शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

रमा शंकर शुक्ल का संस्मरण - मेरे मूर्तिकार -02

मेरे मूर्तिकार-02
डा0 रमा शंकर शुक्ल
बीए का आखिरी साल था। ठण्ड चरम पर थी। हमारी कक्षाएं सुबह 6.30 से शुरू होती थीं। हम आठ भाई-बहन थे, जिनका खर्चा सामान्य किसान पिताजी को निकाल पाना आसान न था। उस पर भी पिताजी के स्वाभिमान का कड़ा अनुशासन। सो हम किसी से कुछ स्वीकार भी नहीं करते थे।


उन दिनों केबी कालेज के प्राचार्य हुआ करते थे डा0 सुधाकर उपाध्याय। बड़े दबंग और कानूनी आदमी। कालेज में किसी की हिम्मत न होती कि उनके सामने खड़ा भी हो जाए। वे कुछ शिक्षकों के साथ बैडमिन्टन खेल रहे थे। घंटी खाली थी, सो हम लोग वही खड़े होकर  उनका खेल देखने लगे। मेरे शारीर पर महज हाफ शर्ट, पैंट के अलावा चप्पल थी। कान भी ढंका न था।


डा0 उपाध्याय ने अचानक खेल बंद करने को कह दिया। वहाँ से सीधे मेरे पास आकर खड़े हो गए। मैं अचकचा गया। कुछ न सूझा तो झुक कर पाँव छू लिया। उनकी एक ख़ास आदत थी, किसी के प्रणाम का उत्तर न देते थे। मैं डर गया की क्लास न लेने पर दण्डित करेंगे। लेकिन यह क्या उन्होंने कुछ पूछने की बजाय कंधे पर हाथ रख दिया और बड़े प्रेम से बोले, "का हो तोहके जाड़ ना लागत हौ?"


मैं संकोच में सिमट गया, नहीं सर, ठण्ड नहीं लग रही थी। सो ऐसे ही चला आया।
अगला सवाल, पिताजी क्या करते हैं?
जी किसान हैं। खेती-बारी करते हैं।
घर कहाँ है, कितने भाई बहन हो? जैसे कुछ सवाल पूछ डाले। फिर बोले, मेरा घर देखे हो?


जी।
तो बेटा शाम को पांच बजे आ जाना। कुछ काम है तुमसे।
पूरा दिन चिंता, आशंका और उद्विग्नता में बीत गए। शाम को डर और संशय के साथ उनके घर पहुंचा। वे कुछ लोगों से बात कर रहे थे। देखते ही वही रुकने का इशारा किये और घर में जाकर एक पोलिथिन ले कर आ गए। उसमे से स्वेटर निकालते हुए बोले, ल एके पहिन ला। हम जानीला की तू स्वाभिमानी हउव। पर हमका आपन बड़ भाई मानि लेब त तोहै दुःख ना होई।


हमें काटो तो खून नहीं। न ना कह सकता था और न हाँ।
डा0 उपाध्याय शायद हमारे असमंजस को समझ रहे थे। बोले, अरे भाई हमारी जिंदगी तो तुलसीदास की तरह गुजरी है। पता नहीं कितने लोगों ने मिलकर मेरा निर्माण किया है। मैं भी आपका गुरु हूँ। यह स्वाभिमान का मामला नहीं है। गुरु और पिता में कोई फर्क नहीं होता।


वह स्वेटर लेकर मैं कमरे पर लौट तो आया, पर ह्रदय में एक हुक सी उठ गयी। भीतर से कोई पुकारता था, जिस गुरु ने तुम पर इतनी करुणा बरसाई है, उसके प्रेम और विश्वास का ख्याल रखना। बस उसी दिन से जीवन साधक हो गया। आज मैं जो कुछ हूँ, डा0 उपाध्याय का उसमे बहुत बड़ा योगदान है।

1 blogger-facebook:

  1. बहुत सुंदर संस्मरण। गुरु की कठोरता के बजाय उसकी एक उदार छवि को उभरता हुआ संस्मरण। बधाई! यदि आप सूरत से निकलने वाली 'संस्कार सुगंध'द्विमासिक पत्रिका में ऐसा कुछ 'जिसने मुझे बिगाड़ा ' स्तंभ के लिए भेजें तो हम आभारी होंगे। ई-मेल पता है--dr.gunshekhar@gmai.com
    आपका
    डॉ॰गुणशेखर

    उत्तर देंहटाएं

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------