गुरुवार, 16 अगस्त 2012

पुस्तक समीक्षा - अम्माँ-पापा (काव्य संकलन)

पुस्‍तक समीक्षा

समीक्षक - दिलीप भाटिया

रावतभाटा 323307

अम्‍माँ-पापा (काव्‍य-संकलन) ः लेखिका माला वर्मा, हाजीनगर 743135 ः प्रकाशक-रोशनाई प्रकाशन काँचरापाडा 743145 ः पृष्‍ठ 296 ः मूल्‍य रू. 200

त्र तत्र सर्वत्र प्रकाशित होती रहने वाली माला वर्मा की ग्‍यारहवीं पुस्‍तक, दूसरे कविता संग्रह के रूप में 101 काव्‍य फूलों का गुलदस्‍ता लेकर साहित्‍य जगत में आई है इन्‍टरनेट टी.वी. मोबाइल ई-मेल, फेसबुक, ब्‍लाग पर कृत्रिम जिन्‍दगी की धूप के बीच एक निर्मल पवित्र शीतल सुखद हवा का झोंका तन मन को छांह भरी शीतलता देता है, यह काव्‍य संकलन इन कविताओं को पढ़ते हुए अम्‍मा, पापा, भाई, भाभी, पीहर, गांव, प्रकृति स्‍मरण होते चले जाते हैं। अम्‍मा पर कई कविताऐं हैं एवं पापा पर भी एवं इन्‍हें पढ़ते हुए आंखे छलक पडती हैं। माला दी की कविताएँ सामयिक, संवेदनशील हैं। प्रकृति व समाज के कई दृश्‍य हैं। ईश्‍वर को भी कठघरे में खड़ा किया गया है। विशेषकर हर पाठिका इस संकलन को पढकर पीहर के वातावरण में पंहुच जाऐगी।

प्रभावशाली श्‍ौली में सृजित ये कविताऐं अंतर्मन को छू लेती हैं। ईश्‍वर से प्रश्‍न है क्‍या तुम्‍हारे परिवार में मृत्‍यु नही होती ? कई रचनाओं में जीवन दर्शन भी है, यथा, होते हैं पिता एक वटवृक्ष, जो बीत गई सो बात गई, अब तक जो कुछ भी हुआ बहुत अच्‍छा ही हुआ, सबका तो दिन नियत कर रखा है तुमने, कब किसकी होने वाली है मौत, अच्‍छे कर्मों वाले ही पाते हैं दुःख सदा, हम जैसा करते हैं वैसा ही इस जग में भरते हैं, मन मेरे थोडा धीरज रखो, मर गए जो ज्ञानी ध्‍यानी वे अब नहीं लौट कर आने वाले, दया और प्‍यार से बढ़कर दूजा कुछ भी नहीं इस भू पर, इत्‍यादि।

चिन्‍तन-मनन-मंथन हेतु बहुत कुछ भरा है। इन कविताओं में दुख-दर्द, पीड़ा-आंसू के साथ यह संदेश भी है कि जीवन से हारना नहीं है। एक सकारात्‍मक सोच है, प्रकृति के दृश्‍य मनोहारी हैं। पीहर का अपनापन, भाभी का पत्र, पति की व्‍यस्‍तता, घर, देश, नीड़, नदी सभी पहलू हैं। निराश लड़की को आशा का संदेश है, घर परिवार का महत्त्व है।

मुद्रण गुणवत्‍तापूर्ण है। मूल्‍य कुछ अधिक सा लगता है। मध्‍यम वर्ग का पाठक इसे पुस्‍तकालय से लेकर ही पद पाएगा। प्रूफ की अशुद्धियां नगण्‍य सी हैं। कुल मिलाकर, संभव हो तो, संकलन घरेलू पुस्‍तकालय का सदस्‍य बनाया जा सकता है एवं अपनों में बांटा जा सकता है।

इन्‍टरनेट मोबाइल फेसबुक की थकान ऊब दूर करने के लिए यह पुस्‍तक मन मस्‍तिष्‍क के लिए एक टॉनिक है।

माला दी को इस संकलन हेतु साधुवाद, अभिजीत, रश्‍यिप्रिया के साथ दिलीप भी अगले संकलन की प्रतीक्षा करेगा

इति. -

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