गुरुवार, 23 अगस्त 2012

गोवर्धन यादव का आलेख - चित्र-विचित्र : गोटमार मेला

यह देश विविधताओं से भरा हुआ देश है. तीन अलग-अलग मौसमों में,- आदमी कभी बारिश में भींगता, तो कभी ठंड में ठिठुरता, तो कभी चिलचिलाती धूप में हलाकान –परेशान हो उठता है, लेकिन हर मौसम में पडते तीज-त्योहारों और परम्पराओं में निमग्न होते हुए वह, उन पलों को बडी आत्मीयता के साथ, अपने आपको जोडते हुए, अपने आपको डुबो देता है,.जिससे उसे आत्मीय खुशी मिलती है. इस आत्मिक खुशी को हम चाहें तो आनन्द कह लें या फ़िर परमानन्द अथवा ब्रह्मानंद. आदमी की इसी जिजीविषा का ही परिणाम है कि वह दैहिक-दैविक और भौतिक तापों की जलन से अपनी आत्मा को लहूलुहान होने से बचा पाता है. ऐसा नहीं है कि केवल भारत में ही यह सब कुछ होता है, पूरी दुनिया में इसी तरह की जद्दोजहद चलती रहती है.

अभी बारिश का मौसम चल रहा है. बारिश के इस मौसम में भीगते हुए अभी हमने रक्षाबंधन का पवित्र पर्व, तो इसी क्रम में तीज- छट का त्योहार और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का पर्व भी बडी धूमधाम से मनाया. इसी कडी में छिन्दवाडा जिले के पाण्ढुर्णा तहसील में जाम नदी के तट पर एक अजीबो-गरीब परम्परा में लिपटे हुए गोटमार मेले का आनन्द भी उठाया. पाण्ढुर्णा के इस मेले में जमकर पत्थर बरसते हैं. लोग जख्मी होते हैं. अंग भंग होता है और कभी-कभी तो जान से भी हाथ धोना पड़ता है. है न ! अजीबो-गरीब परम्परा. इसे मात्र कोरी गप्प न मानें, यदि मन न माने इस बात पर विश्वास करने को, तो इस दिन यहाँ आकर अपनी आँखों से इसे होता हुआ देख सकते हैं. अगस्त की अठारह तारीख को यह अजीबो-गरीब विश्व प्रसिद्ध मेला जिसे clip_image002

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गोटमार के नाम से जाना जाता है, मनाया गया. पांढुर्णा मराठीभाषा का क्षेत्र है. गोट का अर्थ पत्थर होता है. इस दिन यहाँ जमकर पत्थरबाजी का खेल खेला जाता है. किंवदती के अनुसार करीब तीन सौ साल पहले, पांढुर्णा के एक युवक को सांवरगांव में रहने वाली एक युवती से प्रेम हो गया. दोनो पक्ष के लोग इस विवाह के पक्ष में नहीं थे. युवक जब अपनी प्रेयसी को सांवरगांव से लेकर पांढुर्णा लाने लगा. यहां आने के लिए बीच में जाम नदी पडती है, जिसे पार करते हुए इस पार आया जा सकता है. दोनों बीच नदी में पहुंचे ही थे कि गांव वालों ने पथराव शुरु कर दिया. सांवरगांव के लोगो द्वारा पत्थरबाजी के जवाब में पांढुर्णा वालों ने भी पथराव शुरु कर दिया. इस पत्थरबाजी में कई को चोटें आयीं, कई सिर फ़ूटे, कुछ की जानें भी गईं. अंततः वह युवक, युवती को लाने में सफ़ल हुआ.

भादों मास के कृष्ण पक्ष में ,अमावस्या को पोले के त्योहार के ठीक दूसरे दिन, जाम नदी के मध्य में शमी वृक्ष के पेड की टहनी गाडी जाती है और उस पर झंडा लगाया जाता है. पांढुर्णा के लोग इस झंडॆ कॊ लाने का पूरा प्रयास करते हैं और सांवरगांव के लोग पत्थर बरसा कर उन्हें रोकने का प्रयास करते हैं. इस तरह दोनों तरफ़ से पत्थरों की अनवरत बरसात होती है, जिसमें कई युवक गंभीर रुप से जख्मी हो जाते है. खून की नदियां बह निकलती हैं, लेकिन जांबाज लोग, बगैर जख्मों की परवाह किए निरन्तर आगे बढ़ते हैं और झंडे को लाने का उपक्रम करते हैं. पूजा-वंदना के साथ शनिवार यानि 18 अगस्त को विश्वप्रसिद्ध गोटमार मेला शुरु हुआ. सुबह से शुरु हुई पत्थरबाजी दोपहर बाद तक चलती रही. लोगों ने एक दूसरे पर जमकर पत्थर बरसाए. स्थानीय समाचार-पत्र के अनुसार पांढुर्णा पक्ष के 175 और सांवरगांव के 160 लोग घायल हुए. बुरी तरह से जख्मी 33 लोगों को स्थानीय सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र में भर्ती करवाया गया. पांच की स्थिति अत्यन्त ही नाजुक हो चली थी, जिन्हें तत्काल नागपुर रेफ़र कर दिया गया. इस तरह गोटमार शाम के छः बजे तक चलती रही. कोई निर्णय न होता देख,स्थानीय लोगों, अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों ने आपसी सहमति बनाकर पत्थरबाजी रुकवाई. तत्पश्चात चंडी माता मंदिर में झंडॆ की पूजा-अर्चना की गई. इस तरह इस विचित्र किंतु सत्य मेले का समापन हुआ.

इस विश्वप्रसिद्ध गोटमार मेले में व्यवस्थाएं बनाने आला प्रशासनिक अधिकारियों ने पांढुर्णा और सांवरगांव में व्यवस्थाएं संभाल ली थी. उन्होंने गोटमार मेले को रोकने के लिए विभिन्न आयोजन भी आयोजित किए ,बावजूद इसके वे इसे रोक पाने में असफ़ल हुए. इस मेले में 73 एस आई, 95 हेड कांस्टेबल, 454 आरक्षक सहित 645 पुलिसकर्मी तैनात कार दिए गए थे, जो मेले की सुरक्षा व्यवस्था संभालेंगे. इसके अलावा जिला सिवनी और नरसिंहपुर से भी पुलिस बल बुलाया गया था. इस चित्र-विचित्र मेले को साकार रुप में दुनिया को दिखाने के लिए इसका फ़िल्मांकन भी करवाया गया था. सभी ने इसे हैरत के साथ देखा और सुना भी.

5 blogger-facebook:

  1. basically we are uncivilised still now.

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  2. कुल ३०० से अधिक लोग घायल हुए तब प्रशासन की आँख खुली!
    इस तरह के मेले पर पूरी तरह से रोक लगनी चाहिए.

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  3. गोवर्धन यादव7:59 am

    इसे पागलपन ही कह सकते हैं. प्रशासन रोक तो लगाता है,लेकिन अब तक कोई कारगर नुक्सा हाथ नहीं आया है..

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  4. इस मेले के विरोध में सारे समाज को उठ खड़ा होना चाहिये|विगत पंद्रह साल से मैं भी देख रहा हूँ प्रशासन मेले को रोकने अथवा हिंसा को रोकने के प्रयास करता है परंतु परंपराओं की दुहाई देकर लोग मनमाना कर जाते हैं प्रशासन देखता रहा जाता है|हर साल लोग मरते हैं सैकड़ों घायल होते हैं पर लोगों को समझ में नहीं आता|एक बार कर्फयु लागाकर कड़ी कारवाई की आवश्यकत ही तो है पर शासन ही ढीला हो तो क्या करें|
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव‌

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    उत्तर
    1. सहमत.
      सती प्रथा' को भी रोका ही गया है न इसी देश में...
      तो इसे रोकना मुश्किल नहीं ,
      उन गावों के लोगों को अपने सगे- सम्बन्धियों से प्यार नहीं है,
      ऐसा लगता है तभी आगे धकेल देते हैं उन्हें इस मेले में मरने या विकलांग होने या घायल होने के लिए!
      जन जागृति के लिए समाज सेवी संगठनों को आगे आ कर काम करना चाहिए.

      हटाएं

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