गुरुवार, 16 अगस्त 2012

कामिनी कामायनी की ग़ज़लें

 

ग़ज़ल दस

1


मुमकिन है कि गैरों के साथ यॅू  दिल खोल कर मिलना
तेरे प्यार को जी भर के शर्मशार करे ।
तेरी अदा पर अब लिखने वाले लिखे तो क्या
किस घॅूघट को उठा कर तेरा दीदार करे ।
इतना अच्छा भी नहीं है प्यार का यॅू बहकना
सरे बाजार में जलील लोग  बार बार करे ।
ऑखों में बेरूखी किसी को  अच्छी नहीं लगती
नजर तो वो है जो आदाब बार बार करे ।।


 

   2 


क्यों नजर से तुझको मैं अपने पाक साफ कर दॅू
ऑखें झुका कर अक्सर निकल जाते वेा सामने से।
भीगी थी बस वो पलकें और कह गई थी सब कुछ
पशेमान जिन्दगी के पन्ने निकाल करके ।
मत पूछना अब हमसे अता पता किसी का
अपने ठिकाने हमने बडी दूर कर लिए हैं ।
आते न देख पाए जाते तो देख जाना
बस इक नजर के खातिर खाई है हमने ठोकर ।।


 

  3


मयखाने जब खुले घरों में बाहर जाने की क्या बातें
बरपे कहर जमाना जितना पर पाटीहोती है जम के।
मधुशाला से पी कर आई ये बाला क्योंकर जानेगी
प्रेम गलीमें चलना होता कितना पॉव संभलकर के ।
होठों पर सिगरेट सजी है अंगुली में हैं जाम फॅसे
कौन से घर में अॅट पायेगी ये दुल्हन घॅूघट कर के।
कदम कदम जल रही मशाल़ें ़न जाने किस क्रान्ति के
कैसे कोई घर को बचाए पल में राख बदलने से ।
कैसे रोकेंगे यह ऑधी पच्छिम की है तेज हवा
रोज नया इबादत लिखता इंटरनेट रूप बदल करके ।।


 

4


शिकवा नहीं कोई हमको दुनिया तुझसे
यह सफर है जिन्दगी का यॅू ही कट जाते हेैं।
भीगी पलकों पर चमकते हैं जो नन्हींनन्हीं  बॅूदें
चाहो कितना भी छुपाना टपक ही जाते हैं।
सब ने मिल कर यहॉ कुछ खेल ऐसा खेला है
कोई यहॉ चोर कोई सिपाही बन ही जाते हैं ।
आगे पीछे झॅाकते हैं हम गिरेबॉ में  सबके
आखिरी में खुद को ही जाने क्यों भूल जाते हैं ।
कभी कॉटे कभी कलियॉ कभी कोमल सी लता
हर हाल में कभी न कभी मिल ही जाते हैं।
कहीं धूप घनी हो जाती कभी ओले तडपाती
कहीं वसंती फूल ही फूल न जर आते हैं ।।


 

5


नींद आ रही है आज हमें कई मुद्दतों के बाद
कितना सूकॅू मिला है हमें  कई मुद्दतों के बाद।
आना है तो आजा कोई बेरूखी न दिखाना
अपनों को आज समझेंगे कई मुद्दतों के बाद ।
कब से जी रहे थे हम  किसी यायावर की जीन्दगी
थम गए हैं अब यहॉ  कई मुद्दतों के बाद ।
हर गली कूचे बस्ती के हम मेहमॉ घडी घडी
अपना सही पता मिला है कई मुद्दतों के बाद ।।


 

6


अलग ठिकाने बना लिए हो अपनों से इतने दूर हटे
फिर किससे बातें करते रहते यॅू ही तुम तन्हा तन्हा ।
समझ न पाए तेरी फितरत चेहरा सर्द बर्फ गोले सा
भूल गए सब रीति रिवाजें बैठे रहते तन्हा तन्हा।
इश्क विश्क की बातें नहीं लगती है कुछ खास मगर 
वरना नहीं फिरा करते तुम सब से कट के तन्हा तन्हा ।
खिली धूप सी चटक रही है अब भी देखो क्यारी क्यारी
फूलों पर भॅवरें घूम रहे हैं कोई नही यहॉ तन्हा तन्हा ।
सब हाजिर तेरे कदमों में बेकरार बनने को साथी
उठो सॅवारो अपनी जुल्फें रहो न तुम यॅू तन्हा तन्हा ।।


 

7


अभी अभी मिले थे हम सहरा ए बहार में
अभी से फिर जुदा हुए तो कयामत ही मुझपर आएगी ।
सवाल का जवाब तुम्हें हमसे ही क्यों चाहिए
तुम्ही कुछ कहा करो सुकून हमको आयेगी ।
अब न हम हवा किला पे चढ के गुनगुनायेंगे
मिजाज इसका क्या कहें उडा कहीं ले जायेगी ।
बयॉ करूॅ तो क्या करूॅ खबर  की क्या कमी तुझे
मगर कुछ न कह सकी तो दाग मुझपर आयेगी ।।
रहोगे तुम करीब  अब हमें पूरा यकीन है
बदल गए अगर कभी वो भी मेरा नसीब है ।।
राह भी सही सही उलझने कहीं नहीं
खुशनसीब होंगे जिनको ख्वाब भी बुलाएगी ।
बहक के फिर संभल लिए कदम कदम बढे चले
रूकेंगे फिर वहीं जहॉ शमॉ जलाई जा ये गी ।।


 

  8


रातें कितनी हॅसीन है काली मखमली चादर सी
तकते मन नहीं थकता और सवेरा हो जाता ।।
इस हसीन रात के अपने हजारों हैं किस्से
कभी फुरसत में कोई युग आकर बॅाच जाता है ।।
बडी रंगीली मस्तानी मदहोश चाल चलकर के
समय को  राह भटकाने चली आती तिलस्मी रात ।।
तमाशा लोग करते हैं मगर दर्शक बनी है रात
कि खुद को भूल कर दुनिया कैसे चैन से सोती।।
खतरनाक है ये रात नागिन की जहर जैसी
बैठे रहे जो तनहा तो ये खामोश कर देगी ।।
खुदा ने रात की चुनरी में कितने नग जडा रखे
कि झिलमिल चॉदनी में रूप इसका और बढ जाती ।।

9


आओ तुमसे बात करें हम दिल की कुछ फरियाद करें हम
तरस गए हैं कुछ कहने को जाने कितने जमाने से ।
कहते सुनते दिन कट जाते हम अपने घर को मुड जाते
काली रातों में हम लगते खुद कितने अंजाने से ।
बडे लगन से भवन बनाया सुन्दर सॉचे में ढलवाया
दुखती हाथ अचानक रूक गई जब घर लगे विराने से ।
हम क्यों दुनिया भर की बॉचें जिनको जो कहना है सोचें
कौन यहॉ बच कर निकला है किसी न किसी फसाने से ।
मेरा भी कोई हाल सुने तो हम भी दिल की गॉठें खोलें
मुड जाते सब घर तक आकर किसी न किसी बहाने से ।
रोक सका यहॉ कौन पवन को बहते हैं ये जाने कब से
रह रह मचल मचल से जाते भटके हैं दीवाने से ।
हम भी तो न जाने कब से आस लगाए यहॉ खडे
जलते दीपक देख रहे हैं धायल एक परवाने से ।।


 

10


अपने दिल की बातों से हमें महरूफ रखते हो
और कहते हो कि तुम हमारे दिल में रहते हो।
कभी तो पूछ लेते यॅू भी हालत हमारे दिल की
मगर भूले कहीं खोए से तुम खामोश रहते हो ।
तुम्हारी शबनमी ऑखों में मैंने नूर देखा था
चमक फीकी पडी है अब बडे लाचार दिखते हो ।
जमाने को नहीं होता यकीं कभी किसी के बातों पर
लिए क्यों हाथ  गंगाजल बेवजह से फिरते हो ।
जिओ अपने लिए ही बस बनी संसार की फितरत
डाका डाला न चोरी की कहो फिर किससे डरते हो।।


कामिनी कामायनी

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