शनिवार, 29 दिसंबर 2012

मोहसिना जीलानी की कहानी - टेम्ज़ के फूल

DSCN1897 (Mobile)

टेम्‍ज़ के फूल

टेलीफ़ोन की पहली पुकार पर ही उसने लपककर रिसीवर उठा लिया- लेकिन उसे बड़ी निराशा हुई वो उसका फ़ोन नहीं था जिसका वो इंतज़ार कर रही थी।

एक फीमेल आवाज़ उसके कानों से टकराई।

“क्‍या मैं संजय से बात कर सकती हूँ?”

“मुझे अफसोस है- वो इस वक़्‍त घर पर नहीं हैं।” उसने जवाब दिया।

“क्‍या मैं पूछ सकती हूँ- आप कौन हैं?” दूसरी ओर से कहा गया।

“मैं उसकी माँ हूँ।”

दूसरी ओर लहजे़ में हैरानी ही हैरानी थी।

“माँ ...म ... मगर... मगर...।”

“मगर क्‍या ...?” उसने घबरा कर पूछा।

“वो तो कहता था...” वो कहते हुए हिचकिचा रही थी।

“क्‍या... क्‍या कहता था वो” सुदेश परेशान होकर बोली।

“वो कहता था कि उसकी माँ तो दो वर्ष पहले कैंसर से मर गई है। घर में सिर्फ उसकी हाउसकीपर है। क्‍या ये सब झूठ है?” वहाँ से कहा गया।

उसके शरीर का सारा ख़ून सिमटकर उसके सर में आ गया। उस एक पल में जैसे धरती-आकाश गुड़मुड़ हो गये हों। अंधेरा दुख और परेशानी... उसके सारे शब्‍द जैसे कहीं खो गये। समझ में नहीं आया कि क्‍या जवाब दे। बड़ी दृढ़ता से बड़ी हिम्‍मत और ख़ूबसूरती से उसने ख़ुद को संभाला। फिर ठहर-ठहर कर धीमे-धीमे स्‍वर में बोली, “यह तो वही बतायेगा- मैं कह भी क्‍या सकती हूँ।” न जाने कितनी देर तक वो यूँ ही गुमसुम टेलीफ़ोन के पास बैठी रही। तीसरा पहर धीरे-धीरे लँगड़ा कर चल रहा था। एक और उदास दिन गुज़रने की तैयारी में था।

“वो कहता है कि मैं मर गई हूँ ”- यह सोच सोच कर उसका दिल टुकडे़-टुकड़े हुआ जा रहा था। उसने अपनी ज़िन्‍दगी में न जाने कितने दुख भोगे थे। कितनी चोटें खाई थीं, लेकिन ये चोट सारे दुखों पर भारी थी।

बीस साल पहले की बात थी। जब उसके पति ने उसे अचानक छोड़ दिया था। एंजोप्‍लास्‍टी कराने हास्‍पिटल में दाखिल हुआ- और जब ठीक होकर बाहर निकला तो सुदेश के कथानुसार एक काली रात जैसी नर्स का हाथ थामकर अपने जीवन को रौशन कर लिया। मगर सुदेश और उसके बच्‍चे की राहों को अन्‍धेरा दे गया- उस समय संजय पाँच साल का था।

उत्तरी लन्‍दन में टेलीकोकार्नर की सड़कों पर मैंने अक्‍सर उसे चलते देखा था। उसके पैर में थोड़ी लँगड़ाहट थी। आमना सामना होता तो हमारी मुस्‍कुराहटों का आदान-प्रदान होता और फिर ये मुस्‍कुराहटों का आदान-प्रदान छोटी-छोटी बातों का रूप धरते चले गये- और लन्‍दन के मौसम से शुरू होकर ज़िन्‍दगी के मौसम तक जा पहुँचे। जब रंग, ज़बान और संस्‍कृति में थोड़ा बहुत मेल हो तो फिर परिचय की गुंजाइश नहीं रहती। मुझे यूँ लगा जैसे उसके सीने में दुखों का अलाव जल रहा हैऋ और दर्द में डूबी हुई कहानियाँ यूँ छूपी हुई हैं जैसे बांसुरी के सीने में दुखी आवाज़। वो अपना दुख सुनाने के लिये जैसे बेचैन नज़र आती और मैं सोचती कि यहाँ इन्‍सान कितना तन्‍हा है कि अपना दुख सुनने वाले कान नहीं मिलते।

सुदेश बता रही थी कि उसका वैवाहिक जीवन काँटों का बिछौना था। ख़त्‍म हुई तो दुख के साथ-साथ उसे सकून भी मिला। वास्‍तव में हम दोनों में दिमाग़ी तौर पर कभी समझौता न हो सका। पास रहते हुए भी हम बहुत दूर थे। छोटी-छोटी बातें, लड़ाई झगड़े का कारण बन जातीं और नौबत तलाक की धमकियों तक पहुँच जाती। घर में कभी सुकून और शांति न थी। बच्‍चा भी घबरा-घबरा कर हम दोनों का मुँह ताकता रहता। घर का माहौल हमेशा गम्‍भीर रहा करता। बच्‍चा छोटा था और मेरी माली परेशानियाँ, मैं ज़्‍यादा पढ़ी लिखी भी नहीं थी और मुझे नहीं पता था कि मेरे अधिकार क्‍या हैं? और जब मुझे अपने अधिकारों का ध्‍यान आया तो वो अपनी नई बीवी के साथ किसी दूसरे मुल्‍क जा चुका था। अगर मेरे पास कोई डिग्री होती तो कहीं अच्‍छी नौकरी तलाश करती- जब चारों ओर से बिल आने शुरू हुए तो मैंने घबराकर एक जनरल स्‍टोर में नौकरी कर ली- सारा दिन दुकान में खड़े-खड़े थक कर चूर हो जाती है और जब शाम को घर लौटती हूँ तो दुनिया सुनसान और तन्‍हा लगती है और मेरे पैर अलग जवाब दे गये हैं। पहले कम से कम इतना तो था कि हम दोनों की तू-तू मैं-मैं से घर में ज़िन्‍दगी के चिह्न तो थे। अपनी ही बात पर वो हँसने लगी। मैंने हमेशा यही महसूस किया कि वो अपने सारे दुख-दर्द सुनाकर बस हँस दिया करती थी- वो अक्‍सर कहा करती कि सेंस ऑफ ह्यूमर ही मेरा सेविंग ग्रेस है- अगर हँसूँ नहीं तो शायद मर जाऊँ - संजय बड़ी तेज़ी से बड़ा हो रहा था, उसका चेतन जाग्रत हो रहा था। उसके लिये बाहर और घर के वातावरण में कोई समानता नहीं थी। वो स्‍कूल न जाने के बहाने तलाश करने लगा। अक्‍सर उसकी तबीयत ख़राब रहने लगी- कभी वो स्‍कूल जाने के बजाये किसी शापिंग सेन्‍टर में सारा दिन गुज़ार कर छुट्टी के वक़्‍त घर आ जाता। एक दिन एक पुलिसवाले ने उसे पकड़ लिया। तुम यहाँ क्‍या कर रहे हो? उसने पूछा, स्‍कूल क्‍यों नहीं गये? और उस दिन उसने पहला झूठ बोला- मेरी माँ सख्‍़त बीमार है, उसकी दवा लेने आया हूँ। पोलिस वाला अच्‍छी तरह से जान रहा था कि बच्‍चा बहाना बना रहा है- उसने उसे थोड़ी सी वार्निंग दे कर छोड़ दिया- लेकिन उसका ग़लत मार्ग पर चलना जारी रहा। उसके दिमाग़ में हर वक़्‍त कुछ न कुछ चलता रहता। मेरा रंग काला है। मैं अपने दोस्‍तों से अलग हूँ। सब मेरा मज़ाक उड़ाते हैं, मुझे पीकी कह कर पुकारते हैं। और ये बातें वो माँ से छुपाता रहा। माँ उसे जितना समझाने की कोशिश करती उसका उल्‍टा ही प्रभाव उस पर होता। इस प्रकार माँ बेटे के बीच दूरियाँ बढ़ती गईं। छोटी उम्र थी तो उसने डाँट डपट कर अपने वश में रखा- लेकिन सोलह साल की आयु तक पहुँचते-पहुँचते वो हाथों से पूरी तरह से निकल गया। अब वो घर से कई कई दिनों तक ग़ायब रहने लगा। जैसे माँ ने उसे दुनिया में लाकर बड़ा पाप किया हो। जब घर आता तो ऐसा लगता जैसे वो घर आकर एहसान कर रहा हो। फिर एक दिन उसने ऐलान कर दिया कि वह स्‍कूल नहीं जायेगा। कहीं नौकरी तलाश करेगा और नौकरी की तलाश में वो हफ़्‍तों घर से ग़ायब रहा।

“इस मुल्‍क में अब मेरा कोई नहीं, तुम मुझे मत छोड़ना”- वो मुझसे कह रही थी।

“ये भला कैसे हो सकता है?” मैंने तसल्‍ली दी- “जब ठोकरें लगेंगी तो घर वापस आ ही जायेगा। बाहर की दुनिया में भी सुख-चैन नहीं है।”

उसने बड़ी निराशा से सर हिलाया, “मेरी तो किस्‍मत ही ख़राब है!” कहने लगी, “अम्‍मा कहा करती कि मेरी बच्‍ची की सूरत ऐसी है कि दिलों पर राज करेगी। हजारों में एक है और अब वो ज़िन्‍दा होकर यहाँ आ जाये तो मेरी शकल देखकर यकीनन मर जायेगी। आईना देखूँ तो अपनी शकल से ख़ुद ही डर जाती हूँ।” उसने एक बेजान क़हक़हा लगाया, “देखो ना इमारत पुरानी हो गई है। खिड़कियों के शीशे टूट फूट गये हैं- दीवारों से प्‍लास्‍टर उतर रहा है- छत टपक रही है, इमारत है कि अब गिरी तब गिरी और तो और, सुनोगी तो हैरान रह जाओगी। एक ज्‍योतिषी ने मेरा हाथ देखकर कहा था, इसके हाथ पैसों से कभी ख़ाली नहीं होंगे, दौलत की रेल पेल होगी। कितना सच कहा था उसने अब सारा दिन टल पर बैठे पैसे गिनती रहती हूँ। सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक हाथों में पैसा ही पैसा रहता है।” वो बड़ी निर्दयता से हँस रही थी, “शिमला में क्‍या नहीं था-भला? सबसे बड़ी चीज़ तो अपना ख़ानदान था। माँ-बाप, चार भाई, मोहल्‍ले वाले और सहेलियाँ। मगर मुझ बदनसीब को यहीं आना था। शायद मेरा भाग्‍य ही ख़राब था जो मुझे लन्‍दन ब्‍याह कर भेज दिया गया। अगर वही कहीं रहती तो इस आयु में यूँ तन्‍हा नहीं होती।”

“तुम कहती हो कि यहाँ तुम्‍हारा कोई नहीं है- पति ने छोड़ा और बच्‍चा भी ये सब कुछ कर रहा है- क्‍या तुम्‍हारे लिये ये ठीक नहीं रहेगा कि हिन्‍दुस्‍तान वापस चली जाओ कम से कम वहाँ ऐसी तन्‍हाई तो नहीं होगी।”

एक एक करके सब ही समाप्‍त हो गये। वो कह रही थी भाई अपने-अपने संसार की समस्‍याओं में उलझे हुए हैं और फिर... फिर उस समाज में मेरे लिये अब कोई स्‍थान नहीं है। शून्‍य कभी नहीं रहता, भर जाता है। और सच बात तो ये है कि अब मैं उस माहौल से कभी भी उबर नहीं पाऊँगी। देखो ना मुझे यहाँ रहते हुए तीस साल हो गये हैं। मुझे ये चारदीवारी ये दो बेडरूम का छोटा सा घर अच्‍छा लगता है- मुझे यहाँ का मौसम, यहाँ के लोग, यहाँ की चौड़ी साफ़ सुथरी सड़कें, यहाँ के पार्क, हरियाली, हरे भरे पेड़-लैंड स्‍केप सब कुछ अच्‍छा लगता है। और तो और मुझे अब तन्‍हाई भी बुरी नहीं लगती है- फिर अब तो मैं इसकी अभ्‍यस्‍त हो गई हूँ। अगर कोई बिना टेलीफ़ोन किये मेरे घर आ जाये तो मुझे ज़रा भी अच्‍छा नहीं लगता और अगर कोई लाइन तोड़कर मुझसे आगे निकल जाये तो मेरा दिमाग़ ख़राब हो जाता है- बेशक� ये छोटी-छोटी बातें हैं। जो मेरी आदत में रच बस गई हैं- और फिर सबसे महत्त्वपूर्ण बात यहाँ इन्‍सान की क�दर क�ीमत है- सोशल सेक्‍यूरिटी है। ये सब मेरी आवश्‍यकताओं में शामिल हैं और मैं इस सबकी आदी हो गई हूँ- फिर तुम ही बताओ मैं वापस जाकर क्‍या करूँगी?

वो बहुत निराशा भरे स्‍वर में बोले जा रही थी। फिर थोड़ा लहजा बदलकर बोली, “अगर कल को मर-मरा गई तो मेरे फूल गंगा में न सही कोई टेम्‍ज़ नदी में ही डाल देगा।” उसने दुख भरा एक क़हक़हा लगाया और उस एक पल में न जाने कितनी दूर पीछे की तरफ़ चली गई। मुझे वो तोता याद आ गया जो आंगन में एक पिंजरे में बंद रहता था और बहुत चालाक था- किसी के मुँह से बात निकली और उसने लपकी। पिंजरा काले अंगूरों की बेल के नीचे लटका रहता था कि ठंडक बनी रहे और तपती गरमी से बचा रहे। एकदम ड्‌यौढ़ी के पार हर आने-जाने वाले को टोकता। कौन है? कहाँ जाना है? किससे मिलना है? ये सभी वाक्‍य उसने मेरे दादाजी से सीखे थे। वह रट लगाए रहता- “मिट्‌ठू को रोटी दे दो, जमादारिन को रोटी दे दो, दिले नादां तुझे हुआ क्‍या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्‍या है?” किसी शायर भाई ने उसे यह मिसरा भी रटा दिया था। यह मिट्‌ठू मियां सभी के दुलारे थे। किसी भी समय आड़ी तिरछी आँखें करके और गरदन घुमा घुमा कर ये सारे वाक्‍य दोहराते और सारा परिवार मज़े लिया करता।

गर्मियों की एक चिलचिलाती दोपहर जब सब लोग ख़स की टटि्‌टयाँ और पंखों तले आराम फ़रमा रहे थे, मुझ पर रहम दिली का दौरा पड़ा। यह बेचारा क्‍यों कै़द में है? न संगी न साथी, न घोंसला और न ही बच्‍चे... तो मैं जले पैर की बिल्‍ली की तरह सहन में आई और ख़ामोशी से पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया। जाओ अब तुम आज़ाद हो, घोंसला बनाओ और साथी की तलाश करो और जल्‍दी से उड़ जाओ। उसने टेढ़ी गर्दन से मुझे देखा, आहिस्‍ता से बाहर निकला, एक पल जैसे कुछ सोच रहा हो और फिर फुदक कर अमरूद की टहनी पर जा बैठा। थोड़ी देर तक ख़ाली ख़ाली नज़रों से इधर उधर देखता रहा। फिर उड़कर नीम की सबसे ऊंची शाख पर जा बैठा। चल छुट्‌टी हुई अब आज़ाद हवा में साँस लेगा। मैं दिल ही दिल में बहुत खुश थी। किन्‍तु घर के सभी लोग नाराज़ और नाखुश थे। एक दिन उदासी में गुज़र गया। घर के दरो दीवार पर जैसे उदासी छा गई थी। मिट्‌ठू मियां के बग़ैर घर में पली हुई बिल्‍ली, कुत्ता यहां तक की तीतरी, मुर्ग़ियां सभी जैसे गुमसुम हो गये थे।

तीसरे दिन हम सबने हैरान होकर देखा कि मिट्‌ठू मियां वापिस आ गये थे और अमरूद की शाख़ पर आराम से बैठे झूल रहे थे। किसी ने जल्‍दी से पिंजरे का दरवाज़ा खोल दिया और वह खटाक से फुदक कर पिंजरे के अंदर..और मज़े से हरी मिर्च कचर-कचर चबाने लगे। और फिर वही आवाज़ कानों को भली लग रही थी। वही रटे-रटाए वाक्‍य, “मिट्‌ठू को रोटी दे दो, जमादारिन को रोटी दे दो, दिले नादां तुझे हुआ क्‍या है, आख़िर इस दर्द की दवा क्‍या है?” हाय बेचारा इस कै़द का आदी हो गया है। और इसे यही ज़िन्‍दगी पसन्‍द है।

“तुम ठीक कहती हो”- मैंने सुदेश से कहा था, “हम सभी इस पिंजरे के आदी हो गये हैं। हम जो अपनी ज़मीनों को छोड़कर नई ज़मीनों पर आबाद हो रहे हैं, अब हम कहीं और नहीं रह सकते, कहीं नहीं जा सकते। हमारी जगहें भर गई हैं। सभी रिक्‍त स्‍थान भर चुके हैं... ख़ालीपन कहीं नहीं रहता... और दूर शून्‍य में अन्‍धेरा ही अन्‍धेरा है।

सुदेश की अन्‍धेरी ज़िन्‍दगी में एक और तूफ़ान आ गया है। उसके दिल पर एक और घूंसा लगा जब उसने यह सुना कि संजय ने एक इतालवी लड़की से मंगनी कर ली है और वह जल्‍दी ही शादी करने वाला है।

“आख़िर बच्‍चे बड़े होकर इतने बदल क्‍यों जाते हैं?” वह कह रही थी। “यह मुझे इतना कष्‍ट क्‍यों दे रहा है?” कितनी सच्‍ची बात है कि जब बच्‍चे छोटे होते हैं तो उन्‍हें उठाकर बाज़ू दुखते हैं, और बड़े होकर वे दिल दुखाते हैं। दिन तो जैसे तैसे गुज़र ही जाता है लेकिन रात- जब तक नींद की गोली न ले लूं सो नहीं पाती। दिमाग़ सुन्‍न रहता है। कितनी बार उसके मोबाइल पर संदेश छोड़ा, मगर पलट कर नहीं पूछता, माँ कैसी है। मुझे यह भी नहीं पता वह किस हाल में हैं और कहाँ रह रहा है। आख़िर मेरा कुसूर क्‍या है?”

ज़िन्‍दगी इसी तरह घिसट रही थी कि एक दिन टेलीफोन की घण्‍टी बजी। दूसरी तरफ़ से कोई महिला थी, “मैं मारिया की माँ हूँ। माफ करना तुम्‍हारे बेटे ने हम सबसे बहुत झूठ बोले हैं। मेरी बेटी एक झूठे आदमी से शादी नहीं कर सकती। पोस्‍ट से मंगनी की अंगूठी वापिस भेज रही हूँ।” उसने बहुत शांति और ठहराव से बात सुनी। अगर वह मुझे मंगनी के बारे में बता देता, तो क्‍या मैं उसे मना कर देती? उसने सोचा ज़िन्‍दगी उसे बितानी है, मैं तो आज हूँ, कल न रहूँगी।

दूसरी सुबह उसे डाक से आए एक जिफी बैग में अंगूठी मिली... हीरे की वह अंगूठी जिसे वह महीनों तलाश करती रही थी। उसने अपना सर थाम लिया। चोरी करने के बजाय काश, वो मुझसे माँग लेता। शायद ये मेरे पिछले जन्‍म की सज़ा है- मैंने कोई बड़ा पाप किया है या फिर ये पागल हो गया है। नार्मल लोग इस तरह की बात नहीं करते। उसने निश्‍चित रूप से अपनी पहचान खो दी और मैंने उसे खो दिया। उसकी आँखों में न जाने कहाँ से ढेर सारे बादल उमड़ आये। वो रात बड़ी कष्‍टदायक थी। वो सुबह तक जागती रही और आँसुओं से तकिया भिगोती रही। सुबह उसका अंग-अंग दुख रहा था और आँखें रोने के कारण सूज गई थीं। कोशिश के बावजूद वो बिस्‍तर से उठ न सकी, उसने बिस्‍तर पर लेटे-लेटे ही फ़ोन कर दिया कि आज तबीयत ठीक नहीं है। काम पर नहीं आ सकूँगी और यूँ ही लेटे-लेटे न जाने क्‍या-क्‍या सोचती रही। प्रोग्राम बनाती रही- अगर संजय वापस घर आ जाये तो भगवान तुझसे वादा करती हूँ, उससे कुछ भी नहीं कहूँगी, उसके मनपसंद का खाना बनाकर खिलाऊँगी और उससे कह दूँगी कि अगर मैंने कोई ग़लती की है तो मुझे माफ़ कर दो। आख़िर को मैं तुम्‍हारी माँ हूँ। मैं तुम्‍हारा भला चाहती हूँ। तुम जो कहोगे वही होगा। तुम्‍हारी हर बात मानूँगी। जिससे भी शादी करना चाहोगे, मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी। मैं बहुत थक गई हूँ। काम, काम और एकांत जिंदगी एक लम्‍बी तन्‍हाई है। वो जागती आंखों से सपना देख रही थी- एक चाँद सी दुल्‍हन का सपना, नन्‍हें-मुन्‍ने बच्‍चों का सपना, समय के साथ साथ दादी और नानी बनने का ख़याल भी कितना ख़ुशगवार होता है। सपनों का क्रम अचानक टूट गया। दरवाज़ा खुलने की आवाज़ आई। पैरों की चाप जिन्‍हें वो अच्‍छी तरह से जानती थी। वो घर में दाखिल हुआ। तेज़, तेज़ क़दमों से चलता हुआ वो उसके कमरे में आया। उस वक़्‍त माँ का घर में होना आशा के विपरीत था। वो उल्‍टे पाँव बिना कुछ कहे अपने कमरे में चला गया। सुदेश का दिल जैसे गले में आ गया। वो ज़ोरों से चिलाई-‘संजय', और दौड़ती हुई उसके कमरे में जा पहुँची। वो सूटकेस में अपने कपड़े और किताबे ठूँस रहा था- “तुम फिर जा रहे हो?” वो उससे पूछ रही थी। उसके पैर बुरी तरह से काँप रहे थे। उसने क्रोध भरी नज़रों से माँ की तरफ देखा और गला फाड़ के चिल्‍लाते हुए बोला, “तुमने मेरी ज़िन्‍दगी तबाह कर दी। मेरा भविष्‍य बर्बाद कर दिया। मारिया ने मुझसे मंगनी तोड़ दी। ये सब तुम्‍हारी वजह से हुआ है।”

“तो तुमने पहले क्‍यों नहीं बताया कि तुमने मंगनी कर ली है और ये कि मैं मर चुकी हूँ।” वो गुस्‍से से चिल्‍लाई, “मैं उससे कह देती कि मैं तुम्‍हारी माँ नहीं, नौकरानी हूँ। माँ तो एक मुद्दत हुई मर चुकी है।” एक पल के लिये संजय का चेहरा लाल हो गया। फिर उसने कुछ कहे बिना अपना सूटकेस उठाया और अपने पीछे ज़ोर से दरवाज़ा बंद करता हुआ तेज़ी से बाहर निकल गया। इससे पहले कि वो उसे रोकती, उसके पीछे भागती वो कार में बैठकर फुर्र हो चुका था। वो हैरान और परेशान-सी हक्‍का-बक्‍का खड़ी की खड़ी रह गई। उसने अपने माथे को छुआ। ‘मैं ज़िन्‍दा हूँ या मर गई हूँ।' वो बड़बड़ाई। न जाने कब तक यूँ ही खड़ी रही जैसे एक सदी गुज़र गई हो। ज़िन्‍दगी का एक और उदास दिन गुज़र गया। बाहर खिड़की के शीशे के उस पार औरेन्‍ज ब्‍लासम के घने पेड़ों में थकी हुई हवा सिसकियाँ ले रही थी और आँसुओं में भीगा तीसरा पहर लँगड़ा-लँगड़ा कर चल रहा था।

..

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------