मोहसिन ख़ान की लघुकथा - सत्येंद्र का निर्णय

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कहानी

सत्येंद्र का निर्णय

सत्येंद्र (राजस्थान) कोटा शहर के पास के ही गाँव में रहता था । वह रोज गाँव से शहर पढ़ने के लिए स्कूल जाता था । पहली कक्षा से लेकर बारहवीं कक्षा तक उसने सेंट पीटर कॉनवेंट स्कूल, कोटा से अपनी पूरी पढ़ाई की । वह बचपन से ही पढ़ाई में होशियार था । अबतक वह हर कक्षा में प्रथम ही आया था । बारहवीं की परीक्षा समाप्त होते ही उसने मेडिकल की पूर्व परीक्षा दी । उसे अपने पर पूरा विश्वास था कि वह इस परीक्षा में उत्तीर्ण अवश्य होगा । लेकिन उसकी महनत रंग लायी, वह मेडिकल की पूर्व परीक्षा में ज़िले में प्रथम क्रमांक पर आया ।

लेकिन उसके सामने समस्या थी कि वह मेडिकल महाविद्यालय में प्रवेश कैसे प्राप्त करे ? उसके पिता के पास इतना धन नहीं था कि वह मेडिकल महाविद्यालय की फीस भर सकें । सत्येंद्र के पिता ने अपने मित्र से इस संबंध में सहायता मांगी, परंतु उनके पुत्र अरुण को भी मेडिकल महाविद्यालय में प्रवेश लेना था । अरुण के पिता ने सत्येंद्र के पिता को बताया कि उन्हें अपने पुत्र के लिए बैंक से शिक्षा ऋण ले लेना चाहिए । अरुण के पिता सत्येंद्र के पिता को लेकर बैंक गए । बैंक मैनेजर ने सत्येंद्र की पढ़ाई का रिकार्ड देखा तो तुरंत शिक्षा ऋण स्वीकृति देते हुए कहा – “आप शिक्षा ऋण के लिए आवेदन कर दीजिए और जमानत के तौर पर आपके पास जो कुछ हो उसकी जमानत दे दीजिए ।”

बैंक मैनेजर को सत्येंद्र के पिता ने कहा – “मेरे पास तो केवल मेरा घर ही है, आप चाहें तो जमानत के तौर पर वह रख सकते हैं । मैं कल घर के दस्तावेज़ ला दूँगा ।”

अगले दिन सत्येंद्र के पिता ने घर के दस्तावेज़ बैंक मैनेजर को जमानत के तौर पर दे दिये । बैंक मैनेजर ने ऋण के कुछ आवश्यक दस्तावेज़ों पर सत्येंद्र के पिता के हस्ताक्षर कराये और बता दिया कि जल्द आपको शिक्षा ऋण प्राप्त हो जाएगा । एक सप्ताह के भीतर बैंक का पत्र सत्येंद्र के पिता के घर पर आया और उन्हें उसी दिन शिक्षा ऋण मिल गया, जिसके कारण सत्येंद्र को मेडिकल महाविद्यालय में प्रवेश मिल गया ।

मेडिकल महाविद्यालय में प्रवेश के बाद चार वर्षों तक सत्येंद्र ने खूब महनत की और प्रथम क्रमांक से उत्तीर्ण होकर वह डॉक्टर बन गया । सत्येंद्र के सब मित्रों ने कहा था कि अब तो कमाने के दिन आ गए । अपना खुद का क्लीनिक खोलेंगे और नोट छापेंगे । जब सत्येंद्र ने कहा कि वह तो सरकारी नौकरी ही करेगा तो सब साथी उसकी यह बात मज़ाक समझे । लेकिन सत्येंद्र ने गंभीर होकर पुन: कहा – “ मैं सरकारी नौकरी ही करूंगा और गरीबों की सेवा, क्योंकि गरीबी क्या होती है, यह आप लोगों को शायद नहीं पता । बीमारी का तो इलाज संभव है, परंतु गरीबी का काई इलाज नहीं होता, इसी गरीबी ने मुझसे मेरी माँ छीन ली, मेरे पिता के पास इतना धन नहीं था कि वह किसी प्राइवेट बड़े अस्पताल में मेरी माँ का इलाज करा सकें । मेरी माँ ने सरकारी अस्पताल में ही दम तोड़ दिया ।” यह कहते हुए सत्येंद्र की आँखें भर आयीं, भरे मन, भरी आँखों से वह घर अपने पिता को परीक्षा फल बताने चल दिया । उसके पिता उस दिन काम पर भी न गए थे, वह प्रतीक्षा में थे कि सत्येंद्र कितने अंकों से उत्तीर्ण हुआ । जब सत्येंद्र ने बताया कि वह प्रथम क्रमांक और प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुआ है तो उसके पिता बहुत अधिक प्रसन्न हुए और सत्येंद्र को सीने से चिपका लिया साथ ही बहुत सा आशीर्वाद दिया ।

डॉ . मोहसिन ख़ान

अलीबाग

(महाराष्ट्र)

9860657970

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