बुधवार, 13 फ़रवरी 2013

शशांक मिश्र भारती के बालगीत

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ः-

हम बच्‍चे

कण-कण में भर देंगे खुशियाँ

मेहनत करके हम,

मिल-जुल कर सब काम करेंगे

फिर काहे का गम।

अपनी मेहनत रंग लाएगी

महकेगा परिवेश,

हर्ष- स्‍वरों की गूँज उठेगी

चहकेगा यह देश।

छोटे-छोटे हम हैं, पर

मन के हैं निर्मल भोले,

घुल-मिल जाते हैं उनमें

जो हंसकर हमसे बोले॥

--

 

रात ठण्‍ड की

रात ठण्‍ड की बहुत बड़ी है,

सहज नहीं है अधिक कड़ी है।

ठण्‍ड सताए सही न जाए,

और धूप भी पास न आए।

सहमे-सहमे सभी खड़े हैं,

दांत बजें, कंप-कंपी बंधाये।

मुश्‍किल जीना, सर्द महीना,

सिर पर ठण्‍डक बर्फ जमाये।

पंखें-कूलर बन्‍द पड़े सब,

चाय-समोसा सर्दी के संग।

कोहरे की भी अकड़ बढ़ी है,

रात ठण्‍ड की बहुत बड़ी है॥

--

 

उससे भी क्‍या डरना जी

लड़ाई-झगड़ा नहीं किसी से

आदर सबका करना जी,

जो आंधी रोज है आती

उससे भी क्‍या डरना जी।

परिश्रम ही जीवन का रस्‍ता

उस पर सबको चलना जी,

मिलें सफलता बड़ी-बड़ी

बाहों में हो खुशियां जी,

जियो और खुशहाल रहो

तकरार कभी न करना जी

अच्‍छा-बुरा सभी का होता

उससे भी क्‍या डरना जी॥

--

 

चिड़िया के बच्‍चे

छोटी सी एक प्‍यारी चिड़िया

मेरे आंगन आई,

छोटे-छोटे अपने बच्‍चे

साथ चुगाने लाई।

उसके छोटे-छोटे से बच्‍चे

फुदक-फुदक कर चुगते,

अपनी मां के करतबों को

देख-देख डग भरते।

चिड़िया चुगती है जब दाना

हैं वह भी दाना चुगते,

अपनी मां को उड़ता देखकर

हैं वह भी पीछे उड़ते।

--

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ.प्र.

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