सोमवार, 11 फ़रवरी 2013

गिरिराज भंडारी की 7 ग़ज़लें

[ 1 ]

दामिनी को श्रद्धांजलि

मैं हर एक दिल में छाला देखता हूँ ,                 

किसने कैसे सम्हाला देखता हूँ  

 

कई राणा, कई हैं लक्ष्मी बाई ,

सभी हाथों में भiला देखता हूँ ।

 

जगह वो , तू जहाँ पाई गई थी,

वहां मैं इक शिवाला देखता हूँ ।

 

दमक से दामिनी की कल बुनोगे,    

बहुत मजबूत जाला देखता हूँ ।

 

समय है ,जाग जाओ पहरे दारों,

तुम्हारा मुंह मैं काला देखता हूँ ।

 

सियासत भूल के कुछ कर भी गुज़रो,

बना सबको निवाला देखता हूँ ।

 

अँधेरा हाँ बहुत गहरा था लेकिन ,

क्षितिज पर मैं उजाला देखता हूँ ।

 

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गिरिराज भंडारी

 

[ 2 ]

कहाँ से लाऊं ?

बहुत चुभने लगा है आज, ये सवाल नया,

किस तरह आज मनाऊँ कहो ये साल नया ?

 

घाव अब तक हरे हैं, टीस अभी बाकी है,

हुआ जो राजपथ में , याद है वो हाल नया ।

 

जहाँ है दर्द का कारण, क्या वहीँ मरहम है?

कहाँ से लाऊं नई सोच लिए भाल नया ?

 

समय चुप्पी का नहीं,जोर से चिल्लाओ सभी, 

सुलगते दिल में ,समा जायेगा ख़याल नया ।

 

सियासी मंत्रणा और बयानबाजी थोथे हैं , 

हर इक प्रयत्न से पैदा हुआ बवाल नया l

 

बूढ़ा समाज है बीमार, फिर भी अपना है,

जवान खून चढ़ा दो, करो कमाल नया l

 

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गिरिराज भंडारी

 

[ 3 ]

बस आपसी सम्बन्ध है

प्रवाह में है कुछ रुकावट या निकासी बंद है ,

या नदी तालाब सी है , इसलिए दुर्गन्ध  है ।

 

अब नियम से कुछ नहीं होता है भाई जान लो ,

तुमने दिया, मैंने लिया बस आपसी सम्बन्ध है ।

 

शक्तिशाली ना समझ हैं, और समझ बेहोश है ,

अब पुकारे कौन किसको हर कोई अपंग  है ।

 

चाल कछुवे की तरह धीमी है रक्षा पंक्ति की,

और  भागा जो लुटेरा तीव्रतम तुरंग  है ।

 

हाथ जोढ़े गिडगिडाते आये थे, चौखट में वो,

बंद फाटक हैं सभी के, ये सियासी रंग  है ।

 

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गिरिराज भंडारी

 

( 4 )

छोड़ दे बाँह मेरी , ख़ुद मुझे सम्हलने दे

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इलाज-ओ -मुदावा अभी से ,  रहने दे ,   मुदावा=उपचार

ज़रा सा दर्द तो बढ़ने दे ,अभी सहने दे।

 

जो मंज़ूर है, बुलंद सर का झुक जाना,

तो अंजुमन में मुझे , मेरी बात कहने दे।

 

तय है, कभी सड़ जाएयेगा ठहरा पानी,

किसी बहाने से, कभी तो इसे बहने दे।

 

तेरे मैख़ाने की लग्ज़िश नहीं है ,ऐ साक़ी,  लग्ज़िश=लड़खड़ाना

छोड़ दे बाँह मेरी , ख़ुद मुझे सम्हलने दे।

 

साथ चलते हुए , रस्ते बदल भी जाते हैं,

जब तक जो चले साथ , उसे चलने दे।

 

ये दिल प्यार समझने के कहाँ क़ाबिल है,

ग़मों की गोद में कुछ और अभी पलने दे।

 

खिज़ां की क़ैद से मैं, बहार छीन लाया हूँ,

अब बड़े शौक़ से,फ़ूलों को अभी खिलने दे।

 

( 5 )

कर के देखो ये हवन कुछ, और है

अंदर तक की ये जलन,कुछ और है,
दिल को लगी ये चुभन,कुछ और है।


कल कही थी बात, वो कुछ और थी,
कांटी छांटी ये कथन, कुछ और है।


कुछ भला परिणाम आएगा ज़रुर,
हर तरफ़ लगी लगन, कुछ और है।


प्रकृति का हर दृश्य कुछ सिखा रहा,
नागों भरा, संदली वन, कुछ और है।


नगर- नगर, हर डगर,  देखा असर,
अब के जो लगी अगन,कुछ और है।


गर्त में जाती दिखी है सभ्यता,
अब हवाओं में चलन कुछ और है।


ख़ुद के अन्दर भस्म कर कुरीतियाँ,
कर के देखो ये हवन कुछ, और है।


हर नदी,तालाब,सागर,जल ही जल,
इस देश में गंगो-जमन कुछ और है।


पर देश के नक़्क़ाल, वहाँ की सुनो,
आबो-हवा,रहन-सहन कुछ और है।


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गिरिराज भंडारी

( 6 )

फ़िर कमी दिख रही, अकुलाहट में
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अब हम ना आयेंगे तेरी चौखट में,
तू चाहे हर चीज़ देदे, हमें फ़ोकट में।


भीड़ प्रायोजित ना रही हो शायद ,
कुछ भी वो बोले नहीं घबराहट में।


हे भगवान ! मैं ही ग़लत हो जाऊं,
फ़िर कमी दिख रही, अकुलाहट में।


दरवाजे अब खोलना है,चुन चुन कर,
फ़र्क कर कर के सभी आहट में।


पेट फिर किसी ने, भर दिया शायद,
पहले सा वो ग़ुस्सा नही गुर्राहट में।


बचा रखे थे कभी ,आपदा प्रबंधन को,
वो सारे ख़र्च हुए, बाहरी सजावट में।


थाने से बढ़ी बात अदालत गई ,
जाने क्या पा गये, मेरी मुस्कराहट में


गिरिराज भंडारी

( 7 )

ये सारा जहाँ, और ये वतन आपके,
दश्तो दरिया और ये चमन आपके ।---दश्त =जंगल


ये ऐशो आराम,और ये खुशी आपकी,
ये शीतल पवन,ये वातावरण आपके।


इज्ज़त आपकी है, शोहरत आपकी ,
हम तो हैं,बरबाद-ए-वतन आपके ।


ये सुरक्षा, ये ऊँची दीवारें आपकी,
ज़र्रे ज़र्रे में दिखते हैं, जतन आपके ।


ये रस्ते, ये गलियाँ, ये नगर, आपके
इन शहरों के हर इक भवन आपके ।


तहरीर आपकी ये जुबां आपकी,  तहरीर=लेख
महफ़िल आपकी, अंजुमन आपके।


ख़ुद अपने लिए जो सिले थे कभी,
दिए आज से, सब कफन आपके।


गिरिराज भंडारी

6 blogger-facebook:

  1. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि कि चर्चा कल मंगलवार 12/213 को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां स्वागत है

    उत्तर देंहटाएं
  2. हौसला अफजाई के लिए आप का शुक्रिया,सच में मेरी हिम्मत बढ़ी,मैं बहुत दूर भिलाई ,छत्तीसगढ़ में रहता हूँ,पहुंचना तो मुश्किल है ।

    पुनः धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी7:47 pm

    सभी गज़लें बहुत अच्छे हैं . खासकर " छोड़ दे बाहं मेरी खुद मुझे सम्हलने दे" बहुत अच्छी रचना लगी ।
    कपीश चन्द्र श्रीवास्तव

    उत्तर देंहटाएं
  4. गज़लें बहुत अच्छे हैं "कर के देखो ये हवन कुछ, और है" बहुत अच्छी रचना लगी ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. गर्त में जाती दिखी है सभ्यता,
    अब हवाओं में चलन कुछ और है।


    उत्तर देंहटाएं
  6. गर्त में जाती दिखी है सभ्यता,
    अब हवाओं में चलन कुछ और है।
    ye line achhi lagi

    उत्तर देंहटाएं

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