सोमवार, 31 दिसंबर 2012

प्रेम मंगल की कविता - दिल्ली बलात्कार कांड


दिल्ली रेप काण्ड
सुनकर ही लगता है जैसे शून्य हो गया हो ब्रम्हाण्ड,
सोचा नहीं जाता कुछ सुना नहीं जाता मूकबधिर सा हो गया है सारा ब्रम्हाण्ड

भारतीय संस्कृति
डूब गई है संस्कृति भारत की
मिट गई है शान सारी मानवता की
हद पार हो गई है अमानुषिक प्रवृत्ति की
खत्म हो चुकी है मर्यादा इस जहान की

जानवरों से भी बदतर हो गई है हवस जहां की
हवस नहीं गर ईर्ष्या थी तो हद पार हो गई उसकी
जलाते हो पुतला हर वर्ष रावण का
याद रखो कभी चीर हरण नहीं किया उसने सीता का

तुमने तो समाप्त कर दी एक भाई की आत्मा
खत्म कर दिया सारे जहां में जमीर पिता का
न तुम लायक हो पति बनने के
न तुम बन सकते हो पुत्र किसी के

न सम्मान माँ का तुम्हारी नजर में
न कलेजा भाई का तुम्हारे हृद्य में
न हीर रांझा सा प्यार तुम कर सकते
न कभी पिता सा धैर्य तुम रख सकते

शुम्भ निशुम्भ के लालच से गिरी नहीं देवी
चण्ड मुण्ड का संहार करने में पीछे नहीं रही यह देवी

बच्चियां सारी उन्ही देवीं का रुप है
गर बनोगे राक्षस बच नहीं पाओगे
लूट कर इज्जत बच्ची किसी की
क्या मिली शान्ति तुम्हें दिल की

 

बच्ची को कहा जाता है देवी
देवी ने बक्शा नहीं कभी राक्षसों को
चण्डिका कब बन जायेगी यह नारी
समझ नहीं पाओगे यह तुम सच्चाई।

 

                                                       प्रेम मंगल
                                                       कार्यालय अधीक्षक
                                                   स्वामी विवेकानन्द इंजीनियरिंग कॉलेज
                                                       इन्दौर म़.प्र.

3 blogger-facebook:

  1. कानून बना है गुलाम यहाँ
    जन-जन रावनातार है
    और किसी से आश ना कर
    बन रण चंडी तेरी इज्जत
    अब तू ही तारणहार है

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. Thanks.Happy Sakranti.10:15 am

      Thanks.Happy Sakranti.()

      हटाएं
    2. Thanks.Happy Sakranti.10:17 am

      ( Thanks Happy Sankranti )

      हटाएं

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