गुरुवार, 21 फ़रवरी 2013

सुनिल डहाळे का आलेख - दिनकर की कविताओं में राष्ट्रीयता के स्वर

दिनकर की कविताओं में राष्ट्रीयता के स्वर
डॉ.सुनिल डहाळे
हिन्दी विभाग
विनायकराव पाटील महाविद्यालय
वैजापूर जिला औरंगाबाद.

दिनकर हमारे युग के यदि एक मात्र नहीं तो सबसे अधिक प्रतिनिधि कवि है ।’’१ किसी साहित्यकार का जीवनदर्शन उसके व्यापक दृष्टिकोण का परिचायक होता है । जिसके फलस्वरुप वह व्यक्ति
समाज, राष्ट्र, आत्मा, परमात्मा आदि के बारे में चिन्तन करता हैं । दिनकर सहज रुप से विनयशील थे । उनका व्यक्तित्व आडम्बर रहित था । वे स्पष्टवादी थे । एक स्थान पर उन्होंने लिखा है -
’’सच्चाई की पहचान की पानी साफ रहे,
जो भी चाहे, ले परख जलाशय के तल को,
गहराई का वे भेद छिपाते है केवल
जो जान-बूझ गंदला कर

राष्ट्रीयता का अर्थ किसी देश की भौगोलिक सीमा के भीतर निर्वासित जन-समूह की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना के समन्वित स्वरुप से है । राष्ट्रीयता एक ऐसी भावना है, जो देश की जनता को संगठित करती है, गुलामी के दिनों में स्वतंत्रता की चेतना फूँकती है, मुक्ति संग्राम में मर मिटने का आव्हान करती है और कवियों तथा रचनाकारों को राष्ट्र, जाति और धर्म की रक्षा के लिए आन्दोलन जगाने और राष्ट्र पर सर्वस्व समर्पण की भावना भरनेवाली रचनाएँ लिखने का प्रोत्साहन भी देती है ।
    श्री भगवतीचरण वर्मा ने लिखा है कि, ’’दिनकते अपने जल को ।’’२
    मिथ्यावादी बनकर उन्हें अपने जल को  गंदला करना अभीष्ट नहीं था । महाकवि एवं लोकप्रिय नेता होने का रंज मात्र भी अहंकार नहीं था । वे अपने समीक्षकों के प्रति भी उदार भावना रखते थे । क्रोध एवं दया की भावनाएँ उनमें त्वरित गति से आवेश में रुपान्तरित हो जाती थी । उनकी अधिकांश कविताएँ क्रोध एवं आवेश के फलस्वरुप लिखी गयी थी । क्रोध उनकी सृजनात्मक प्रक्रिया का प्रेरणा स्त्रोत रहा है ।
काव्य में राष्ट्रीय भावना की चर्चा दिनकर के बगैर अधुरी है । दिनकर छायावाद की उपज नहीं थे बल्कि उनका उदय उस धारा से हुआ था जो भारतेन्दु, मैथलीशरण गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी, सुभद्राकुमारी चौहान, माखनलाल चतुर्वेदी और बालकृष्ण शर्मा ’नवीन’ से बहती आ रही थी । दिनकर छायावादोत्तर काल के श्रेष्ठतम कवि है और साथ ही वे एक श्रेष्ठ काव्य चिन्तक और समर्थ समीक्षक भी थे । उन्होंने छायावाद की शक्ति को ग्रहण करके और उसके अभाव तथा दोषों का निरिक्षण करते हुए अपना काव्य मार्ग निर्मित किया है ।
    १९३६ के आसपास देश में समाजवादी विचारधारा का प्राबल्य हुआ और काँग्रेस के बडे-बडे नेता भी समाजवादी जीवनदर्श की बात करने लगे । यह वह समय था जब देश में स्वतंत्रता की भावना प्रबल होती जा रही थी । ब्रिटिश शासन का दमनचक्र और शोषण अधिकाधिक तीव्र होता जा रहा था । देश की आर्थिक और समाजिक दशा अधिकाधिक शोचनीय होती जा रही थी । ऐसे युग और परिवेश की सहज स्वाभाविक माँग थी कि कविता धरती के नजदीक आये और कवि आकाशचारी मात्र होकर न रहे ।
    युग की इस आवाज को दिनकर जैसे जागरुक कवियों ने अपनी पूरी चेतना से सुना था और रचनाओं में प्रतिध्वनित किया । रेणुका के प्रारम्भिक गीत में ही उन्होंने कवि का भूचारी होने का संदेश दिया है । विदेशी शासन देश की तरुणाई को जब ललकारता हो, देश की विपन्न मानवता पर जुल्मों भरा गुलामी का जुआ लदा हो उस समय कविता आकाशचारी नहीं हो सकती -
    ’दिल्ली और मास्को’ नामक कविता में दिनकर ने मास्को की वन्दना उसी पूजा और निष्ठा भाव से की है, जैसे हिन्दू काशीधाम और मुसलमान मक्का शरीफ की किया करते है -
’’अरुण विश्व की लाली, जय हो,
लाल सितारोंवाली, जय हो
दलित, दुभुक्ष विषण मनुज की शिखा रन्द्र मतवाली जय हो ।’’३
दिनकर की राष्ट्रीय कविताएँ जन साधारण में अत्याधिक लोकप्रिय हैं । कविवर ने समय की माँग के अनुसार अपने राष्ट्रीय उत्तरदायित्वों का वहन किया है । ’रेणुका’ से लेकर ’उर्वशी’ तक का प्रत्येक काव्य ग्रंथ राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत है । रेणुका, हुँकार, सामधेनी की अधिकांश कविताओं में पराधीनता के प्रति आक्रोश, साम्राज्यवादी दुर्दशा का चित्रण एवं क्रांति की प्रेरणादायक ’हुंकार’ स्पष्ट सुनाई देती है । बाद के काव्य संग्रहों ’नीम के पत्ते,’, नील कुसुम, उर्वशी, परशुराम की प्रतिक्षा आदि में राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा तथा भारत के उज्ज्वल भविष्य की कामना निहित है । ’चक्रवाल’ की भूमिका में कवि ने अपने उद्गार प्रकट करते हुए लिखा है - ’’राष्ट्रीयता मेरे व्यक्तित्व के भीतर से नहीं जन्मी, उसने बाहर से आकर मुझे आक्रान्त किया । उस समय सारा देश उत्साह से उच्छल और दासता की पीडा से बेचैन था । अपने समय की धडकर सुनने को मैं जब भी हृदय से कान लगाता, मेरे कान में किसी बम के धडाके की आवाज आती, फाँसी पर झूलने वाले किसी नौजवान की निर्भीक पुकार आती अथवा मुझे दर्द भी ऐठन की वह आवाज सुनाई देती जो गांधीजी के हृदय में चल रही थी, जो उन सभी राष्ट्रनायकों के मन में चल रही थी, जिससे बढकर मैं और किसी को श्रध्देय नहीं मानता था ।’’
    इस कथन से स्पष्ट है कि उस समय कवि एक ओर तो उग्रदल से प्रभावित था और दूसरी ओर वह गाँधीवादी विचारों को भी श्रध्दा की दृष्टि से देखता था ।४
    दिनकर की राष्ट्रीयता आरम्भ से ही क्रांतिगर्भित रही है, जिसमें पराक्रम ओज एवं विस्फोटक प्रलय की अग्नि सतत, सुलगती रही है । ’ जनता लगी हुई है’ कविता में मुक्ति की बाजी जीतने के लिए जीवन को मरण के दाँव पर लगाने की ललकार लगाता हुआ कवि कहता है -
’’खेल मरण का खेल,
मुक्ति की यह पहली बाजी है
सिर पर उठा वज्र,
आँखों पर ले हरि का अभिशाप
अग्नि-स्नान के बिना धुलेगा नहीं राष्ट्र का पाप ।’’५
    स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात क्रांति का स्वर कुछ मन्द पड गया था और विद्रोह की आग लगभग बुझ गई थी । इसी के फलस्वरुप १९६२ ई. में चीनी आक्रमण हुआ, तब कवि दिनकर का यह क्रांतिकारी स्वर पुनः ’परशुराम की प्रतीक्षा’ काव्य में गूंज उठा और कवि ने भारत के प्रसुप्त पौरुष को जगाया -
’’सामने देशमाता का भव्य चरण है,
जिव्हा पर जलता हुआ एक, बस प्रण है,
काटेंगे अरि का मृण्ड कि स्वयं कटेंगे,
पीछे, परन्तु, सीमा से नहीं हटेंगे ।’’६
    ’रेणुका’ में संग्रहित ’हिमालय के प्रति’ दिनकर की राष्ट्रीय भावना को प्रकट करनेवाली कविता है । १९३३ में लिखित यह कविता प्रत्येक भारतीय में राष्ट्रीय चेतना निर्माण करने वाली ओजपूर्ण शैली में लिखी हुई कविता है कवि हिमालय की महत्ता और गौरव का गुणगान कर भारत भूमि की रक्षा करने की अपील करता है -
’’उस पुण्यभूमि पर आज तपी
रे ! आन पडा संकट कराल;
व्याकुल तेरे सुत तडप रहे,
डस रहे चतुर्दिक विविध व्याल !
मेरे नगपित ! मेरे विशाल !’’७
    ’जनता जगी हुई है’ कविता में कवि जन-चेतना की विप्लवी शक्ति के उद्रेक की कामना कर रहा है । उनका कहना है कि राष्ट्र के बाहर और भीतर कपटी, कुटिल, कृतघ्न, आसुरी महिमा के मतवाले लोग गाँधी के शांति-सदन में आग लगाने का प्रयास कर रहे हैं । इनको सबक सिखाना अब आपदधर्म बन गया है । अब अग्नि-स्नान के बिना इस राष्ट्र का पाप नहीं धुलेगा । जनता को अब जागना ही होगा । परशुराम को नवीन अवतार में शस्त्र उठाना ही होगा ।
’’ओ गाँधी के शान्ति-सदन में आग लगानेवाले !
कपटी, कुटिल, कृतघ्न, आसुरी महिमा के मतवाले ?
वैसे तो, मन मार शील से हम विनम्र जीते हैं,
आततायियों का शोणित, लेकिन, हम भी पीते हैं ।
मुख में वेद, पीठ पर तरकस, कर में कठिन कुठार,
सावधान ! ले रहा परशुधर फिर नवीन अवतार ।’’८
    ’परशुराम की प्रतीक्षा’ संकलन की कविताओं में स्वातंत्र्योत्तर भारत की दुर्दशा के प्रति कवि मन का आक्रोश प्रकट होता है । ’समर शेष है’ कविता में कवि का मन आजाद भारत को भूखा देखकर बेचैन हो उठता  है । दिल्ली में बैठे इस देश की सत्ताधारी नेताओं की भारत की दुर्दशा का हाल कविता के माध्यम से स्पष्ट करने की कोशिश कवि करता है -
’’सकल देश में हालहल है, दिल्ली में हाला है,
दिल्ली में रौशनी, शेष भारत में अँधियारा है ।’’९
    दिनकर की दृष्टि में सच्ची राष्ट्रीयता दुसरों पर आक्रमक स्वरुप नहीं ग्रहण करती, बल्कि विश्व बन्धुत्व की एक स्वस्थ्य और सशक्त कडी बन ज़ी हैं । उनके चिन्तन में राष्ट्र ही नहीं समस्त मानवता समाहित है । हिंसा और युध्द की कवि घृणित कर्म मानता है और मैत्री, त्याग और सहिष्णुता को सर्वोपरि महत्व देते हुए राष्ट्रीय कंठ से विश्व मानवता का राग अलापता है । इसलिए डॉ. अवधनारायण त्रिपाठी के अनुसार - ’’दिनकर की राष्ट्रीय उपलब्धियों को देखते हुए इस राष्ट्रीय काव्य-युग को दिनकर की संज्ञा देना सर्वथा समीचीन है ।’’१०
संदर्भ :
१.    रामधारीसिंह दिनकर, मम्मनाथ गुप्त, पृष्ठ १५
२.    राष्ट्रकवि दिनकर और उनकी साहित्य  साधना, सम्पा. प्रतापचंद्र जैसवाल, पृष्ठ ६९
३.    छायावादोत्तर काव्य, डॉ. कृष्णचंद्र वर्मा, पृष्ठ ७
४.    दिनकर का काव्य, द्वारिका प्रसाद सक्सेना, पृष्ठ ११
५.    दिनकर : परशुराम की प्रतीक्षा, पृष्ठ. २०
६.    वहीं, पृष्ठ १४
७.      काव्य सागर, हिंदी पाठ्य समिति, डॉ.बा.आं.म. विश्वविद्यालय, औरंगाबाद पृष्ठ २७
८.       साहित्य सागर हिंदी पाठ्य समिति, डॉ.बा.आं.म. विश्वविद्यालय, औरंगाबाद पृष्ठ ८८
९.       वहीं, पृष्ठ ८९
१०.    राष्ट्रकवि दिनकर और साहित्य  साधना, सम्पा. प्रतापचंद्र जैसवाल, पृष्ठ ४७

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