शनिवार, 19 जनवरी 2013

उमेश मौर्य की लघुकहानियाँ

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॥ घटिया - लघुकहानी ॥

एक बार मेरे एक मित्र ने कहा - यार एक चप्‍पल खरीदना थी। मैंने कहा - इसमे कौन सी बड़ी बात है। एक से बढ़कर एक बढ़िया से बढ़िया चप्‍पल मार्केट में है। खरीद लाते है। उन्‍होंने कहा- नहीं यार घटिया से घटिया चप्‍पल चाहिए। इतनी की इससे घटिया कोई चीज न हो।

मुझे विस्मय हुआ कारण पूछा। उन्‍होंने खिन्‍न भाव से कहा- यार मेरे यहॉ चोरी बहुत होती है। बहुत ही घटिया किस्‍म के लोग है। आज लाओ, तो कल गायब। इसलिए सोचता हूं कोई घटिया चप्‍पल ही खरीद लूं।

मुझे थोड़ा हॅसी आयी , फिर सोचकर बोला- तब तो आप नंगे पैर ही रहो। क्‍योंकि अब के समय में आदमी से घटिया कोई चीज नहीं मिलेगी। वो फिर चिन्‍ता में डूब गये।

॥ नमक ॥

शर्मा जी अपनी बीबी को अक्‍सर डॉटते रहते थे। ये काम ऐसा नहीं करती, वैसा नहीं करती, कोई भी सामान ठीक से नहीं रख सकती। देखो यादव जी की पत्‍नी कितने सलीके से रहती है। खाना भी कितना स्‍वादिष्ट बनाती है। बातें भी कितनी मीठी करती है।

शर्मा जी बोलने के कोई न कोई बहाने ढूंढते रहते थे। उस दिन शर्मा जी की छुट्‌टी थी। घर पे ही थे। मिसेज शर्मा बेटी को स्‍कूल छोड़ने जाते समय बोली- सुनो जी, मैंने सब्‍जी गैस पे रख दी है। थोड़ा देख लेना। मैं मुन्‍नी को स्‍कूल छोड़ कर आती हूं। नमक भी नहीं डाला है। डाल देना या मैं आके नमक डाल दूंगी।

अब शर्मा जी पसीने-पसीने हो गये। मारे गुस्‍से के रसोई घर में जा खडे़ हुए। क्‍या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था। जैसे -तैसे सब्‍जी बनाई। आत्‍मसम्‍मान की बात थी । नमक क्‍या बड़ी बात है, जो वो खुद आके डालेगी। बहुत सोच विचार के नमक भी डाल दिया। पन्‍द्रह मिनट में ही शर्मा जी के हाल बेहाल हो गये।

आज शर्मा जी खुशी से फूले न समा रहे थे। सब्‍जी जो बनाया था। खुशी-खुशी दोनों साथ में खाना खानें बैठे। जैसे ही दोनों ने पहला निवाला मुंह में डाला। रूके के रूके रह गये। पत्‍नी ने एक व्‍यंग्‍य की मुस्‍कान छेड़ी। शर्मा जी आज कुछ न बोले। क्‍योंकि सब्‍जी में नमक बहुत ज्‍यादा हो गया था। फिर दोनों खिलखिला के हॅस पड़े।

- उमेश मौर्य, सराय, भाईं, सुलतानपुर, 0प्र0। वर्तमान - कुवैत मे।

Mail ID- ukumarindia@gmail.com

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