

अंत्‍येष्‍टि पूरी होते ही वह शहर छोड़कर भाग गया। मित्र और रिश्‍तेदार जिन नज़रों से उसे देखते थे वह उसके बर्दाश्‍त से बाहर था। उनके बर्ताव में सहानुभूति से ज़्‍यादा जिज्ञासा दिखाई देती या फिर शायद उसे ही ऐसा लगता था। यह उसका भ्रम हो या असलियत पर यह असहनीय था। और तो और घर का फर्नीचर, ख़ासकर बेडरूम की हर चीज़ (जहाँ अब भी गैस की चिपचिपी बदबू बसी हुई थी) उस पर इल्‍ज़ाम लगाती दिखाई देती थी। इसलिए घर में घुसते ही वह घृणा से भर उठता। पर सबसे ज़्‍यादा असहनीय दुःस्‍वप्‍न की तरह जो बात उसे खटक रही थी वह यह थी कि वह स्‍त्री जो किसी वक़्‍त उसकी विश्‍वासपात्र थी, एकदम अविचलित बनी हुई थी वह यह थी कि वह स्‍त्री जो किसी वक़्‍त उसकी विश्‍वासपात्र थी, एकदम अविचलित बनी हुई थी। दिन हो या रात उस भुतहा ख़ाली घर में अपने काम में इस तरह रमी रहती जेसे कुछ घटा ही न हो। स्‍टेशन पर जबसे उसके भाई ने उसका नाम लिया था बस उसकी पल से वह उसकी परछाई तक से कांपने लगा था। उसके क़दमों की आहट सुनते ही उसका मन भाग पड़ने को बेचैन हो उठता। उसके ख्‍़याल से ही उसे मतली आने लगती। उसकी कठोर आवाज़ तेल से चुपड़े बाल, शुष्‍क पशुवत निर्दयता से उसे नफ़रत हो गई थी। गुस्‍से ने उसे इस कदर लाचार कर दिया था कि उसमें इतनी भर ताक़त नहीं बची थी कि उस घृणित जीव से खुद को छुड़ा सके या गला घोंटने वाली उन उंगलियों की जकड़न से मुक्‍त हो सके। एकमात्र रास्‍ता था कि वहाँ से भाग जाए। उसने चुपचाप अपना सामान बांधा, उससे कुछ कहे-सुने बग़ैर चोरी-छिपे चला गया। काग़ज़ पर लिख दिया कि वह अपने दोस्‍तों के साथ रहने जा है।

गर्मियां पूरी होने तक वह नहीं लौटा। हाँ, एक मर्तबा अपनी स्‍वर्गीय बीवी की जायदाद से जुड़े मसले को निपटाने के सिलसिले में उसे आना पड़ा था। तब वह होटल में ही ठहरा, ताकि घर में मौजूद उस दुष्‍ट औरत का सामना न करना पड़े। क्रेसेंज जो अपने में ही सिमटी रहती थी उसके वियना आने के बारे में कभी जान ही नहीं पाई। बेकार, बेमकसद वह अपना पूरा वक़्‍त रसोई में ही गुज़राती, इबादत के लिए दिन में दो बार ;पहले के एक बार की बजायद्ध चर्च जाती। बैरन का वकील उसके वेतन का हिसाब-किताब कर देता। मालिक के बारे में उसे कभी कोई ख़बर नहीं मिलती। उसने न तो कोई संदेश भेजा न कभी चिट्‌ठी लिखी।

इस ख़ामोश प्रतीक्षा के दौरान उसका चेहरा पहले से ज़्‍यादा कड़ा और कमज़ेर हो गया। उसकी चाल भी पहले की तरह काठ-सी निष्‍प्राण हो गई। मानसिक जड़ता की इस अज़ीब हालत में कई महीने गुज़र गए। पतझड़ में किसी ज़रूरी कारोबारी काम से बैरन को घर आना पड़ा। दहलीज़ पर आकर वह ठिठक गया। एक लंबा अरसा अपने अजीज़ दोस्‍तों के संग गुज़ारने से वह काफ़ी कुछ भुला सका था पर अब एक बार फिर किसी वक़्‍त उसकी सहयोगी रह चुकी उस स्‍त्री से सामना होने के ख्‍़याल मात्र से वह विचलित हो उठा। गुस्‍से और आवेश से भर उठा, जैसे पत्‍नी की मृत्‍यु के अगले दिन हुआ था। क़दम-दर-क़दम जैसे वह सीढ़ियां चढ़ता गया उसे लगा कोई अदृश्‍य हाथ उसका गला जकड़ रहा है। उसके क़दम सुस्‍त पड़ते गए। दरवाज़े तक पहुंचकर ताले में चाबी घुमाने के लिए उसे अपनी समूची ताक़त बटोरनी पड़ी।

आवाज़ सुनते ही भौंचक्‍की-सी क्रेसेंज रसोईघर से दौड़ते हुए बाहर आई। मालिक को सामने देख वह पीली पड़ गई। फिर, मानो प्रणाम कर रही हो, वह झुकी ओर बैग उठा लिया जिसे भीतर आकर उसने नीचे टिका दिया थां स्‍वागत में कुछ भी कहने का उसे भान ही नहीं था। बैरन ीाी खोया-खोया सा था। उसने अभिवादन में एक शब्‍द भी नहीं कहा। बैग उठाकर चुपचाप बेडरूम में ले गई, वह भी ख़ामोशी से उसके पीछे हो लिया। सामान रखकर जब तक बाहर नहीं निकल गई, वह खिड़की के पास खड़ा बाहर देखता रहा। उसके जाते ही सिटकनी लगा दी।

इतने दिनों बाद मिलने पर उन दोनों के बीच बस इतना ही संपर्क हुआ।

क्रेसेंज इंतज़ार करती रही। बैरन भी इसी इतंज़ार में था कि उसे देखते ही जो भय उस पर हावी हो जाता है वह उससे उबर आएगा। पर हालात में कोई सुधार नहीं आया। देखना तो दूर, दरवाज़े के बाहर उसकी आहट भर से उसका जी घबराने लगता। वह जो नाश्‍ता बनाती उसका एक दाना भी वह नहीं खा पाता। सुबह होते ही वह रोज़ तैयार होकरघर से खिसक लेता ओर देर रात को ही लौटता ताकि उसके साए से भी दूर रह सके। कभी-कभार उसे कुछ हिदायतें देना ज़रूरी होता तो उसकी ओर देखे बग़ैर दे देता।

दूसरी ओर क्रेसेंज भी रसोई में तिपाई पर चुपचाप बैठकर अपने दिन गुज़ार रही थी। वह अपने लिए खाना भी नहीं बनाती थी। उसकी भूख मर चुकी थी। किसी से एक लफ़्‍ज भी नहीं बोलती। सहमी-सी हर वक़्‍त मालिक की पुकार का इंतज़ार करती रहती-कोड़े की मार खाए कुत्ते की तरह जो जानता था किउसने गलती की है। दरअसल वह इतनी मूर्ख थी कि उसे अपनी गलती की गंभीरता का अंदाज़ा ही नहीं था। वह तो बस इतना जानती थी कि उसके मालिक, उसके स्‍वामी ने मुंह फेर लिया है और उसकी नाराज़गी उसके लिए बेहद असह्‍य थी।

बैरन के लौटन ेके तीन दिन बाद दरवाज़ै की घंटी बजी। पायदान पर हाथ में बैग उठाए, बगैर दाढ़ीवाला एक बूढ़ा शांत मुद्रा में खड़ा था। क्रेसेंज ने उसे चले जाने का इशारा किया, मगर आगन्‍तुक ने समझाया कि वह नौकर है और खुद बैरन ने सुबह दस बजे आकर मिलने को कहा था। अच्‍छा होगा कि क्रेसेंज उन्‍हें उसके आने की ख़बर कर दे। वह बर्फ़ की तरह सफेद पड़ गई, हाथ और उंगलियां जस की तस उठीं और खुली रह गईं, फिर एक घायल पक्षी की तरह हाथ नीचे आ गिरा।

“जाकर खुद ही बता दो,” फटकारते हुए उसने अवाक खड़े नौकर से कहा और पैर पटकते हुए रसोई में चली गई, फिर ज़ोर से दरवाज़ा बंद कर लिया।

नौकर को काम पर रख लिया गया था। उसके बाद से रूडोल्‍फ को क्रेसेंज से कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी। उसे कुछ कहना भी होता तो इस शांत नौकर के जरिए कहलवा देता था, जो उम्रदराज़ तो था ही, कई बड़े नामी परिवारों में काम कर चुका था। रसोई के बाहर घर में क्‍या चल रहा है इसकी क्रेसेंज को अब कोई ख़बर नहीं लगती। बाहर का जीवन उसके सिर के ऊपर उसी तरह चलता रहता जैसे पत्‍थर के ऊपर बहता पानी।

तक़रीबन एक पखवाड़े तक यही दुखद स्‍थिति बनी रही। इसका क्रेसेंज पर क्षय का-सा असर हुआ। चेहरा उतर गया, कनपटी के सारे बाल सफेद पड़ गए। पहले उसकी चाल काठ-सी थी जो अब पाषाण हो गई। बुत बनी निश्‍चल बैठी वह खिड़की के बाहर शून्‍य में ताकती रहती। जब उसे कोई काम करना पड़ता तो गुस्‍से और भावावेग से ही करती।

नौकर को काम पर लगे अभी एक पखवाड़ा ही गुज़रा था कि एक सुबह बिन बुलाए मालिक के अध्‍ययन-कक्ष में आकर कोने में चुपचाप खड़ा हो गया- जिससे साफ़ ज़ाहिर था कि वह कुछ कहना चाहता है। एक मर्तबा पहले भी वह उसे तिरौली मलिा की बदसलूकी की शिकायत कर चुका था और उसे नौकरी से निकालने की सलाह भी दी थी। हालांकि मालिक ने क्रेसेंज के प्रति हमदर्दी जताते हुए उसकी बात मानने से इंकार कर दिया था। नौकर की ज़्‍यादा ज़ोर डालने की हिम्‍मत नहीं हुई। लेकिन इस मर्तबा उसने पुरज़ोर ढंग से अपनी शिकायत रखी। जब रूडोल्‍फ ने फिर कहा कि क्रेसेंज एक लंबे अरसे से काम कर रही है और उसे बेदखल करने की कोई वाजिब वजह उसे दिखाई नहीं देती तो भी नौकर उसके इस जवाब को चुपचाप मान लेने की बजाय परेशान-सा बैरन को ताकता रहा और अपने अनुरोध को दोहराते हुए बड़े संकोच और शर्म से उसने बतायाः

आपको शायद मेरी बात मूर्खतापूर्ण जान पड़े पर सच यह है कि मुझे उस... औरत से डर लगता है... वह छल और दुर्भावना से भरी है। आपको वाकई अंदाज़ा नहीं कि आपने किस कदर ख़तरनाक इंसान को अपने घर में पनाह दे रखी हैं

तर्जुबे के बावजूद लेडरशीम भयभीत हो उठा पर बताई गई बात अस्‍पष्‍ट थी।

“एण्‍टन, अगर तुम चाहते हो कि मैं तुम्‍हारी बात मानूं तो खुलकर साफ़-साफ़ बताओ।”

“मालिक, मैं यक़ीन से तो कुछ भी नहीं कह सकता पर मुझे लगता है कि क्रेसेंज किसी वहशी जानवर की तरह है। एक ऐसा जानवर जो पूरी तरह पालतू नहीं हुआ है। किसी भी वक़्‍त वह मेरे या आपके साथ दग़ा कर सकती है। कल जब मैं उसे आपका हुक़्‍म सुना रहा था तो वह मुझे देखने लगी... वह देखना महज़ देखना नहीं था। लगा जैसे मुझ पर झपट्‌टा मार अपने दांत गड़ा देगी। मालिक मुझे वाकई उसके हाथ का पका खाना खाने में भी डर लगता है। किसी दिन आपको या मुझे ज़हर भी खिला सकती है। आप वाकई नहीं जानते वह कितनी ख़तरनाक है। दरअसल वह कहती तो कुछ भी नहीं है पर मुझे यक़ीन है कि वह किसी का भी ख़ून तक कर सकती है।”

रूडोल्‍फ उस शिकायतकर्ता को चौकन्‍ना होकर देखने लगा। क्‍या उसे कहीं से कुछ भनक लग गई है? या कहीं उसके मन में संदेह तो नहीं घर कर गया है? या कहीं उसके मन में संदेह तो नही घर कर गया है? रूडोल्‍फ को अपनी उंगलियां कांपती-सी लगीं। उसने सिगार एश-ट्रे में टिका दी वरना उसकी घबराहट ज़ाहिर हो जाती। पर एण्‍टन का चेहरा निरावेग था, उस पर ऐसा कोई भाव नहीं था जिससे लगे कि वह कुछ छिपा रहा हो। नौकर की सलाह उसकी खुद की इच्‍छा से मेल खाती थीं । वह खुद भी क्रेसेंज से छुटकारा पाना चाहता था।

“मैं हड़बड़ी में कोई क़दम नहीं उठाना चाहता, शायद तुम ठीक कहते हो पर कुछ दिन ठहर जाओ। यदि दोबारा वह कभी सख्‍़ती से पेश आए तो मुझसे पूछे बग़ैर तुम उसे नोटिस दे सकते हो अलबत्ता उससे यही कहना कि ऐसा तुम मेरे हुक्‍म से कर रहे हो।”

बैरन ने राहत महसूस की ओर बाहर आ गया। हालांकि कोई भी बात जो उसे इस रहस्‍यमय प्राणी की याद दिलाती उससे उसका दिन बिगड़ जाता था। उसने सोचा जिस दिन वह घर पर न हो उस दिन क्रेसेंज को निकालना ठीक रहेगा। क्रिसमस का दिन सबसे उचित रहेगा क्‍योंकि यह दिन वह मित्रों के संग गुज़ारने वाला है।

अगले दिन सवेरे नाश्‍ते के तुरंत बाद वह अध्‍ययन-कक्ष में अभी बैठा ही था कि दरवाज़े पर दस्‍तक हुई। यूं ही उसने अख़बार से नज़र उठाकर कहा -

“आ जाओ!”

तभी भारी, लड़खड़ाते क़दमों से वह भीतर आई। यह वही आक्‌ती थी जिससे वह नफ़रत करने लगा था और जो सपनों में भी उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी। उसके बदले रूप को देखकर वह अवाक्‌ रह गया। बदसूरत तो वह थी ही, पर अब उसका मरियल-सा चौड़ा चेहरा ऐसे दिख रहा था जैसे काली पोशाक के ऊपर महज़ खोपड़ी हो। बैरन की नफ़रत करुणा में बदल गई जब उसने देखा कि किस तरह वह दीन-हीन स्‍त्री कालीन के छोर पर ठिठककर रुक गई। उसमें आगे आने का साहस ही नहीं था। अपने भावों को छिपाने के लिहाज़ से उसने भरसक बेरुखी से कहाः

“क्‍या बात है क्रेसेंज?”

फिर भी सहजता के बजाय उसके स्‍वर में घृणा ओर गुस्‍सा ही झलक रहा था।

क्रेसेंज हिली नहीं पर उदासी से कालीन को ही ताकती रही। लंबी ख़ामोशी के बाद बड़ी मुश्‍किल से उसके भीतर से कुछ शब्‍द निकलेः

“एण्‍टन... एण्‍टन कहता है कि मालिक ने तुम्‍हें निकालने का नोटिस दिया है।”

रूडोल्‍फ लेडरशीम को वाकई दुख हुआ, वह खड़ा हो गया। उसने कभी नहीं चाहा था कि सब कुछ इतनी तेज़ी से घट जाए। रुक -रुककर उसने क्रेसेंज को समझाया कि एण्‍टन ने जल्‍दबाज़ी की है। सब कुछ ठीक-ठाक हो सकता है यदि वह नौकर के साथ अच्‍छा सलूक करे। नौकरों को तो मिल-जुलकर रहना चाहिए।

क्रेसेंज अब भी बुत बनी खड़ी रही मानो उसने कुछ सुना न हो। निगाहें अब भी कालीन में ही धंसी थीं। कंधे अड़ियलपन से उठे हुए और सिर मायूसी से झुका ही रहा। वह बस एक लफ़्‍ज सुनना चाहती थी जो नहीं आया। आिख़रकार बैरन को वाकई यह हास्‍यास्‍पद लगा कि एक नौकर के सामने वह क्‍यों इस तरह सफ़ाई दे रहा है इसलिए उसने समझाना बंद कर दिया। फिर भी क्रेसेंज बिना कोई जवाब दिए बागी क़िस्‍म का मौन धारण किए खड़ी रही।

दो-तीन मिनट तक अज़ीब ख़ामोशी के बाद वह बोलीः

“मैं सिर्फ़ यह जानना चाहती हूँ कि क्‍या मालिक ने खुद एण्‍टन को मुझे नोटिस देने के लिए कहा है।”

उसने आवेश व उदासी से भरे ये शब्‍द बैरन से कहे। क्‍या उसमें कोई धमकी छिपी थी या फिर चुनौती? पर यह सुनते ही बैरन का संकोच ओर सहानुभूति पल भर में काफूर हो गई। पिछले हफ़्‍तों और महीनों से इस स्‍त्री के लिए जो नफ़रत उसके भीतर जज़्‍ब थी उसका बांध टूट गया और वह फट पड़ी। वह उसे दोबारा नहीं देखना चाहता था। एकाएक उसका स्‍वर बदल गया और उसने कड़ा और व्‍यावहारिक रुख़ अिख्‍़तयार कर लियाः

“हाँ, क्रेसेंज, यह सच है। परेशानी से बचने के लिए मैंने घर की ज़िम्‍मेदारी एण्‍टन को सौंप दी है। उसने यदि तुम्‍हें नोटिस दिया है तो तुम्‍हें चले जाना चाहिए। हाँ, अगर तुम उसके साथ तमीज़ से पेश आओ तो मैं उससे बात कर सकता हूँ। फिर मैं उसे तुम्‍हारी पिछली सारी बदसलूकी को नज़रअंदाज़ करने के लिए कहूँगा। वरना तुम्‍हें जाना होगा और जितनी जल्‍दी जाओ उतना अच्‍छा रहेगा।”

यदि वह उसे धमकाना चाहती थी तो उसे सज़ा मिलनी चाहिए। इस क़िस्‍म की बदतमीज़ी वह क्‍यों कर बर्दाश्‍त करें?

पर जब क्रेसेंज ने कालीन से आंखें ऊपर उठाईं तो उनमें धमकाने का कोई भाव नहीं था बल्‍कि शिकार हुए जानवर की कातरता झलक रही थी जो बचने की उम्‍मीद में झाड़ी में पनाह लेना चाह रहा हो और वहीं से शिकारी कुत्तों का दल टूट पड़े।

“धन्‍यवाद मालिक, धन्‍यवाद,” उसने रुंधे गले से कहा। मैं इसी वक़्‍त यहाँ से चली जाती हूँ। मैं आपके लिए मुसीबत नहीं बनूंगी।”

धीरे से मुड़कर लड़खड़ाते हुए वह बाहर चली गई।

उस शाम ऑपेरा से लौटने के बाद बैरन दोपहर में आई डाक देखने के लिए अध्‍ययन-कक्ष में गया। तभी मेज़ पर रखी एक अनजानी चीज़ पर उसकी नज़र पड़ी। देहाती कारीगरी में बेंत से बना एक आयताकार बक्‍सा वहाँ रखा हुआ था। उस पर ताला नहीं था। बक्‍से में बड़ी बारीकी से चीज़ें सहेज़कर रखी थीं। ये छोटी-मोटी चीज़ें थीं जो क्रेसेंज को उसने दी थीं- चंद पोस्‍टकार्ड जो शिकार पर बाहर जाने पर उसने भेजे थे, थियटर की दो टिकटें, चांदी की अंगूठी, इन्‍हीं के साथ नोटों की एक गड्‌डी (जो ज़िंदगी भर की कमाई थी) रखी थी और बीस बरस पहले तिरौल में ली हुई एक तस्‍वीर, जिसमें उसकी आंखें रोशनी में चुंधिया गई थीं और उनमें ठीक वैसी ही वेदना और कातरता झलक रही थी जैसी उस वक़्‍त दिखाई दी थी जब बैरन ने उसकी बख़ार्स्‍तगी की पुष्‍टि की थी।

बेहद व्‍याकुल हो बैरन ने घंटी बजाकर एण्‍टन को बुलाया और जानना चाहा कि क्रेसेंज का सामान उसकी मेज़ पर क्‍योंकर रहा है? नौकर फौरन अपनी दुश्‍मन को बुलाने चल पड़ा, लेकिन क्रेसेंज का कहीं अता-पता नहीं था- रसोईघर, सोने के कमरे और पूरे मकान में वह कहीं नहीं मिली।

दूसरे दिन तब तक उसकी कोई ख़बर पता नहीं चली जब तक उन्‍होंने अख़बार में छपी एक ख़बर नहीं पढ़ ली। अख़बार में ख़बर थी कि तक़रीबन चालीस बरस की एक स्‍त्री ने डेन्‍यूब नदी में कूदकर आत्‍महत्‍या कर ली। यह पढ़कर मालिक और नौकर को पता चला कि लेपोरैला का क्‍या हुआ।

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कला पाठकीय पालगुम्मि पद्मराजू पुनर्वसु जोशी पूजा उपाध्याय पोपटी हीरानंदाणी पौराणिक प्रज्ञा प्रताप सहगल प्रतिभा प्रतिभा सक्सेना प्रदीप कुमार प्रदीप कुमार दाश दीपक प्रदीप कुमार साह प्रदोष मिश्र प्रभात दुबे प्रभु चौधरी प्रमिला भारती प्रमोद कुमार तिवारी प्रमोद भार्गव प्रमोद यादव प्रवीण कुमार झा प्रांजल धर प्राची प्रियंवद प्रियदर्शन प्रेम कहानी प्रेम दिवस प्रेम मंगल फिक्र तौंसवी फ्लेनरी ऑक्नर बंग महिला बंसी खूबचंदाणी बकर पुराण बजरंग बिहारी तिवारी बरसाने लाल चतुर्वेदी बलबीर दत्त बलराज सिंह सिद्धू बलूची बसंत त्रिपाठी बातचीत बाल कथा बाल कलम बाल दिवस बालकथा बालकृष्ण भट्ट बालगीत बृज मोहन बृजेन्द्र श्रीवास्तव उत्कर्ष बेढब बनारसी बैचलर्स किचन बॉब डिलेन भरत त्रिवेदी भागवत रावत भारत कालरा भारत भूषण अग्रवाल भारत यायावर भावना राय भावना शुक्ल भीष्म साहनी भूतनाथ भूपेन्द्र कुमार दवे मंजरी शुक्ला मंजीत ठाकुर मंजूर एहतेशाम मंतव्य मथुरा प्रसाद नवीन मदन सोनी मधु त्रिवेदी मधु संधु मधुर नज्मी मधुरा प्रसाद नवीन मधुरिमा प्रसाद मधुरेश मनीष कुमार सिंह मनोज कुमार मनोज कुमार झा मनोज कुमार पांडेय मनोज कुमार 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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3789,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2067,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी नागरानी,20,देवेन्द्र कुमार मिश्रा,2,देवेन्द्र पाठक महरूम,1,दोहे,1,धर्मेन्द्र निर्मल,2,धर्मेन्द्र राजमंगल,2,नइमत गुलची,1,नजीर नज़ीर अकबराबादी,1,नन्दलाल भारती,2,नरेंद्र शुक्ल,2,नरेन्द्र कुमार आर्य,1,नरेन्द्र कोहली,2,नरेन्‍द्रकुमार मेहता,9,नलिनी मिश्र,1,नवदुर्गा,1,नवरात्रि,1,नागार्जुन,1,नाटक,87,नामवर सिंह,1,निबंध,3,नियम,1,निर्मल गुप्ता,2,नीतू सुदीप्ति ‘नित्या’,1,नीरज खरे,1,नीलम महेंद्र,1,नीला प्रसाद,1,पंकज प्रखर,4,पंकज मित्र,2,पंकज शुक्ला,1,पंकज सुबीर,3,परसाई,1,परसाईं,1,परिहास,4,पल्लव,1,पल्लवी त्रिवेदी,2,पवन तिवारी,2,पाक कला,22,पाठकीय,61,पालगुम्मि पद्मराजू,1,पुनर्वसु जोशी,9,पूजा उपाध्याय,2,पोपटी हीरानंदाणी,1,पौराणिक,1,प्रज्ञा,1,प्रताप सहगल,1,प्रतिभा,1,प्रतिभा सक्सेना,1,प्रदीप कुमार,1,प्रदीप कुमार दाश दीपक,1,प्रदीप कुमार साह,11,प्रदोष मिश्र,1,प्रभात दुबे,1,प्रभु चौधरी,2,प्रमिला भारती,1,प्रमोद कुमार तिवारी,1,प्रमोद भार्गव,2,प्रमोद यादव,14,प्रवीण कुमार झा,1,प्रांजल धर,1,प्राची,309,प्रियंवद,2,प्रियदर्शन,1,प्रेम कहानी,1,प्रेम दिवस,2,प्रेम मंगल,1,फिक्र तौंसवी,1,फ्लेनरी ऑक्नर,1,बंग महिला,1,बंसी 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रचनाकार: जर्मन कहानी - स्टीफन ज्विग की कहानी - लेपोरैला
जर्मन कहानी - स्टीफन ज्विग की कहानी - लेपोरैला
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