गुरुवार, 24 जनवरी 2013

विजय शिंदे का आलेख - शिक्षा, धर्म और नैतिकता

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शिक्षा, धर्म और नैतिकता
                                   
                                    डॉ. विजय शिंदे
                                    देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद

    शिक्षा की शुरूआत प्राचीन काल में धर्म के आधार पर हो गई है। प्राचीन काल में शिक्षा और धर्म का नजदीकी संबंध था। धर्मगुरू द्वारा शिक्षा की प्राप्ति विद्यार्थियों को होती थी। धार्मिक तत्वों का प्रचार-प्रसार पुराणी पीढ़ी नई पाढ़ी के साथ करती थी। धार्मिक शिक्षा के कारण समाज में नैतिकता वास करती थी। सामाजिक जीवन पर धर्म का भय रहता था। अतः कोई भी अनुचित कार्य करने से व्यक्ति पर रोक लगती थी। लेकिन विज्ञान युग की शरूआत ने धार्मिक कल्पनाओं को झूठा साबित किया। धर्म में लोगों की जो आस्था थी वह अनास्था में परिवर्तित हो गई। जिस आस्था और चिंतन पर धार्मिक विचारों का ताना-बाना बुनना था वह हवा हो गया। धर्म का अर्थसंकोच होकर जाति और संप्रदाय तक सीमित हो गया। एक धर्म की दूसरे धर्म के प्रति जो उदारवादी दृष्टि थी वह नष्ट हो गई है। धर्म के कारण मनुष्य ने जिन नैतिक बंधनों को स्वीकृत किया था वे भी गायब हो गए और समाज नैतिक अधःपतन की कगार पर खड़ा हो गया है। ईश्वर के प्रति जो आस्था और आदरयुक्त भय था वह कम हो गया है। मनुष्य मुक्त होकर बिना भय गय से अनुचित कार्य करने लगा। आधुनिक जीवन में विज्ञान से नए-नए चमत्कार होने लगे, मनुष्य सुविधा-भोगी हो गया। स्पर्धात्मक युग की नई पहल साम्राज्यवाद का मुखौटा लेकर आक्रमण करने लगी है। विज्ञान से नए-नए शस्त्रों की निर्मिति होकर छोटी-मोटी लड़ाइयों से शक्तिमान राष्ट्रों ने अविकसित राष्ट्रों को गुलाम बनाया। परिणामतः पूरी दुनिया को दो विनाशकारी महायुद्धों का सामना करना पड़ा। जिस धार्मिक शिक्षा की वैज्ञानिकों ने अवहेलना की थी उसकी जरूरत इस विध्वंसकारी रूप को देखकर मुखरित होने लगी। समाजशास्त्रियों की सोच में नई क्रांति आ गई और धर्म, नैतिकता एवं शिक्षा के पारस्परिक संबंधों के बारे में विचार-पूनर्विचार होने लगे।
    धार्मिक शिक्षा का मुख्य आधार श्रद्धा, नीति और आचार माने जाते हैं। धर्म अनेक क्यों न हो लेकिन उनके मूल में यही तीन आधार कार्य करते हैं। भारत अनेक धर्मों का राष्ट्र है। उसकी धर्म निरपेक्षता तथा धार्मिक स्वातंत्र्य की कल्पना इन्हीं आधारों पर टिकी है। सभी धर्मों के रीति-रिवाज, परंपराएं अलग क्यों न हो लेकिन श्रद्धा, नीति और आचार विचार समान है। इन्हीं तत्वों को आधार बनाकर शिक्षा और धर्म को जोड़कर देखना चाहिए। समाज विघातक शक्तियां धार्मिक और भौतिक शिक्षा का विरोध करती हैं। उनका विरोध धार्मिक है; श्रद्घा, नीति और आचारों का नहीं। मनुष्य में मानवता जाग्रत करने का कार्य धार्मिक शिक्षा करती है। अतः धार्मिक विसंगतियों को हाशिए पर रखते हुए श्रद्धा, नीति और आचारों की शिक्षा मानवतावादी धर्म के लिए उपयोगी है। प्राचीन भारतीय शिक्षा में ऋषियों के आश्रमों और गुरुकुलों में ‘‘धार्मिक और नैतिक शिक्षा कुछ तो पुस्तकों और उपदेशों के आधार पर तथा कुछ आश्रमों में पारस्परिक सेवा, स्नेह और सहयोग के वातावरण से दी जाती थी, जिससे छात्र यह ज्ञान ग्रहण करते थे कि स्वयं असुविधा एवं कष्ट झेल कर भी दूसरों को सुख पहुंचना चाहिए तथा सहनशीलता का व्यवहार करना चाहिए।’’१ इस प्रकार की शिक्षा की नींव में न कोई धर्म, जाति तथा संप्रदाय कार्य करता है बल्कि मानवता की भावना कार्य करती है।
    भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन धार्मिक आंड़बर और नैतिक अधःपतन की समस्या जब जटिल बनती है तब सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठती है। कई बार सांप्रदायिक हिंसा ने भारत की राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुंचाई है। जब राष्ट्रीय एकता को खतरा निर्माण होता है तब धर्म, धर्म निरपेक्षता और नैतिकता चर्चा का विषय बनते हैं। ‘‘इन प्रसंगों ने केवल धर्म शास्त्रियों, राजनीतिज्ञों अपितु शिक्षाशास्त्रियों तथा विद्यार्थियों के संरक्षकों का ध्यान समय-समय पर आकर्षित किया है। भारत वर्ष में तो प्रत्येक सांप्रदायिक दंगे, छात्र आंदोलन व समाज की किसी भी बड़ी अप्रिय अथया असामाजिक घटना होने के समाचार मिलते ही इन प्रसंगों पर चर्चा प्रारंभ हो जाती है, और फिर शीघ्र ही उसे भूला भी दिया जाता है।’’२ इस प्रकार की उदासीनता भारतीय एकता को ठेस पहुंचाती है। अतः धर्म, नैतिकता और शिक्षा को जोड़ते हुए धर्म निरपेक्ष भावनाओं को बढ़ावा देना शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए। भारत जैसे अनेक धर्मी राष्ट्र के लिए धर्म निरपेक्षता को शिक्षा के साथ जोड़कर नैतिक और मानवतावादी शिक्षा देना बुध्दिमानी नीति है।
    हमारे देश में नीति नियम और अनुशासन था। यह नैतिकता धर्म और सत्य का पर्यायवादी बन गई है। नैतिकता का संबंध शारीरिक और आत्मिक आचरण के साथ जुड़ा है। उसकी सहायता से धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों का समन्वय होता है। ‘‘नैतिकता नीति से संबंधित है, जो रूढ में धर्म से बंधकर भी, विस्तृत अर्थ में सभी विषयों, अनुभवों को संस्पर्श करती है। यही वह घुंटी है, जिसके आधार पर भारतीय संस्कृति आश्रित है और यही वह निधि है जिसके कारण हम जगद्गुरू कहलाते थे।’’३ इस नैतिकता का दूसरे देशों ने अध्ययन और अनुसंधान किया है और राष्ट्रीयता और शिक्षा को जोड़कर देख रहे हैं। हमारे देश की शिक्षा नीति में इसकी उपेक्षा हो गई है। आज कल पढ़ाई में मूल्य शिक्षा का कई राज्यों की सरकार ने समावेश किया है, लेकिन वह मात्र कागजी और दिखावा बना है। आज धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक गिरावट आ गई है, अतः इससे उभरने के लिए नैतिक शिक्षा को धर्म और संस्कृति के साथ तालमेल बिठाकर प्रचार करने की आवश्यकता आ गई है। जो देश भौतिकवाद और विज्ञान की चकाचौंध में पैसों को महत्त्व देकर विकसित होने का प्रयास करता है, उसके विकास की प्रक्रिया अल्पकालिक और अस्थायी होती है। नैतिक शिक्षा के  बिना मनुष्य मानवतावादी दृष्टि से आत्मिक उन्नति नहीं कर सकता है। ‘‘शिक्षा की सार्थकता इसी में है कि जो लोग उसका लाभ उठाना चाहते हैं, उनकी मानवीयता तथा उनके नैतिक ताने-बाने को वह उदात्त तथा सशक्त बनाए।’’४ सामाजिक जीवन के चरमराते ढांचे को संभालने के लिए शिक्षा में शिष्टाचार तथा नैतिकता का महत्वपूर्ण योगदान रहता है।
    मानव जीवन आज विकास की उस चरमसीमा पर पहुंच चुका है जिसमें उसकी अहंवादी प्रवृत्ति तीव्रता से सामाजिक व्यवस्था को बाधा पहुंचाने लगी है। मानवीय व्यक्तित्व और क्रियाकलापों का संस्कारों के साथ संबंध टूट-सा गया है। जीवन में व्याप्त अधार्मिकता और अनैतिक प्रवृत्ति का मूलभूत कारण यही है कि शिक्षा के साथ धर्म और नैतिकता को जोड़ा नहीं गया है। निःसंदेह मानवतावादी धर्म पर आधारित नैतिक शिक्षा समय की मांग रही है।

संदर्भ संकेत
१. डॉ. वैद्यनाथ प्रसाद मिश्र - शिक्षा शास्त्र, पृ.१८९.
२. डॉ. सत्यपाल रूहेला - भारतीय शिक्षा का समाजशास्त्र, पृ.१२१
३. (सं.) डॉ. रामशकल पांडेय - भारतीय शिक्षा के विविध आयाम, पृ.१७५
   (शिक्षा में नैतिकता की आवश्यकता - डॉ. विनयकुमार पाठक)
४. डॉ. शंकर दयाल शर्मा - शिक्षा के आयाम, पृ.६८.

                                डॉ. विजय शिंदे
                                देवगिरी महाविद्यालय,औरंगाबाद.
                                फोन  :- ०९४२३२२२८०८
                                ई.मेल :- drvtshinde@gmail.com

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  1. "आज धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक गिरावट आ गई है, अतः इससे उभरने के लिए नैतिक शिक्षा को धर्म और संस्कृति के साथ तालमेल बिठाकर प्रचार करने की आवश्यकता आ गई है।"
    सुंदर लेख ...बधाई

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    उत्तर
    1. शिवकुमार जी धन्यवाद। आपने मेरे विचारों को ताकद प्रदान की। फिलहाल एक फैशन सा बन गया है की जहां नैतिकता का सवाल आ जाता है वहां युवकों को कटघरे में खडा किया जाता है। कल युवकों के हाथों में धर्म, नैतिकता, संस्कृति, शिक्षा...के अधिकार है,और आशा भी है कि युवक उन्हें बडी सफलता से निभाएंगे। दुनिया को शिकायत का मौका देंगे नहीं।

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  2. गहन विवेचना!! साधुवाद!!

    "धार्मिक शिक्षा का मुख्य आधार श्रद्धा, नीति और आचार माने जाते हैं। धर्म अनेक क्यों न हो लेकिन उनके मूल में यही तीन आधार कार्य करते हैं।"

    सत्य!!

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    उत्तर
    1. सुज्ञ जी बिल्कुल सही फरमाया। सभी धर्मों के मूल में श्रद्धा, नीति,आचार ही कार्य कर रहा है। आप और हम मिल कर आशा करें कि लोग धर्मों के साथ-साथ इन तीन आधारों का ईमानदारी से पालन करें।
      डॉ.विजय शिंदे

      हटाएं

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