बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

मनमोहन कसाना की कविताएं

1

बेचारे किसान

किसानों के लिए

अब तो बहुत लड़ रहे हैं,

पर न जाने क्‍यूं ?

ये ही लोग अपनी सरकार बनते ही,

गुम हो जाते हैं,

और .................................

रह जाते हैं थके हारे,

पुलिस के पिटे,

बेचारे किसान।

अपनी फसल के पैसों से ,

केस लडते................................

उसी सरकार के खिलाफ,

जो सिर्फ

चेहरा बदलती रहती है,

और.....................................

फिर डूब जाते हैं कर्ज में,

बेचारे किसान।

 

2

उम्‍मीद अब कहां ?

इन

आताताईयों और दलालों की,

मिली भगत से,

बुझ गये हैं चिराग जिन घरों के,

वहां रोशनी की ,

उम्‍मीद अब कहां ?

इन

बेहयाओं से भरे शहरों

के मुल्‍क में,

शर्म और लज्‍जा की,

उम्‍मीद अब कहां ?

क्‍योंकि..........

अवाराओं से छेड़छाड़ में,

शरीफ जो बंद होते हैं यहां,

वहां न्‍याय की,

उम्‍मीद अब कहां ?

इन

सफेद और खाकी रंग से रंगे

लुटेरों के देश में,

उनकी लूट खसोट से उजड गये हैं

यहां चमन और शांति,

वहां अब फूलों और खुशी की,

उम्‍मीद अब कहां ?

इन

पढ़े लिखों की

किस्मत अनपढ़ लिखते जहां,

वहां समानता की,

उम्‍मीद अब कहां ?

 

3

तब कहना मुझसे

पहले खुद कर जरा,

एक बार ही सही,

अंधेरे में रोशनी का चिराग

बनके तो देख,

थामने वाला ही बुझाये न अगर पहले

तब कहना मुझसे।

अमीरी गरीबी की छोड़,

जरा..

भेदभाव के खिलाफ ही,

दूसरी आजादी की लड़ाई

लड़ के तो देख,

पहले थोड़ी ही सही ,

हुंकार भर के तो देख,

घरवाले ही एक कोने में

बैठा न दे अगर

तब कहना मुझसे।।

दूसरों की छोड़............

अपनों के हक ही मांग के तो देख,

गैरों की नहीं कहता,

अपने ही मुंह बंद न कर दें अगर,

तब कहना मुझसे।।।

तेरी एक आवाज को चुप करने,

चारों तरफ से आवाज उठें न अगर,

तब कहना मुझसे।।।।

.............. दुबारा आवाज उठाने की।

 

लेखक परिचय:-मनमोहन कसाना

गांव-भौंडागांव, पोस्‍ट- जगजीवनपुर,तहसील-वैर,जिला-भरतपुर,राजस्‍थान-(321408) मोबाईल- 09672281281,09214281281
ईमेल- मनमोहन.कसाना एटदीरेट जीमेल.कोम

बलौग-एककोना.बलौगस्‍पोट.इन

संप्रति-

दैनिक भास्‍कर,राजस्‍थान पत्रिका, हिमप्रस्‍थ,रचनाकार,नव्‍या, आदि में कविता,कहानी,लघुकथा प्रकाशित। वर्तमान में देहाती संगीत पर काम।

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