रचनाकार

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका

पुस्तक समीक्षा - लघुकथा संग्रह : डोर

पुस्‍तक समीक्षा

समीक्षक - दिलीप भाटिया

रावतभाटा

---

डोर

(लघु कथा संग्रह)

लेखक-पंकज शर्मा,

19 सैनिक विहार, जण्‍डली, अम्‍बाला शहर

प्रकाशक-शुभ तारिका प्रकाशन, ।-47, शास्‍त्री कॉलोनी, अम्‍बाला छावनी-133001,

पृष्‍ठ-116, मूल्‍य रू150 (पेपर बेक), रू. 200 (सजिल्‍द)

यत्र तत्र सर्वत्र प्रकाशित होते रहने वाले पंकज की दूसरी कृति 80 लघुकथाओं के संकलन रूप में साहित्‍य जगत में आई है। सामयिक ज्‍वलंत हर विषय पर गागर में सागर सदृश ये लघुकथाएं एक सकारात्‍मक समाधानात्‍मक एवं विचारणीय संदेश देती हैं। वर्त्तमान रचनाओं से हटकर ये लघुकथाएं पाठक के मन को संतोष, तृप्‍ति एवं आशा की किरण देती हैं।

धार्मिक उत्‍सव पर कटाक्ष ‘मजाक‘ में है, ऊर्जा संरक्षण का संदेश ‘संस्‍कार‘ में है, ममता का गुण ‘समानता‘ में है, लॉटरी पर कटाक्ष ‘लाटरी‘ में है, पापा की कमी ‘मेरे पापा‘ में है, अंधेरे की हार ‘रोशनी‘ में है, संवेदनशीलता ‘काश‘ में है, रिश्‍तों की निरर्थक तुलना ‘तुलना‘ में है, रिश्‍वत पर प्रश्‍न चिन्‍ह ‘प्रतिपूर्त्ति‘ में है, घर का महत्त्व ‘ईनाम‘ में है, जीवनसंगिनी का महत्त्व ‘डोर‘ में है, शालीनता एवं मर्यादा का महत्त्व ‘कसूरवार‘ में है, मोहल्‍ले की एकता का महत्त्व ‘सुख‘ में है, इत्‍यादि।

साहित्‍यिक प्रदूषण के कीचड़ में अपने नाम को सार्थक करते हुए कमल सदृश पंकज की रचनाएं कभी ऑखें छलकाती हैं, कभी दर्पण दिखलाती हैं, कभी कटघरे में खडा करती हैं, वर्त्तमान व्‍यवस्‍था पर प्रश्‍न चिन्‍ह भी लगाती हैं, काली अमावस्‍या पर संकेत देते हुए भी पूर्णिमा का आश्‍वासन दे जाती हैं।

जन्‍मजात बायें हाथ की कमी के कारण पंकज दया, सहानुभूति की अपेक्षा नहीं करते, उनका दायां हाथ इतना सक्षम समर्थ है कि आत्‍म स्‍वाभिमानी, ऊर्जावान, कर्त्तव्‍यशील पंकज स्‍वतः ही कर्म एवं रचनाओं के माध्‍यम से शिक्षा दे जाते हैं। अल्‍पकाल में ही साहित्‍य की कई मंजिलें चढ़ने वाले पंकज कई सम्‍मानीय सम्‍मान पुरस्‍कार अर्जित कर चुके हैं, पंकज एक अच्‍छे साहित्‍यकार हैं, पर साथ ही पंकज एक उत्‍कृष्‍ट इन्‍सान हैं, पाठक उन्‍हें सम्‍मान देते हैं, पत्रिकाओं के सम्‍पादक रचनाओं के लिए अनुरोध करते हैं, यही पंकज के लेखन की सार्थकता है।

पंकज की यह कृति प्रत्‍येक सत्‍साहित्‍य प्रेमी को अवश्‍य पढ़नी चाहिए। पंकज की तीसरी कृति के लिए प्रतीक्षा अधिक नहीं करनी पड़े, यही मंगल शुभकामना है

--

विषय:
रचना कैसी लगी:

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

[blogger][facebook]

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget