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कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -89- नीरा सिन्हा की कहानी : अकेलापन

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कहानी अकेलापन नीरा सिन्हा शिशिर सुबह की चाय नींद में ही पी लिया था। दिन के आठ बजने को आए, बच्‍चे स्‍कूल के लिए तैयार हो चुके है पर इन्‍हे...

कहानी

अकेलापन

नीरा सिन्हा

शिशिर सुबह की चाय नींद में ही पी लिया था। दिन के आठ बजने को आए, बच्‍चे स्‍कूल के लिए तैयार हो चुके है पर इन्‍हें तो सोने की ही पड़ी है, बुदबुदाते हुए चादर बिछाने लगी थी पिंकी। शिशिर धीरे-धीरे अपना सर सहलाते हुए उठा और उठते ही पूछा क्‍या बात है, रामनाम के बेला में ही शुरू हो गयी, शिशिर मजाक में बोला। पिंकी तपाक से फिर शुरू हो गयी, आपको पता है कि आज काम वाली बाई रेखा भी नहीं आयी है। सुबह पांच बजे से ही चौका-बर्त्‍तन, बच्‍चों का नाश्‍ता, उन्‍हें स्‍कूल के लिए बस स्‍टॉप छोड़ना, आपके लिए चाय, बाबूजी के लिए चाय और नाश्‍ता, अरे-अरे, रूको-रूको, शिशिर ने कहा, ये तुम क्‍या गिनवा रही हो सुबह-सुबह !

इतना काम करना पड़ा मुझे, पिंकी झुंझला कर बोले जा रही थी, सुबह से अबतक, उस पर बाबूजी कहने लगे कि बहू बच्‍चों को बस स्‍टॉप तक जब छोड़ने जाती हो न उस वक्‍त नाइटी पहनकर मत जाया करो, लोग तरह-तरह की बातें करते हैं। पिंकी तैश में आ गयी थी, उसने शिशिर को कहा, बाबूजी भी किस जमाने की बात करते रहते हैं। मोहल्‍ले की सभी नहीं तो ज्‍यादातर औरतें तो नाइटी ही पहन कर बच्‍चों को छोड़ने जाती है। शिशिर ने कहा कि पिंकी तुम बाबूजी से यह आशा मत करो कि वो तुम्‍हें नाइटी पहनकर घर से बाहर जाने की इजाजत दे देंगे। अरे बाबूजी को तो तुम्‍हारा स्‍लीवलेस नाइटी पहनकर उनके सामने जाना भी ठीक नहीं लगता लेकिन तुम मानने वाली कहां ! इसलिए कम से कम घर से बाहर बच्‍चों को बस स्‍टॉप तक जब छोड़ने जाती हो तो साड़ी नहीं तो सलवार कमीज तो पहन लिया करो, शिशिर ने समझाने वाली मुद्रा में कहा। पिंकी गुस्‍से से तमतमायी बिना कुछ कहे रसोई की ओर चली गयी। चाय फिर से बनाकर ले आयी और सामने रखे मेज पर लगभग पटक सा दिया, लो पीओ, पिंकी ने शिशिर को नाराज शब्‍दों में कहा। दो-तीन घूंट चाय पी लेने के बाद शिशिर जब पिंकी की ओर देखा तो पिंकी बड़े प्‍यार से कही, देखो जी मुझे सुबह-सुबह बहुत काम रहता है, आप ही बाबूजी से कहिए न कि वे बच्‍चों को बस स्‍टॉप तक छोड़ आया करें। बैठे-बैठे वैसे भी कुर्सी ही तोड़ते रहते हैं बाबूजी, पिंकी ने शिशिर के साड़ी या सलवार पहनने की सलाह का बदला लिया था ऐसा बोलकर। शिशिर सुनकर अवाक रह गया, उसने पिंकी को डांटते हुए कहा, तुम्‍हें मालूम है कि बाबूजी के दोनों घुटनों में दर्द रहता है और बीस वर्ष हो चुका उनके रिटायर किए हुए, इस उम्र में वे तुम्‍हारे नटखट-शरारती बेटे और बेटी को बस स्‍टॉप तक सही सलामत छोड़ पाएगें। खुद को संभालेगें या बच्‍चों को !

आपको तो बस राई का पर्वत बनाने की आदत है, पिंकी ने कहा। सारा दिन तो बाबूजी घर के अंदर घूमते-फिरते रहते हैं तब उन्‍हें घुटनों में दर्द नहहीं महसूस होता, बच्‍चों को बस स्‍टॉप तक छोड़ने से तो उनके घुटने ही टूट जाएगें, पिंकी कर्कश आवाज में बोली। शिशिर बिना कुछ उत्‍तर दिए तैयार होने बाथरूम चला गया। उसे समय पर ऑफिस भी पहुंचना होता है तथा जय बिल्‍डर्स कंपनी में सेल्‍स एक्‍सक्‍यूटीभ की नौकरी करता था शिशिर। घर से ऑफिस पहुंचने में डेढ़ घंटे का समय लगता था उसे।

अपने कमरे में बैठे अखबार पढ़ते हुए शिशिर के बाबूजी जयप्रकाश सहाय सारी बातों को सून कर भी अनसुना किए जा रहे थे। बहू की बातें कहीं गहरे जाकर उन्‍हें आहत कर रही थी। वो आज तक पुत्र-पौत्र के मोह में फंसकर बहू के ताने सह जाते थे किन्‍तु आज न जाने क्‍यों उनका मन आज बहुत ही खिन्‍न और उदास हो गया था। अपनी पत्‍नी रेणु का नहीं रहने का अभाव आज उन्‍हें बहुत खल रहा था। जयप्रकाश बाबू कमरे में लगी बड़ी सी अपनी पत्‍नी की तस्‍वीर के सामने जा खड़े हुए और कुछ पल तक निहारते रहे फिर आंखों में अनायास आए आंसू को पोंछते हुए मन ही मन कहा, रेणु तुम भाग्‍यशाली थी, जो दुनिया छोड़ गयी। तुम्‍हारे बिना रत्‍ती भर भी मन नहीं लगता है मेरा यहां। जयप्रकाश बाबू बहुत शिद्‌दत से चाहा था अपनी पत्‍नी को पर भगवान भी शायद अच्‍छे लोगों को ज्‍यादा ही प्‍यार करते हैं इसलिए रेणु को अपने पास बुला लिया। मरने के पहले उन्‍हें याद आ रहा था, रेणु ने बहू से कहा था कि बहू, शिशिर के बाबूजी पर ध्‍यान रखना, उन्‍हें अपने पिता की तरह समझना, बेटी और आंखें मूंद ली थी रेणु ने सदा के लिए। जयप्रकाश बाबू सोच रहे थे कि अगर वे अपनी बहू को क्‍या सही है और क्‍या गलत है, यह बताते हैं तो क्‍या बुरा करता है, अगर मेरी बेटी होती तो क्‍या वो उसे सही-गलत नहीं बताते क्‍या ? इसमें बूरा मानने की बात तो नहीं है।

पिंकी एक स्‍वछंद विचार की महिला थी उसे रोक-टोक पसंद नहीं थी। शिशिर को अपने काम से फुसर्त ही नही मिलती थी, घर बाहर का सारा काम पिंकी ही करती थी इसलिए शिशिर भी बहुत हद तक उसे आजादी दे रखी थी।

जयप्रकाश बाबू अपने पुत्र शिशिर से बहुत खुश रहते थे और इकलौता होने के कारण उसे छोड़ना भी नहीं चाहते थे लेकिन उम्र के इस पड़ाव में बहू की कड़वी बातों से दिल छलनी हो जाता था उनका। बहु कि कही बातें जैसे घर के अंदर तो वे घूमत-फिरते रहते हैं तब उन्‍हें दर्द महसूस नहीं होता, भीतर तक कचोटता रहा था उन्‍हें, इसका अर्थ यह हुआ कि बहू सोचती है कि वो घुटने के दर्द का बहाना बनाते हैं, झूठ बोलते हैं वे, दिमाग खराब होने लगा था जयप्रकाश बाबू का ये सब सोच-सोच कर।

पिंकी अपने सास के गुजर जाने के बाद कुछ दिनों तक तो अपने ससुर का ख्‍याल ठीक ढ़ंग से रखी थी पर जैसे-जैसे जिम्‍मेदारियां बढ़ती गयी त्‍यों-त्‍यों बह ससुर से विमुख होने लगी थी। समय-समय पर यद्यपि चाय, नाश्‍ता, खाना आदि अपने ससुर को पिंकी दिया जरूर करती थी किन्‍तु बातचीत ज्‍यादा नहीं करती थी। शिशिर के ऑफिस जाने के बाद लगता ही नहीं था कि घर में कोई रहता भी है। फर्स्‍ट स्‍टैन्डर्ड में पढ़ने बाला बबलू और यूकेजी में पढ़ने वाली बबली जब स्‍कूल से डेढ़ बजे घर लौटते थे तो उन्‍हें पिंकी स्‍नान करवा कर, खाना खिला देती और फिर आराम करने के ख्‍याल से दोनों बच्‍चों को सुला देती थी। दादाजी से बच्‍चों को मिलने का समय ही नहीं मिल पाता था। बबलू जिद भी करता दादाजी से मिलने का तो पिंकी उसे समझा दिया करती कि अगर समय पर नहीं सोओगे तो शाम को ट्यूशन पढ़ने में मन नहीं लगेगा। बबलू शाम को दादाजी से मिलने की आस लिए सो जाया करता था। सोकर उठने के बाद दोनों बच्‍चों को दूध-कम्‍प्‍लान पिला कर ट्यूशन के लिए घर के पास ही रह रहे ट्यूटर के यहां भेज देती थी। बच्‍चों का ट्यूशन खत्‍म होते-होते शिशिर भी ऑफिस से आ जाया करता तब जाकर कहीं घर में रौनक लौटती थी।

अकेलापन जयप्रकाश बाबू के लिए असहनीय होने लगा था तिस पर बहू की खरी-खोटी बातें। रहने की किसी वैकल्‍पिक व्‍यवस्‍था के संबंध में लगातार सोच रहे थे जयप्रकाश बाबू इन दिनों। हालांकि अपने पुत्र शिशिर को अभी तक कुछ भी नहीं कहा था। अंदर कोलाहल के बावजूद जयप्रकाश बाबू उपर से शांत बने हुए थे। जयप्रकाश बाबू लगातार सोचे जा रहे थे कि उनके मित्रों में कौन-कौन अभी जीवित है और कहां है। उन्‍हें याद आया कि रूद्र अभी जीवित है लेकिन अमेरिका में सेटेल कर गया है। श्‍याम भी अभी है लेकिन दिल्‍ली में सेटेल है। हरिहर आजकल प्रयाग के किसी आश्रम में रहता है। हरिहर की याद आते ही जयप्रकाश बाबू को याद आया कि अरे हां, हरिहर की बड़ी बेटी का ब्‍याह तो इसी शहर में एक वकील से हुआ है। हरिहर की बेटी से मिलने का मन बना लिया था जयप्रकाश बाबू ने।

अपने पोते बबलू और पोती बबली से जयप्रकाश बाबू को बहुत मन लगता था पर बहू बच्‍चों को कहां छोड़ती थी दादा के पास। बबलू आया नहीं कि उसकी मां की आवाज पीछा करती उसके पीछे ही पड़ जाती, दादाजी फिर रह जाते थे तन्‍हा। बबली अभी छोटी थी फिर भी उसे बहुत लगाव था अपने दादा जी से। अभी से सुगडि़न होने के सारे गुण मौजूद थे बबली में, वो जब दादाजी के पास जाती तो उनकी गोद में बैठ जाती थी और दादाजी के कहने पर पास रखी दवाईयों का पैकेट अपने छोटे-छोटे हाथों से लाकर दादाजी को दे देती थी। पूरी मेहनत और ताकत से सेंटर टेबूल के एक छोर पर रखी पानी के जग को धीरे-धीरे खिसकाते हुए अपने दादाजी के पास ला देती थी, कांच का ग्‍लास उठा कर ला देती थी दादाजी के पास, इतने में मां की आवाज सुनकर अपने दादाजी से इजाजत लेकर फूदकते हुए सीढि़यां चढ़ जाती। जो थोड़ा बहुत समय बच्‍चे दादाजी के पास रहते अपनी मनपंसद कहानियां सुनते लेकिन एक भी कहानी पूरी नहीं सुन पाए थे बच्‍चे इतने सालों में।

एक दिन शाम को जयप्रकाश बाबू अपना आयरन किया हुआ कुर्ता-पायजामा निकाल कर पहन लिया, अपनी छड़ी ली और शिशिर को आवाज लगाते हुए कि बेटा मैं जरा टहल कर कुछ देर में आता हूँ। बबलू भी अपने दादाजी के साथ जाने की जिद करने लगा पर पिंकी उसे यह कह कर जाने नहीं दी कि कुछ ही देर में उसके पढ़ने का समय हो जाएगा। जयप्रकाश बाबू अकेले ही निकल पड़े अपने मित्र हरिहर की बड़ी लड़की से मिलने उसके घर। बिनिता जयप्रकाश बाबू को अपने घर के दरवाजे पर देख कर आश्‍चर्य में पड़ गयी, बोली आइए चाचा जी, आपने क्‍यों तकलीफ किया, शिशिर से कहलवा देते तो मैं ही आपसे मिलने आ जाती। थक गए थे जयप्रकाश बाबू पैदल चलकर, बैठ गए सोफे में और घुटने को सहलाते हुए बिनिता और उसके पति के हालचाल पूछने के बाद, अपने मित्र हरिहर के संबंध में जानकारी हासिल करने की जिज्ञासा जाहिर किया। बिनिता ने बताया कि पापा स्‍वस्‍थ्‍य है और अभी प्रयाग के एक आरम में रह रहे है। बिनिता ने कहा कि मैं पिछले माह पापा से मिलने प्रयाग गयी हुयी थी। पंद्रह दिन रह कर आयी हूँ, मां भी साथ गयी थी, कुछ दिन वहीं आश्रम में पापा के साथ रहेगी। बिनिता ने आश्रम का वर्णन करते हुए बताया कि चाचाजी क्‍या वातावरण है वहां आरम का। हिमालय की तराई में बसा वह आश्रम बुर्जगों का तो जैसे स्‍वर्ग है। नियम से हर काम किया जाता है। वहां कई सन्‍यासी बाबा लगभग 90-95 वर्ष के है और बिल्‍कुल स्‍वास्‍थ, उनलोगों के सामने तो हम युवा ही कहे जायेगें लेकिन स्‍टेमिना में हमलोग टीक नहीं पायेगें उन सन्‍यासी बाबाओं से। उबली हुई सब्‍जी और चपाती आश्रम के लंगर में बनायी जाती है जो शाम छह बजे तक ही वितरित होती है। जयप्रकाश बाबू बिनिता की बातें आश्‍चर्य चकित होकर बस सुने जा रहे थे। बीच-बीच में कुछ पूछ लेते थे। ऐसा लग रहा था मानो जयप्रकाश बाबू मन ही मन प्रयाग के आश्रम को अपनी कल्‍पना में देखने की कोशिश कर रहे हों। घंटे भर की बीतचीत के बाद जयप्रकाश बाबू ने जानना चाहा कि क्‍या वे भी रह सकते हैं उस आश्रम में। बिनिता ने कहा क्‍यों नहीं चाचा जी, चंदे के तौर पर कुछ रकम जमा कराने पड़ते हैं आश्रम प्रबंधन के पास। वैसे मैं पापा से विस्‍तृत बातचीत कर आपको बताउंगी, बिनिता ने जयप्रकाश बाबू को कहा। जयप्रकाश बाबू चलने को हुए और चलते-चलते बिनिता को कहा कि हरिहर से आज ही बात करना और मुझे बताना। जिज्ञासावश बिनिता ने जयप्रकाश बाबू से कही अन्‍यथा न ले चाचाजी, पर आपको अचानक आश्रम जाने की क्‍या सूझी। जयप्रकाश बाबू ने घर के माहौल को छूपाते हुए कहा, कुछ नहीं बेटी, अपने जीवन का तीन आश्रम पार कर चुका हूँ आखरी आश्रम सन्‍यास है जो प्रयाग के आश्रम में काटना चाहता हूँ। बिनिता आगे कुछ भी न पूछ सकी और नीचे तक छोड़ आयी जयप्रकाश बाबू को।

रात के आठ बजे जयप्रकाश बाबू घर पहुंचे। अभी अपने कमरे में कपड़े बदल ही रहे थे कि शिशिर आया और पूछने लगा बाबूजी आज अचानक बिनिता दीदी की याद कैसे आ गयी कि बस मिलने ही चले गए। घुटने का दर्द बढ़ गया होगा, बाबूजी, शिशिर ने पूछा। उत्‍तर नहीं देते देख, शिशिर फिर बोला, आइए बाबूजी यहां बेठिए, घुटनों पर ला तेल लगा देता हूँ। जयप्रकाश बाबू बेटे शिशिर से बात करना ही चाह रहे थे, सो सोफे में धंस गए और पांव को हाथों से सहारा देकर सामने रखी मेज पर रख दिया। शिशिर वहीं जमीन पर बैठ कर रोगन अहमद लाल तेल की मालिश घुटनों में करने ललगा। दस मिनट के मालिश से जयप्रकाश बाबू का दर्द जब कुछ कम हो गया तो जयप्रकाश बाबू ने मौका देखकर कहा, बेटा एक बात कहना चाहता हूँ, कहूँ ! आप आदेश दीजिए बाबूजी, शिशिर ने कहा। तुम इसे अन्‍यथा नहीं लेना, जयप्रकाश बाबू ने शिशिर से कहा। क्‍या बात है बाबूजी, ऐसा क्‍यों बोल रहे है, शिशिर अंदर से कांपते हुए पूछा। शिशिर अपने बाबूजी से बहुत प्‍यार करता था, शिशिर की मां जब जीवित थी तो कहा करती थी कि जब वो छोटा था तो सो सुबह उठते ही वह अपनी मां को नहीं बाबूजी को खोजता था और झट से गोद पर चढ़ जाता था तब कहीं जाकर दूध पीता था। जयप्रकाश बाबू ने कहा, बेटा मैं प्रयाग के आश्रम में अपनी बाकी की जिंदगी काटना चाहता हूँ, मैं आश्रम में हरिहर के साथ रहना चाहता हूँ। क्‍यों बाबूजी, ऐसा आपने क्‍यों सोचा, शिशिर द्रवित होकर पूछा। मैने कोई कमी कर दी, बाबूजी, जो आप मुझे, पिंकी, बबलू और बबली को छोड़कर सदा के लिए जानना चाहते हैं। नहीं बेटा, तुमने कोई कमी नहीं की, जयप्रकाश बाबू ने कहा, ये तो मेरे नसीब का दोष है। मुझसे पहले तुम्‍हारी मां मुझे छोड़कर चली गयी, मैं तो उसी दिन अधमरा हो गया था, बेटे। दरअसल, जयप्रकाश बाबू भावना की अविरल गति में बहते हुए कहा, मैं बहुत अकेला हो गया हूँ,इसमें किसी को मैं दोषी नहीं ठहरा रहा हूँ। सभी अपने-अपने कार्यों में व्‍यस्‍त रहते हैं, घर पर दिन काटना दूभर हो जाता है, बेटे। शिशिर रूआंसा हो गया था, हिम्‍मत जुटा कर उसने कहा, बाबूजी, घर पर पिंकी है, बबलू और बबली है। सभी है पर, जयप्रकाश बाबू चुप से हो गए, वे नहीं चाहते थे कि बहू को किसी भी तरह का दोष देवें क्‍योंकि ऐसा करने से उनका बेटा शिशिर अपनी पत्‍नी से झगड़ा कर बैठेगा और पति-पत्‍नी के झगड़े में बबलू और बबली की जिंदगी नरक बन जाएगी, सो उन्‍होनें बात को दूसरी दिशा में मोड़ते हुए शिशिर से कहा, देखो बेटा, बूढ़े आदमी की जरूरत किसी को नहीं होती, इसका उदाहरण है प्रायः सभी शहरों के वृद्ध आश्रमों में बूढ़ों की बढ़ती भीड़। बच्‍चे क्‍या बूढ़ों के साथ खेलेगें, नहीं न, जयप्रकाश बाबू ने प्रश्‍न किया था शिशिर से। बच्‍चों के पढ़ने-लिखने के दिन है उन्‍हें समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। रही बात बहू की तो वो भी क्‍या करेगी बेचारी, काम का बोझ उसके सर पर क्‍या कम है। सारा दिन तो काम ही करती रहती है, जयप्रकाश बाबू कहे जा रहे थे, और कामों से जब जरा फुर्सत मिलती है तो क्‍या बहू हम जैसे बूढ़ों के साथ तो समय नहीं बिता सकती, आराम भी तो करना जरूरी है। शिशिर समझ नहीं पा रहा था कि ये बाबूजी को क्‍या हो गया है, व्‍यंग्‍य कर रहे है, पर है तो सब सच, इसे काटा भी तो नहीं जा सकता है। जयप्रकाश बाबू फिर कहने लगे, बेटे तुम तो ऑफिस चले जाते हो, बच्‍चे स्‍कूल और बहू अपने कार्यों में व्‍यस्‍त हो जाती है। अब तुम्‍हीं बताओ, बेटे मैं क्‍या करूं अकेले। शरीर अब ठीक नहीं रहता कि मैं भी कहीं निकल जाउं घूमने-फिरने। प्रोभिडेन्‍ट फंड की नौकरी से रिटायर होने के बाद जब तक तुम्‍हारी मां जीवित रही, हम दोनों का समय एक-दूसरे के साथ अच्‍छा ही कटा पर जब भगवान ने तुम्‍हारी मां को मुझसे छीन लिया तो मेरे पास क्‍या रास्‍ता बच जाता है अपने अकेलेपन को दूर करने का, यही न कि मैं भी अपने मित्र के साथ रहूं, वहां आश्रम में, स्‍वास्‍थ्‍य लाभ भी होगा और अकेलापन भी दूर हो जाएगा, जयप्रकाश बाबू ने कहा।

शिशिर की हालत तो काटो तो खून नहीं। वह अपने बाबूजी से जुदा होकर नहीं जी सकता, उसे मालूम था। शिशिर आरजू-बिनती करने लगा अपने बाबूजी के सामने, नहीं बाबूजी, मैं आपको कहीं नहीं जाने दूंगा।

काफी देर से शिशिर को बाबूजी के कमरे में बात करती देख पिंकी को यह जानने की जिज्ञासा हुयी कि आखिर इतनी देर से क्‍या बात हो रही है बाप-बेटे में। पिंकी बाबूजी के कमरे के नजदीक आकर ठिठक गयी और सूना कि बाबूजी कह रहे थे कि बिनिता को प्रयाग के आश्रम के संबंध में हरिहर से बात करने को कह आया हूँ। और फिर शिशिर की आवाज सुनाई पड़ी कि, नहीं बाबूजी, मैं आपको कहीं भी जाने नहीं दूंगा। मैं कोशिश करूंगा कि आपका अकेलापन दूर कर सकूं।

पिंकी सोचने लगी कि अगर बाबूजी घर छोड़कर कहीं जाना चाहते हैं तो शिशिर उन्‍हें क्‍यों रोक रहें है। वो यह नहीं समझ पा रही थी कि एक बेटा का पिता के प्रति क्‍या भावनात्‍मक रिश्‍ता हो सकता है।

कई ऐसे पुरूष होते हैं जो अपनी पत्‍नी के प्रभाव में पिता को छोड़ देते हैं पर शिशिर ऐसे पुरूषों में से नहीं थे। शिशिर का अपने पिता के प्रति भावनात्‍मक रूझान मिसाल देने लायक था।

जयप्रकाश बाबू के प्रयाग जाने में तो वैसे भी अभी बिलंब था, बिनिता कोई खबर नहीं दी थी। जयप्रकाश बाबू अपने पुत्र के भावनाओं को देखते हुए कहा कि मैं तो तुम सभी को खुश देखना चाहता हूँ। शिशिर को अब जाकर कुछ शांति मिली।

उस रात पिंकी ने शिशिर से पूछा कि क्‍या बातें हो रहीं थी बाबूजी से। शिशिर बोला अजीब बात है अचानक बाबूजी घर छोड़कर प्रयाग स्‍थित एक आश्रम में जाना चाहते हैं जहां हरिहर चाचा कई वर्षों से रहते आ रहे है। पिंकी ने झट से कहा कि अच्‍छा ही तो है, बाबूजी को उनका मित्र मिल जाएगा और वे चैन से अपनी बाकी जिंदगी गुजार सकेगें। शिशिर इतना सून कर आग बबूला हो गया अपनी पत्‍नी पिंकी पर और डांट के लहजे में कहा, ऐसा कभी सोचना भी नहीं, मैं बाबूजी से अलग रह नहीं सकता हूँ, वो यहीं रहेगें, कहीं नहीं जाने दूंगा मैं उन्‍हें।

बबलू और बबली दूसरे कमरे से अपने मम्‍मी-पापा के कमरे में आ गए और तमाशबीन की तरह खड़े हो गए। पिंकी बात को वहीं खत्‍म कर रसोई की ओर चली गई, शिशिर टीवी ऑन कर पलंग पर बैठ कर चैनल बदलने लगा। बबलू कुछ समझदार हो गया था वो अपने पापा की गोद में जाकर बैठ गया, उसे देखकर बबली भी अपने पापा के गोद में बैठने चली गयी। दोनों को शिशिर आजू-बाजू में बिठा कर पोगो चैनल टीवी पर लगा दिया। बबलू पोगो देखते हुए अपने पापा से पूछा कि पापा दादाजी हमलोगों को छोड़कर कहां जाना चाहते हैं, अगर वे चले गए तो फिर हम लोगों को कहानियां कौन सुनायेगा, पापा ? शिशिर क्‍या जवाब दे, सच बताए या नहीं इसी उधेड़बुन में पड़ा था। उसने कहा दरअसल दादाजी का मन यहां अभी नहीं लग रहा है इसलिए अपने दोस्‍त से मिलने प्रयाग जाना चाहते हैं। बबलू ने पूछा प्रयाग कहां है पापा, हमलोगों के स्‍कूल से कितना दूर ! अरे नहीं, बेटे, प्रयाग तुम्‍हारे स्‍कूल के आसपास नहीं बल्‍कि यहां से बहुत दूर है।

समय गुजरता रहा, एक दिन बिनिता जयप्रकाश बाबू से मिलने आयी और उन्‍हें प्रयाग के आश्रम में रहने के संबंध में अपने पिता से की गयी तहकीकात का व्‍यौरा दे दी। जयप्रकाश बाबू सून कर खुश हुए कि बहुत मामूली रकम बतौर सिक्‍यूरिटी जमा करना पड़ता है आश्रम के प्रबंधन के पास। जो उन्‍हें अपने पेंशन से बचाए गए रकम से पूरा हो जाएगा। शिशिर से भी रूपए मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी। हम प्रयाग कब जा सकते हैं बिनिता, जयप्रकाश बाबू ने पूछा। बिनिता ने कहा किसी भी दिन चाचा जी। बस जाने के पहले पापा को खबर दे दें, बिनिता ने कहा।

पिंकी ने बिनिता दीदी और बाबूजी के लिए चाय और नाश्‍ता लेकर बाबूजी के कमरे में आयी और औपचारिक तौर पर बिनिता दीदी से बातचीत कर वापस लौट गयी।

एक दिन अचानक शिशिर को दो दिन के लिए अपने कंपनी के कार्य से बाहर जाना पड़ा। इस दौरान पिंकी अकेले घर के सभी कार्यों को संभाली प्रायः मौन ही रहती थी।

जयप्रकाश बाबू ने फैसला तो पहले ही कर लिया था, एक पत्र अपने पुत्र के नाम छोड़कर, उन्‍होंने पिंकी को बताया कि वे प्रयाग जा रहे है। पिंकी बस इतना ही कही थी कि ऐसी भी क्‍या जल्‍दी है बाबूजी, उन्‍हें आ जाने देते। जयप्रकाश बाबू जैसे पिंकी की बात सुने ही न थे, मुड़कर घर के दरवाजे से निकल गए, फिर कभी नहीं लौटने के लिए।

शिशिर जब लौट कर घर आया तो सबसे पहले अपने बाबूजी के बारे में पूछा, पिंकी ने बिना जवाब दिए बाबूजी का लिखा खत शिशिर को थमा दिया और कमरे से बाहर चली गयी। कांपते हाथों से शिशिर खत पढ़ने लगा, लिखा था,

प्रिय शिशिर,

हमेशा अपने परिवार के साथ खुश रहो। तुम मेरी चिंता मत करना, मैं प्रयाग जा रहा हूँ। तुम्‍हारे रहते शायद मैं घर छोड़ नहीं सकता इसलिए तुम्‍हारे पीछे मैं घर छोड़ प्रयाग के लिए निकल पड़ा। बेटे शिशिर तुम जरा भी मत घबराना, मैं प्रयाग पहुंच कर तुम्‍हें खत लिखूंगा तुमसे मिलता-जुलता भी रहूंगा।

तुम्‍हारा पिता

जयप्रकाश सहाय।

शिशिर को काटो तो खून नहीं, उसे तो लगा जैसे उसकी सांसें उखड़ रहीं हों। उसने पिंकी की तरफ क्रोध से देखा पर न जाने क्‍यों एक शब्‍द भी नहीं कहा। पिंकी तो जैसे तैयार बैठी थी शिशिर के प्रत्‍येक प्रश्‍न का जवाब देने को।

बबलू तब तक अपने पापा के कमरे में आ गया था और उसके पीछे बबली भी। बबलू अपने पापा से पूछा-पापा, मां कहती है कि दादाजी प्रयाग गये है अपने दोस्‍त से मिलने, क्‍या दादाजी अब कभी नहीं आयेंगे, पापा।

शिशिर का तो खुद ही बुरा हाल था, उसने अपने को संयमित कर, बबलू को बहुत प्‍यार किया और कहा, नहीं बेटे दादाजी आयेंगे, जरूर आयेंगे।

नहीं पापा, सच-सच कहो, डबडबायी आंखों से बबलू पूछा रहा था, हम जब बड़े हो जायेंगे और हमारी शादी हो जाएगी, तब आप भी मुझे दादाजी की तरह छोड़कर प्रयाग चले जायेंगे, पापा ?

सुन कर शिशिर पुनः एक बार कांप उठा, और बबलू को अपने आगोश में भींच लिया।

नीरा सिन्‍हा

ईमेल- nirasinha54@gmail.com

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रचनाकार: कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -89- नीरा सिन्हा की कहानी : अकेलापन
कहानी लेखन पुरस्कार आयोजन -89- नीरा सिन्हा की कहानी : अकेलापन
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