गुरुवार, 13 सितंबर 2012

प्रमोद भार्गव का हिंदी दिवस विशेष आलेख : शैक्षिक परिदृश्‍य में विस्‍थापित होती हिंदी

शैक्षिक परिदृश्‍य में विस्‍थापित होती हिन्‍दी

प्रमोद भार्गव

वर्तमान वैश्‍विक परिदृश्‍य में हिन्‍दी अनेक विरोधाभासी स्‍थितियों से जूझ रही है। एक तरफ उसने अपनी ग्राह्यता तथा तकनीकी श्रेष्‍ठता सिद्ध करके वैश्‍विक विस्‍तार पाया है और वह दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा बन गई है। इसीलिए यह जनसंपर्क और बाजार की उपयोगी भाषा बनी हुई है। इन्‍हीं कारणों के चलते इसकी अंतरराष्‍ट्रीय महत्‍ता स्‍वीकारी गई, किंतु विश्‍व पटल पर राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाशा बनने का दर्जा हिन्‍दी को अभी भी हासिल नहीं हुआ है ? जब भारतीयों और अनिवासी भारतीयों द्वारा यह सबसे ज्‍यादा 118 देशों में बोली व समझी जाने वाली भाषा है तो फिर हिन्‍दी राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषा क्‍यों नहीं बनने जा रही ? शिक्षा के क्षेत्र में हिन्‍दी व अन्‍य भारतीय भाषाओं के पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने का काम हमारे नीति - नियंताओं ने 1990 में थाईलैण्‍ड के जोमतियान शहर में आयोजित 'सबके लिए शिक्षा' (एजुकेशन फॉर ऑल) में भागीदारी व प्राथमिक शिक्षा में विश्‍व बैंक के हस्‍तक्षेप को मंजूर करके किया। शिक्षा के इस तथाकथित अंतरराष्‍ट्रीय सम्‍मेलन में भूमण्‍डलीय उदारवाद की अवधारणा के अंतर्गत भारतीय शिक्षा व्‍यवस्‍था में विदेशी अभिकरणों की घुसपैठ और एकाधिकार को बड़ी सहजता से स्‍वीकार लिया गया। इस निर्णय के दुष्‍परिणाम स्‍वरुप शैक्षिक संस्‍थाओं पर सरंचनात्‍मक व प्रशासनिक नियंत्रण के साथ - साथ नीतिगत निर्णय लेने की जवाबदेही भी विश्‍व बैंक के हाथों में चुपचाप स्‍थानांतरित हो गई।

यहीं से शिक्षा में उस दौर की शुरुआत हुई, जिसका उद्‌देश्‍य देश के लिए अच्‍छा नागरिक गढ़ने की बजाय भूमण्‍डलीय बाजार के लिए छात्रों का मानस सुनियोजित ढंग से गढ़ा जाने लगा। स्‍थानीय भाषा, बोली, परंपरागत पहचान, सांस्‍कृतिक मूल्‍य और समावेशी जीवन दृष्‍टि के स्‍थान पर अंग्रेजी, पाश्‍चात्‍य जीवन मूल्‍य और जीवन दृष्‍टि को अंगीकार किए जाने के लिए शिक्षा के जरिये दबाव बनाया जाने लगा। आर्थिक, शैक्षिक एवं सांस्‍कृतिक साम्राज्‍यवाद का यही वह विस्‍तार था, जिसने शिक्षा से हिन्‍दी ही नहीं सभी भारतीय भाषाओं की बेदखली शुरु कर दी। इधर हिन्‍दी से जुड़ी बोलियों के अस्‍तित्‍व को स्‍वतंत्र भाषा का स्‍वरुप देने की मांगे पुरजोरी से उठ रही हैं। यदि ये भाषाएं देर-सवेर आठवीं अनुसूची में शामिल हो जाती हैं तो जाहिर है अब तक जो लोग हिन्‍दी को अपनी मातृभाषा मानते रहे हैं, उनकी संख्‍या एकाएक घट जाएगी और हिन्‍दी को जिस संख्‍या बल के आधार पर हम सबसे ज्‍यादा, लगभग 75-80 करोड़ लोगों की भाषा मानते रहे हैं, वह आंकड़ा खिसक कर नीचे आ जाएगा। इसमें हैरतअंगेज यह है कि अंग्रेजी को भी आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात उठ रही है। बाजारवादी इन कुचक्रों से भाषाओं को बचाने के लिए जरुरी है कि शिक्षा से अंग्रेजी का अनिवार्य रुप से विस्‍थापन हो।

वैश्‍वीकरण के दौर में विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास की अवधारणा महत्‍वपूर्ण है। गुलामी की लंबी दासता का अभिशाप झेलने के कारण हमने अपनी ज्ञान परंपराओं को नकारा और हम पश्‍चिमोन्‍मुखी हो गए। जबकि हमारे यहां विज्ञान और गणित की श्रेष्‍ठतम‌ परंपराएं थीं। शून्‍य और दशमलव की अवधारणा दुनिया को भारत ने दी। जिस सौम्‍य तकनीक के आविष्‍कार की बात पश्‍चिमी देश करते हैं, वह भा्रमक हैं। वर्तमान में 400, 500 और 600 कांउट के महीन धागे देखने में आते हैं। लेकिन आजादी के पहले के अखण्‍ड भारत में ढाका और मुर्शीदाबाद में 2400 और 2500 काउंट का भी धागा बनता था। मात्र एक ग्रेन में 29 गज लंबा धागा। लेकिन जब फिरंगियों ने ढाका में सूती वस्‍त्रों के निर्माण का औद्योगिक कारोबार शुरु किया तो हाथों से महीन धागा कातने वाले कारीगरों के हाथों के अंगूठे काट दिए गए, जिससे उनका औद्योगिक विकास निर्बाध गति से परवान चढ़ता रहे।

भारत में इस्‍पात निर्माण की अनूठी तकनीकें उपलब्‍ध थीं। किंतु 1782 में अंग्रेजों ने भारतीय इस्‍पात की उन्‍नत तकनीक को नष्‍ट कर दिया। सस्‍ता इस्‍पात बनाने की इस तकनीक से उस समय 10 हजार लोग जुड़े हुए थे। बिहार, झारखण्‍ड और छत्‍तीसगढ़ में इस्‍पात ढालने की उन्‍नत किस्‍म की भट्‌टियां थीं। डॉ जेनर को टीकाकरण का जनक माना जाता है। 1758 में उन्‍होंने टीका की खोज की थी। जबकि नए अध्‍ययनों से पता चला है कि बंगाल में टीकाकरण की देशज तकनीक मौजूद थी। जिसकी खोज धन्‍वंतरी ने की थी। महर्षि सुश्रुत को तो आज चिकित्‍सा विज्ञानियों ने भी मान लिया है कि वे प्राचीन भारत मे शल्‍य क्रिया के विशेषज्ञ थे।

आज हम विज्ञान के क्षेत्र में लगातार पिछड़ रहे हैं। हमारे प्रधानमंत्री डॉ․ मनमोहन सिंह इस चिंता को विज्ञान सम्‍मेलनों में कई मर्तबा जता चुके हैं। क्‍या कारण है कि आज हमारे वैज्ञानिकों के पास पर्याप्‍त अंग्रेजी ज्ञान है, विज्ञान संबंधी श्रेष्‍ठतम साहित्‍य है। कंप्‍यूटरीकृत उपकरणों से भरी समृद्ध प्रयोगशालाएं हैं। बावजूद स्‍वतंत्रता प्राप्‍ति के एक दशक तक दुनिया भर में होने वाले शोधकार्यों में भारत का योगदान नौ प्रतिशत हुआ करता था, यह आज घटकर महज 2․3 प्रतिशत रह गया है। महान वैज्ञानिक सीवी रमन ने साधारण देशी उपकरणों से उपलब्‍धियां हासिल की थीं। भारत के सत्‍येंन्‍द्रनाथ बोस ने आंइस्‍टीन के साथ मिलकर काम किया था। हाल ही के ब्रहमाण्‍ड निर्माण की खोज के जिस कण को ‘हिग्‍स बोसोन' नामकरण किया गया है, वह इन्‍हीं सत्‍येंद्रनाथ बोस' के नाम पर किया गया है। मेघनाथ साहा, रामानुजम, डॉ․ होमी जहांगीर भाभा और पीसी रे, ये सब ऐसे वैज्ञानिक थे, जिन्‍होंने अपनी मातृभाषाओं में उच्‍चतर माध्‍यमिक शिक्षा हासिल की थी और अपनी लगन , अनुशीलन व शोधवृत्‍ति से वैज्ञानिक उपलब्‍धियां हासिल कीं थी। अग्‍निपुत्र डॉ․ एपीजे अब्‍दुल कलाम और अग्‍निपुत्री टेसी थॉमस ने भी प्राथमिक और माध्‍यमिक शिक्षा अपनी मातृभाषा में ली है और वे प्रक्षपास्‍त्र (मिसाइल विज्ञान) के श्रेष्‍ठतम वैज्ञानिक हैं। आज हम तकनीकी विकास में जिस परावलंबन का अनुभव कर रहे हैं, उसका सबसे प्रमुख कारण अंग्रेजी में उधार के विज्ञान और तकनीकी विषयों को पढ़ाया जाना है। यदि हम अंग्रेजी को विज्ञान, गणित व तकनीकी विषयों से बेदखल करके ज्ञानार्जन के द्वार हिन्‍दी व अन्‍य भारतीय भाषाओं के लिए खोलते हैं तो इन क्षेत्रों में नए सिरे से तरक्‍की की उम्‍मीद की जा सकती है।

अक्‍सर कहा जाता है कि हिन्‍दी के पास शब्‍द सार्म्‍थ्‍य का अभाव है। जबकि हकीकत यह है कि हिन्‍दी के शब्‍द कोष में सात लाख शब्‍दों का भण्‍डार है और अंग्रेजी केवल ढाई लाख शब्‍दों के कोष के मार्फत भारतीय भाषाओं की सिरमौर बनी बैठी है। यह देश और संविधान का दुर्भाग्‍य है कि संविधान के अनुच्‍छेद - 19, 343, 346, 347, 350 और 351 कहीं भी अंग्रेजी की अनिवार्यता का हवाला नहीं है। अनुच्‍छेद - 19 में भारत के सभी नागरिकों को ‘अभिव्यक्‍ति की स्‍वतंत्रता' का अपनी भाषा में व्‍यक्‍त करने का मूलाधिकार दिया गया है। यह अभिव्‍यक्‍ति संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किसी भी भारतीय भाषा में हो सकती है। किंतु संविधान द्वारा हासिल यह मूलाधिकार उच्‍च और सर्वोच्‍च न्‍यायालयों के दरवाजे पर जाकर ही ठिठक जाता है। यहां अधिकांश अपीलें व याचिकाएं अंग्रेजी में ही स्‍वीकार की जाती हैं। इस बावत हैरानी में डालने वाली बात यह है कि किसी भी मुकदमें के दो बिन्‍दु अहम्‌ होते हैं। एक प्रथम सूचना प्रतिवेदन (एफआईआर) और दूसरे, मामले से संबंधित फरियादी व गवाह। एफआईआर भी क्षेत्रीय भाषा में लिखी जाती है और फरियादी व गवाह भी निचली अदालतों में अपने बयान अपनी मातृभाषाओं में दर्ज कराते हैं। बावजूद उच्‍च न्‍यायालयों में अपीलें अंग्रेजी अनुवाद के साथ स्‍वीकारी जाती हैं। एक तरह से संविधान का न्‍यायवादी आग्रह अदालत की देहरी पर ही खारिज कर दिया जाता है।

यदि शिक्षा और कानून के क्षेत्र में भारतीय भाषाएं उपेक्षित रहेंगी तो वह दिन दूर नहीं, जब ऐसा दिन भी देखने में आ जाए कि अंग्रेजी को राष्‍ट्रभाषा का दर्जा देने की मांग उठने लग जाए। क्‍योंकि प्राथमिक शिक्षा से लेकर महाविद्यालयीन शिक्षा और तकनीकी शिक्षा में तो अंग्रेजी का बोलवाला शिक्षा को निजी हाथों में सौंप देने के बाद पूरी तरह होने लग गया है। राजनीति व प्रशासन के क्षेत्र में राष्‍ट्रीय और अंतरराष्‍ट्रीय संवाद की भाषा अंग्रेजी देश की आजादी के समय से ही बनी हुई है। और अब अंग्रेजी को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की बात भी उठने लगी है। हालांकि संक्रमण के इसी दौर में एक खुशी का पैगाम मध्‍यप्रदेश सरकार की ओर से आया है। हाल ही में भोपाल में खोले गए हिन्‍दी विश्‍वविद्यालय में चिकित्‍सा और अभियांत्रिकी की पढ़ाई हिन्‍दी माध्‍यम से होगी। इस पढ़ाई के साथ नौकरी की अनिवार्य शर्त भी जोड़ दी जाए तो हिन्‍दी समेत अन्‍य भारतीय भाषाएं अंग्रेजी के दुष्‍चक्र से निकल सकती हैं। जरुरी पहल यही होगी कि भारतीय भाषाओं को शिक्षा और कानून के क्षेत्र में मजबूती से स्‍थापित किया जाए। अन्‍यथा शैक्षिक परिदृश्‍य में इनके विस्‍थापन को कोई रोक नही सकता।

प्रमोद भार्गव

शब्‍दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी

शिवपुरी मप्र

मो 09425488224

फोन 07492 232007, 232008

लेखक प्रिंट और इलेक्‍ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार है।

3 blogger-facebook:

  1. हिन्‍दी की स्थिति पर गम्‍भीर आलेख। मध्‍य प्रदेश सरकार बधाई की पात्र है। काश अन्‍य राज्‍य सरकारें भी ऐसे ही कदम उठातीं।

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  2. हिन्दी का कोरा गुणगान करने की बजाए उसकी सही स्थिति को समझने व उसे उसके सही स्थान पर प्रतिष्ठित कराने के लिये कारगर उपाय सोचने से ही कुछ बात बनेगी । यह आलेख उसी दिशा में एक कदम है । धन्यवाद । ऐसे बहुत से हिन्दी-गायक देखे जाते हैं जो स्वयं अपने बच्चों को अँग्रेजी स्कूलों में पढाते हैं । आपने सही लिखा है कि आज शिक्षा का उद्देश्य अच्छा नागरिक बनाना नही है बल्कि भूमण्डलीय बाजार के लिये छात्रों को सुनियोजित ढंग से गढा जाना है । इस विडम्बना से मुक्ति पाने के उपाय कठिन जरूर हैं पर होने चाहिये ।

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  3. हिन्दी का कोरा गुणगान करने की बजाय उसकी वास्तविक स्थिति ,कारण,व निवारण खोजना अधिक सार्थक होगा । यह आलेख इसी दिसा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास है । धन्यवाद ।

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