शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

श्याम गुप्त का आलेख - अगीत कविता विधा.... कला पक्ष....

अगीत कविता विधा.... कला पक्ष....


                                                                    (डॉ. श्याम गुप्त)
यद्यपि अगीत रचनाकार शब्द-विन्यास, अलंकार, रस, लक्षणाओं आदि काव्य के कलापक्ष पर अधिक आधारित नहीं रहता क्योंकि अगीत विधा--क्रान्ति व रूढिवादिता के विरुद्ध से उपजा है तथा संक्षिप्तता, विषय वैविध्य, सहज भाव-सम्प्रेषणता व अभिधेयता से जन-जन संप्रेषणीयता उसका मुख्य लक्ष्य है। तथापि छंद-विधा व गीत का समानधर्मा होने के कारण अगीत में भी पर्याप्त मात्रा में आवश्यक रस, छंद, अलंकार व अन्य काव्य-गुण सहज रूप में स्वतः ही आ जाते हैं


वस्तुतः रचना की ऊंचाई पर पहुँच कर कवि सचेष्ट लक्षणा व अलन्कारादि विधानों का परित्याग कर देता हैरचना के उच्च भाव स्तर पर पहुँच कर कवि अलन्कारादि लक्षण विधानों की निरर्थकता से परिचित हो जाता है तथा अर्थ रचना के सर्वोच्च धरातल पर पहुँच कर भाषा भी सादृश्य-विधान के सम्पूर्ण छल-छद्मों का परित्याग कर देती हैतभी अर्थ व भाव रचना की सर्वोच्च परिधि दृश्यमान होती है। अगीत रचनाकार भी मुख्यतः भाव-संपदा प्रधान रचनाधर्मी होता है अतः सोद्देश्य लक्षणादि में नहीं उलझता। परन्तु जहां काव्य है वहाँ कथ्य में कलापक्ष स्वतः ही सहज वृत्ति से आजाता है, क्योंकि कविता व काव्य-रचना स्वयं ही अप्रतिम कला है। इस प्रकार " अमित अरथ आखर अति थोरे " की अभिधेयता के साथ-साथ अगीत काव्य में ..रस, छंद, अलंकार , लक्षणादि सभी काव्य-गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। प्रमुख अगीत रचनाकार व अगीत पर विभिन्न साहित्यिक-शास्त्रीय आलेखों के लेखक श्री सोहन लाल सुबुद्ध , श्री पार्थो सेन, डा रंगनाथ मिश्र 'सत्य' एवं डा श्याम गुप्त आदि द्वारा अगीत विधा के विभिन्न भाव व कला पक्षों पर विविध आलेखों द्वारा समय समय पर प्रकाश डाला जाता रहा है। उदाहरणार्थ ----सोहन लाल सुबुद्ध द्वारा---'अगीत काव्य में अलंकार योजना ' व  "काव्य के गुण व अगीत '...'हिन्दी काव्य में नारी चित्रण'...डा सत्य के अगीत; एक काव्यशास्त्रीय दृष्टि '.....पार्थोसेन द्वारा..'अगीत कविता व वैचारिक क्रान्ति'.....तथा मेरे द्वारा ( डा श्याम गुप्त)...'विचार क्रान्ति व अगीत कविता'...'समष्टि व जन सामान्य हित काव्य गुण '..एवं 'हिन्दी साहित्य की विकास यात्रा में निरालायुग से आगे विकास की धारा है अगीत '...आदि।


काव्य का कला पक्ष काव्य की शोभा बढाने के साथ साथ सौन्दर्यमयता, रसात्मकता व आनंदानुभूति से जन-जन रंजन के साथ विषय-भाव की रुचिकरता व सरलता से सम्प्रेषणता बढ़ाकर अंतर की गहराई को स्पर्श करके दीर्घजीवी प्रभाव छोडने वाला बनाता है। परन्तु अत्यधिक सचेष्ट लक्षणात्मकता भाषा व विषय को बोझिल बनाती है एवं विषय व काव्य जन सामान्य के लिए दुरूह होजाता हैएवं उसका जन-रंजन व वास्तविक उद्देश्य पीछे छूट जाता है , पाण्डित्याम्बर व बुद्धि-विलास प्रमुख होजाता हैअतः सहज व समुचित कलात्मकता अगीत का उद्देश्य है


शिल्पसौन्दर्य, शब्दसौन्दर्य व भाव सौंदर्य ( रस, छंद, अलंकार योजना ) द्वारा अर्थ-सौंदर्य की उत्पत्ति (अभिधा, लक्षणा, व्यंजना ) का उपयोग करके अर्थ-प्रतीति द्वारा विषय के भाव व विषय बोध को पाठक के मन में रंजित किया जाता है। इस प्रकार काव्य का कलापक्ष प्रमुखतः तीन वर्गों में विभाजित किया जा सकता है।


(अ ) रस, छंद, अलंकार योजना --शब्द-शिल्प व अनुभूति सौंदर्य।
(ब) काव्य के गुण --माधुर्य , ओज , प्रसाद ---अर्थ व भाव सौंदर्य।
(स्) कथ्य-शक्तियाँ ---अभिधा , लक्षणा , व्यंजना ----शब्द व अर्थ-प्रतीति।


अगीत के कलापक्ष पर समुचित प्रकाश डालने के लिए उपरोक्त तीनों वर्गों पर संक्षिप्त व सोदाहरण विवरण समीचीन होगा।


(अ) अगीत में रस, छंद अलंकार योजना ----
अगीत कविता में लगभग सभी रसों का परिपाक समुचित मात्रा में हुआ है। सामाजिक एवं समतामूलक समाज के उदेश्य प्रधान विधा होने के कारण यद्यपि शांत, करुणा, हास्य ..रसों को अधिक देखा जाता है तथापि सभी रसों का उचित मात्रा में उपयोग हुआ है।


वीर रस का उदाहरण प्रस्तुत है ....
" हम क्षत्री है वन में मृगया,
करना तो खेल हमारा है।
तुम जैसे दुष्ट मृग-दलों को,
हम सदा खोजते रहते हैं।
चाहे काल स्वयं सम्मुख हो,
नहीं मृत्यु से डरते हैं हम।| "                           ---शूर्पणखा काव्य उपन्यास से ( डा श्याम गुप्त )


रौद्र रस का एक उदाहरण पं. जगत नारायण पांडे के महाकाव्य सौमित्र गुणाकर से दृष्टव्य करें --
" क्रोध देखकर भृगु नायक का,
मंद हुई गति धारा-गगन की;
मौन सभा मंडप में छाया।
बोले,' कौन दुष्ट है जिसने -
भंग किया पिनाक यह शिव का ;
उत्तर नहीं मिला तो तत्क्षण ,
कर दूंगा निर्वीर्य धारा को।| "


श्रृंगार रस का एक उदाहरण देखें -----
" नैन नैन मिल गए सुन्दरी,
नैना लिए झुके भला क्यों ;
मिलते क्या बस झुक जाने को।"                        ----त्रिपदा अगीत ( डा श्याम गुप्त )


भक्ति रस ---का एक उदाहरण प्रस्तुत है....
" मां वाणी !
मुझको ज्ञान दो
कभी न आये मुझमें स्वार्थ ,
करता रहूँ सदा परमार्थ ;
पीडाओं को हर दे मां !
कभी न सत्पथ से-
मैं भटकूं
करता रहूँ तुम्हारा ध्यान। "                         ------डा सत्य


हास्य कवि व व्यंगकार सुभाष हुडदंगी का एक हास्य-व्यंग्य प्रस्तुत है-----
" जब आँखों से आँखों को मिलाया
तो हुश्न और प्यार नज़र आया;
मगर जब नखरे पे नखरा उठाया ,
तो मान यूँ गुनुगुनाया --
'कुए में कूद के मर जाना,
यार तुम शादी मत करना।"


वैराग्य, वीभत्स व करूण रस के उदाहरण भी रंजनीय हैं-----
" मरणोपरांत जीव,
यद्यपि मुक्त होजाता है ,
संसार से , पर--
कैद रहता है वह मन में ,
आत्मीयों के याद रूपी बंधन में ,
और होजाता है अमर। "                       ----डा श्याम गुप्त


" जार जार लुंगी में,
लिपटाये आबरू ;
पसीने से तर,
भीगा जारहा है-
आदमी।"                                        ----धन सिंह मेहता


" केवल बचे रह गए कान,
जिव्हा आतातायी ने छीनी ;
माध्यम से-
भग्नावशेष के ,
कहते अपनी क्रूर कहानी। "              ------गिरीश चन्द्र वर्मा 'दोषी '


" झुरमुट के कोने में,
कमर का दर्द लपेटे
दाने बीनती परछाई;
जमान ढूँढ रहा है
खुद को किसी ढेर में। "                    ----जगत नारायण पांडे


अगीत के विविध छंद व उनका रचना विधान का वर्णन विस्तृत रूप से पृथक आलेख द्वारा किया गया है ( देखें ..रचनाकार पर ४ अक्टूबर २०१२ का आलेख ‘अगीत कविता के विविध छंद व उनका रचना विधान’)। लय व गति काव्य-विधा के अपरिहार्य तत्व व विशेषताएं हैं जो इसे गद्य-विधा से पृथक करती है । यति --काव्य को संगीतमयता के आरोह-अवरोह के साथ कथ्य व भाव को अगले स्तर पर परिवर्तन की स्पष्टता से विषय सम्प्रेषण को आगे बढाती है। तुकांत बद्धता ..काव्य के शिल्प सौंदर्य को बढाती है परन्तु संक्षिप्तता, शीघ्र भाव सम्प्रेषणता व अर्थ प्रतीति का ह्रास करती है। अतः वैदिक छंदों व ऋचाओं की अनुरूपता व तादाम्य लेते हुए अगीत मूलतः अतुकांत छंद है। हाँ लय व गति इसके अनिवार्य तत्व हैं तथा तुकांत, यति, मात्रा व गेयता का बंधन नहीं है। अगीत वस्तुतः अतुकांत गीत है


अलंकार , साहित्य को शब्द-शिल्प व अर्थ-सौंदर्य प्रदान करते हैं। साहित्य में आभूषण की भांति प्रयुक्त होते हैं। यद्यपि प्रत्येक वस्तु, भाव व क्रिया के अनिवार्य गुण-रूप-तत्व ...." सत्यं शिवम् सुन्दरं " के अनुसार सौंदर्य अर्थात अलंकरण काव्य का अंतिम मंतव्य होना चाहिए , तथापि अलंकारों के योगदान को नकारा नहीं जा सकता। अतः अगीत में भी पर्याप्त मात्रा में अलंकार प्रयुक्त हुए हैं। मुक्य-मुख्य शब्दालंकार व अर्थालंकार के उदाहरण प्रस्तुत हैं।


अनुप्रास अलंकार ----
" आधुनिक कविता की
सटीली, पथरीली, रपटीली -
गलियों के बीच ,
अगीत ने सत्य ही
अपना मार्ग प्रशस्त किया है ;
अनुरोधों, विरोधों, अवरोधों के बीच
उसने सीना तान कर जिया है। "                      ---- पाण्डेय रामेन्द्र ( अन्त्यानुप्रास )


" शिक्षित सज्जन सुकृत संगठित
बने क्रान्ति में स्वयं सहायक। "                   ----- डा श्याम गुप्त (शूर्पणखा खंडकाव्य से )


उपमा अलंकार -----
" बिंदुओं सी रातें
गगन से दिन बनें ,
तीन ऋतु बीत जाएँ ,
बस यूँही। "                                                 -----मंजू सक्सेना


" बहती नदी के प्रबल प्रवाह सा,
उनीदी तारिकाओं के प्रकाश सा,
कभी तीब्र होती आकांक्षाओं सा,
मैदानों पर बहती समतल धारा सा ,
नन्हे शिशुओं के तुतले बोलों सा ,
यह तो जीवन है । "                                    -----स्नेह-प्रभा ( मालोपमा )


रूपक अलंकार ------
" खिले अगीत गीत हर आनन्,
तुम हो इस युग के चतुरानन।"                     ---- अनिल किशोर शुक्ल 'निडर'


" कामिनी के पुलके अंग् अंग्,
नयन वाण आकर हैं घेरे। "                         ---- सोहन लाल सुबुद्ध


" पायल छनका कर दूर हुए,
हम कुछ ऐसे मज़बूर हुए ;
उस नाद-ब्रह्म मद चूर हुए।"                       --- त्रिपदा अगीत ( डा श्याम गुप्त )


यमक अलंकार -----
" जब आसमान से
झांका चाँद,
याद आई, आँखें डबडबाईं ,
आंसुओं में तैरने लगा
एक चाँद। "                                   

--तथा ..


" सोना,
रजनी में सजनी में सुहाता है,
मन को लुभाता है।
अत्यधिक सोना घातक है ,
कलयुग में सोना पातक है। "                         ----सुरेन्द्र कुमार वर्मा


उत्प्रेक्षा अलंकार ------
" यह कंचन सा रूप तुम्हारा
निखर उठा सुरसरि धारा में;
अथवा सोनपरी सी कोई,
हुई अवतरित सहसा जल में ;
अथवा पद वंदन को उतरा,
स्वयं इंदु ही गंगाजल में। "                               ----डा श्याम गुप्त


" क्या ये स्वयं काम देव हैं,
अथवा द्वय अश्विनी बंधु ये।"                          ---- शूर्पणखा खंड-काव्य से


अगीत में श्लेष अलंकार के उदाहरण की एक झलक देखें -----
" दीपक देता है प्रकाश ,
स्वयं अँधेरे में रहता है।
सुख-दुःख सहकर ही तो नर,
औरों को सुख देता है। "                                     ---राम प्रकाश राम


"चलना ही नियति हमारी है,
जलना ही प्रगति हमारी है।"                              ----डा सत्य


संशय या संदेह अलंकार ------
" सांझ की गोधूली की बेला में ,
प्रफुल्लित चांदनी में ;
अमृत की अभिलाषा लिए ,
निहार रही थी एक टक,
झुरमुट में चकवा-चकवी का मिलन ;
प्रिया प्रियतम से,
मोह का पान कर रही थी ;
या यह कोरी कल्पना थी। "                                   ----- घनश्याम दास गुप्ता


अतिशयोक्ति अलंकार -----
' नव षोडशि सी इठला करके ,
मुस्काती तिरछी चितवन से।
बोली रघुबर से शूर्पणखा ,
सुन्दर पुरुष नहीं तुम जैसा ;
मेरे जैसी सुन्दर नारी,
नहीं जगत में है कोई भी।|"                          ---- डा श्याम गुप्त ( शूर्पणखा खंड-काव्य से )


मुख्यतया अंग्रेज़ी साहित्य के अलंकार --मानवीकरण व ध्वन्यात्मक अलंकार भी देखें...
" असफलता आज थक गयी है ,
गुजरे हैं हद से कुछ लोग ,
उनकी पहचान क्या करें ?
अमृत पीना बेकार,
प्राणों की चाह है अधूरी ,
विह्वलता और बढ़ गयी है।"                        ------डा सत्य ( मानवीकरण )


" नदिया मुस्कुराई
कल कल कल खिलखिलाई ,
फिर लहर लहर लहराई।"                            ----- डा श्याम गुप्त -प्रेम काव्य से-ध्वन्यात्मक )


पुनुरुक्ति प्रकाश व वीप्सा अलंकार ------
" श्रम से जमीन का नाता जोड़ें ,
श्रम जीवन का मूलाधार ,
श्रम से कभे न मानो हार ;
श्रम ही श्रमिकों की मर्यादा,
श्रम के रथ को फिर से मोड़ें। "                            ------ डा सत्य ( पुनुरुक्ति प्रकाश )


" एक रबड़ ,
खिंची खिंची खिंची -
और टूट गयी ;
ज़िन्दगी रबड़ नहीं ,
तो और क्या है ? "                                            -----राजेश कुमार द्विवेदी ( वीप्सा )


अन्योक्ति,  स्मरण,  वक्रोक्ति,  लोकोक्ति,  असंगति व अप्रस्तुत अलंकार ------
" बालू से सागर के तट पर ,
खूब घरोंदे गए उकेरे।
वक्त की ऊंची लहर उठी जब,
सब कुछ आकर बहा ले गयी।
छोड़ गयी कुछ घोंघे सीपी,
सजा लिए हमने दामन में।| "                       ----- प्रेम काव्य से ( अन्योक्ति )


" अजब खेल हैं,  मेरे बंधु !
गड्ढे तुम खोदते हो ,
गिरता मैं हूँ ;
करते तुम हो-
भरता मैं हूँ।
फिर भी न जाने कौन सी डोर ,
खींच लेजाती है तुम्हारे पास ,
मेरे अस्तित्व को;
साँसें तुम्हारी निकलती हैं,
मरता मैं हूँ। "                                              ------ मंगल दत्त द्विवेदी 'सरस' ( असंगति


" घिर गए हैं नील नभ में घन,
तडपने लग गए तन मन ;
किसी की याद आई है,
महक महुए से आयी है। "                             ---- डा श्रीकृष्ण सिंह 'अखिलेश' ( स्मरण )


" आँख मूद कर हुक्म बजाना,
सच की बात न मुंह पर लाना ;
पड जाएगा कष्ट उठाना। "                          ---- डा श्याम गुप्त ( वक्रोक्ति )


" ओ मानवता के दुश्मन !
थोड़े से दहेज के लिए,
जलादी प्यारी सी दुल्हन;
ठहर ! तुझे पछताना पडेगा,
ऊँट को पहाड़ के नीचे
आना पडेगा। "                                         ----- विजय कुमारी मौर्या ( लोकोक्ति )


" मन के अंधियारे पटल पर ,
तुम्हारी छवि,
ज्योति-किरण सी लहराई;
एक नई कविता,
पुष्पित हो आई। "                                  ------ डा श्याम गुप्त ( अप्रस्तुत )


( ब) काव्य के गुण और अगीत ----
आचार्य मम्मट के अनुसार काव्य के गुण उसके अपरिहार्य तत्व हैं । अलन्कारादि युक्त होने पर भी गुणों से हीं काव्य आनंददायी नहीं होता। ये काव्य की आतंरिक शोभाकारक हैं। काव्य के उत्कर्ष में मुख्य तत्व होते हैं। यद्यपि काव्याचार्यों के विभिन्न मत हैं परन्तु मूल रूप में काव्य के समस्त गुणों का मुख्यतः तीन गुणों में समावेश करके वर्णन किया जाता है। ये हैं---माधुर्य, ओज व प्रसाद ---ये गुण चित्त की वृत्तियों को को विषय-भावानुसार प्रकट व प्रदीप्त करते हैं। माधुर्य --- का सम्बन्ध आह्लाद से है जिसमें अंतःकरण आनंद से द्रवित हो जाता है। ओज -- से चित्त दीप्त, प्रदीप्त व सम्पूर्ण होकर जोश , आवेग व ज्ञान के प्रकाश से भर उठाता है। प्रसाद गुण --का सम्बन्ध व्याकपत्व, विकासमानता व प्रफुल्लता से है। अर्थात जो श्रवण मात्र से ही अपना अर्थ प्रकट कर दे। आचार्य विश्वनाथ के अनुसार --" स प्रसाद: समस्तेषु रसेषु रचनाषु च "..अर्थात प्रसाद गुण समस्त रसों व रचनाओं का सहज सामान्य व आवश्यक गुण है।


अगीत काव्य मुख्यतया: प्रसाद गुण द्वारा सहज भव-संप्रेषणीयता युक्त विधा है , परन्तु सामाजिक सरोकारों से युक्त होने के कारण तीनों ही गुण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। कुछ उदाहरण प्रस्तुत हैं-----माधुर्य गुण युक्त कुछ अगीत देखिये ------
" सपने में मिलने तुम आये,
धीरे से तन छुआ,
आँखें भर आईं , दी दुआ;
मौन स्तब्ध साक्षात हुआ ,
सहसा विश्वास जमा -
मन को तुम आज बहुत भाये। "                        ------ डा सत्य


" विविध रंगकी सुमन वल्लरी ,
विविध रंग की सुमनावालियाँ ;
एवं नव पल्लव लड़ियों से,
सीता ने विधि भांति सजाया।
हर्षित होकर लक्ष्मण बोले,
'करें पदार्पण स्वागत है प्रभु ! "                       ---- शूर्पणखा खंड काव्य से


ओज --अर्थात नवीन उद्बोधन, नवोन्मेष, उत्साह , ओज से पाठक का मन ज्ञानवान, स्फूर्त व दीप्त होजाय। वाणी, मन , शरीर , अंतस, बुद्धि व ज्ञान से व्यक्ति प्रदीप्त हो उठे -----
" रक्त बीज भस्मासुर ,
रावण अनेक यहाँ ;
शकुनी दुर्योधन-
कंस द्वार द्वार पर ;
चाहिए एक और -
नीलकंठ आज फिर। "                      -----श्रीकृष्ण द्विवेदी 'द्विजेश'


" नव युग का मिलकर
निर्माण करें ,
मानव का मानव से प्रेम हो ,
जीवन में नव बहार आये।
सारा संसार एक हो,
शान्ति औए सुख में-
यह राष्ट्र लहलहाए "                                ----डा सत्य


प्रसाद गुण के कुछ उदाहरण देखें। सीधी-सीधी बात मन के अंदर तक विस्तार करती हुई, अर्थ- प्रतीति देती है----
" तुमे मिलने आऊँगा,
बार बार आऊँगा।
चाहो तो ठुकरादो,
चाहो तो प्यार करो।
भाव बहुत गहरे हैं,
इनको दुलरालो। "                                 --- डा सत्य


" संकल्प ले चुके हम,
पोलियो मुक्त जीवन का,
धर्म और आतंक के ,
विष से मुक्ति का,
संकल्प भी तो लें हम। "                       ---जगत नारायण पांडे


(स्) अभिधा, लक्षणा, व्यंजना -----
कथ्य की तीन शक्तियाँ, कथ्यानुसार अर्थ-प्रतीति व भाव उत्पन्न करती हैं। कवि अपनी कल्पना शक्ति से कथ्य में विशिष्ट लक्षणा, शब्द व अर्थगत लाक्षणिकता उत्पन्न कर सकता है जो अर्थ-प्रतीति को रूपकों आदि द्वारा लाक्षणिकता देकर कथ्य-सौंदर्य प्रकट करता है ( लक्षणा ) अथवा दूरस्थ भाव या अन्य विशिष्ट व्यंजनात्मक भाव देकर कथ्य में दूरस्थ सन्देश, छद्म-सन्देश या कूट-सन्देश या अन्योक्तियों द्वारा विशिष्ट अर्थ-प्रतीति से शब्द या भाव व्यंजना उत्पन्न करके कथ्य सौंदर्य बढाता है (व्यंजना ); अथवा वह सीधे सीधे शब्दों में अर्थवत्तात्मक भाव-कथ्य का वर्णन कर सकता है ताकि विषय की क्लिष्टता, अर्थ-प्रतीति में बाधक न बने और सामान्य से सामान्य जन में भी भाव-सम्प्रेषण किया जा सके (अभिधा )।
यद्यपि अगीत मुख्यतया अभिधेयता को ग्रहण करता है तथापि विविध विषय-बोध के कारण व अगीत कवियों के भी प्रथमतः गीति व छंद विधा निपुण होने के कारण लक्षणाये व व्यंजनाएं भी पर्याप्त मात्रा में सहज ढंग से पाई जाती हैं। यह प्रस्तुत उदाहरणों से और भी स्पष्ट होजाता है --


लक्षणात्मक अगीत ----
" शरद पूर्णिमा सुछवि बिखेरे ,
पुष्पधन्वा शर संधाने,
युवा मन पर किये निशाना;
सब ओर छागई प्रणय गंध
कामिनी के पुलके अंग् अंग् ,
नयन वाण आकर हैं घेरे। "                       ---- सोहन लाल सुबुद्ध ( अर्थ लक्षणा )


" स्वप्नों के पंखों पर,
चढ कर आती है ;
नींद-
सच्ची साम्यवादी है। "                             --- डा श्याम गुप्त ( शब्द लक्षणा )


" निजी स्वार्थ के कारण मानव ,
अति दोहन कर रहा प्रकृति का।
प्रतिदिन एक ही स्वर्ण अंड से ,
उसका लालच नहीं सिमटता।
चीर कलेजा एक साथ ही ,
पाना चाहे स्वर्ण खजाना। "                     ---- सृष्टि महाकाव्य से   (भाव लक्षणा )


व्यंजनात्मक अगीतों के उदाहरण प्रस्तुत हैं.-----
" तुमने तो मोम का ,
पिघलना ही देखा है।
पिघलने के भीतर का,
ताप नहीं देखा।"                             -----डा सरोजिनी अग्रवाल


" गीदड़ों के शोर में,
मन्त्रों की वाणी ,
दब गयी है ;
भीड़ की चीखों में,
मधुरिम् स्वर,
नहीं मिलते। "                               ----डा मिथिलेश दीक्षित


अभिधात्मक अगीतों के निम्न उदाहरण पर्याप्त होंगे -----
" कुछ नेताओं का,
वजूद कैसा;
स्वयं के लिए ही जीते ;
सत्य तुम बिलकुल रीते। "                       ---- क्षमा पूर्णा पाठक


" मेरी मां ने मुझे पढ़ाया ,
मां न चाहती क्या पढ़ पाता ;
आजीवन पछताता रहता।
मेरे हिस्से का श्रम करके,
उसने ही स्कूल पठाया ,
मुझको रचनाकार बनाया। "                    --- सोहन लाल सुबुद्ध


" नीम ,
जिसमें गुण है असीम ;
मानव हितकारी ,
हारता अनेक बीमारी ;
द्वार की शोभा है नीम ,
पारिवारिक हकीम है नीम। "                       ----- सुरेन्द्र कुमार वर्मा ( मेरे अगीत छंद से )


" गीत मेरे तुमने जो गाये,
मेरे मन की पीर अजानी ,  
छलक उठी आंसू भर आये।
सोच रहा बस जीता जाऊं ,
गम् के आंसू पीता जाऊं।
गाता रहूँ गीत बस तेरे ,
बिसरादूं सारे जग के गम् । "                     --- प्रेम काव्य से ( डा श्याम गुप्त )


प्रस्तुति- -----डा श्याम गुप्त

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