रविवार, 19 अगस्त 2012

कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन - 49 - श्याम गुप्त की कहानी : अब पोते को पालती...

अब पोते को पालती...

                                             ( डॉ. श्याम गुप्त )

“अब पोते को पालती, पहले पाली पूत” ...वाह! क्या सच्चाई बयान करती कविता है।’ सत्यप्रकाश जी कविता पढ़कर भाव-विभोर होते हुए कहने लगे, ’आजकल यही तो हो रहा है, बच्चे माँ-बाप को आया बनाकर ले जाते हैं, रखते हैं, अपनी संतान के पालन हेतु। बेचारी माँ पहले ... पुत्र-पुत्रियों को पालती रही अब इस उम्र में पोतों को; स्वयं लिए कब समय मिलेगा।’ वे क्लब-हाउस में मित्रों के साथ बैठे पत्रिका पढ़ रहे थे।

‘अरे ! क्या पोते–पोतियों को पालना स्वयं का कार्य नहीं है, ‘साथ में बैठे जोशी जी बोले, ‘वह भी तो स्वयं का कार्य ही है, अपनी संतान का। कवि भ्रमित-भाव है, अनुभव की कमी है अभी।’

पर ठीक तो है जी, इस प्रकार माँ को अपने स्वयं के लिए समय मिला ही कब। कवि तो वर्त्तमान का यथार्थ, भोगा हुआ, देखा हुआ यथार्थ लिखता है।’, सत्यप्रकाश जी ने कहा।

हाँ ... हाँ, वर्तमान का वर्णन तो कवि का सामयिक दायित्व है, परन्तु अनुचित भाव-कथ्य या बिना विषय की गंभीरता पर सोचे विचारे तथ्य कवि को नहीं रखने चाहिए, जैसे इस कविता में। भई, अपने लिए समय क्या ? क्या नाती-पोतों को पालना आयागीरी कहलायेगी। यह तो सदा से ही होता आया है, कोई नयी बात थोड़े ही है। पहले कभी तो यह प्रश्न नहीं उठा। सम्मिलित परिवारों में भी नाती-पोते सदा बावा-दादी ही तो पालते हैं। पुत्र- जो इस समय पिता है व घर का मुखिया रूप में है – को तो कार्य से समय ही कब मिल पाता है। तभी तो पोते में सदा दादा के संस्कार जाते हैं। कहावत भी है...”मूल से अधिक ब्याज प्रिय होती है।” पोते–पोतियों को पालना, खिलाना सबसे बड़ा सुख व मनोरंजन है।’ जोशी जी बोले।

    ‘परन्तु एक सच बात को लिखने में क्या बुराई है ?’

हाँ..sss, पर एक बुराई को दृश्यमान करने हेतु क्या आप एक अन्य सामाजिक प्रथा को बुरी बनने में सहायक होंगे? जोशी जी बोले।

कैसे ?

                     ‘माँ-बाप’ को, जो स्वच्छंदता पसंद हैं, कुछ पैसा भी है या पाश्चात्य विचार-धारा से प्रभावित हैं, उनको यह सन्देश जाता है कि अरे! जब सब मौज कर रहे हैं तो हम भी क्यों न मौज मस्ती में गुजारें ये दिन। आजकल यूं भी हर बिंदु पर–चाहे टीवी सीरियल व विज्ञापन हो, या सिनेमा, समाचार-पात्र, ट्रेवल एजेंसी के विज्ञापन आदि...सभी मौज-मस्ती कराने के विज्ञापनों से भरे रहते हैं। वे अपने लिए तो कमाने का ज़रिया, धंधे का ज़रिया ढूँढते हैं और वरिष्ठ–जनों को ललचाते रहते हैं इस उम्र में भी मौज-मस्ती – मनोरंजन हेतु, घूमने हेतु। नाती-पोतों में फंसने से बचने हेतु। यह स्थिति समाज को विभक्त करती है। पीढ़ियों के मध्य दूरी, जेनेरेशन गैप, को अधिक चौड़ा करती है। समाज में और अधिकतम कमाने की प्रवृत्ति और आपसी वैमनस्यता, विषमता के बीज फैलाती है।’ जोशी जी ने अपना कथन स्पष्ट किया।

‘तो कवि क्या लिखे, पौराणिक कथाएं ?’ मेज के दूसरी ओर बैठे सुरेश जी ने वार्तालाप में भाग लेते हुए कहा तो सत्य प्रकाश जी व अन्य सब हंसने लगे।

            ‘ हाँ, लिख सकते हैं, लिखना चाहिए’, जोशीजी भी हंस कर कहने लगे,’ परन्तु अद्यतन सन्दर्भ के साथ, आज की परिस्थितियों की विवेचना, पुरा से तुलना करके यथा-तथ्य बताना सार्थक साहित्य का दायित्व है।’

                      ‘क्या पुरा साहित्य सब सच होता है ?’ अस्थाना जी पूछने लगे।

                      ‘हो भी सकता है, परन्तु वही साहित्य इतने लंबे समय तक जीवित रहता है जो सत्य के निकट हो अथवा जो सत्य को एवं समाज हेतु आवश्यक तथ्यों को उद्घाटित करता है चाहे वह रचना में वास्तविक हो या कल्पित। साहित्य वास्तव में है क्या, साहित्य समाज का इतिहास होता है। साहित्यिक कथाओं के पात्र सदैव समाज में होते हैं भले ही कथा में वे कल्पित हों। जैसे ये कविता, जोशीजी सत्य प्रकाश जी की ओर उन्मुख होकर कहने लगे, जो अभी आपने पढ़ी, वह भी यह बताने में तो समर्थ है ही कि आज के समाज में ऐसा भी सोचा जाता था, होता भी था। यदि कविता दीर्घजीवी हुई तो।’

                        ‘तो क्या जो समाचार मिल रहे हैं या मिलते हैं कि माता-पिता के साथ बेटे दुर्व्यवहार कर रहे हैं....यह स्थिति उचित है या समाचार असत्य हैं।’ सत्य जी ने प्रश्न उठाया।

‘ उचित कैसे कहा जा सकता है ? समाचार सत्य हो या असत्य। देखिये, दुर्व्यवहार तो श्रवणकुमार के माता-पिता के साथ भी हुआ था सतयुग में। वास्तव में आज ये घटनाएँ मूलतः स्वार्थ, अति-भौतिकता वाली धन आधारित सोच व जीवन शैली व्यवस्था के कारण हैं। मुझे लगता है अधिकाँश बच्चे सामयिक वस्तु-स्थिति के दबाव व मज़बूरी वश ऐसा करते हैं, मन ही मन वे अवश्य ही आत्म-ग्लानि व पीड़ा से ग्रस्त रहते हैं। तभी तो वे प्राय: नर्वस, चिडचिडे हो जाते हैं और इससे पति-पत्नी झगड़े..व अन्य द्वंद्वों के कारक उत्पन्न होते हैं। क्या दया, प्रेम, सांत्वना व उचित सुझाव की अधिकारी नहीं है आज की पीढ़ी ?’            

‘क्या आज की पीढ़ी हमारे सुझाव मानती है ?’ अस्थाना जी कहने लगे।

‘हाँ, यह भी एक पृथक समस्या है परन्तु वे दया, प्रेम, सांत्वना व उचित सुझाव के अधिकारी तो हैं ही।’ सत्य प्रकाश जी ने कहा।

‘माता-पिता भी यदि उन्हें अपने समय की दृष्टि से तौलते हुए चलाना चाहते हैं तो भी द्वंद्व बढ़ते हैं। जब तक नाती-पोते छोटे होते हैं तभी अधिक आवश्यकता होती है दादा-दादी की, परिवार की। यदि ऐसे समय पर आप उनके साथ नहीं होंगे, घूम-फिर रहे, मस्ती कर रहे होंगे, अपनी ज़िंदगी जी रहे होंगे तो और आपकी अधिक उम्र होने पर वे क्यों आपके काम आयेंगे। हाँ,आप काफी धनपति हैं तो अलग बात है|’ जोशी जी हंस कर बोले।

अरे ! तब तो वे आपके आगे-पीछे भी लगे रहेंगे परन्तु सिर्फ स्वार्थ हेतु ...या फिर एकदम किनारा कर लेंगे।’ सुरेश जी बोले।

‘जहां तक विदेश में बसे भारतीयों के माँ-बाप की बात है। वहाँ न साथी, न समाज, न कोई अपना तो आराम भी बंधन हो जाता है और मशीन की भांति पोते-पोतियों को पालना-खिलाना भी बंधन लगने लगता है। उनके स्कूल जाते ही वे नितांत अकेले हो जाते हैं| किसके पास समय है उन्हें पूछने के लिए। वहाँ की कल्चर भी प्रभावित करती है व्यवहारों को, जिसे आधुनिक से आधुनिक भारतीय माँ-बाप नहीं झेल पाते। वही सब बंधन, उपेक्षा, शोषण, पीड़न लगने लगता है।’ जोशी जी ने कहा।

‘यह सब तो अब यहाँ भी होता है।’, अस्थाना जी बोले।

‘सही कहा’, यह सब साहित्यकारों, कवियों व समाज शास्त्रियों को सिर्फ कहने की अपेक्षा इसका युक्ति-युक्त समाधान भी प्रस्तुत करना चाहिए।’ जोशी जी कहते जा रहे थे।

तभी जोशी जी की पत्नी, कुसुम जी, आ जाती हैं, और कहने लगीं,’ मुझे भी कहाँ समय मिलता है अपने लिए, दिन भर राघव की देखभाल में लग जाता है। एक फुल-टाइम आया भी रखी हुई है उसके लिए फिर भी।’

‘आपको किसलिए टाइम चाहिए ?’ जोशीजी मुस्कराते हुए पूछने लगे।

‘कथा, सत्संग, भजन-कीर्तन मंडली में मन बहलाने के लिए। वहाँ अपने शहर में तो किटी, सहेलियों, पडौसी ...आना-जाना लगा ही रहता था, सब छूट गया।’  

वह भी एक महत्वपूर्ण काल-खंड था जीवन का, आप भोग चुके। वैसे पोते को पालने-खिलाने-बड़ा करने-पढाने-लिखाने से बड़ा कीर्तन क्या होगा। भविष्य की संतति, बाल-रूप भगवान की सेवा से बढकर क्या भजन, पूजा व दुनिया की सैर होगी ? अपने पुत्र-पुत्री पालते समय भी तो कभी-कभी एसा अनुभव हुआ होगा कि क्या-क्या छूटा जा रहा है जीवन में ...क्यों..| जोशी जी ने हंसते हुए पत्नी से पूछने लगे।

‘हाँ.. लगता तो था, पर दायित्व-बोध था’, कुसुम जी बोलीं, ’ आजकल के बच्चे तो अपने बच्चों को समय देने की अपेक्षा नौकरी, पार्टी, मीटिंग को अधिक समय देते हैं। यदि वे बच्चों के प्रति अपना दायित्व ठीक से निभाएं, कुछ ऐसा रहे कि वे भी अपने बच्चों को और अधिक समय दें तो दादा-दादी को अखरेगा नहीं, दिन भर जुटना नहीं पड़ेगा| उन्हें भी स्पेस चाहिए। संयुक्त परिवार की भांति घर में ही दायित्व निर्वहन के साथ–साथ खेल-कूद, पार्टी, मनोरंजन सब करें।’

‘पर वह तो संयुक्त परिवार की बात है। वहाँ तो दायित्व व कार्य का विभाजन हो जाता है। पर यहाँ आजकल तो पति-पत्नी दोनों ही काम पर जाते हैं अन्यथा परिवार की आय कैसे बढ़ेगी। पत्नियां भी व्यावसायिक व्यस्तता के चलते घर व बच्चों पर कम समय दे पाती हैं| ‘ जोशीजी ने कहा।

‘हाँ, यही तो सच है आज का, अधिक और अधिक कमाई, अर्थ-युग की मेहरबानी।’ कुसुम जी कहने लगीं,’ जिन बच्चों के माँ-बाप नहीं है पोतों की देखभाल हेतु, या नहीं उपलब्ध हैं किसी कारण वश, वे आया रखते हैं बच्चों के लिए। आया पर जहां सिर्फ दस हज़ार खर्च होते हैं तो पत्नी पचास हज़ार कमाकर लाती है।’

हूँ, जोशी जी बोले, ’अर्थ लाभ तो है ही, परन्तु बच्चों का भाग्य...जो बच्चे पचास हज़ार की क्षमता वाली से पलने चाहिए व दस हज़ार वाली से पल रहे हैं।' सब हंसने लगे तो वे पुनः कहने लगे, ‘‘मैं समझता हूँ ऐसे में जो बावा-दादी अपने पोते-पोतियों को पाल रहे हैं वे बहुत बड़े सामाजिक, साथ ही साथ राष्ट्रीय व मानवीय दायित्व का निर्वहन कर रहे हैं।’

‘हाँ,बहुत से बच्चे बावा-दादी के होते हुए भी बच्चे के लिए आया रखते हैं ताकि उनके माता-पिता को अधिक कष्ट न हो|’ सुरेश जी ने कहा|

‘पर आया, उन्हें लिफ्ट कहाँ देती है। स्वयं को मेम-साहब की अनुपस्थिति में मालकिन समझती है| वह तो बावा-दादी को ही बच्चे पालना सिखाने लगती है। कभी-कभी बच्चों की दुर्गति देखकर उन्हें और अधिक कष्ट होता है। शिशुगृहों (क्रेच) में भी बच्चे पलते हैं परन्तु वहाँ के हालात सब जानते हैं| भई ! असली-नकली में अंतर तो होता ही है।’ जोशी जी ने कहा।

‘रोने गाने से क्या लाभ ?' सत्यप्रकाश जी कहने लगे, ’न आप कुछ कर पाते हैं न हम। यह युग चलन है। नाती-पोते खिलाते रहो, पुण्य कमाते रहो, समय मिले कविता पढ़ते रहो, गुनगुनाते-गाते रहो, मस्त रहो।’ सत्य प्रकाश जी ने जैसे अपना निर्णय सुनाया।

‘ सच है, पर कवि को तो कविता में दुविधा-भाव वाले तथ्यों व अनुचित बात पर तूल देने की अपेक्षा समस्या का समाधान भी देना चाहिए न।’ कहकर जोशी जी हंसने लगे।

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डॉ श्याम गुप्त , सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना, लखनऊ -२२६०१२ ...

[स्व-कथ्य -- मेरी कहानियां मूलतः जन सामान्य की सांस्कृतिक, वैचारिक व व्यावहारिक समस्याओं व उनके समाधान से सम्बंधित होती हैं।

इन कहानियों में मूलतः सामाजिक सरोकारों को इस प्रकार संतुलित रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि उनके किसी कथ्य या तथ्यांकन का समाज व व्यक्ति के मन-मष्तिष्क पर कोई विपरीत अनिष्टकारी प्रभाव न पड़े .. अपितु कथ्यांकन में भावों व विचारों का एक संतुलन रहे। (जैसे बहुत सी कहानियों या सिने कथाओं में सेक्स वर्णन, वीभत्स रस या आतंकवाद, डकैती, लूटपाट आदि के घिनोने दृश्यांकन आदि से जन मानस में उसे अपनाने की प्रवृत्ति व्याप्त हो सकती है।)   अतः मैं इनको संतुलित-कहानी कहता हूँ]

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