गुरुवार, 30 अगस्त 2012

प्रमोद भार्गव का व्‍यंग्‍य निबंध : वाटरगेट बनाम कोलगेट

भैया हमारे सनातन ऋषि तो पहले ही कह गए कि काजल की कोठरी में रहोगे तो थोड़े बहुत काले होगे ही। अब बेचारे निष्‍काम निर्लिप्‍त प्रधानमंत्री ने काजल की इस कोठरी में रहने की मजबूरी तो पूरे छह साल ढोई, सो सफेद पोशाक पर थोड़े बहुत काले छींटे पड़ भी गए तो उनकी यह नादानी क्षमा के काबिल है।

अब विपक्ष संसद में चाहे जितना हल्‍ला बोले। बहस न होने दे। आप भले ही कहते रहें ‘‘कोयले की दलाली है, सारी कांग्रेस काली है।‘‘ मूर्ति सदृश्‍य मनमोहन इस्‍तीफा देने वाले नहीं हैं। ऐसे कई अवसरों का दिलेरी से मौन साधे वे कई मर्तबा सामना कर चुके हैं। टूजी स्‍पैक्‍ट्र्रम घोटाला, राष्‍ट मण्‍डल खेल धोटाला और सार्वजानिक निजी साझेदारी के कई ऐसे कई मुद्‌दे संसद में परवान चढ़े, पंरतु संसद में साधना के मौन हठयोग के चलते उन्‍होंने सब पर पार पा ली। हठयोग की इस सिद्धी की सीख बाबा रामदेव को मनमोहन से लेने की जरुरत है। संसद के बाहर बेचारे अण्‍णा और रामदेव भ्रष्‍टाचार, धोटालों और लूट की सरकार होने का मंत्रजाप करते ही रह गए, किंतु मंत्र सिद्धि दूर की कौड़ी ही रही।

अब जो समन्‍वय समीति की बैठक काग्रेंस आलाकमान के धर हुई है, उसमें गठ जोड़ की गांठ और मजबूत होकर उभरी है। सर्वसम्‍मति से सहमति बनी कि बाजार में आवारा पूंजी का प्रवाह बनाए रखने और विकास दर चढ़ाए रखने के लिए आंखें मूंदी रखना जरूरी था। जिससे कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहें। इस दलाली को बढ़ावा देने के लिए लाचार प्रधानमंत्री को भाजपा शासित राज्‍यों के मुख्‍यमंत्रियों  ने तो मजबूर किया ही पश्‍चिम बंगाल के माकपा मुख्‍यमंत्री भी कब पीछे रहे। बतौर प्रमाण कैग रिपोर्ट में इनकी चिट्‌ठियों का हवाला है। अब अण्‍णा सदस्‍य के अरबिंद केजरीवाल कहते रहें कि संसद में कांग्रेस और भाजपा के बीच सबकुछ फिक्‍स है किसी दल के पास यह नैतिकता नहीं बची है कि वह कोयला घोटाले के खिलाफ आवाज को बुलंदी दे सके। माया का मोह अच्‍छे अच्‍छों की नैतिकता और ईमान डिगा देता है। यही वजह है भैया, सार्वजानिक जीवन में नैतिकता का संकट गहरा रहा है और आर्दश के प्रतिमान बदल रहे हैं।

मिलीभगत बनाम्‌ फिक्‍सिंग की कार्यवाहियां अब दलों और क्रिकेट का हिस्‍सा भर नहीं रह गई हैं। इस बुराई का विस्‍तार राज्‍यसभा में भी पहली बार देखने को मिला। संसदीय मामलों के मंत्री ने सभा के नये उपसभापति के कान में कुछ फुसफुसाया और सदन में हंगामा होते ही सदन की कार्यवाही दिनभर के लिए टाल दी गई। मैच फिक्‍सिंग का यह अनैतिक वार्तालाप वीडियों कैमरो में फिक्‍स होकर सार्वजनिक भी हो गया। मौजूदा सियासत के सामाजिक सरोकार तो अब भैया सिमटकर ही चंद पूंजिपातियों को बेजा फायदा पहुंचाने तक रह गए हैं। नीति नियम और तौर तरीको में ढीले देगें तभी तो कुदरती भू संपदा को दोनों हाथों से लूट पायेंगें। और फोर्ब्‍स पात्रिका में नाम दर्ज कराने की लायकी हासिल करेंगें। इस लूट पर छूट का शिकांजा कस दिया जाएगा तो चुनाव खर्च के किए राजनीतिक दलों को चंदा कौन देगा ?

अब भारत अमेरिका तो है नहीं कि आप राष्‍ट्र्र प्रमुख के पद बैठे रहें और अरोप लगें तो आपकी संवैधानिक प्रवाधनों के तहत जांच भी शुरू हो जाए। और अरोप सिद्ध हो जाने पर बिना कोई अपील किए चुपचाप इस्‍तीफा दे दें। हमारे यहां जैसे कोलगेट कांड हुआ, वैसा ही अमेरिका में सत्‍तर के दश्‍क में वाटर गेट स्‍केंडल हुआ था। हमारे यहां घोटाले सीएजी, पीएसी और अदालतों में दायर जनहित याचिकाओं के जरीए बाहर आ रहे है जबकि वाटरगेट कांड का खुलासा वहां के समाचार पत्र ‘वाशिंगटन पोस्‍ट' ने 1972 में किया था। जांच बैठी और जांच में लगे आरोप सिद्ध हुए, वैसे ही राष्‍टपति रिचर्ड निक्‍सन ने 1974 में इस्‍तीफा दे दिया। अब बेचारे अण्‍णा ऐसे राजनीतिक घोटालेबाजों पर नियंत्रण के लिए ही तो जन लोकपाल को कानूनी दर्जा देने की बात कर रहे हैं। अब भला इसमें हर्ज ही क्‍या है।

पर सरकार है कि कोयले की दलाली में हाथ काले होते रहे इसलिए खदानों में नीलामी के नियामों को दरकिनार रखेगी। साथ ही उल्‍टे पैर चलकर कोशिश करेगी कि किन्‍हीं ऐसे उपायों को अंजाम दिया जाए, जिससे सीएजी, पीएसी और सर्वोच्‍च न्‍यायालय की सक्रीय चाल में बेडि़या पड़ जाएं। आर्थिक उदारवादी दौर का भी यही तकाजा है कि कानून के हाथ बंधे रहें, जिससे बाजारवाद उन्‍मुक्‍त ताण्‍डव के लिए मुक्‍त हो जाए।

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प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007, 232008

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

1 blogger-facebook:

  1. A very nice satire on to days Political field...
    what so we write on the political person they will be silence....Badhai...
    Ravi, Uttarakhand

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