कुंवर प्रीतम की कविता : सपना एक सुनहरा देखो

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सपना एक सुनहरा देखो
जिसमें सब कुछ अपना देखो
खुद ही खुद के ख्वाब में आओ
ऐसा प्यारा सपना देखो
ख्वाब पराए जब देखोगे
नींद कोई ले जाएगा
जब्त करेगा दिल तेरा औ
दर्द तुम्हें दे जाएगा

तुम झांसे में पढ़ जाओगे
प्रेम-पथिक बन बढ़ जाओगे
मेरा अनुभव बोल रहा है
जख्मी होकर रह जाओगे
रात गिनोगे तारे सारे
तारे सभी लगेंगे प्यारे
लेकिन जब तारा टूटेगा
कौन तुम्हारा दुख पूछेगा
विरह -अग्नि में जलना प्यारे
बहुत कठिन है, बहुत कठिन है
टूट चुके तारों का जुड़ना
नामुमकिन है, नामुमकिन है
प्रेम-पथिक कल रात ख्वाब में
एक नयी लय, ताल बनाना
खुद से करना प्रेम बारहा
खुद ही गाना, खुद को सुनाना
हौले-हौले रात चांदनी
प्रेम सुधा रस बरसाएगी
खुद से खुद जब प्रेम करोगे
दुनिया अपनी हो जाएगी


- कुंवर प्रीतम

(चित्र - मोहन सिंह श्याम की कलाकृति)

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1 टिप्पणी "कुंवर प्रीतम की कविता : सपना एक सुनहरा देखो"

  1. जटिल रचनाअों के जंगल में सरल सुंदर रचना - फिर भी प्रभावशाली ढंग से पाठक तक आपकी बात पहुँचाती है.
    आपकी बात अपनी जगह, पर एक बात तो है. अपने पर गुमान न हो, पर किसी और से प्यार होने से पहले, खुद से प्यार होना ज़रूरी है.

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