मंगलवार, 14 अगस्त 2012

ललित गर्ग का पर्युषण महापर्व विशेष आलेख : आत्‍मा में अवस्‍थित होने का अवसर है पर्युषण पर्व

आत्‍मा में अवस्‍थित होने का अवसर है पर्युषण पर्व

- ललित गर्ग -

पर्युषण पर्व जैन समाज का एक ऐसा महापर्व है जो प्रतिवर्ष सारी दुनिया में मनाया जाता है। चाहे श्‍वेताम्‍बर हों या दिगम्‍बर- जैन समाज के चारों सम्‍प्रदाय एवं उपसम्‍प्रदाय के सदस्‍यों द्वारा इस उत्‍सव को आत्‍मशुद्धि एवं क्षमा जैसे विशिष्‍ट आयामों को लेकर मनाया जाता है, जो आज के हिंसा, शत्रुता, भौतिक चकाचौंध एवं सुविधावाद के दौर में चमत्‍कार एवं आश्‍चर्यजनक है। आमजन की इस पर्व को लेकर जिज्ञासा होना स्‍वाभाविक है कि यह पर्व क्‍या है और इसे कैसे मनाया जाता है?

यह सर्वविदित है कि भारतीय संस्‍कृति को निखार देने में पर्वों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। लेकिन जैनधर्म की त्‍याग प्रधान संस्‍कृति में पर्युषण पर्व का अपना अपूर्व एवं विशिष्‍ट आध्‍यात्‍मिक महत्‍व है। यह एकमात्र आत्‍मशुद्धि का प्रेरक पर्व है। इसीलिए यह पर्व ही नहीं, महापर्व है। जैन लोगों का सर्वमान्‍य विशिष्‍टतम पर्व है। पर्युषण पर्व- जप, तप, साधना, आराधना, उपासना, अनुप्रेक्षा आदि अनेक प्रकार के अनुष्‍ठानों का अवसर है।

पर्युषण पर्व जैन एकता का प्रतीक पर्व है। जैन लोग इसे सर्वाधिक महत्‍व देते हैं। संपूर्ण जैन समाज इस पर्व के अवसर पर जागृत एवं साधनारत हो जाता है। दिगंबर परंपरा में इसकी ‘‘दशलक्षण पर्व'' के रूप में पहचान है। उनमें इसका प्रारंभिक दिन भाद्रव शुक्‍ला पंचमी और संपन्‍नता का दिन चतुर्दशी है। दूसरी तरफ श्‍वेतांबर जैन परंपरा में भाद्रव शुक्‍ला पंचमी का दिन समाधि का दिन होता है। जिसे संवत्‍सरी के रूप में पूर्ण त्‍याग-प्रत्‍याख्‍यान, उपवास, पौषध सामायिक, स्‍वाध्‍याय और संयम से मनाया जाता है। वर्ष भर में कभी समय नहीं निकाल पाने वाले लोग भी इस दिन जागृत हो जाते हैं। कभी उपवास नहीं करने वाले भी इस दिन धर्मानुष्‍ठानपूर्वक उपवास करते नजर आते हैं।

पर्युषण पर्व का शाब्‍दिक अर्थ है-आत्‍मा में अवस्‍थित होना। पर्युषण शब्‍द परि उपसर्ग व वस्‌ धातु इसमें अन्‌ प्रत्‍यय लगने से पर्युषण शब्‍द बनता है। पर्युषण का एक अर्थ है-कर्मों का नाश करना। कर्मरूपी शत्रुओं का नाश होगा तभी आत्‍मा अपने स्‍वरूप में अवस्‍थित होगी अतः यह पर्युषण-पर्व आत्‍मा का आत्‍मा में निवास करने की प्रेरणा देता है।

पर्युषण महापर्व आध्‍यात्‍मिक पर्व है, इसका जो केन्‍द्रीय तत्त्व है, वह है-आत्‍मा। आत्‍मा के निरामय, ज्‍योतिर्मय स्‍वरूप को प्रकट करने में पर्युषण महापर्व अहं भूमिका निभाता रहता है। अध्‍यात्‍म यानि आत्‍मा की सन्‍निकटता। यह पर्व मानव-मानव को जोड़ने व मानव हृदय को संशोधित करने का पर्व है, यह मन की खिड़कियों, रोशनदानों व दरवाजों को खोलने का पर्व है।

पर्युषण पर्व मनाने के लिए भिन्‍न-भिन्‍न मान्‍यताएं उपलब्‍ध होती हैं। आगम साहित्‍य में इसके लिए उल्‍लेख मिलता है कि संवत्‍सरी चातुर्मास के 49 या 50 दिन व्‍यतीत होने पर व 69 या 70 दिन अवशिष्‍ट रहने पर मनाई जानी चाहिए। दिगम्‍बर परंपरा में यह पर्व 10 लक्षणों के रूप में मनाया जाता है। यह 10 लक्षण पर्युषण पर्व के समाप्‍त होने के साथ ही शुरू होते हैं।

पर्युषण महापर्व-कषाय शमन का पर्व है। यह पर्व 8 दिन तक मनाया जाता है जिसमें किसी के भीतर में ताप, उत्ताप पैदा हो गया हो, किसी के प्रति द्वेष की भावना पैदा हो गई हो तो उसको शांत करने का उपक्रम इस दौरान किया जाता है। धर्म के 10 द्वार बताए हैं उसमें पहला द्वार है-क्षमा। क्षमा यानि समता। क्षमा जीवन के लिए बहुत जरूरी है जब तक जीवन में क्षमा नहीं तब तक व्‍यक्‍ति अध्‍यात्‍म के पथ पर नहीं बढ़ सकता।

इस पर्व में सभी अपने को अधिक से अधिक शुद्ध एवं पवित्र करने का प्रयास करते है। प्रेम, क्षमा और सच्‍ची मैत्री के व्‍यवहार का संकल्‍प लिया जाता है। खान-पान की शुद्धि एवं आचार-व्‍यवहार की शालीनता को जीवनश्‍ौली का अभिन्‍न अंग बनाये रखने के लिये मन को मजबूत किया जाता है। मानवीय एकता, शांतिपूर्ण सह-अस्‍तित्‍व, मैत्री, शोषणविहीन सामाजिकता, अंतर्राष्‍ट्रीय नैतिक मूल्‍यों की स्‍थापना, अहिंसक जीवनश्‍ौली का समर्थन आदि तत्त्व पर्युषण महापर्व के मुख्‍य आधार हैं। ये तत्त्व जन-जन के जीवन का अंग बन सके, इस दृष्‍टि से पर्युषण महापर्व को जन-जन का पर्व बनाने के प्रयासों की अपेक्षा है।

मनुष्‍य धार्मिक कहलाए या नहीं, आत्‍म-परमात्‍मा में विश्‍वास करे या नहीं, पूर्वजन्‍म और पुनर्जन्‍म को माने या नहीं, अपनी किसी भी समस्‍या के समाधान में जहाँ तक संभव हो, अहिंसा का सहारा ले- यही पर्युषण की साधना का हार्द है। हिंसा से किसी भी समस्‍या का स्‍थायी समाधान नहीं हो सकता। हिंसा से समाधान चाहने वालों ने समस्‍या को अधिक उकसाया है। इस तथ्‍य को सामने रखकर जैन समाज ही नहीं आम-जन भी अहिंसा की शक्‍ति के प्रति आस्‍थावान बने और गहरी आस्‍था के साथ उसका प्रयोग भी करे।

नैतिकताविहीन धर्म, चरित्रविहीन उपासना और वर्तमान जीवन की शुद्धि बिना परलोक सुधार की कल्‍पना एक प्रकार की विडंबना है। धार्मिक वही हो सकता है, जो नैतिक है। उपासना का अधिकार उसी को मिलना चाहिए, जो चरित्रवान है। परलोक सुधारने की भूलभुलैया में प्रवेश करने से पहले इस जीवन की शुद्धि पर ध्‍यान केंद्रित होना चाहिए। धर्म की दिशा में प्रस्‍थान करने के लिए यही रास्‍ता निरापद है और यही पर्युषण महापर्व की सार्थकता का आधार है।

भगवान महावीर ने क्षमा यानि समता का जीवन जीया। वे परिस्‍थिति में सम रहे चाहे कैसी भी परिस्‍थिति आई हो, सभी परिस्‍थितियों में सम रहे। ‘‘क्षमा वीरो का भूषण है''-महान्‌ व्‍यक्‍ति ही क्षमा ले व दे सकते हैं। पर्युषण पर्व आदान-प्रदान का पर्व है। इस दिन सभी अपनी मन की उलझी हुई ग्रंथियों को सुलझाते हैं, अपने भीतर की राग-द्वेष की गांठों को खोलते हैं वह एक दूसरे से गले मिलते हैं। पूर्व में हुई भूलों को क्षमा के द्वारा समाप्‍त करते हैं व जीवन को पवित्र बनाते हैं।

पर्युषण महापर्व का अन्‍तिम चरण- क्षमावाणी या क्षमायाचना है, जो मैत्री दिवस के रूप में आयोजित होता है। इस तरह से पर्युषण महापर्व एवं क्षमापना दिवस- यह एक इंसान को दूसरे के निकट लाने का पर्व है। इंसान इंसान के बीच की दूरियों को समाप्‍त कर एक दूसरे को अपने ही समान समझने का पर्व है। गीता में भी कहा है‘‘‘आत्‍मौपम्‍येन सर्वत्रः, समे पश्‍यति योर्जुन''‘श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन से कहा-हे अर्जुन ! प्राणीमात्र को अपने तुल्‍य समझो।

भगवान महावीर ने कहा-‘‘मित्ती में सव्‍व भूएसु, वेरंमज्‍झण केणइ''सभी प्राणियों के साथ मेरी मैत्री है, किसी के साथ वैर नहीं है।

पर्युषण पर्व अंतआर्त्‍मा की आराधना का पर्व है- आत्‍मशोधन का पर्व है, निद्रा त्‍यागने का पर्व है। सचमुच में पर्युषण पर्व एक ऐसा सवेरा है जो निद्रा से उठाकर जागृत अवस्‍था में ले जाता है। अज्ञानरूपी अंधकार से ज्ञानरूपी प्रकाश की ओर ले जाता है। तो जरूरी है प्रमादरूपी नींद को हटाकर इन आठ दिनों में विशेष तप, जप, स्‍वाध्‍याय की आराधना करते हुए अपने आपको सुवासित करते हुए अंतर्आत्मा में लीन हो जाए जिससे हमारा जीवन सार्थक व सफल हो पाएगा

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(ललित गर्ग)

ई-253, सरस्‍वती कुंज अपार्टमेंट

25 आई. पी. एक्‍सटेंशन, पटपड़गंज, दिल्‍ली-92

फोनः 22727486, 9811051133

1 blogger-facebook:

  1. ललित गर्ग जी को इतना आत्मीय आलेख लिखने के लिए हार्दिक
    आभार। भगवान हम सबकी आत्मा पवित्र करें।
    डॉ रावत
    आईआईआईटी खड़गपुर

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