रविवार, 25 नवंबर 2012

सुरेश सर्वेद की छत्तीसगढ़ी कहानी - मतलाहा पानी

कहानी -

सुरेश सर्वेद

मतलाहा पानी

गाँव म जब ले राजनीति अपन पांव धरिस। गाँव के गाँव जम्मों निर्दयी अउ निष्ठुर होगे। लोक लाज के बात बिसर गे। सुवारथ अउ पाखण्ड अपन अउकात म आ गे। समारु ल राजनीति ले का लेना - देना पर गांव वाले मन ओकर बिगाड़ करे के निश्चय कर ले रहै। दू पारा के लड़ई म ओल पेराय लगीस। सरपंची चुनाव म जेन रामधीन चुनइस उहू समारु ल बदमाश कहाय अउ जउन मंगल हारिस उहू ओला बदमास कहय। समारु के परिवार मं रहय छै सदस्य छै बोट ले जीतिस रामधीन अउ छै बोट ले हारिस मंगल। मंगल के कहना रहय ये सबो वोट रामधीन ल मिलिस अउ रामधीन के कहना रहय ये छै बोट दीवान के परिवार के आय।

दीवान, दीवान रहिस। राजनीति के पक्का खेलइया। कभू ए डहर कभू ओ डहर। जेन तरफ परला भारी रहय उही म समा जाय। दीवान के चरितर ल सब जाने पर ओकर मेर बोले के अउ आदमी ल पटाया के अतेक गुन रहय के अपनेच बात ल सच कहवाय ले नइ चुके। सही सही बात तो इही रहिस के समारु के परिवार के जम्मों बोट रामधीन ल गे रिहीस अउ दीवान के परिवार के बोट चुनाई म हारे मंगल ल गे रिहीस। पर दीवान एक डहर रामधीन ल कहाय मंय मोर परिवार समेत तोला बोट दे हंव तब तंय जीत पाय अउ दूसर डहर रामधीन ल कहाय मोर घर के जम्मों वोट गिस तो हे पर का करबे तोला समारु के परिवार के वोट नई मिल पाइस तेकर सेती तंय हार गेस।

दूनों पारा के बीच म रहय समारु के घर बारी। जीते रामधीन पंचाइत म बइठते ही परस्ताव लाइस के जेकर जेकर घर दुआर अतिक्रमण म बने हवय ओला तोड़ना हे। ऐकर साथ मंगल घलो दे लगिस। काबर के दूनों के दुश्मन बने रहय समारु। अउ गांव भर म ककरो घर दुआर अतिक्रमण के चपेट म आये केसंभावना बने त ओ रहय समारु के घर दुआर। माथा पीट लीस समारु। कोन - कोन ल समझाय के ओहा जीतइया ल बोट दे हे। कलेचुप रहय अउ मन - मन फिकर म जरत रहय। जब ले पंचाइत म अतिक्रमण तोड़े के बात चले लगिस तब ले समारु ल अपन उजाड़ दिखे लगीस। मेहनत - मजदूरी करके परिवार के पेट पोसने वाला करे त करे का। काकर - काकर संग लड़े। गाँव भर के लोगन सरपंच के पक्ष म। समारु ल पंचाइत म बलाये गिस। समारु एक कोंटा म जा के बइठ गे। सरपंच किहिस - समारु, तंय अतिक्रमण करके घर बनाये अउ बारी रुंधे हस। तोला बारी के रुंधना अउ घर दुआर ल तोड़े ल परही।

- मंय कते मेर अतिक्रमण करे हंव। मंय तो उही ठीहा म घर बनाय हंव जेन ल पहले के सरपंच ह मोला दे हे। रहिस बात बारी के त आधा म मकान बनाय हंव अउ आधा म बारी हे।

- सब के तो परचा पट्टा हे, तोर काबर नइ हे। परचा पट्टा नइ हे मतलब तोर घर दुआर अउ बारी अतिक्रमण म बने हे।

- बीस बरिस होगे रहत। अब तुम्मन ल अतिक्रमण लगत हे। ये नियाव नई हे सरपंच साहेब।

- बीस बच्छर म चार चुनई आगे। अलग - अलग सरपंच बइठगे पर तंय काबर परचा - पट्टा नइ बनवाय।

- अर्जी तो देय रहेव। नइ बनिस त मंय का करंव। कहू त अर्जी तहूं मन ले दे देहू।

- जइसे तोर मर्जी बोट बर चलिस वइसने मर्जी तंय अभू चलाना चाहत हस। जब जेन ल मन आय बोट दे दे अउ जब मन आये अर्जी दे दे।

- कसम किरिया खाके कहत हंव मंय अर्जी देय रहेवं अउ बोट घला आपेच ल दे रहेवं।

- हम तोर बात ल नइ पतियावंन।

- सही सही होथे, तुम्मन मानो के मत मानो।

- तोला अपन घर दुआर तोड़े ल परही। ये मोर निरनय नई हे। ये निरनय पंचायत के आवय। गाँव वाले मन के आवय।

समारु समझ गे ओकर सुनने वाला कोनो नइ हे। ओहर उठिस अउ अपन घर कोती आगे। बुधयारिन ओकर लुगई चांउर ल तोसकत रहय। अंगना म धम्मा ले ठाड़े खटिया ल गिरइस अउ ओमा बइठ गे। समारु के तेवर ल समझत बुधयारिन ल देरी नइ लगिस। पूछीस - का होइस पंचाइत म ...।

- का होही, मोर घर बारी ल तोड़े बर सब किरिया खा ले हे।

- तुमन कुछू नइ केहेव।

- कोनो सुने त न, पंचायइती राज आय। पंचायइत म जउन निरनय होगे उही आखिरी आय। चाहे ओहर तिनका भर सच भले मत हो।

- कब टुटही ...।

अब समारु रकबकागे। कहिस - तंय तो अइसे पूछत हस मानो तहूं पंचाइत के डहर हस। कइसे टुटजाही मोर घर दुआर। बीस बच्छर ले रहत आवत हंव।

कलेचुप होगे बुधियारिन। जानत रहिस। समारु सुधवा बर सुधवा हे अउ कहूं अपन म आ गे त ककरो नइ सुने। नाक के फुलगी म गुस्सा फनफनाथे अउ का करत हे तेकरो सुध नइ रहय। कलेचुप ओहर चाउर निमारे लगिस। समारु अब चुप बइठे म अपन अहित समझे लगीस पर करे ता करे का। ओला सुरता अईस मनसा। ननपन के संगवारी। परोसी गांव म जा के बस गे रिहीस। समारु मुड़ भर के लउठी ल धरे पहुंच गे मंनशा मेर। मंसा ननपन के संगवारी ल देख के बड़ खुश होइस। दूनों संगवारी गले लग के मिलिन। उंकर आंखी म आंसू आ गे। प्रेम के आंसू, अपनपन के आंसू, बहुत दिन बाद मिले के आंसू। मंसा किहिस - सब बने बने तो हे न समारु।

समारु ओकर ले अलग होवत किहिस - क बताव मंनसा। तहीं बने करे जउन मोर गांव ल छोड़ के आ गे।

- तोला तोर गाँव म का तकलीफ होगे।

- राजनीति , कुटनीति हावी होगे हे। आदमी के पहिचान आदमी नई कर पावत हे। भाई - भाई दुश्मन बनगे हे। मोर घर बारी ल टोरे के पंचाइत म निरनय होगे हे। नानकुन झोपड़ी बनाय हंव। लोगन मन के महल अटारी हे। मोर आंखी ककरो घर बारी म नई गड़े मोर झोपड़ी म जम्मों गांव वाले मन के आंखी गढ़ गे हे।

- अइसन काबर .... ?

- सरपंच कहिथे, चुनई के बेरा मंय उनला वोट नई दे हंव। हरोंडा मंगल कहिथे तंय वोट नई देस तेकर सेती मोर हार होइस।

- वोट तो स्वतंत्र निरनय हे। फेर येमा तोर झोपड़ी तोड़े के बात काबर।

- लोगन मन कहन लगे हे, मोर झोपड़ी बारी के पट्टा नई हे। जेन - जेन सरपंच बइठिन उनला अर्जी देंय। मोर परचा - पट्टा नई बनाइन त मंय का करवं। अब कहत हे ... मोर कर परचा पट्टा नई हे। अतिक्रमण म मंय निरमान करे हंव। बीस साल ले अंधरा मन ल नई दिखीस। अब दिखत हे।

मनसा ल सारी बात समझ आ गे। वोहर मुड़ भर लउठी ल देख के किहिस - कब टुटही तोर झोपड़ी ... ?

समारु अचरज म पड़गे। सोच के आय रिहीस - ओकर नानपन के संगवारी ओकर आंसू ल पोंछही। ओला सांत्वना देही पर इंही तो उही पूछे लगे रिहीस के कब टूटही तोर झोपड़ी । अचरज म मनसा डहर ल ओ देखे लगिस। मंनसा के सिरफ मुंह म ही नहीं आंखी ल घलोक हंसी दिखे लगीस। समारु के लउठी ल एक टक देख के किहिस - तोर मेर तो बड़ बड़े चीज हे अउ तंय डर्रावत हस ...।

आगू डहर मनसा कुछू कहितिस ओकर ले पहिली समारु ल समझ आगे। ओहर किहिस - मंय समझ गेंव संगवारी .. मंय समझ गेंव ...। अब मंय अपन ठउर लहुट हंव।

जब अपन गांव ले समारु चले रिहीस त निराश रिहीस। मन म पीरा अउ तन म सुस्त पन रिहीस। पर संगवारी घर ले लहुटत ओर मन म आशा, तन म जोस रिहीस। ओहर अपन गांव पहुंचिस। रद्दा म दीवान दिख गे। समारु अपन मेछाा ल जोर दार अइठिस। लउठी ल धरती म ठोकिस। समारु के रुद्ररुप ल देख के दीवान के सिट्टी पिटटी गुम होगे। समारु जे परकार के अपन रुप ल देखाय रिहीस। ओमा आक्रोश रिहीस। समारु दीवान ल टेरवा के देखत अपन घर मोहाटी म पहुंचिस अउ जोर - जोर से एक हाथ म धरे लउठी ल भुइंया म पटके अउ दूसर हाथ म मूंछ ल अइठत कहे लगीस - कोन माइ के लाल हे जउन मोर झोपड़ी ल टोरही ... आवव देखहूं तुम्हर राजनीति ल ...।

गांव के एक कान ले दूसर कान बात पहुंचिस। गांव के लोगन माजरा देखे खातिर समारु के घर कोती अइन। समारु के मइंता अउ भड़कते गिस। ओहर जोर - जोर से लउठी ल पटके लगीस। मेछा ल अइठ अइठ के ठाड़ कर डरिस। ओकर रौद्ररुप ल देख के गांव वाले मन के रुंआ कांपे लगीस। जउने मांजरा देखे ल अइस ओला लगीस - समारु के लउठी ओकरे मुड़ म गिरे बर तियार हे ...। सरपंच के कान तक बात पहुंचिस तब तक समारु के तेवर सातवां आसमान म चढ़गे रिहीस। सरपंच आरो ले असन समारु के घर कोती अइस। ओकर संग चार लंगुरुवा रिहीन। सरपंच ल देख के समारु किहिस - कइसे सरपंच, मोर झोपड़ी ल टोरे खातिर आय हस ?

सरपंच चुप .. ओकर एक चमचा किहिस - समय आही त तोला कहे ल नई परही टूट जाही तोर झोपड़ी ...।

समारु अपन पूरा औकात म आगे। जोरदार लउठी ल भुइंया म पटक। मूंछ ल अइठिस अउ थूंक दीस। समारु के अइसन रुप गांव म कभू कोनो नई देखे रिहीन। सिधवा ले महा सिधवा रिहीस समारु पर इहां तो आज ओकर अलगे रुप रिहीस। सरपंच ल समझत देरी नई लगीस। ओहर अपन चम्मच मन ल किहिस - चलो, जल्दी टरो इंहा ले ...।

संसकीत तो सबो के सबो होगे। ओमन लहुटे लगीन। समारु पूरा ताकत के साथ चिल्ला के किहिस - मोर झोपड़ी टोरे ल आय के पहिले अपन मुड़ म पागा बांध लेना ... मतलाहा पानी हवय ओला मंय साफ करहूं। अउ जोर दार फेर एक बार मुड़ भर के लउठी ल भुंइया म पटकीस ...।

जउन दिन ल ओ घटना घटिस। ककरो मुंह ले ये सुने ल नइ मिलीस के समारु अतिक्रमण म झोपड़ी बनाय हवै ....।

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लेखक परिचय

सुरेश सर्वेद

जन्म - 07- 02 - 1966 ( सात फरवरी उन्नीस सौ छैंसठ )

पिता - श्री नूतन प्रसाद शर्मा

माता - श्रीमती हीरा शर्मा

पत्नी - श्रीमती माया शर्मा

जन्म स्थान - भंडारपुर ( करेला ), पोष्ट - ढारा

व्हाया - डोंगरगढ़,

जिला - राजनांदगांव छत्तीसगढ़

वर्तमान पता - सांई मंदिर के पीछे, वार्ड नं. - 16

तुलसीपुर, राजनांदगांव ( छत्तीसगढ़)

मोबाईल - 94241 - 11060

संपादक - साहित्यिक पत्रिका “विचार वीथी”

प्रकाशन - देश के विभिन्न पत्र - पत्रिकाओं में अनेक कहानियों का प्रकाशन एवं काशवाणी रायपुर सेअनेक कहानियों का प्रसारण।

प्रकाशित कृतियाँ - मेरी चौबीस कहानियाँ”, छन्नू और मन्नू”

प्रकाशक - छत्तीसगढ़ी "गरीबा” महाकाव्य लेखक

श्री नूतन प्रसाद शर्मा

सपने देखिये” व्यंग्य संग्रह

लेखक श्री नूतन प्रसाद शर्मा।

आगामी प्रकाशन - छत्तीसगढ़ी कहानी संग्रह”।

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