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तेजेन्द्र शर्मा विशेष : मधु अरोड़ा का संस्मरण - खरा-खाँटा दोस्त

(तेजेंद्र शर्मा - जिन्होंने हाल ही में अपने जीवन के 60 वर्ष के पड़ाव को सार्थक और अनवरत सृजनशीलता के साथ पार किया है. उन्हें अनेकानेक बधाईयाँ व हार्दिक शुभकामनाएं - सं.)

1996 की शाम के 5 बजे का समय. नरीमन पाइंट मुंबई के एअर इंडिया के सभागृह में इंदु शर्मा कथा सम्मान' का कार्यक्रम पूरा हाल भरा हुआ. तेजेन्द्र की धीर-गंभीर आवाज. पूरा हाल और वातावरण इतना शान्त कि सुई भी गिरे तो आवाज सुनाई दे जाये. कार्यक्रम की गरिमा को देखकर यह सोचने को विवश हो गये कि सचमुच तेजेन्द्र ने अपनी पत्नी इंदु की स्मृति को अनूठे रूप में संजोया है. तेजेन्द्र बताते हैं कि वे इंदु की मृत्यु पर रोये नहीं बल्कि धर्मवीर भारती, राहुलदेव, विश्वनाथ सचदेव, नवीन निश्चल के साथ मिलकर 'इंदु शर्मा कथा सम्मान' की योजना बनाकर उसे कार्यान्वित किया. तेजेन्द्र इंदु को आकाश में चमकते तारे के रूप में देखना चाहते थे और तेजेन्द्र के इसी सपने को हम आज 'अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान' के रूप में साकार होते देख रहे हैं, जिस पर पूरे विश्व का हिन्दी साहित्य जगत चकित और अचंभित है. इस प्रकार मानो आज भी तेजेन्द्र इंदु को यह विश्वास दिला रहे हैं - 'इंदु, तुम मर ही नहीं सकती तुम और तुम्हारा वजूद हमेशा मेरे आसपास बना रहेगा ।‘

सूरज पंजाबी हैं और तेजेन्द्र भी पंजाबी हैं. सूरज मुंबई में पंजाबी बोलने को तरस जाते थे. उन दिनों तेजेन्द्र से दोस्ती हुई तो उनसे पंजाबी में बात करके भाषाई कमी पूरी कर लेते थे. उन दिनो. तेजेन्द्र एअर इंडिया में परसर थे. जब वे मुंबई में होते थे सो कभी हम उन्हें घर बुला लेते थे. या कभी हम दोनों तेजेन्द्र के घर चले जाते थे. तेजेन्द्र अपने हंसमुख स्वभाव से कब हमारे आत्मीय और पारिवारिक मित्र बन गये, पता ही नहीं चला. उन्हीं दिनों तेजेन्द्र की कई कहानियां कैंसर पर पढ़ने को मिलीं. जब उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि वे इस भयावह बीमारी से इतने आक्रान्त हैं कि यदि वे ऐसी कहानियों के जरिये दिल हल्का न करें तो पागल हो जायेंगे. हम लोग करीब अठारह वर्षों से दोस्त है जिसमें कई बार कई तरह के उतार चढ़ाव आये परन्तु कहते हैं न कि यदि दोस्त पेट और कान के पक्के हों तो दोस्ती नहीं टूटती. तेजेन्द्र और सूरज दोनों ही कभी भी एक दूसरे के बारे में तीसरे व्यक्ति द्वारा कही गई बात को न तो तरजीह देते हैं और न ही कम्यूनिकेट करते हैं. ये आपसी विश्वास ही हम लोगों की दोस्ती को बरकरार रखे है. दरअसल तेजेन्द्र बहुत ईमानदार हैं. वे नेक इंसान पहले हैं और कथाकार बाद में. सीधी सी बात है कि एक लेखक समाज की स्थिति को, इंसान की भावना को कागज पर उकेरता है लेकिन यदि वह संवेदनशीलता सिर्फ कागज तक ही सीमित है तो उसका लेखकीय रूप अपने आप ही खारिज हो सकता है. इस परिप्रेक्ष्य में तेजेन्द्र संवेदनशील पहले हैं. वे अपनी कथनी करनी में फर्क नहीं रखते इसीलिये अच्छे कथाकार भी हैं. उनका समझदारी भरा एवं संतुलित व्यवहार उन्हें लोगों से अलग करता है. वह यह जता देता है कि उनकी सोच भी सर्वथा लीक से हटकर है. तेजेन्द्र मानवीय मूल्यों के खूब कद्रदान हैं. वे गरीबी और मजबूरी का अर्थ अच्छी तरह समझते और करते हैं. शायद इसी के तहत उन्होंने मुंबई में काफी लोगों की आर्थिक मदद की है. अगर आज भी कोई सच में जरूरतमंद है, तो उनका मदद भरा हाथ हमेशा आगे रहता है. वे कभी किसी की गरीबी एवं विवशता का मजाक नहीं उड़ाते. यही वजह है कि उनके दोस्तों के दायरे में हर तबके का बन्दा शामिल है.

तेजेन्द्र अपनी बात और वादे के पक्के हैं. यह बात अलग है कि वे किसी बात के लिये जल्दी हां नहीं करते, लेकिन यदि एक बार हां कर दी गई है तो फिर काम को अंजाम देना ही है. वे दोस्ती में कमिटमेंट और ईमानदारी को जरूरी तत्व मानते हैं. उनका मानना है कि दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते में झूठ बोलने और सफाई देने की जरूरत नहीं होती, बल्कि एक दूसरे के लिए गुंजाइश रखना होता है. जब एक बंदा नाराज हो और दूसरा शान्त रहे. हां बाद में अपनी बात सलीके से कही जाये. इस तरह मित्रता बनी रहती है. वे बोलते तो इतना नापतौलकर हैं कि लगता है कि भगवान ने उनको बहुत सोच समझकर 'तुला' राशि सौगात में दी है. बातचीत के दौरान उनकी सतर्कता, हाजिर जवाबी देखते बनती है. आप उनसे कड़ी से कड़ी बात कह दीजिये. जल्दी प्रतिक्रिया नहीं देंगे. पूछने पर कारण बताते हैं - उन्हें एअर इंडिया की नौकरी ने पूरा विश्व सैकड़ों बार घुमाया है जिसमें हजारों किस्म के लोगों से मिलना-जुलना रहा है. इसलिये हर तरह के व्यवहार सहने की आदत और कूवत है. लेकिन एक बात है कि तेजेन्द्र हमेशा तर्कों से लैस रहते हैं. उनमें अपनी बात मनवाने का पूरा माद्दा है. अपनी बात के समर्थन में इतने सटीक तर्क देते हैं कि सामने वाला हथियार डाल ही देता है. अपनी किसी गलत बात को भी सही सिद्ध करने में उन्हें महारत हासिल है. तेजेन्द्र को जितनी जल्दी गुस्सा आता है, उतनी ही जल्दी शान्त भी हो जाता है. कई बार तेजेन्द्र और सूरज के बीच बातचीत ऊंची आवाज का रूप ले लेती है और लगने लगता है कि बस अब दोनों की दोस्ती टूटने के कगार पर है, और उस पल का इंतजार रहता है कि न जाने कब तेजेन्द्र अपने सूटकेस लेकर एअरपोर्ट चल दें. लेकिन अगले 5 मिनटों में ये गरजते-बरसते समुद्र शान्त हो जाते हैं और चाय का आदेश दे दिया जाता है. फिर एक जोक सुनाकर माहौल को सामान्य बना लेते हैं. वे स्पष्टवादिता के पक्षधर हैं. इस मामले में वे किसी का कोई लिहाज नहीं करते. उन्हें जो बात गलत लगती है मुंह पर कह देते हैं.

तेजेन्द्र संबंधों की मर्यादा का पूरा ध्यान रखते हैं. हम दोनों ने कभी तेजेन्द्र को किसी की चुगली करते नहीं देखा है. कान से सुनी बात सीधे उनके पेट में पच जाती है. उनका कहना है कि संबंध या रिश्ता एक निहायत निजी वस्तु है जिसे सहेजना होता है. बेवजह रिश्तों की छीछालेदारी उनको बिल्कुल पसन्द नहीं है. वे कहते हैं कि किसी को किसी के बारे में बोलने का कोई अधिकार नहीं है. उनका मानना है कि दोस्ती जैसे पवित्र रिश्ते में दुराव छिपाव व गलतफहमी का कोई स्थान नहीं है. यदि किसी वजह से कोई गलतफहमी हो भी जाये तो बिना देरी किये अपने-अपने अहम दरकिनार करके आमने-सामने उसे दूर कर लेना चाहिये. वे कहते हैं कि दोस्ती तो आपसी समझदारी के तंतुओं से जुड़ी है जिसमें दोस्तों का दुःख-सुख साझा है और यही तो दोस्ती की सच्ची कसौटी है. तेजेन्द्र अपने शब्दों की कीमत खूब जानते हैं. बतौर उनके, जब तक हम नहीं बोलते, शब्द हमारे रहते हैं. हमारे बोलते ही शब्द दूसरे के हो जाते हैं. इसलिए सोच-समझकर जितना कम बोला जाए, अच्छा रहता है. गलतियां होने की आशंका भी कम होती है. हमारी एक मित्र का कहना है कि अब हम उम्र के ऐसे पड़ाव पर हैं जहां बने हुए रिश्तों और संबंधों को सहेजना होता है इस उम्र में नये दोस्त नहीं बनते और यदि बनते भी हैं तो टिकते नहीं हैं. सच ही तो है और स्वीकार्य भी है कि पुराने दोस्तों का रिप्लेसमेंट हो ही नहीं सकता. निश्चित रूप से तेजेन्द्र हमारे उन दोस्तों में शामिल हैं जिनका स्थान कोई नहीं ले सकता.

कई बार तेजेन्द्र की कुछ बातें खटकती भी हैं. जैसे वे अपना आत्मसम्मान तो बनाये रखना चाहते हैं, लेकिन दूसरों से एडजस्टमेंट की अपेक्षा रखते हैं. बावजूद कई ifs and buts के हमें अपना यह दोस्त बहुत प्रिय है. वे भी आखिर इंसान हैं और उनमें कमियां व खूबियां बखूबी विद्यमान हैं. वे अपने माइनस और प्लस पाइंट्स के साथ हमारे बेहतरीन दोस्त हैं. तेजेन्द्र व सूरज दोनों का मानना है कि दोस्ती कोई बनिये की दुकान सो है नहीं, जहां बात बात में नफा नुकसान देखा जाये या मीनमेख निकाली जाये. यह तो पूरी तरह से भावनात्मक एवं संवेदनात्मक रिश्ता होता है जिसमें एक दूसरे को संभालना होता है, न कि गिराना. तेजेन्द्र प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हिम्मत नहीं हारते. पूरे सकारात्मक नजरिये के साथ उनका सामना करते हैं. शायद यही वजह है कि वे जिंदगी के बड़े से बड़े हादसे को आसानी से अपने सीने पर झेल जाते हैं. उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वे आज भी जमीन से जुड़े आदमी हैं. इसलिये अपने लगते हैं. लंदनवासी होने के बावजूद जब भी भारत आते हैं, वो सभी से उसी सहजता से मिलते हैं. कहीं कोई बनावट नहीं, दुराव छिपाव नहीं. उन्हें यह बात भली भांति पता है कि हंसते बोलते इंसान को हर कोई पसंद करता है. बिसूरते बंदे को कोई नहीं पूछता, इसलिये आप उनको हमेशा हंसते, ठहाका लगाते हुए ही देखेंगे.

यही तेजेन्द्र व्यक्ति दर व्यक्ति बदल भी सकते हैं तेजेन्द्र कइयों के निकटतम दोस्त हो सकते हैं लेकिन इस निकटता में भी वे एक सुरक्षित दूरी बनाकर रखते हैं. वे किसी से इतने इनवाल्व नहीं होते कि उनको मिस करें. इस मामले में वे बहुत मेच्योर हैं. वे अपनी नजदीकी का फायदा उठाने की इजाजत किसी को नहीं देते. इनके इस तरह के व्यवहार के मामले में हम लोग उनके कायल हैं. वे अपने दोस्तों से इज्जत, अपनेपन एव बेहतर आपसी समझदारी की अपेक्षा रखते हैं. जब वे अपने मित्रों से यह सब नहीं पाते तो फिर एक सुरक्षित दूरी बना लेते हैं. दोस्ती में बेईमानी इनकी फितरत में नहीं है. एअर इंडिया की परसर की नौकरी के अनुभव इनके व्यवहार में सहज ही देखे जा सकते हैं. वे कभी किसी के मामले में बेवजह तांकझांक नहीं करते. वे सामनेवाले की चुपचाप पूरी बात सुनते हैं और पूरे धैर्य के साथ उस वक्त का इंतजार करते हैं, जब वे अपनी बात को पूरे तौर पर सही रूप में कह सकें. वे कभी बिना मांगे राय नहीं देते, लेकिन जब किसी बात पर उनसे राय ली जाती है तो फिर उस मामले को सारे आयामों, सारे दृष्टिकोणों से समझाते हुए अपनी बेबाक राय देते हैं.

अरे, एक बात तो जेहन से उतर ही गई - तेजेन्द के बारे में मशहूर है कि वे कहानी पाठ बहुत अच्छा करते हैं, लेकिन उस दौरान उन्हें किसी भी तरह की दखलंदाजी और अपनी अवहेलना कतई गवारा नहीं होती है. इसका एक नजारा जो हमने, बल्कि सभी उपस्थितों ने देखा, जरा आप भी गौर फरमाइये - दो वर्ष पूर्व मुंबई में तेजेन्द्र का कहीं कहानी पाठ होना था अध्यक्ष महोदय का देर से आना तय था. श्रोतागण आ चुके थे. अतः तेजेन्द्र ने कहानी पाठ शुरु कर दिया. वे कहानी पढ़ ही रहे थे कि अध्यक्ष महोदय का आगमन हो गया और आयोजक तपाक से अध्यक्ष की तरफ लपक लिये. तेजेन्द्र ने कहानी पढ़ना बन्द कर दिया और कहा - 'आज नहीं, फिर कभी पढ़ूंगा .' पूरा हाल सकते में था क्योंकि उनके लिये यह सामान्य बात थी कि अध्यक्ष के आने पर मंच पर इस तरह की भगदड़ मच जाती है. आयोजकों के लिये यह शर्म की बात थी. उनके बारबार अनुरोध करने पर ही तेजेन्द्र कहानी पढ़ने के लिये राजी हुए.

समय और अनुशासन के पाबन्द तेजेन्द्र का दिल आज भी अपनी पत्नी इंदु के लिये तड़पता है. उनकी हर धड़कन में आज भी इंदु पूरी शिद्दत से विद्यमान हैं. वे इंदु के साथ बिताये पलों को खूब याद करते हैं और 'अन्तर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान' के जरिये इंदु को और खुद को जिंदा रखे हैं. उन्होंने इंदु की याद में उस समय जो कविताएं रची थी, उनमें तेजेन्द्र की तड़प पूरी मार्मिकता से देखी जा सकती है –

आज रात चुपके से

नभ के एक अंधेरे कोने में

चमका एक सितारा

लगा जगाने नींद से मुझको

सितारे की आखों से मिली

आखें मेरी...

अरे! यह तो मेरा अपना चांद है

और सितारा ओझल हो चुका था ।

 

दरख्तों के साये तले

करता हूं इंतजार

सूखे पत्तों के खड़कने का

पत्ते तब भी परेशान थे

पत्ते आज भी परेशान हैं

उनके कदमों से

लिपटकर, खड़कने को

मगर सुना है

कि रुहों के चलने से

आवाज नहीं होती

 

तुम्हारी याद की इतंहा

ये है

कि हीरे से कांच तक

सोने से पीतल तक

और रद्दी से अनमोल पाक

हर शै से जुड़ी है

तेरी याद ।

जिन्दगी के तमाम थपेड़ों को झेलने के बाद भी तेजेन्द्र साहस एवं जीवन्तता की मिसाल हैं. हम अपने इस आत्मीय और पारिवारिक दोस्त को उसकी जीवटता और जुझारूपन के लिये सलाम करते हैं. तेजेन्द्र तुम ऐसे ही सशक्त और ऊर्जावान बने रहो. अपनी सशक्त रचनाओं से समाज को, हिन्दी साहित्य जगत को समृद्ध करते रहो. यही कामना है.

तो यह है हमारे आत्मीय मित्र तेजेन्द्र का मित्रता का फ़लक जो आपके सामने है

साभार-

टिप्पणियाँ

  1. 'दोस्ती कोई बनिए की दुकान तो है नहीं, जहां बात बात में नफा नुकसान देखा जाए या मीनमेख निकाली जाये। यह तो पूरी तरह से भावनात्मक एवं संवेदनात्मक रिश्ता होता है जिसमें एक दूसरे को संभालना होता है, न कि गिराना।' बेहद खूबसूरत संस्मरण। एक रौ में अपने साथ बहाता ले चला गया। शुक्रिया मधु जी। - नीलम शर्मा 'अंशु'

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  2. तेजेन्द्रजी का बहुत ईमानदारी से किया गया आकलन.उन्हें आदमी की पहचान है.तभी कहानियों में पात्र जीवंत लगते हैं.

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  3. तेजेन्द्रजी का बहुत ईमानदारी से किया गया आकलन.उन्हें आदमी की पहचान है.तभी कहानियों में पात्र जीवंत लगते हैं

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