मुरसलीन साकी की ग़ज़लें

मुरसलीन साकी

(1)

जिस दिन गमे जहां से दिल आशना हो जायेगा।

उस दिन सलीका जिन्‍दगी का खुद ब खुद आ जायेगा

 

छट जायेंगी चमन में फैली हुयी वीरानियां

हर फूल फिर बहार के नगमें गुनगुनायेगा

 

मजहबों के नाम पर गर वो लड़ाना छोड़ दें

फिर अमन का बोलबाला चार सू हो जायेगा।

 

जब अदालत में सियासत की ही चलती चाल है

कौन फिर उनके सितम को आईना दिखलायेगा।

 

साकी नहीं आसान मन्‍जिल, राह है कांटों भरी

क्‍या ये समझा अभी मन्‍जिल को तू पा जायेगा

 

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(2)

दिल मेरा बेखबर था अभी दौर आयेगा

थी मुझको क्‍या खबर की कोई और आयेगा।

 

मुझ पर तो तेरी याद ने ऐसा असर किया

अब मुझको सजा देने भला कौन आयेगा।

 

हर वक्‍त तसव्‍वुर में तेरा अक्‍स रूबरू

तेरे सिवा ख्‍यालों में क्‍या गैर आयेगा।

 

तन्‍हा ही चल रहा हूं रहे जिन्‍दगी पे मैं

अब बनके हमसफर की तरह कौन आयेगा ।

 

इक टूटा आईना है मेरी जिन्‍दगी यहाँ

इस आईने में सजने भला कौन आयेगा।

 

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मो0 मुरसलीन साकी

मो0 न0 9044663196

लखीमपुर-खीरी (उ0प्र0)

पिन0- 262701

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2 टिप्पणियाँ "मुरसलीन साकी की ग़ज़लें"

  1. Saaki ji Apki Gagal achhai lagi,

    मजहबों के नाम पर गर वो लड़ाना छोड़ दें

    फिर अमन का बोलबाला चार सू हो जायेगा।

    umesh maurya

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  2. जबरजस्त गज़ले ,मन को गहराई तक छूने वाली शानदार .शुभकामनाये ,बहुत बहुत साधुवाद

    उत्तर देंहटाएं

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