गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -44- कैस जौनपुरी की कहानी : वन्डरफुल वुमन

 

कहानी कैस जौनपुरी

वन्डरफुल वुमन

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आज मैं फ़िल्म देखने गया था ‘वन्डरफुल वुमन’. रूम से निकला था लाईब्रेरी जाने के लिए. दस बजे से पैदल चलते हुए लाईब्रेरी साढ़े दस बजे तक पहुंच गया. लाईब्रेरी अभी नहीं खुली थी. फिर बगल में ‘जिला विद्यालय निरीक्षक भवन’ के ग्राउण्ड में बैठकर डायरी के पन्‍ने उलटने लगा. फिर पौने ग्यारह बजे देखा तो लाईब्रेरी का गेट खुल चुका था. मैं आगे बढ़ गया तो पाया कि चपरासी दरवाजा खोल ही रहा था. मुझे दूर से देखते ही बोल पड़ा, “अभी नहीं, वापस जाएं, ग्यारह बजे के बाद आईएगा.”

मैं मुस्कुराते हुए आगे बढ़ता गया. वो फिर बोला, “इसका क्‍या मतलब? अगर हम नौ बजे खोल देंगे तो क्‍या नौ बजे ही आ जाएंगे?”

मैंने कहा, “क्‍यूं परेशान हैं?”

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रु. 15,000 के 'रचनाकार कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन' में आप भी भाग ले सकते हैं. पुरस्कार व प्रायोजन स्वरूप आप अपनी किताबें पुरस्कृतों को भेंट दे सकते हैं. अंतिम तिथि 30 सितम्बर 2012

अधिक व अद्यतन जानकारी के लिए यह कड़ी देखें - http://www.rachanakar.org/2012/07/blog-post_07.html

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उसने कहा, “परेशान नहीं, अभी टाईम है...!”

फिर हम वापस मुड़ गए. अब कहां जाएं? तभी ख्‍याल आया, “चलो, फ़िल्म देखते हैं.”

अब हम रोडवेज की तरफ मुड़ चुके थे. थोड़ी ही दूरी पर चर्च है. तभी दिमाग में आया, “चलो, इस चर्च के बारे में पता करते हैं.”

कदम अपने आप चर्च के गेट को पार कर गए. फिर चर्च के अन्दर ही के ‘हेल्थ केयर क्‍लीनिक’ के एक आदमी से हमने अपनी इच्छा बताई तो उन्होंने हमें ‘फादर’ से मिलवा दिया.

अब हम ‘फादर’ से बात करने लगे तो उन्होंने कई रोचक बातें बताईं जैसे कि, “कुरआन शरीफ़ में लिखा है कि कयामत के दिन आदमी के कर्मों का हिसाब-किताब यीशु मसीह करेंगे.”

और सण्डे को साढ़े आठ बजे से दस-ग्यारह बजे तक प्रेयर होती है.

मैंने बारह बजे तक बात की. फिर सण्डे को प्रेयर में शामिल होने की बात कहकर चला आया.

अब मुझे टॉकीज़ तक पहुंचना था. पहुंच गए. बीस रूपए का बालकनी का टिकट लिया. ऊपर गए. गेट के पास कुछ लोग टहल रहे थे. मैं भी वहीं टहलने लगा.

फिर पेशाब करने के लिए पेशाबघर में घुस गया. यूरीनल बिल्कुल पीले पड़ गए थे. पेशाब यूरीनल में पहुंचा तो गड़गड़ की आवाज आने लगी. मैंने देखा तो पता चला कि यूरीनल पूरा भरा हुआ था. पीला होने के कारण पता नहीं चल रहा था.

खैर, पेशाब करके वापस गेट के पास खड़ा हो गया. तभी घण्टी बजी. मैंने सबसे पहले दरवाजा खोला और घुस गया.

“ये क्‍या...? अन्दर तो ढ़ेर सारे लोग बैठे हैं. मैं फालतू में बाहर खड़ा था...!”

खैर, अब मुझे सीट लेनी थी. आदत के मुताबिक मैं पीछे वाली लाईन की ओर बढ़ा और एक किनारे बैठ गया.

नजर दौड़ाई तो क्‍या देखता हूं...! आंखों को यकीन नहीं आया. मेरी ही लाईन में दूसरे किनारे पर एक मियां-बीवी बैठे हैं.

औरत ब्लू फ़िल्म देखने आई है...? अन्दर बैठे सारे लोग इन्हीं की तरफ मुड़-मुड़ कर देख रहे हैं.

मैं लोगों को देख रहा हूं, फिर उस जोड़े को. मेरा तो दिमाग घूम गया. ये दोनों क्‍या देखने आए हैं...?

खैर, अब मैं क्‍या कर सकता था...!

कुछ लोग अपनी-अपनी सीटों से उठे और उन्हीं दोनों के पास जाकर बैठ गए.

मुझे तो डर लग रहा था कि, “कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए.”

खैर, फ़िल्म शुरू हो गई. अन्धेरा हो गया.

कोई किसी को देख नहीं पा रहा था. फ़िल्म बदायूं जिले के हिसाब से दिखाई जा रही थी. ब्लू फ़िल्म का ब्लू वाला हिस्सा काफी देर बाद आया.

अब मैं ये सोच रहा हूं कि, “वो औरत क्‍या सोच रही होगी...? और वो आदमी, जो उसे ले आया है...?”

खैर, दुनिया में सब कुछ हो सकता है. और...और आज एक औरत ने टॉकीज़ में आदमियों के साथ ब्लू फ़िल्म देख ली.

कुछ देर बाद इण्टरवल हो गया. अब उजाला था. पूरी बालकनी के लोग उस औरत को देखने के लिए परेशान थे.

जब फ़िल्म चल रही थी तो पिक्‍चर साफ नहीं होने पर लोग ऑपरेटर को बड़ी-बड़ी गाली दे रहे थे. ये सब भी उस औरत ने सुना था. और ये लोग उसी औरत के आसपास बैठे थे.

मैंने भी उस औरत की हालत जाननी चाही.

“मगर ये क्‍या...?” वो दोनों तो अब अपनी जगह पर नहीं थे. वो दोनों सेकेण्ड लास्ट की किनारे वाली दोनों सीटों पर बैठ गए थे.

मेरे आगे वाले भाईसाहब अपने दोनों पैरों को अपनी लाईन की सीटों पर डालकर इस तरह बैठ गए जैसे पर्दा उसी औरत की जगह जाकर लग गया हो.

तभी वो औरत खड़ी हुई. मैंने देखा. उसकी पीठ मेरी तरफ थी.

फिर वो अपनी साड़ी सम्भालते हुए वापस जाने लगी. अब वो मेरी तरफ आ रही थी क्‍यूंकि मैं आखिरी लाईन में ही बैठा था.

मैंने उसका चेहरा देखा. हालांकि वो बार-बार अपना चेहरा ढंकने की कोशिश कर रही थी. उसकी साड़ी अच्छी थी, बनारसी लग रही थी. उसने गहने भी पहन रखे थे. अच्छे घर की लग रही थी. उसका पूरा शरीर मुझे कांपता हुआ लग रहा था.

फिर वो आदमी भी उठा और उसके पीछे-पीछे थोड़ी दूरी पर चलने लगा.

औरत अपना मुंह ढ़ंकती हुई सामान्य गति से चलते हुए बाहर निकल गई. आदमी भी निकल गया.

लोग अब आपस में बातें करने लगे. एक कह रहा था, “पहले यहां बैठी थी. फिर वहां बैठी. आखिरी बार यहां बैठी.”

मैं सुनता रहा. सोचता रहा, “ये लोग फ़िल्म देखने आए थे...? या उस औरत को...?”

फिर फ़िल्म का दूसरा भाग शुरू हो गया, जो जल्दी ही खत्म हो गया.

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