अनुराग तिवारी की कविता - सागर

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सागर

रेतीले तट पर खड़ा हुआ,

मैं हतप्रभ सम्‍मुख देख रहा 

है दृष्‍टि जहाँ तक जाती दिखता,

नीली लहरों का राज वहाँ।

उस पार उमड़ती लहरों का

आलिंगन करता नभ झुक झुक कर।

 

रवि बना साक्षी देख रहा

करता किरणों को न्‍योछावर।

सागर की गहराई कितनी,

कितने मोती, माणिक, जलचर

कितनी लहरें बनती, मिटतीं,

बेला से टकरा टकरा कर।

 

लहरों की गोदी में खेलें,

नौकाएँ मछुआरों की।

आती जाती लहरें तट का

पद प्रक्षालन कर जातीं।

सिंधु लहरें

क्‍यूँ विकल हैं,

सिंधु लहरें,

खोज में,

अपने किनारों की।

 

नीली नीली,

वेग़वती,

लहरें उठतीं गिरतीं,

उन्‍मादग्रस्‍त हो

दौड़ लगातीं,

तट की ओर।

करती विलास,

उन्‍मुक्‍त हास,

गुंजायमान

चँहु ओर।

 

दूर कर

सब विकार,

हो जातीं

श्‍वेत फेनिल,

चरण धोक़र

समा जातीं

हैं किनारों में।

 

संसार सागर की

लहर हम

काश, हम भी

खोज पाते,

अपने किनारे को।

मिल पाता

विश्राम।

--

-सी ए. अनुराग तिवारी

5-बी, कस्‍तूरबा नगर,

सिगरा, वाराणसी- 221010

मो. ः 9415694329

--

संक्षिप्‍त परिचय

नाम ः अनुराग तिवारी

पिता का नाम ः स्‍व. राम प्‍यारे तिवारी

माता का नाम ः स्‍व. सुशीला देवी

जन्‍म तिथि ः 09.05.1970

जन्‍म स्‍थान ः हमीरपुर, उ.प्र.

शिक्षा ः शिक्षा वाराणसी में हुई। काशी हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय से बी. काम. उत्‍तीर्ण

करने के बाद चार्टर्ड एकाउन्‍टेन्‍सी की परीक्षा उत्‍तीर्ण की और तब से

बतौर सी. ए. प्रैक्‍टिस कर रहा हूँ।

लेखन ः साहित्‍य के प्रति मेरी रुचि बचपन से ही रही है और तभी से कविताएँ

लिखता आ रहा हूँ। मेरी कविताएँ कई पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो

चुकी हैं।

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