रविवार, 30 दिसंबर 2012

क़ैसर तमकीन की कहानी - बुरा वक्त

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बुरा वक्त

अभी दिन पूरी तरह नहीं निकला था, फ़िर भी बादशाह जानी बिस्‍तर छोड़ कर उठा ख्‍ड़ा हुआ। उसने चेहरे पर उल्‍टा हाथ फेर कर देखा अगर दाढ़ी ज़्‍यादा न बढ़ी हो तो शेव न करे लेकिन उसको याद आ गया कि आज तो ईद है। उसने ताक पर रखे आइने के टुकड़े में मुख्‍तलिफ़ जावियों से अपना चेहरा देखा और कुछ सोचने लगा।

पिछले कई महीनों में वह इतने सवेरे नहीं उठा था। ईद होने की वजह से उस्‍ताद ने उसको ईदगाह के इलाके में काम करने की हिदायत की थी। उसके गिरोह में मुसलमान काम करने वाले अब दो तीन ही रह गए थे। ज़्‍यादातर साथी शहर में काम की कमी की वजह से दूसरी जगहों पर चले गए थे। जो हिन्‍दू, मसीही या सिख थे, उन पर पाबन्‍दी थी कि ईदगाह की चहादीवारी के अन्‍दर क़दम रखने की भी कोशिश न करें। इसी तरह की पाबन्‍दी मुसलमानों पर थी। वह भी महाबीहरों को मेले में सिफ़र् आस-पास ही काम कर सकते थे। इबादतगाहों के अहाते में जाने की इजाज़त उनको नहीं थी। उस्‍ताद नेपोलियन को अच्‍छी तरह मालूम था कि इन कायदों में ज़रा भी बेएहतियाती हुई, कोई मुसलमान किसी मन्‍दिर या गुरुद्वारे के पास या कोई गैर मुस्‍लिम किसी मस्‍जिद या इमामबाड़े की हुदूद में काम करता पकड़ा गया तो ख्‍वामखाह का फसाद होगा। शहर में कई दिन तक सन्‍नाटा रहेगा और सब के काम पर असर पड़ेगा।

बादशाह जानी को भी मालूम था कि पूरे शहर की हालत ख़राब थी। जो लोग शहर छोड़ कर चले गए थे उनसे उसको कोई शिकायत नहीं थी। खुद उसने भी कई बार इस तरह सोचा था मगर शहर छोड़ कर न जा सका क्‍योंकि इस गई गुजरी हालत में भी इसका काम ठीक ठाक चल रहा था। वह नौवीं जमाअत (कक्षा) तक पढ़ा हुआ था। गाड़ी चलाना जानता था। छोटी रानी की ड्‌योढ़ी का ड्राइवर जब छुट्‌टी पर जाता या बीमार पड़ जाता तो फिर उसको आरजी तौर पर ड्राइवरी मिल जाती। वह साफ सुथरी पतलून या बुशर्ट पर धुली हुई कमीज या बुशर्ट पहनता। उसके कंधे पर सियासी कारकुनों (कारिंदो) की तरह एक सूती झोला लटकता रहता जिसमें सिनेमा के गानों के किताबचे और इब्‍ने सफी को कोई ताज़ा जासूसी नावेल पड़ा रहता। जब छोटी रानी की कोठी पर नई नस्‍ल की चटाख-पटाख करती बीवी लोग छुटि्‌टयों पर आतीं और उनको पर्दे में रहना पड़ता तो बादशाह जानी को ज़रूर बुलाया जाता। वह पर्दा लगी हुई नई फिएट गाड़ी चलाने में बड़ा फ़भ महसूस करता बीवी लोगों को सिनेमा घर और दूसरे तफरीही मकामात (जगहों पर) ले जाता। बीवी लोगों को बादशाह जानी के जरिए नई शुरू होने वाली फिल्‍मों के टिकट भी आसानी से मिल जाते। फिल्‍म खत्‍म होने पर बाजारों से इधर-उधर की फुजूल खरीदारियों के बाद वह गाड़ी नगरामी जी किताबी दुनिया से ज़रा दूर खड़ी करता। नगरामी जी पहले तो बादशाह जानी को सिग्रेट पेश करते जिसे वह कान में लगा लेता, फिर एक झोले में पाकिस्‍तान में छपने वाले जाली एडीशन (यह एडीशन नगरामी जी खुद छपवाते थे) वही वहानवी के नाम से शाया (छपने) होने वाले फहश (अश्‍लील) कोकशास्‍त्रनुमा नावेल और उरयां (नवंगी) और रंगीन तस्‍वीरों वाले अंग्रेज़ी रिसाले भर देते। बादशाह जानी यह झोला बीवी लोगों के सुपुर्द कर देता। पर्दे के पीछे खूब सुखर-पुसर होती और दबी-दबी हँसी की आवाजें आतीं। बिटिया लोग सब से मज़ेदार और ज़्‍यादा से ज़्‍यादा फ़ोहोश रिसाले और किताबें मुन्‍तखिब (चुन) लेती और दस-दस के नोट देकर झोला बादशाह जानी को वापस कर देती। बादशाह जानी जब यह नोट नगरामी जी को देता तो वह उनमें से रिसालों और किताबों की कीमत निकालने के बाद बाकी रकम वापस कर देते। ऐसा करते वक़्‍त दो चार रुपये बादशाह जानी को उसके चाय पानी के अलग से देते।

बादशाह जानी की इस ‘बाइज़्‍ज़त' हैसियत का इल्‍म उस्‍ताद नेपोलियन को था इसलिए वह ज़रा अच्‍छी जगहों पर उसकी ड्‌यूटी लगाता। उसने बादशाह जानी को कभी रेस कोर्स में काम करने नहीं भेजा जहाँ पैसा तो खूब बनता था मगर जब कोई कारीगर हाथ की सफाई दिखाते हुए पकड़ा जाता तो सब जॉकी लोग मिलकर उसके साथ वजा-एगैर फितरी करते। उस्‍ताद ने काम के गुर बताते वक़्‍त बादशाह जानी के साथ डाँट फटकार से भी काम नहीं लिया। अब तो बादशाह तक़रीबन ख़ुद मुख्‍तार था फिर भी उस्‍ताद के हुक्‍म नामे कभी-कभी आते “हमारा नज़राना दो सौ से कम नहीं होगा आज, समझ लिया कि नहीं?”

उस्‍ताद नेपोलियन की आपनी हालत भी ज़्‍यादा अच्‍छी नहीं थी लेकिन चूँकि शहर में कोई मुक़ाबला नहीं था इसलिए वह एक तरह से नवाबी कर रहा था। वह तीसरे दर्जे के फ़िल्‍मों में दिखाए जाने वाले बदमाशों की तरह काली ऐनक लगता। साफ सुथरे बुशर्ट्र और पतलून डालकर माली खाँ की सराया में आराम कुर्सी पर आधा लेटा, आधा बैठा रहता। उसके एक हाथ में कोका कोला की बोतल रहती और दूसरा हाथ तरह-तरह के इशारों के लिए इस्‍तेमाल करता। इस दूसरे हाथ की तक़रीबन तमाम उँगलियों में अँगूठियाँ भरी रहतीं। वह सीधे हाथ की कलाई में शगुन के तौर पर सोने का कंगन पहने रहता। इलेक्‍शन या किसी सियासी ‘आन्‍दोलन' के ज़माने में मुख्‍़तलिफ ‘पार्टियों' के नेता लोग उसके ‘जल पान' की फ़िक्र करते। उसका रंग बहुत गोरा था जिस पर वह काली ऐन लगाकर बैठता तो मामूली एम.एल.ए. लोग एहसासे कमतरी में मुब्‍तिला हो जाते। अगर उसकी एक आँख ख़राब न होती तो वह वाकई बम्‍बई की मारधाड़ की फ़िल्‍मों में काम कर सकता था।

बादशाह जानी को उस्‍ताद का पैगाम हजरत शम्‍सी के जरिए मिला था। शम्‍शी जी उर्दू के ‘ऊंचे' शायर थे। उनका कद छह फुट से भी ज़्‍यादा बुलंद था। वह दूर-दूर के मुशायरों में जाते। सिग्रेटों के पैकेट नक्‍शी लोटे, चादरें, दरियां, शमा दाम और अगर कुछ न मिल तो खूब सूरत हमाएल शरीफ, कुआर्न शरीफ और पन्‍ज सूरे वगैरह अपने सामान में भूले से बांध लाते। यह सब सामान वह नेपोलियन की नज्र कर देते। वह बगैर देखे भले जेब में हाथ डालकर जो भी होता उनको दे देता। रात गए मुशायरे पढ़ने के बाद हजरत शमसी नेपाली के ‘मदिरालय' में पहुंचते तो उस्‍ताद के मुताद्‌दिद शगिर्दों से उनकी अच्‍छी निभती। शम्‍सी जी बादशाह जानी को अपना शागिर्द करते थे क्‍योंकि एक बार अपने स्‍कूल के मुशायरे में उसने शम्‍सी जी की गज़ल अपने नाम से पढ़ी थी।

बादशाह जानी नहा धोकर तैयार हुआ। बुशर्ट और पतलून के बाजाए उसने खास तौर पर शोख धारियों वाली कमीज और सफेद धुली हुई शलवार पहनी। उसने खूब फ़य्‍याजी से (बहुत ज़्‍यादा) बालों में तेल लगाया और तिरछी माँग निकाली आँखों में सुरमा लगा ही रहा था कि पिछले दरवाज़े से रामलाल दाखिल हुआ और ब़गैर कुछ कहे सुने चारपाई पर आड़ा-आड़ा लेट गया। दीवार के खुरदुरेपन से बचने के लिए उसने दोनों हाथों की उंगलियों को आपस में फॅँसा कर जोड़ा और उनकी टेक बनाकर बादशाह जानी को देखने लगा।

बादशाह जानी ने चंद सानियों तक इन्‍तिज़ार किया कि शायद रामलाल कुछ कहे। फिर उसकी ख़ामोशी से उलझ कर ख़ुद ही पूछ बैठा “क्‍यों मास्‍टर। कैसे सबेरे निकल पड़े?” रामलाल थोड़ा उठा, एक हाथ की उँगली से दूसरे हाथ की हथेली पर तिरछी लकीरें बनाने लगा फिर बादशाह जानी के चेहरे पर भरपूर नज़र डालकर कहा, “यार। तेरी वजह से ज़िन्‍दगी हराम हो गई है, वही साली चन्‍दो का झगड़ा है, न जीने देती है न मरने।”

“अमाँ चुप रहो, बड़े हीरो बनते हो। चाँदनी कहो चाँदनी। तुम कौन होते हो चंदो कहने वाले।”

“अबे वह... तेरी है न मेरी। वह तो है...”

उसके बाद रामलाल ने कुछ अजीब तरह उँगलियों से इशारा किया जिस पर बादशह जानी हँस पड़ा और कहने लगा “तो फिर बेटा! आज तो वह हमारी है, सोने का गहना लेकर जाऊँगा।”

रामलाल जरा खफ़गी आमेज हसरत के साथ कहने लगा, “हाँ बेटा ईद मनाओ। माल काटो, माल। हम तो... वह जुमला खत्‍म किए बगै़र ही चुप हो गया।”

बादशाह जानी अपने को मुख्‍़तलिफ जावियाँ से आईने में देख रहा था। उसने पलट कर रामलाल को हैरत से देखा और कहने लगा “अजीब यार है तू भी बस आदमी ही हो। अमाँ महाबीरों के मेले में, अलीगंज में इतना कमाया, सब कहाँ गया?”

यह कह कर बादशाह जानी बढ़ा और कोठरी का दरवाज़ा इस तरह पकड़ा कि रामलाल को अच्‍छी तरह अन्‍दाज़ा हो जाए कि वह चलने को तैयार है। रामलाल भी खड़ा हो गया और तल्‍खी से बोला “ बस यार। जी जलाने की बातें न किया करो, किस भिकवे ने कमाया। सारे शहर के काम करने वाले वहीं मर रहे थे। महाबीरों का मेला कोई दीवाली दशहरा थोड़े ही है कि ऐश हो जाए। दिन भर की दौड़ धूप के बाद दो तीन तोते हाथ लगे। उस्‍ताद ने नज़राना वहीं धरा लिया। बाक़ी में क्‍या ऐश होता। बस पान सिगरेट का ख़र्चा निकल आया। अपनी कहो। आज तो चाँदी है। अरब लोग भी आएँगे। नवाब होते हैं साले यह लोग भी, एक ही हाथ में पौ बारे हो जाएँगे। जेवर गहना अलग। ज़रा से रियाज़ से हज़ार बारह सौ तोते फँस जाएँगे।”

रामलाल सौ रुपये के नोट को तोता कहता था। उसका कहना था कि सौ रुपये के नोट की रंगत तोते की तरह हरी होती है। जेब में सौ सौ के नोट हों तो आदमी तोते की ही तरह टें टें भी खूब करता है और तोते ही तरह अपने मुँह मियाँ मिट्‌ठू भी बनता है। फिर यह साले हरे हरे नोट तोते ही की तरह फुर से उड़ जाते हैं और तोते ही की तरह आँखें फेर लेते हैं। रामलाल तो अब सौ का लफ़्‍ज ही भूल गया था, जब भी सौ कहना होता उसकी जगह तोता कहता।

उस दिन के बारे में रामलाल का कहना कुछ ज़्‍यादा सही न था क्‍योंकि बादशाह जानी बहुत पुरउम्‍मीद नहीं था। शहर के मुसलमान लोग तो ज़्‍यादातर गरीब गुरबा थे। जो लकड़ी वाले चमड़े वाले और तम्‍बाकू वाले नए-नए सय्‍यद बने थे वह एक-एक पाई के बारे में बहुत होशियार थे। खलीजी रियासतों से जो लोग चमचमाती घड़ियाँ लगाए आते थे वह सब शानो-शौकत तो बहुत दिखाते थे मगर टेंटें करते, हरियल तोते किसी की जेब में न होते। उन लोगों के पास महँगे सिगरेट केस, कीमती कलम, नई-नई वजा (डिजाइन) के महँगे रिकार्ड और कैमरे होते जिनको पार करना तो बहुत आसान होता मगर ठिकाने लगा कर नकदी बनाना बड़ा मुश्‍किल होता।

रामलाल और बादशाह जानी आम शहरियों की तरह चल रहे थे और उस्‍ताद ही के बारे में बातें कर रहे थे। इसी के साथ उनकी तेज नज़रें भी ईदगाह की तरफ़ जाने वालों पर थी। रामलाल ने बताया कि तुम्‍हारा आशिक मासूक वाली ग़ज़लें बनाने वाला भी रो रहा था। और ये कह कर वह हँसने लगा। रामलाल बहुत अच्‍छी उर्दू बोलता मगर उस वक़्‍त नेपाली के मदिरालाय में अपने साथियों की नकल करते हुए शीन और काफ़ के तलफ़्‍फुज का मज़ाक उड़ा रहा था उसका इशारा शम्‍सी जी की तरफ़ था।

बादशाह जानी बे-ख्‍़याली में बोला “उस भिकवे को क्‍या हुआ, ऐसे तो करता है। मंत्री जी के गुलदान तो ठिकाने लगा चुका है।”

“नहीं बे। परसों कम्‍युनिस्‍टों का मुशायरा था। वहाँ उसका पाँच-पाँच के जाली नोट मिले और सिगरेट चाय अपने जेब से पीना पड़ी।”

बादशाह जानी हँसने लगा। शम्‍सी जी अपनी आदतों से बाज नहीं आते थे। थोड़ी मुद्‌दत पहले ही वह राजभवन से चाँदी के कई चमचे ले आए थे। उनके चमचों पर सरकारी मुहरें खुदी हुई हुई थीं। उस्‍ताद तो देखकर घबरा गया। उसने अपने जानने वालों से कह सुनकर मामला दबा दिया। उसके बाद शम्‍सी जी पर सरकार मुशायरों के दावतनामे बन्‍द हो गए थे। शम्‍सी जी ने मशहूर कर दिया कि उन्‍होंने गवर्नर के सामने एक इन्‍किलाबी नज़्‍म पढ़ दी थी जिसमें राजभवन के दरवाज़े उन पर बन्‍द हो गए थे। लेकिन जिन दिनों शम्‍सी जी को मुशायरे न मिलते तो वह अपने नाम आने वाले उर्दू रिसाले आधे दामों पर निगरामी जी के हाथ बेच देते।

रामलाल मालूम नहीं क्‍यों बहुत खफ़ा सा था। दो मिनट ठिठक कर शैकत खान को गालियाँ देने लगा, “यह साला सौखत खान भी शबराती छछूंदर है। हर जगह बेफायदा बेफुजूल में लफड़ा खड़ा कर देता है। उसने उस्‍ताद को बहुत नाराज़ कर दिया। कहने लगा कि अगर हिन्‍दू-मुसलमान एक दूसरे के तीज त्‍योहार में काम नहीं कर सकते तो सड़कों पर लेट कर ही कुछ नावां बना सकते हैं।”

बादशाह जानी को अपने कानों पर यक़ीन न आया ताज़्‍जुब से रामलाल को देख कर कहने लगा “अबे नहीं? क्‍या कह रहा था।”

“अरे ईद की बात हो रही थी। कहने लगा कि कारीगर अपने बदन पर हल्‍दी चूना लगाए। लाल लाल फटि्‌टयाँ (पटि्‌टयाँ) बाँध कर मेले इश्‍नान और उरस के रास्‍तों में लेट जाया करें तो कर्म धर्म करने वाले कुछ दान पुन ज़रूर करेंगें। इस तरह भी एक आध तोता फँस जाएगा।”

बादशाह जानी ने अपना सर बेयक़ीनी की हालत में ज़ोर सा झटका और फिर पूछा... “फिर? उस्‍ताद क्‍या बोला?”

“अबे उसके तो मिर्च लग गई। चारों तरफ़ घूम कर चिल्‍लाने लगा। सुन रहे हो सालो। सुन रहे हो। जनानो, हीजड़ो अबे सालो, सुना यह जनखा क्‍या कह रहा है। अब हमारे लोग भीख माँगने निकलेंगे... अबे भिकवो... कुछ तो शर्म करो। उस्‍ताद के मुँह में कालिख लगाओगे। हमारी बेजती (बेइज़्‍जती) ख़राब करता है। पुलिस वाले, एम.एल.ए. लोग, नेता लोग, रिपोर्टर जब कहेंगे कि नेपोलियन उस्‍ताद अपने चेलों से भीख मँगवाता है तो क्‍या मैं तुम सालों की माँ बहनों की... मैं मुँह कि छपाऊँगा। जिस साले का काम नहीं करना है अभी निकल जाए नहीं तो मार-मार कर गू निकाल दूँगा।”

बादशाह जानी उस्‍ताद की नशरी नज़मों जैसी गालियों के बारे में सोच कर हँसा और इश्‍तियाक से बोला, “फ़िर सौखत खान का क्‍या बना?”

“बनता क्‍या। उस्‍ताद सचमुच बहुत गर्म हो गया था। कहने लगा निकल जाओ मेरे सामने से नहीं तो अभी जेल भिजवा दूँगा। सड़ते रहोगे साले उम्र भर। उसके जाने के बाद हम लोगों को भी समझाने लगा। बेटा लोगो, काम करना है तो हुनर सीखो। मेहनत की कमाई खाओ। पुलिस और नेता लोगों में इज़्‍ज़त बनी रहती है। मर्द होकर भीक माँगने की बात करते हो। सालो, पहले अपने अपने टोटे कटा लो तब भीक माँगना। जब भीक भी नहीं मिलेगी तो क्‍या करोगे। अपनी-अपनी माँ बहन... लगोगे?”

वह दोनों बातें करते-करते महल की सरहद से निकल आए थे। बादशाह जानी को अन्‍दाज़ा हो गया कि उस ने ऐसा रास्‍ता चुना था जिस पर से अमीर लोग गुज़रते ही नहीं थे। छोटे-मोटे हाथ तो वह चला ही सकता था मगर आज बरस के दिन इस तरह का गीला काम करना बादशगुनी के बराबर था। इसलिए वह जी आई लाँडरी के खाली तखते से टेक लगा कर ईदगाह की तरफ़ जाने वालों को देखने लगा।

रामलाल अब भी ज़माने का रोना रोए जा रहा था, “बड़ा खराब वख़त आ गया है” -उस ने गहरी नज़र से ईदगाह की तरफ़ जाने वालों का जायजा लिया और कहने लगा, “अबे हाँ, वह यूसुफ घड़ी वाला भी बग़ैर बताए कहीं निकल गया।”

बादशाह जानी ने सर से ऐसा इशारा किया जैसे उस को पहले से यह बात मालूम हो चुकी हो, इस रू में खुद भी बोला, “वह जन्‍नत बी का काले पालक नहीं था। मजीदा जो गुल मोहम्‍मद अत्तार के वहाँ नुस्‍खे बनाया करता था, वह भी साला चुपके से कहीं सटक गया। अब जन्‍नत बी कह रही है कि कोठरी खाली कर दो। बेचना है। वह कहीं अरब में जाने को कह रही है।”

“अबे वह कहीं नहीं जाएगी। मैं सब जानता हूँ। वह तुझे कोठरी खाली कराना चाहती है, बस। मुलतानी शाह इस में दुकान खोलने की बात कह रहा था। वह जन्‍नत बी को सात-आठ तोते पगड़ी देने को तैयार है। बस इत्‍ती सी बात है।”

बादशाह जानी को जन्‍नत बी की बात पर पहले भी यक़ीन नहीं था। अब रामलाल से मुल्‍तानी शाह का जिक्र सुनकर उसको बड़ा गुस्‍सा आया। वह ज़रा देर को रुक गया। वह दोनों नादान महल रोड के मकबरों के आगे निकल आए थे। हर तरफ़ ईदगाह जाने वालों का हुजूम बढ़ रहा था। रामलाल ने ठिठक कर कहा कि अब सीधा रकाब गंज जाएगा या यहिया गंज होता हुआ उधर से ही राजा की बाज़ार तक निकल जाएगी और वह आफ़त कर देगा।

बादशाह जानी भी गहरी साँस लेकर बोला, “अपना भी बुरा वख़त आ गया है।”

यही बात अभी कुछ मिनट पहले रामलाल ने कही थी मगर अब बादशाह जानी के मुँह से सुनकर बोला, “अरे बाबू, सभी का बुरा वख़त है। पूरे शहर की रौनक ढाँए-ढाँए फिश हो कर रह गई है। इसी शहर में हमने भी वह तोते उड़ाए हैं कि...”

वह दोनों ज़रा दिलचस्‍पी से देखने लगे। आगे रास्‍ता तंग हो गया था, पुलिस ने पैदल चलने वालों के लिए एक अलग पट्‌टी बना दी थी। सब लोग इस तरह उस पर जा रहे थे जैसे कोई बड़ा जासूस जा रहा हो। रामलाल और बादशाह जानी दोनों ने क़रीब से गुज़रने वालों को आंका और फिर दोनों एक दूसरे को देखकर खिसिया गए। बादशाह जानी खिफ़्‍फत मिटाने के लिए बड़बड़ाया “ठन ठन गोपाल” (मतलब यह था कि यह सब बने ठने) लोग पैसे कोड़ी के एतबार से कुड़क थे।) रामलाल ने हल्‍के चटखारे के अन्‍दाज़ में कहा “अच्‍छा पार्टनर माल कटो माल। अपने राम तो चल दिए।”

बादशाह जानी ने किसी माहिर सिविल इंजीनियर की तरह ईदगाह के मैदान का जायज लिया। इधर-उधर घूमते हुए उसने दो तीन सिगरेट फूँक डाले। मजमा बहुत था और ईदगाह की चहारदीवारी के अंदर दाखिल होने में बड़ी मुश्‍किल नज़र आ रही थी। फिर भी बादशाह जानी इस तरह घूम रहा था जैसे किसी पुरसूकून बाग में टहल रहा हो। अस्‍ल काम तो नमाज के बाद ही शुरू होता था, जब सब लोग हड़बोंग में एक साथ निकलने की कोशिश करते या सब कुछ भुला कर एक दूसरे से गले मिलने में मशगूल हो जाते।

वह खस फाटक के सामने लगे हुए खेमों की कतार का जायजा लेने लगा। उन खेमों में मज़हबी किताबों जानमाजों, मज़हबी ज़रूरयात की चीज़ों, फूलों फलों, सामानों आराइश (सजावट का सामान) और मिठाइयाँ और खिलौने की दुकान सजी हुई थी। उससे नवे दर्जे के जाविये से एक कतार दूसरी तरफ थी जहाँ सिर्फ चाय, शर्बत, खीर और हलवे पराठे वाले थाल सजाए हुए बैठे थे। हर खेमे में नातों के कैसेट, कव्‍वालियों के रिकार्ड या किरअत के रिकार्ड बज रहे थे। एक बड़ा खेमा किसी मज़हबी जमाअत के मुबलगों का था जिसमें मज़हबी किताबों, तबलीगी कामोें और मज़हबी फिर्के के लोगों के रिसाले भरे थे। इस्‍लामी कैलेण्‍डरों, जन्‍तरियों और अजान देने वाली घड़ियों की भरमार थी और जमाअत के रहनुमा के बडे़ बड़े फ्रेम शुदा फोटो भी बिक रहे थे। इस कैम्‍प के दूसरे हिस्‍से में एक नौजवान मुल्‍ला अपने नए-नए सरसरातें कपड़ों में सचमुच का दूल्‍हा बना हुआ तागूती ताक़तों का जिक्र कर रहा था। उसके हाथ पर बहुत ही नफीस घड़ी सजी हुई थी। जब वह हाथ उठाकर किसी नुक्‍ते पर ज़ोर देता तो घड़ी के हीरे अंधेरी रातों में आतिशबाजी के रंगों की तरह चमकते। बादशाह जानी को याद आया कि यही मुल्‍ला गुजिश्‍ता रोज़ दरिया के क़रीब मसनूई आबशार के पास फैशनेबिल लड़कों और लड़कियों के साथ पिकनिक मना रहा था।

बादशाह जानी इस तरह टहलता रहा। दुकानों के बीच में, फकीरों में मजमे में,दर्जियों के गिरोह में, बर्फ खाने वालों और तम्‍बाकू फ़रोश ‘सय्‍यदों' के हुजूम में महारत से जायजा लेते हुए वह बराबर इस बात का कायल होता जा रहा था। वह दिल ही दिल में मुसलमानों के उर्सों और त्‍योहारों का हिन्‍दूओं और सिक्‍खों के त्‍योहारों और मेलों से मुक़ाबला कर रहा था। इसलिए उसको रामलाल की परेशानी का यक़ीन नहीं आया। वहाँ आए दिन ही तीरथ स्‍नान और त्‍यौहार रहा करते थे। रामलाल को काम की क्‍या परेशानी थी।

ज़रा देर में लोग खड़े होने लगे। इमाम साहब जो लाउड स्‍पीकर से वाज (भाषण) देने में मशगूल थे जब उतर कर अपनी जगह पर पहुँच गए थे और नमाज पढ़ाने के लिए तैयारी कर रहे थे। बादशाह जानी एक सफ से गुज़र कर दूसरी तरफ फलांगता और तीसरी एक सफ से आगे बढ़ कर उसने एहतियात से मुट्‌ठी खोली।

‘धत तेरे की' वह अपने पर नफरीन करता हुआ बड़बड़ाया। यह बजाहिर किसी मियाँ भाई की मताए कुल (कुल रकम) थी। सात आठ रुपये, कुछ रोजगारी और एक हकीम का नुस्‍खा उसने मरोड़ कर एक तरफ फेंका और रकम बदौली से जेब में डाल ली।

वह एक दूसरी तरफ से एक नई सफ में घुस गया। उसके बराबर में लोग चिल्‍ला रहे थे। हजरात, सफें बराबर कर लीजिए, बादशाह जानी भी इधर-उधर बहुत ही बनावटी बेजारी और झुंझालाट से चिल्‍लाया- “सफें बराबर कर लो भाइयों।” यह कहते हुए उसने बायां हाथ चलाने से पहले आँख के गोशे से देखा। उसके बराबर एक नौजवान मजिस्‍ट्रेट अदब से खड़ा नमाज शुरू होने का मुन्‍तज़िर था। बादशाह जानी उसको भी पहचान गया। दो तीन महीने पहले उस मजिस्‍ट्रेट ने उसको एक गलत जगह पेशाब करने के जुर्म में सौ रुपये जुर्माना किया था। मजिस्‍ट्रेट को अपने क़रीब पाकर बादशाह जानी का जज्‍बा-ए-इन्‍तिकाम भड़क उठा। उसने बाएं हाथ से ‘कोशिया' की और वहाँ से खिसक गया। चंद सानियों बाद वह एक घने दरख्‍़त की छाँव में बैठे हुए बच्‍चों की एक टोली में था। उसने अपने हाथ में लहराता हुआ रूमाल खिसका कर देखा, एक चौकोर सिगरेटकेसनुमा बटवा था जिसके अन्‍दर शर्बती रंग की दो तीन चूड़ियाँ और एक नन्‍हीं बच्‍ची की तस्‍वीर थीं।

उस नौजवान मजिस्‍ट्रेट की बच्‍ची अपने मकान की छत पर बंदरों से डर कर भागी तो छज्‍जे पर गिर पड़ी थी। उसने जब उठने की कोशिश की तो नीचे गली में गिर कर मर गई थी। बादशाह जानी ने यह कि�स्‍सा सुना था। अब उसको मजिस्‍ट्रेट पर तरस आ गया और वह सोचने लगा कि किसी तरक़ीब से यह बटवा, चूड़ियाँ और तस्‍वीर मजिस्‍ट्रेट को वापस भिजवा देगा।

ज़्‍यादातर लोग अल्‍लाहो-अबकर कह कर ख़ामोश खड़े थे मगर ‘चुप रहिए नमाज़ शुरू होने वाली है' के नारे लगाने वालों की आवाज़ से कान पड़ी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही थी। नज़म व जब्‍त की तमाम ज़बानी कोशिशें के बावजूद एक हंगामा मचा था। इस हालत में इमाम साहब ने ‘अल्‍लाह अकबर' कहा और उनकी तकलीद में बड़े से मैदान में जगह-जगह बने हुए मकबरों पर जमें हुए जमनी इमामों ने अल्‍लाह अकबर की बाज गश्‍त में हिस्‍सा लिया। बादशाह जानी एक किनारे पर सफ में खड़ा हुआ आँखों के मोशों से आस-पास देखे जा रहा था। उसके सीधे हाथ पर एक कोई सरकारी अफ़सर खड़ा था उसके साथ कई बच्‍चे भी थे जो नमाज पढ़ने की नकल में मस्रूफ़ थे। बादशाह जानी ने आसानी से एक लड़की का बन्‍दा उतार लिया और साथ ही हाथ की सफाई से काम लेते हुए अफसर की जेब में भी कैंची लगा दी।

नमाज ख़त्‍म होते ही वह उठ खड़ा हुआ, जो लोग आस-पास बैठे थे वह भी नफसा नफसी के आलम में खडे़ होकर एक दूसरे से गले मिलने लगे। एक कयामतखेज़ हंगामा बर्पा हो गया। बादशाह जानी फुर्ती से इधर-उधर घूमने लगा। उसको दो एक कारीगर और भी नज़र आए, वह तल्‍खी से हँस कर उनकी नज़रों से बच कर अपनी मेहनत में मस्रूफ़ रहा। उसको पुलिस वालों से भी होशियार रहना था क्‍योंकि अगर उनमें कोई भी जानने वाला होता तो वह बादशाह जानी से फौरन अपना हक़ तलब करता।

इमाम साहब के जुलू के उनके अहाली मवाली हटो बचो करते हुए उस शामियाने की तरफ़ जा रहे थे जहाँ रियासती गवर्नर, वजीर आला और मुमताज़ गैर मुस्‍लिम अमाएद गदीले सोफों में धंसे हुए इमाम साहब और मुसलमान भाइयोें को ‘मुबारकबादिया' देने जमा हुए थे। बादशाह जानी उस गिरोह में शालिम हो गया जिसमें कप्‍तान पुलिस वगैरा इमाम साहब के साथ चल रहे थे। उस वक़्‍त अगर कोई पुलिस वाला उसको पहचान भी लेता तब भी चुप रहता क्‍योंकि उसको डर होता कि ख़बर बादशाह जानी किसी अहम ओहदेदार या लीडर की गाड़ी चलाने पर लगा हो।

एक तरफ़ से इमाम साहब अपने मुरीदों और खदम व चश्‍म के साथ आ रहे थे और दूसरी तरफ से किसी अरब मुल्‍क का एक सफ़ारती नुमाइन्‍दा आगे बढ़ कर उनसे बगल गीर हुआ। यह मौक़ा गनीमत समझ कर बादशाह जानी वहाँ से निकल गया।

बीस बाईस ‘कैंचियाँ' लगाने और ‘क्रोशिया' करने के अलावा उसने एक जगह ‘बुनाई' भी की। इसके बाद उसका ख्‍़याल आया कि अच्‍छा मौका देख कर अपना जूता भी बदल ले। उसका अपना पम्‍प बहुत पुराना हो गया था। उसने ईदगाह के जुनूब (दक्षिण) की तरफ एक चक्‍कर लगया। वहाँ लकड़ी की अल्‍मारियों पर जूतों और चप्‍पलों का ढेर था जिनकी देखभाल और हिफ़ाजत के लिए हस्‍बे मामूल (हमेशा की तरह) दरगाही बैठा था। दरगाही के बाप दादा के वक़्‍त से अब तक ईदगाह में आने वालों के जूतों और छतरियों की देख भाल का ज़िम्‍मेदार और कोई न था। दरगाही बहुत बूढ़ा था और उसकी नज़र बचा कर कोई अच्‍छा कीमती जोड़ा उड़ा लेना मुश्‍किल न था लेकिन उसी तरफ खालिक बाज़ार का इंचार्ज दरोगा गुलाठी, इक़बाल भट्‌टी से बातें कर रह था। इकबाल भट्‌टी एक हफ़तरोजा अखबार निकालता था जिसमें पुलिस की कारगुजारियाँ ज़ोरदार अल्‍फाज में छापता था। उसके बदले में उसको इलाके के तमाम सिनेमाघरों, फुटबॉल, क्रिकेट और दंगल के मुक़ाबलों के टिकट मुफ्‍त मिलते थे। अगर गुलाठी बादशाह जानी को रोक कर महज उसकी खैरियत ही पूछता तब भी इकबाल भट्‌टी अपने अखबार में मोटी मोटी सूर्खियाँ लगाता कि खालिक बाज़ार पुलिस ने गिरह कटों के आलमी (विश्‍वव्‍यापी) गिरोह को बड़ी बहादुरी से बन्‍दूकों और चाकुओं का मुक़ाबला करते हुए पकड़ा। इकबाल भट्‌टी ने जब शाकिर अली और इज़्‍ज़त आपा के बारे में शरारतअंगेज मजमून छापे तो वह बीच बाज़ार में इकबाल भट्‌टी को जूते लगवाएगा। तब से मकामी तालिबात के स्‍कूल के बारे में बे-बुनियाद अफवाहें बन्‍द हो गई थीं। बादशाह जानी ने उस वक़्‍त इकबाल भट्‌टी और गुलाठी की नज़रों से बच निकलना ही मुनासिब समझा। मगर चलते-चलते उसने इकबाल भट्‌टी को यही कहते सुना- भाई बहुत बुरा ज़माना आ गया है।

बादशाह जानी ईदगाह से ज़रा दूर एक पराठे कबाब की दुकान में घुस गया। खाने के बाद उसने सुर्ख रंग का कोई मज़ेदार शर्बत भी पिया। रास्‍ते में उसने भिखारियों को कुछ पैसे भी दिए और ‘दोपहर की छुट्‌टी' के लिए अपनी कोठरी पर पहुँचा।

दरवाजे बंद करके उसने अभी तक की कमाई का हिसाब किया। ज़्‍यादातर बटुओं में नोटों की जगह लांड्री की रसीदें, तरह-तरह के बिल और अदाएगी के मुतालिबे और तकाजे थे। उसने उन सब काग़ज़ों को फाड़ चीर कर कूड़े में डाल दिया और नकद रकम का हिसाब किया तो सिर्फ सात तोते बनते थे जिनमें उस्‍ताद का नज़राना भी था।

वह आराम करने के बाद लाल बाग की तरफ जाना चाहता था जहाँ सिनेमाघरों में ईद की ख़ुशी में नए-नए फिल्‍म शुरू हो रहे थे। ऐसे मौकों पर दो बजे दिन से ही खूब जमघट हो जाता है और फिर वह हड़बोंग होता है कि पुलिस को लाठी चार्ज तक करना पड़ता है। बादशाह जानी का दिल आराम में न लगा। वह नावेल्‍टी टाकीज और बसन्‍त टाकीज की तरफ काम करने के ख्‍़याल से तैयार हो गया। लेकिन बे-ख्‍याली में कपड़े बदल कर और बुशर्ट और पतलून पहनकर हरचरन के मकान भैरों जी रोड पहुँचा।

हरचरण की दुकान चाँदी वाली गली के नुक्‍कड़ पर थी और उसका खास दरवाज़ा चौक की तरफ खुलता था। पिछला दरवाज़ा चाँदी वाली गली में था। वह अपनी दुकान पर छोटे-मोटे जेवर बनाता था लेकिन अस्‍ल काम पुराने जेवर सस्‍ते दामों में खरीदने का था शरीफ घरों की बहू बेटियाँ बुर्के ओढ़े दुकान का पिछला दरवाज़ा खटखटातीं और कोई ‘अदद' हरचरण के हाथों में पकड़ा देती। वह जो कुछ नकद रकम देता ख़ामोशी से लेकर वहाँ से खिसक जाती।

उस दिन ईद की छुट्‌टी की वजह से दुकानें बन्‍द थीं इसलिए बादशाह जानी हरचरन के मकान पर पहुँचा और बुन्‍दा उसके हाथ में पकड़ा दिया। हरचरण ने उसको रोशनी के रुख करके देखा। दो-तीन बार हाथ से घिसा और फिर जेब से कसौटी निकाल कर उस पर घिसा। उसने मलामती नज़रों से बादशाह जानी को देखा और शिकायत करने लगा “क्‍यों यार! हम से भी उस्‍तादी करोगे?”

“क्‍या बात है सेठ?” बादशाह जानी इधर-उधर मोहतात (सावधान) नज़रों से देख रहा था। इसलिए ताज़्‍जुब से पूछा।

“बात क्‍या है। देखते नहीं हो?” उसने कसौटी बादशाह जानी के सामने कर दी जिस पर बुन्‍दे की रगड़ से सुनहरी चमक के बजाय अजीब किस्‍म का स्‍याही माएल बैंगनी रंग झलक रहा था।

“यार। मैं तेरी चीज़ों को कभी नहीं परखता। जो माँगता है दे देता हूँ। पर अब ऐसा तो न कर।”

बादशाह जानी खिसियाना हो गया। शर्म से बोला। “हटाओ यार। माफ कर दो। आज साली कि�स्‍मत ही ख़राब है।” वह जिस तरह खिसियाकर वहाँ से क़रीबन रूहांसा हो कर चला उससे हरचरण को यक़ीन हो गया कि बादशाह जानी से उसको दाँव देने की कोशिश नहीं की थी।

वापसी में कहारों वाली गली पड़ी। बादशाह जानी के क़दम जम गए। जानी को देखकर बनावटी लगाव से उठकर खैर मकदम (स्‍वागत) को आई। अपने दो चार जानने वालों को नज़र अन्‍दाज़ करते हुए उसने बादशाह जानी के दोनों हाथ अपने हाथ में लिए और उसी तरह उसको कमरे में बिछे तख्‍़त के फर्श तक लाई और बड़ी तिरछी अदा से बोली।” क्‍यों जी लाए मेरा हार। आज मैंने इन्‍तिज़ार में अभी तक कोई गहना नहीं पहना है, चलो निकालो जल्‍दी से।”

बादशाह जानी ख़ामोशी से फ़र्श पर एक धब्‍बे को देखे जा रहा था। उसने इधर-उधर नज़र डाल कर यह न देख कि वहाँ नागर जी और शम्‍सी साहब दोनों दूध और बालाई में घुटी रामलाल का चमचा रतनसिंह मठारू शहनाई पर पूरबी धुन बजाने की कोशिश कर रहा था और सब लोग हँस रहे थे।

बादशाह जानी की ख़ामोशी से चाँदनी समझ गई। फिर भी जाहिरी तौर पर किसी तरह का असर लिए बगैर उसने तपाक से बादशाह जानी को बड़े लिहाज से बिठाया और पूरे तकल्‍लुफ के साथ उसके लिए चाँदी का वर्क लगी सिवइयाँ मँगाई। आस-पास बैठे लोग बादशाह जानी की इस मदारात पर खूब छींटे कस रहे थे मगर बादशाह जानी बिल्‍कुल जैसे बहरा और गूंगा था।

“लाना बरादर... ज़रा एक पनामा तो पिलाना।” बादशाह जानी को अब भी अन्‍दाज़ा न हुआ कि कोई उससे मुख़ातिब था, वह तो बराबर हरचरण की कसौटी के बारे में सोच रहा था।

“प्‍यारे नवाब। हमारी ईद कहाँ गई।” चाँदनी ने ऐसे बेतकल्‍लुफ और अजीब लहज़े में कहा कि बादशाह जानी चौंक उठा उसने जेब से रूमाल निकाल कर मुँह पोंछा और उसी रूमाल में सब कुछ लपेट कर चाँदनी के हाथों में पकड़ा दिया, और उसी तरह जल्‍दी से वहाँ से उठा जैसे पकड़े जाने का ख़ौफ हो।

वह मेरा पुराना साथी था। जब हम दोनों आठवीं जमाअत में पढ़ते थे तो वह घर से रुपए चुरा कर लाता था। हम दोनों स्‍कूल से भाग कर शहर के अच्‍छे-अच्‍छे होटलों में जाकर खूब उलल्‍ले-तलल्‍ले करते। बहुत से होटल वालों को अच्‍छी तरह अन्‍दाज़ा था कि हम चोरी करके पैसे लाते थे मगर उनको क्‍या पड़ी थी कि हमारे घरों में या स्‍कूल में जाकर शिकायत करते।

बादशाह जानी जब किसी तरह न सुधरा तो उसके बाप ने उसको घर से निकाल दिया। वह भी पलट कर न गया और शहर में गीला काम करने वालों के गिरोह में शामिल हो गया। मैं भी कई बार मेट्रिक फेल होने के बाद बंबई भाग गया। वहाँ बहुत दिनों आवारागर्दी के बाद मुझे काम मिल गया जिसमें मजदूरी करते हुए लीवर पूल पहुँच गया। वहाँ मैंने कई बरसों तक काम किया फिर अपना कारोबार शुरू कर दिया। मैं बड़े गोदामों से सामान लेता (जो ज़्‍यादातर चोरी का होता) और आस-पास कई लारियाँ हो गईं और फिर मैंने जायज तरीके पर ख�ुद बराहेरास्‍त सामान मँगाना शुरू कर दिया, जो मैं एशियाई दुकानदारों को सप्‍लाई करता। उस मुद्‌दत में मेरे पास इतना पैसा जमा हो गया कि सब लोग मुझको अच्‍छा आदमी समझने लगे। बहुत से लोगों ने मशहूर कर दिया कि मैं बहुत दीनदार और नमाज रोज़ा का पाबन्‍द अच्‍छा मुसलमान हूँ।

अब मैं बहुत बरसों बाद अपने शहर आया था। बादशाह जानी को मालूम नहीं कैसे ख़बर लगी, वह मुझसे मिलने आ गया और पुराने दिनों की बातें करते हुए मुझसे कहने लगा कि मैं उसको लंदन बुला लूँ।

हम लोग सहपहर शहीद स्‍मारक के पास एक होटल में बैठे थे। वह तरह-तरह की बातें करता रहा। मैं ज़्‍यादातर सुनता ही रहा, मेरे कई बार पूछने पर उसने बताया कि उस्‍ताद नेपोलियन शहर के हालात से बद दिल होकर कलकत्‍ता और बम्‍बई निकल गया पर वहाँ भी उसका काम बना नहीं।

‘क्‍यों। उसका वहीं तो काम बन सकता था। वह तो सचमुच का दादा था। उस्‍ताद था।”

“बम्‍बई के दादा लोगों में बड़ी तनातनी थी। हर बात में हिन्‍दू मुसलमान का मामला खड़ा कर दिया जाता था। हिन्‍दू लोगों ने उसको मुसलमान समझ कर बहुत मारा। दूसरी तरफ मुसलमान दादा लोग भी उस को हिन्‍दू समझते रहे। उन्‍होंने उसको घेर कर ऐसा मारा कि हाथ पैर तोड़ कर रख दिये।

“तो फिर अब वह कहाँ है?” मैंने अफसोस अमेज इश्‍तियाक के साथ पूछा। बादशाह जानी जैसे ख़ुद से बातें करते हुए बड़बड़ाया। “मर ही जाता तो अच्‍छा था।”

मैंने फिर बेवकूफ़ों की तरह पूछा “क्‍या मतलब?”

“मैंने बहुत दिन हुए उसको टोंडला के स्‍टेशन पर देखा था।”

“अरे तो वहाँ वह क्‍या कर रहा था।”

“वह वहाँ स्‍टेशन के बाहर एक टाट पर पड़ा भीख माँग रहा था। उसके हाथों में उँगलियाँ तो थीं ही नहीं। वह मुझको नहीं पहचाना। मैं भी जल्‍दी से उसके सामने से हट आया।”

थोड़ी देर हम दोनों बिल्‍कुल ख़ामोश रहे।

“तुम मुझको लंदन बुला लो... ऐसा हो सकता है?” उसने दरख्‍़वास्‍त भी की और साथ ही ख�ुद ही मुश्‍किलों के एहसास को इज़हार भी कर दिया।

“हो क्‍यों नहीं सकता... मगर... क्‍या किया जाए। भई, आज कल तो बड़ा बुरा वक़्‍त आ गया है।”

“हाँ यार... बड़ा बुरा वख़त है। बुरा वख़त है” उसने मेरी बात से इत्‍तिफाक किया

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