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मनोज 'आजिज़' की नव वर्ष पर एक ग़ज़ल - इक साल फिर

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नव वर्ष पर एक ग़ज़ल 

इक साल फिर ... (ग़ज़ल)

                   -- मनोज 'आजिज़'

इक साल फिर बीत गया उम्र भी ढली 

फिसल गए इतने दिन कर आँख मिचौली 

 

न साथ दे पाया काफ़िले-ख़्वाब को हमने 

सोचता हूँ कब हुई ख्वाहिशात भली 

 

ये भी सच जो बीत गया बात गयी 

पर रहते हैं ज़ेहन में यादें खट्टी मखमली 

 

आशनाई, फ़र्जो रहम क़त्ल हुए देखे गए 

कोई बताये क्या होनी कभी टली 

 

इक साल फिर आ गया नेमत इसे समझ 

छोड़ ज़िन्दगी की 'आजिज़' वो सँकरी गली 

  ---

नज़्म

           बस इसलिए ...

             

दीवारें फीकी पड़ रही थी 

झरोखों में पसरी थी धुंध 

नज़रों से ओझल था आसमान 

हवा भी दुबक बैठी थी 

                 दूर ऊँचे पहाड़ों पर।

मौजूद सिर्फ एक सिसक 

बरबस आहें 

अनकही पुकार 

और कुछ बेबस यादें।

ये हालत बस इसलिए 

कि हम बसे थे --

उम्मीदों के शहर में

 

--

जमशेदपुर 

झारखण्ड 

5 टिप्पणियाँ

  1. achhi ghazal o najam ke liye shukriya.
    waqt aur hatal achhe nahi hai kaya bat karun.
    chehre per hai gham-e-udasi mulakat kaise karun,
    yahi sochakar ki waqt to badlega hi
    sheyar her jajbat tumse kaise karun.
    -------saroj kant jha------

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. saroj ji apko meri rachanayen achhi lagi, shukriya. jahan tak halaat ki bat hai to yakinan ye bigdi hui hai par jina isi ka naam hai. hame apne din khud sudharne honge.
      Manoj 'Aajiz'

      हटाएं

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