सोमवार, 17 दिसंबर 2012

अरुण यादव की कविताएँ

अरुण यादव

DSCN1458 (Mobile)

ख़यालों का उत्‍स

अग़र मैं कहूँ

कि मैं कुछ नहीं चाहता किसी से

तो तुम नाराज़ जो सकते हो

फ्रेडरिक नीत्‍शे की तरह

मैं नहीं कहता

कि ईश्‍वर मर गया है

पर इतना अवश्‍य चाहता हूँ

कि वह छेड़े ना मुझे बेवजह

भावनाओं संवेदनाओं की बारिश

यूँ ही नहीं होती

कविताओं में

बैठाने पड़ते हैं तर्क

और आकर्षक शब्‍दों का

जोड़-तोड़ मस्‍तिष्‍क में

क्‍यों बुरा लगा न?

दूर क्षितिज में

टिमटिमाते असंख्‍य तारे दुःखों से

ख़ुशियों की तरह

दमकता चाँद

और मैं हैरान-परेशान

महाँ है मेरे ख़यालों का उत्‍स?

 

दुःख की दूब

दुःख की दूब

हरी नहीं होती

अतीत की किसी गहरी चोट के

भद्दे निशान

अवसाद में लिपटा वर्तमान का

पीलापन

और भविष्‍य की

धूसर चिन्‍ताएँ

ढक लेती हैं

दूब का हरापन

पानी की जगह

बरसता है आसमान से

ईर्ष्‍या का तेज़ाब

अहंकार की लपलपाती बिजलियाँ

गिरती हैं

दूब की नंगी पीठ पर

छलनी कर देते हैं

कुतर कर

दूब का पोर पोर

अपमान के विषैले कीट

इसलिये

दुःख की दूब

हरी नहीं होती

 

स्‍मृतियाँ

परछाईं की तरह

साथ चला करता है

स्‍मृतियों का कारवाँ

साथ होकर भी

साथ नहीं रहती स्‍मृतियाँ

परछाईं की तरह

स्‍मृतियाँ इतिहास है

छोटी-बड़ी ख़ुशियों, ग़मों का

झाँकता है इतिहास के पन्‍नों से

माँ का दुलार

और क्रोध में तमतमाते

पिता का रक्‍ताभ चेहरा

कुछ बरस पहले

ब्रेन हेमरेज हुआ था माँ को

स्‍मृति खो गई उनकी

थोड़े दिनों के लिए

शून्‍य में ताकती रहती माँ

बहुत कोशिशों के बाद

वे देखतीं हमारी ओर

अजनबी की तरह

दवाओं के असर से

धीरे-धीरे वापस आई

माँ की स्‍मृति

और वापस आये हम

माँ की दुनिया में

सारे रिश्‍ते-नाते

स्‍मृतियाँ हैं बस

हमारा संसार है स्‍मृतियाँ।

 

रात

शर्माती सकुचाती

नई नवेली

दुल्‍हन की तरह

बड़े आहिस्‍ता से

उतरती है रात

भागते शहर की

खुरदुरी ज़मीन पर

दिन के उजाले में

सारी बेचैनी चिंताएँ

असुरक्षाएँ उदासी

जिराफ़ की तरह सिर उठाये

भटकती हैं सड़कों पर

इंसानों का मुखौटा लगाये

रात पनाह देती है उन्‍हें

अपने स्‍याह आग़ोश में

कारखानों में खटते मज़दूर

खेतों में हडि्‌डयाँ घिसते किसान

मालिकों ठेकेदारों के बँधुआ

इंतज़ार करते हैं सुबह से

आने वाली रात का

ताकि अपना बेजान जिस्‍म

और अधूरे ख्‍़वाब

सौंप कर उसे

निर्भार हो सके

रात की खूँटी पर

टाँग देते हैं वे खुद को

उतारे हुए कपड़ों की तरह

हवा के किसी अंजान झोंके से

अक्‍सर उघड़ जाती है आदिम इच्‍छाएँ

टँगे हुए जिस्‍मों से

उन कुछ पलों में ही

हो पाता है अहसास उन्‍हें

अपने ज़िन्‍दा होने का

एक दिलासा है रात

कि तुम स्‍वतंत्र हो

;सुबह होने तक

रात आश्‍वासन भी है

कि आने वाली सुबह

तुम्‍हारी है

निराशा के घटाटोप में

एक उम्‍मीद है रात

सोचो

अग़र रात न हो तो...।

 

एक सार्थक शब्‍द

वक़्‍त

चूहे की तरह

कुतरता रहा

ज़िंदगी के पल घंटे

दिन महीने और साल

मैं भी

फैलाता रहा

खुद को

शब्‍दों की कूँची से

कविता के कैनवस पर

कुतरने और विस्‍तृत होने का

यह खेल

जारी रहेगा तब तक

जब तक कि

खोज न लूँ मैं

एक सार्थक शब्‍द।

 

142, यादव मोहल्‍ला, रामपुर, जबलपुर ;म.प्र., पिन ः 482008,

1 blogger-facebook:

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------