'हिंदी दिवस' पर देवेन्द्र कुमार पाठक की एक कविता

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घर मेँ ही बेघर बनाइए !

हिँदी दिवस तो शान - बान से मनाइए।

एक दिन की बात है भले कल भूल जाइए।

हिँदी मेँ आज बोलिए माँ-पिता को नमन ;

कल डैड-ममी,हाय-हेलो ही दुहराइए

 

इस दिन के नाम धन भले सरकारी बहाएँ ;

पर राजकाज मेँ अंग्रेजी ही अपनाइए ।

कुछ ज्ञानी कहते हैँ ये हिँदी श्राद्ध दिवस है ;

चाहेँ तो आप उनके सुर मेँ सुर मिलाइए ।

 

दौड़़ाइए नीली और लाल स्याही के घोड़े ;

हर साल आँकड़ोँ मेँ तरक्की दिखाइए ।

घर का हो जोगी जोगड़ा

सिद्ध और गाँव का ;

हिंदी को अपने घर मेँ ही बेघर बनाइए।

 

कुछ हिँदी सेवी हैँ बड़े 'देवेन्द्र' दुर्हठी ;

उनको अमल की मुश्किलेँ सारी गिनाइए।

 

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5 टिप्पणियाँ "'हिंदी दिवस' पर देवेन्द्र कुमार पाठक की एक कविता"

  1. वास्तविकता तो यही है. हम चाहे कहने को जो ख लें परन्तु अंग्रेजी सर से उतरती ही नहीं. कभी रोब गांठने के लिए बोलते हैं, कभी न चाहते भी निकलती है. वाह रे मैकाले....तू ये कैसी घुट्टी पिला गया रे....?

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  2. हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...

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  3. हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...

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  4. बेनामी12:39 pm

    हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...हिंदी दिवस की बहुत बहुत शुभकामनायें ...

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  5. बहुत खूब लिखा है....यथार्थ

    उत्तर देंहटाएं

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