शनिवार, 29 सितंबर 2012

प्रभुदयाल श्रीवास्तव की बाल रचना - (बिजली के) खंभे चाचा की पाती

बच्चों के नाम खंभे चाचा की प्यार भरी पाती
प्यारे बच्चों
आपके खंभे चाचा का आप सब बच्चों को प्यार भरा नमस्कार
बच्चों आपने अनुभव किया होगा कि रात्रि को कभी कभी अचानक बिजली गुल हो जाती है और चारों ओर बिल्कुल अँधेरा हो जाता है। कुछ भी नहीं दिखाई देता है , तब आपको डर लगने लगता है और आप मम्मी मम्मी चिल्लाने लगते हैं। कोई कोई पापा को आवाज़ लगाते हैं। यदि घर में दादा दादी भी साथ रहते हैं तो आप उनको भी आवाज लगाते हैं जोर से चिल्लाते हैं। तब घर के लोग कहते हैं बच्चों डरना मत हम अभी आपके पास आते हैं। फिर कोई टार्च तलाशता है तो कोई माचिस ढ़ूंढता है और‌ कोई मोबाइल की लाइट जलाकर तुम्हारे पास आ जाता है और तुम्हें पलंग ,सोफे अथवा किसी सुरक्षित स्थान पर बिठा देता है। इतने में कोई मोमबत्ती अथवा दीपक जलाकर प्रकाश कर देता है। गांव में तो अभी भी कहीं कहीं लालटेन अथवा लेंप घरों में दिख जाते हैं। यदि मिट्टी का तेल घर में उपलब्ध रहता है तो इन लालटेनों लेंपों को जलाकर घरों में उजाला कर देते हैं। उजाला होने से बच्चों आपको आपके मम्मी ,पापा ,दादा, दादी सब लोग दिखने लगते हैं। मगर भैया इनका उजाला बहुत कम होता है। इसमे तो आप पढ़ भी नहीं सकते। बिजली की तो बात ही और है। टयूब लाईट का मज़ा तो अलग ही होता है।
बच्चों बिना बिजली के हमारा जीवन कितना कठिन हो जाता है। इसके बिना हम थोड़ी देर भी सहज़ नहीं हो पाते। आपको मालूम है कि यह बिजली कहाँ से आती है और कैसे आती है?"
"क्या कहा ,पावर हाउस से आती है"
"किंतु आपको मालूम है पावर हाउस कहां हैं? शायद सबको नहीं मालूम होगा। अच्छा यह बताओ पावर हाउस से कैसे आती है ,ट्रेन से आती है बस से आती है या पैदल आती है। "
"खंभों से आती है। "
"अरे वाह आपको तो मालूम है,मगर अकेले खंभों कैसे आयेगी, खंभों में तार लटके होते हैं और बिजली तारों में से होकर आती है। पावर हाउस तो सैकड़ों मील दूर होते हैं,जहाँ बिजली बनती है फिर खंभों पर लगे तारों के द्वारा हमारे घरों तक पहुँती है। ये खंभें जंगल पहाड़ों में अकेले खड़े हैं । सर्दी गर्मी बरसात सब सहन करते हैं और आपको बिजली पहुँचाते हैं। बच्चों मैं ही खंभा हूं और आज आपको
अपनी आप बीती और अपने हालात बताऊंगा। जब कभी कभी बिजली बंद हो जाती है तो लोग गुस्से के मारे हमें नुकसान पहुंचाने की कोशिश करते हैं। तोड़ फोड़ करते हैं। बच्चों क्या उचित है? बच्चों मैंने भी एक कविता लिखी है आपको सुनाता हूँ मज़ा आयेगा। हम कितनी कठिनाई में जीते हैं आपको इस कविता से मालूम पड़ जायेगा


बिजली के खंभे बतलाते
मेरे सिर पर तार तने जो,तुम उनसे उजियारा पाते । बिजली के खंभे बतलाते।
जिन को सिर पर ढोते ढोते,  रात दिवस मेरे यूं बीते। ये तार तुम्हें बिजली पहुँचाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
सड़क किनारे खड़े हुये हैं,खेत खेत में अड़े हुये हैं। आँधी तूफां डरा न पाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
खोदा गड्ढा खड़ा कर दिया,यूं खज़ूर सा बड़ा कर दिया। दिखें आसमां से बतियाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बल्व ,टियूब लाइट हेलोज़न, लगा लगा छेदा मेरा तन। मैं रोता और तुम मुस्कराते।
बिजली के खंभे बतलाते।
मैं सबको उजयारा देता, बदले में कुछ कभी न लेता। फिर भी मुझको लोग सताते।
बिजली के खंभे बतलाते।
मेरे दम पर खेत पल रहे , पानी वाले पंप चल रहे। मेरे कारण अन्न उगाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
चलें मशीनें चक्की चलतीं ,सब की सब बिज़ली से चलतीं। फिर भी लोग मुझे गरियाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बंद कभी बिज़ली हो जाती मेरी तो आफत‌ हो जाती मुझको देख लोग गुर्राते।
बिजली के खंभे बतलाते।
दूर दूर जंगल खेतों से आते हैं हम परदेसों से सिर पर ढोकर बिज़ली लाते ।
बिजली के खंभे बतलाते
बिजली कड़के पानी बरसे बरसाती न छाता सिर पे। सर्दी गर्मी सब सह जाते।
बिजली के खंभे बतलाते।
बिजली कभी बंद हो जाये कभी किसी को क्रोध न आये। यही बात सबको समझाते
। बिजली के खंभे बतलाते।
बताना बच्चों मेरी कविता कैसी लगी।
आपका ही प्यारा चाचा एक बिजली का खंभा


प्रभुदयाल श्रीवास्तव छिंदवाड़ा

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