गुरुवार, 17 जनवरी 2013

बृजेश नीरज की कविता - मित्र के नाम

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मित्र के नाम

जब

स्वप्न नदी के स्रोत

      सूख जाएं

शेष हो सिर्फ रेत

और उस पर चलते

पांव में छाले पड़ते हों

जब सम्बन्धों के कुएं

कटुता की मिट्टी

फेंकते हों

मन प्यासा रह जाए

जब बीते कल की

गीली लकडी सुलगाने पर

उससे उठता धुआं

मन की आंखों में

चुभता हो

आंसू छलक पड़ते हों

जब जीवन के कमरे में

खुद को अकेला पाओ

तड़प उठो

किसी के संग को

तब तुम्हें

मेरी आवश्यकता होगी

तुम बुलाना

मैं आऊंगा ।

          - बृजेश नीरज

Brijesh Kumar Singh

65/44, Shankar Puri,

Chhitwapur Road,

Lucknow-226001

Email-brijeshkrsingh19@gmail.com

20 blogger-facebook:

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 19/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  2. achhi kavita hai Brijesh ji.jaari rakhen.
    Manoj 'Aajiz'

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  3. ACHCHHI LAGI,MITRATA KEE PARIBHASHA KO PURN KARATI HAI.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति....बहुत बहुत बधाई...

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत अच्छे प्रतीकात्मक ढंग से भावों की प्रस्तुति की है आपने...
    बधाई हो आपपको!

    उत्तर देंहटाएं
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    बधाई हो आपपको!

    उत्तर देंहटाएं
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    बधाई हो आपपको!

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    बधाई हो आपपको!

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत अच्छी प्रतीकात्मक भाव पूर्ण कविता...
    बधाई आपको!

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छी प्रतीकात्मक भावपूर्ण कविता...
    बधाई आपको!

    उत्तर देंहटाएं
  11. बहुत अच्छी प्रतीकात्मक भावपूर्ण कविता...
    बधाई आपको!

    उत्तर देंहटाएं
  12. बहुत अच्छी प्रतीकात्मक भावपूर्ण कविता...
    बधाई आपको!

    उत्तर देंहटाएं

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