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दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - एक हसीन बस का सफ़रनामा

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एक  हसीन बस का सफ़रनामा उस समय मेरी मोटर साइकिल की स्पीड 70 किमी/घंटा के आस -पास  रही होगी। सामान्यता दो पहिया वाहनों को जिस तेज़ गति से चल...

एक  हसीन बस का सफ़रनामा

उस समय मेरी मोटर साइकिल की स्पीड 70 किमी/घंटा के आस -पास  रही होगी। सामान्यता दो पहिया वाहनों को जिस तेज़ गति से चलाने वाले व्यक्तियों को मैं असामाजिक तत्वों में गिनता हूँ , उसी  गति से चलना उस समय मेरी मज़बूरी बन गई  थी और मज़बूरी क्यूँ न हो मामला जो इतना गंभीर था। मुझे हर हाल में उस एक मात्र बस को पकड़ना था, जिसे इस अति पिछड़े ग्रामीण क्षेत्र में चलाकर परिवहन विभाग ने अपनी समस्त ज़िम्मेदारियों से मुक्ति पा ली थी।

आखिरकार मैं उस गड्ढेदार ऊबड़-खाबड़ सड़क पर पहुँच ही गया जो इस ग्रामीण क्षेत्र को शेष भारत से जोड़ती थी। सड़क के ही नजदीक वह स्थान था जहाँ पहले से ही पचासों और लोग खड़े होकर बस के आने का इंतज़ार कर रहे थे। वहां प्रथम और द्वितीय विश्व युद्धों के बीच के समय की तरह शीतवार वाला  कुछ व्यक्त और कुछ अव्यक्त भयावह तनाव फैला हुआ था।  जिस तरह प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के बीच के समय में हर देश दूसरे देश को शक, प्रतिस्पर्धा और डर की नज़र से देख रहा था,ठीक  उसी तरह वहां मौजूद हर व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को देख रहा था। मैंने अपनी मोटरसाइकिल अपने छोटे भाई को थमाई और उस भीड़ का हिस्सा बन गया।

लगभग आधा घंटा इस तनाव पूर्ण माहौल में बस का इंतज़ार करते बीते होंगे कि अचानक कुछ अति जागरूक  लोग रोड की उस दिशा की तरफ भागने लगे जिधर से बस आने वाली थी। पहले मैं कुछ समझ नहीं पाया पर थोड़ी देर बाद जब मुझे उसी दिशा से बस जैसी कोई आकृति नज़र आने लगी तो मैं भी सम्पाती जैसी दूर दृष्टि  वाले उन व्यक्तियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका। जैसे त्रेता में सम्पाती ने समुद्र के उस पार बैठी सीता को दूर से ही देख लिया था, उसी प्रकार वे व्यक्ति भी बस को दूर से ही देखकर पहले बस पर चढ़ने के लिए उसी दिशा में भागने लगे थे। थोड़ी देर बाद पहले से ही लगभग भरी हुई बस   हमारे नज़दीक आकर रुकी।  उसके रुकते ही वहां एक जलजला-सा आ  गया। चारों ओर  से यात्री बस में घुसने लगे, कुछ गेट से, कुछ खिड़की से, जो जहाँ जरा सा भी स्थान पा रहा था वहां से अन्दर जाने की जुगत में लगा था और धन्य हैं इस देश की वीर महिलाएँ  जो एक हाथ में अपना बच्चा लिए -लिए  रानी लक्ष्मीबाई की तरह दुश्मनों को चीरते हुए बस मेन धँसने  में सफल हो गई थीं । लेकिन इतनी ज्यादा मारामारी देख कर मैं तो सहम गया और शहर जाने के अपने निर्णय पर पुनः विचार करने लगा। शहर में आवश्यक कार्य होने के कारण मैंने अपने आप को सम्हाला और उस प्रतिस्पर्धा में शामिल हो गया। अपने पूर्वजन्मों  के पुण्य और अपने पूर्वजों के आशीर्वाद की बदौलत आखिरकार मैं भी उस बस में स्थान पाने में सफल हो गया। एक बात तो है हमारी भारतीय बसों का मॉडल ज़रूर 'पुष्पक विमान' , जिसके बारे में कहा जाता है कि उस विमान में चाहे जितने लोग बैठते थे  पर उसमें एक सीट हमेशा खाली ही रहती थी, का विकसित जमीनी प्रारूप  है ।पुष्पक विमान की तरह ही  भारतीय बसें भी  कभी फुल नहीं होती हैं, उनमें एक क्या अनेक  यात्रियों के लिए जगह सदैव बरकरार रहती है। 

मैं अपने इन्हीं  विचारों में खोया हुआ और उस भरी भीड़ में दबा कुचला साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की तलाश कर रहा था कि उसी समय अचानक ड्राइवर की सीट की तरफ से जोर-जोर से गालियों की बौछार होने लगी।  स्त्री जननांगों  पर आधारित कुछ पारंपरिक तो कुछ नवीन आविष्कृत गालियाँ सुनकर मैं इतना तो समझ ही गया कि  हम भारतीय और किसी विषय में मौलिक और सृजनात्मक हों चाहे न हों पर गालियों के मामले में हमसे ज्यादा सृजनधर्मी  विश्व में कोई दूसरा नहीं है। कुछ  देर बाद मुझे पता चला कि इस गाली- गलौज का मूल उत्स या कारण वे लोग थे जो ड्राइवर की सीट वाली खिड़की से अन्दर घुस रहे थे।  उनके इस अपावन आचरण से  ड्राइवर साहब के चरण घायल हो गए ।इसी से वे अपना आपा खो बैठे थे और जंग शुरू हो गयी थी।

कुछ समझदार अवसरवादी व्यक्तियों ने मामले को शांत कराया जिससे कि  ड्राइवर बस स्टार्ट करने की  प्रक्रिया शुरू कर सके। यहाँ यह उल्लेख उत्तर प्रदेश के निवासियों को भले ही अनावश्यक लगे  पर अन्य  देश वासियों को यह बताना ज़रूरी है कि उत्तर प्रदेश परिवहन निगम की बसों को स्टार्ट करने के लिए एक लम्बी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है , जिसमे सबसे पहले ड्राइवर रूपी बस का पुजारी किसी देवी-देवता को अगरबत्ती से मनाता है। कभी-कभी ख्वाजा साहब भी याद किए जाते जाते हैं। उन्हें लोबान सुलगा और आँखें मूँद कर रिझाया जाता है। इसके आधे घंटे बाद  आँखें खुलीं तो खुलीं नहीं तो बंद आँखों से ही चाभी लगाकर दसों बार खुल चुके बस के इंजन को जगाने की कोशिश की जाती  है।  इस जागरण प्रक्रिया में यात्रीगण भी बड़ी भूमिका निभाते हैं । वे भी ड्राइवर के साथ-साथ अपने-अपने इष्टों का ध्यान करते हैं। यह सब होने के बाद सारे यात्रियों से उतारने का अनुरोध किया जाता है।कुछ बेहया मर्द और औरतें लाख प्रार्थनाओं के बावजूद अपना वज़ूद बस मेन ही बनाए रखने में विश्वास रखते हुए अपनी-अपनी सीटों को जकड़े बैठे रहते हैं। तदुपरान्त कुछ युवा यात्रियों को धक्का देने के लिए आमंत्रित किया जाता है। प्रायः अंत में धक्का मार-मार के कुम्भकरण की तरह सोये हुए बस के इंजन को जगा ही लिया जाता है। इस तरह दुर्गा ,बजरंगबली या अली की जय-जयकार के साथ बस रवाना हो जाय तो ठीक वरना दूसरी किसी बस का ऐलान हो जाता है। सभी तरफ भागमभाग मच जाती है ।

इस पूरी प्रक्रिया को ग्रामीण क्षेत्र का हर यात्री आत्मसात कर चुका है ।  इसलिए उसे बहुत ज्यादा कष्ट नहीं होता और वैसे भी कष्ट, वेदना, प्रसन्नता, आदि भाव महसूस करने की चीज़े हैं, महसूस करो तो हैं न करो तो नहीं है। इस तरह इस पूरी प्रक्रिया का अक्षरशः पालन करने के बाद बस स्टार्ट हुई और उसके चलते ही बस में बैठे हुए यात्रियों ने जोर का नारा लगाया "बोलो बजरंग बली की जय।"

बस की स्थिति को देखते हुए मुझे भी लगा कि  इसे शहर तक पहुंचने के लिए वाह्य बल (बजरंग बली) की आवश्यकता जरुर पड़ेगी इसलिए मैंने भी जयकारे में सहयोग किया। 

कुछ छिटपुट मारपीट, गाली गलौज की घटनाओं के बीच उस बस रूपी यातना शिविर में लगभग 8 घंटे बिताने के बाद आखिरकार शहर के बस स्टेशन पर मैं उतरा।

बस स्टेशन पर दो तरह की प्रजातियों का जमावड़ा अधिक होता है, ये दो प्रजातियाँ हैं चोर और भिखारी।

वैसे तो ये प्रजातियाँ पूरे शहर में फैली हैं पर अपने पूर्ण कौशल को प्रदर्शित करने के लिए बस स्टेशन जैसी भीड़ भाड़ वाली जगह को ये प्रजातियाँ सबसे उपयुक्त मानती हैं।शहर के इस बस स्टेशन पर इन दोनों प्रजातियों में से कोई एक आपको न मिले ऐसा असंभव है और हुआ भी वही, मैं बस के नीचे उतरकर ये चेक करने में लगा था कि मेरे शरीर के सभी अंग मेरे पास हैं या कुछ बस ही में छूट गए हैं की अचानक एक छह साल का बच्चा मेरी टाँगों में आकर लिपट गया और चिल्लाने लगा "बाबू  पैसा दे दो ...भगवान तुम्हारा भला करे। " वहीँ थोड़ी दूर बैठी उसकी माँ कि आँखों में ये नज़ारा देख कर कुछ वैसी चमक आ गई  जैसी एक पैदायशी किसान की आँखों में पहली बार अपने बेटे को खेत जोतते देखकर आती है। 

मैंने उस बच्चे  को टालने की कोशिश की लेकिन तभी उसने ऐसी बात कही जो मेरी तरह किसी भी बेरोजगार आदमी से कहकर कोई भी व्यक्ति पैसे ऐंठ सकता है। असल में वो बच्चा मेरी नौकरी लग जाए  ऐसी दुआ दे रहा था, मैंने तुरंत पैसे देकर उसका आभार व्यक्त किया। उससे मैंने अपना पिंड छुड़ाया ही था कि दूर खड़े टेम्पो स्टैंड के दो ड्राइवर भागते हुए मेरे  पास आये और पूछने लगे "कहाँ जायेंगे साहब ....अमीनाबाद, कैसरबाग, आलमबाग, अलीगंज।" उसको छेंक कर दूसरा ड्राइवर मुझे लगभग घसीटता हुआ अपने टेम्पो की तरफ ले जाते हुए बोला, " आप जहाँ जायंगे मैं ले चलूँगा आप मेरे साथ चलिए।" 

मैं जब तक पूरी स्थिति समझने की कोशिश करूँ तब तक दोनों ड्राइवर मुझे लेकर आपस में झगड़ने लगे।

पहला- "मैंने पहले सवारी देखी  थी। "

दूसरा- " तो क्या मैं पहले सवारी के पास पहुँचा था इसलिए इस पर मेरा हक है।" इस वार्तालाप के अवसान से पहले दोनों में खूब जमकर हाथापाई भी हुई । कुछ लातों और घूसों के उपहार मुझे भी मिले।

किसी तरह मैं अपनी उखड़ी हुई साँसों को व्यवस्थित करके उन दोनों से अपनी जान बचा अपने नज़दीक से गुज़र रहे एक टेम्पो पर जाकर लगभग लेट गया। लगा कि जैसे किसी बड़े पुण्य के चलते जान बची है वरना जेब या गले में से कुछ भी कट-फट सकता था।


शहर के टेम्पो वालों, आर टी ओ ऑफिसर्स तथा शहर वासियों के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता-सा हुआ लगता है। समझौता ये है कि टेम्पो की 3 व्यक्तियों वाली सीट पर 4 बैठेंगे। 3 व्यक्ति जो पहले बैठ जाते हैं उनको तो थोडा आराम रहता है परन्तु चौथा व्यक्ति अवैध संतान की तरह पूरे सफ़र भर अपने हक़ की सीट के लिए संघर्ष करता रहता है।


मुझे टेम्पो ड्राइवर के बगल वाली सीट मिली और यहाँ भी तीन की सीट पर ड्राइवर सहित 4 लोग बैठे थे। ड्राइवर के बगल वाली सीट पे बैठने के आप तभी योग्य हो सकते हैं जब आप अपने शरीर को 'अष्टावक्र' ऋषि की भांति कई स्थानों से मोड़ सकें तथा ड्राइवर की बकवास में हाँ में हाँ मिला सकें।


इस टेम्पो ड्राइवर की उम्र लगभग 18 साल रही होगी और वो अपने टेम्पो को इस तरह चला रहा था मानो वो टेम्पो  न होकर अमेरिका के राष्ट्रपति का विमान 'एयर फ़ोर्स वन' हो, जिस पर मिसाइल का भी असर नहीं होता। हवा से बाते करते टेम्पो में उसने टेप रिकॉर्डर ऑन कर दिया जिसमें एक लोकप्रिय भोजपुरी गायक का द्वि अर्थी गाना चल  रहा था। जिसका एक अर्थ तो महान कवि कबीर के निर्गुण से भी ज्यादा गूढ़ था तथा दूसरा अर्थ  निहायत ही अश्लील था, जिसमें  प्रेमी अपने प्रेयसी के आगे अपने प्रेम का प्रस्ताव रख रहा था।


थोड़ी दूर चलने पर टेम्पो एक जाम में फँसगया, फिर क्या था चारों ओर हॉर्न बजाने का कम्पटीशन शुरू हो गया। इसी  ऊहापोह में टेम्पो ड्राइवर ने थोड़ा आगे बढ़ने की कोशिश की ही थी कि एक कार वाला व्यक्ति जिसकी कार टेम्पो के बगल में थी,उसने बहुत जोर से टेम्पो ड्राइवर को गाली दी। टेम्पो वाला समझे या न समझे परन्तु मैं उस कार चालक की वेदना समझ सकता था। भला कार वाला ये कैसे बर्दाश्त कर सकता था कि एक टेम्पो उससे आगे निकल जाये। अचानक उसी जाम में फंसे एक रिक्शेवाले ने जैसे रिक्शे को टेम्पो से आगे ले जाने की कोशिश की, टेम्पो चालक ने अपने ऊपर पड़ी समस्त गालियों को चक्रवृद्धि ब्याज सहित उस रिक्शा चालक को सौंप दीं। सामंतवाद का इससे अच्छा  उदाहरण कहाँ मिल सकता है, जहाँ एक वर्ग अपने से  उच्च वर्ग द्वारा शोषित होकर भी इसलिए खुश था क्योंकि वह भी अपने से निम्न वर्ग का  शोषण कर सकता था।


उस रिक्शा चालक पर गालियों की बौछार करने के बाद टेम्पो ड्राइवर गर्व से मेरी तरफ देख कर मुस्कुराया, जवाब मुझे भी मुस्कुराकर देना था। मैं अपने शरीर की बची हुई समस्त शक्ति की बदौलत मुस्कुराने में कामयाब रहा।


अंत में वो भी क्षण  आया जब मेरी यात्रा की पूर्णाहुति हुई । मैं अपने गंतव्य स्थान जो कि शहर में ही किराये पर लिया हुआ एक घर था, तक पहुँच चुका था। अपने शरीर को लगभग ढोते हुए मैंने अपने कमरे में प्रवेश किया। मेरे मित्र ने जो कि  मेरे साथ ही रहता था, मुस्कुराकर मेरा स्वागत किया


और पूछा, " सफ़र कैसा रहा?"


उसके इतना कहते ही लाइट चली गयी। मैंने उसके प्रश्न के जवाब में उस पर केवल एक नज़र डाली और बिस्तर पर ढेर होते हुए उस पंखे के परों को तोलने  लगा जो पंगु होने के बावजूद ईश कृपा से गिरिवर को जीतने का उपक्रम कर रहे थे यानी बहुत ही धीरे-धीरे घूम रहे थे।
                                                                                              

  -----दीपक शर्मा 'सार्थक'

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नारायण,1,आरकॉम,1,आरती,1,आरिफा एविस,5,आलेख,3793,आलोक कुमार,2,आलोक कुमार सातपुते,1,आशीष कुमार त्रिवेदी,5,आशीष श्रीवास्तव,1,आशुतोष,1,आशुतोष शुक्ल,1,इंदु संचेतना,1,इन्दिरा वासवाणी,1,इन्द्रमणि उपाध्याय,1,इन्द्रेश कुमार,1,इलाहाबाद,2,ई-बुक,326,ईबुक,182,ईश्वरचन्द्र,1,उपन्यास,257,उपासना,1,उपासना बेहार,5,उमाशंकर सिंह परमार,1,उमेश चन्द्र सिरसवारी,2,उमेशचन्द्र सिरसवारी,1,उषा छाबड़ा,1,उषा रानी,1,ऋतुराज सिंह कौल,1,ऋषभचरण जैन,1,एम. एम. चन्द्रा,17,एस. एम. चन्द्रा,2,कथासरित्सागर,1,कर्ण,1,कला जगत,105,कलावंती सिंह,1,कल्पना कुलश्रेष्ठ,11,कवि,2,कविता,2744,कहानी,2070,कहानी संग्रह,245,काजल कुमार,7,कान्हा,1,कामिनी कामायनी,5,कार्टून,7,काशीनाथ सिंह,2,किताबी कोना,7,किरन सिंह,1,किशोरी लाल गोस्वामी,1,कुंवर प्रेमिल,1,कुबेर,7,कुमार करन मस्ताना,1,कुसुमलता सिंह,1,कृश्न चन्दर,6,कृष्ण,3,कृष्ण कुमार यादव,1,कृष्ण खटवाणी,1,कृष्ण जन्माष्टमी,5,के. पी. सक्सेना,1,केदारनाथ सिंह,1,कैलाश मंडलोई,3,कैलाश वानखेड़े,1,कैशलेस,1,कैस जौनपुरी,3,क़ैस जौनपुरी,1,कौशल किशोर श्रीवास्तव,1,खिमन मूलाणी,1,गंगा प्रसाद श्रीवास्तव,1,गंगाप्रसाद शर्मा गुणशेखर,1,ग़ज़लें,484,गजानंद प्रसाद देवांगन,2,गजेन्द्र नामदेव,1,गणि राजेन्द्र विजय,1,गणेश चतुर्थी,1,गणेश सिंह,4,गांधी जयंती,1,गिरधारी राम,4,गीत,3,गीता दुबे,1,गीता सिंह,1,गुंजन शर्मा,1,गुडविन मसीह,2,गुनो सामताणी,1,गुरदयाल सिंह,1,गोरख प्रभाकर काकडे,1,गोवर्धन यादव,1,गोविन्द वल्लभ पंत,1,गोविन्द सेन,5,चंद्रकला त्रिपाठी,1,चंद्रलेखा,1,चतुष्पदी,1,चन्द्रकिशोर जायसवाल,1,चन्द्रकुमार जैन,6,चाँद पत्रिका,1,चिकित्सा शिविर,1,चुटकुला,71,ज़कीया ज़ुबैरी,1,जगदीप सिंह दाँगी,1,जयचन्द प्रजापति कक्कूजी,2,जयश्री जाजू,4,जयश्री राय,1,जया जादवानी,1,जवाहरलाल कौल,1,जसबीर चावला,1,जावेद अनीस,8,जीवंत प्रसारण,129,जीवनी,1,जीशान हैदर जैदी,1,जुगलबंदी,5,जुनैद अंसारी,1,जैक लंडन,1,ज्ञान चतुर्वेदी,2,ज्योति अग्रवाल,1,टेकचंद,1,ठाकुर प्रसाद सिंह,1,तकनीक,30,तक्षक,1,तनूजा चौधरी,1,तरुण भटनागर,1,तरूण कु सोनी तन्वीर,1,ताराशंकर बंद्योपाध्याय,1,तीर्थ चांदवाणी,1,तुलसीराम,1,तेजेन्द्र शर्मा,2,तेवर,1,तेवरी,8,त्रिलोचन,8,दामोदर दत्त दीक्षित,1,दिनेश बैस,6,दिलबाग सिंह विर्क,1,दिलीप भाटिया,1,दिविक रमेश,1,दीपक आचार्य,48,दुर्गाष्टमी,1,देवी 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कुमारी,1,रेवती रमण शर्मा,1,रोहित रुसिया,1,लक्ष्मी यादव,6,लक्ष्मीकांत मुकुल,2,लक्ष्मीकांत वैष्णव,1,लखमी खिलाणी,1,लघु कथा,226,लघुकथा,808,लतीफ घोंघी,1,ललित ग,1,ललित गर्ग,13,ललित निबंध,18,ललित साहू जख्मी,1,ललिता भाटिया,2,लाल पुष्प,1,लावण्या दीपक शाह,1,लीलाधर मंडलोई,1,लू सुन,1,लूट,1,लोक,1,लोककथा,306,लोकतंत्र का दर्द,1,लोकमित्र,1,लोकेन्द्र सिंह,3,विकास कुमार,1,विजय केसरी,1,विजय शिंदे,1,विज्ञान कथा,57,विद्यानंद कुमार,1,विनय भारत,1,विनीत कुमार,2,विनीता शुक्ला,3,विनोद कुमार दवे,4,विनोद तिवारी,1,विनोद मल्ल,1,विभा खरे,1,विमल चन्द्राकर,1,विमल सिंह,1,विरल पटेल,1,विविध,1,विविधा,1,विवेक प्रियदर्शी,1,विवेक रंजन श्रीवास्तव,5,विवेक सक्सेना,1,विवेकानंद,1,विवेकानन्द,1,विश्वंभर नाथ शर्मा कौशिक,2,विश्वनाथ प्रसाद तिवारी,1,विष्णु नागर,1,विष्णु प्रभाकर,1,वीणा भाटिया,15,वीरेन्द्र सरल,10,वेणीशंकर पटेल ब्रज,1,वेलेंटाइन,3,वेलेंटाइन डे,2,वैभव सिंह,1,व्यंग्य,1882,व्यंग्य के बहाने,2,व्यंग्य जुगलबंदी,17,व्यथित हृदय,2,शंकर पाटील,1,शगुन अग्रवाल,1,शबनम शर्मा,7,शब्द संधान,17,शम्भूनाथ,1,शरद कोकास,2,शशांक मिश्र भारती,8,शशिकांत सिंह,12,शहीद भगतसिंह,1,शामिख़ फ़राज़,1,शारदा नरेन्द्र मेहता,1,शालिनी तिवारी,8,शालिनी मुखरैया,6,शिक्षक दिवस,6,शिवकुमार कश्यप,1,शिवप्रसाद कमल,1,शिवरात्रि,1,शिवेन्‍द्र प्रताप त्रिपाठी,1,शीला नरेन्द्र त्रिवेदी,1,शुभम श्री,1,शुभ्रता मिश्रा,1,शेखर मलिक,1,शेषनाथ प्रसाद,1,शैलेन्द्र सरस्वती,3,शैलेश त्रिपाठी,2,शौचालय,1,श्याम गुप्त,3,श्याम सखा श्याम,1,श्याम सुशील,2,श्रीनाथ सिंह,6,श्रीमती तारा सिंह,2,श्रीमद्भगवद्गीता,1,श्रृंगी,1,श्वेता अरोड़ा,1,संजय दुबे,4,संजय सक्सेना,1,संजीव,1,संजीव ठाकुर,2,संद मदर टेरेसा,1,संदीप तोमर,1,संपादकीय,3,संस्मरण,637,संस्मरण लेखन पुरस्कार 2018,128,सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन,1,सतीश कुमार त्रिपाठी,2,सपना महेश,1,सपना मांगलिक,1,समीक्षा,676,सरिता पन्थी,1,सविता मिश्रा,1,साइबर अपराध,1,साइबर क्राइम,1,साक्षात्कार,14,सागर यादव जख्मी,1,सार्थक देवांगन,2,सालिम मियाँ,1,साहित्य समाचार,52,साहित्यिक गतिविधियाँ,181,साहित्यिक बगिया,1,सिंहासन बत्तीसी,1,सिद्धार्थ जगन्नाथ जोशी,1,सी.बी.श्रीवास्तव विदग्ध,1,सीताराम गुप्ता,1,सीताराम साहू,1,सीमा असीम सक्सेना,1,सीमा शाहजी,1,सुगन आहूजा,1,सुचिंता कुमारी,1,सुधा गुप्ता अमृता,1,सुधा गोयल नवीन,1,सुधेंदु पटेल,1,सुनीता काम्बोज,1,सुनील जाधव,1,सुभाष चंदर,1,सुभाष चन्द्र कुशवाहा,1,सुभाष नीरव,1,सुभाष लखोटिया,1,सुमन,1,सुमन गौड़,1,सुरभि बेहेरा,1,सुरेन्द्र चौधरी,1,सुरेन्द्र वर्मा,62,सुरेश चन्द्र,1,सुरेश चन्द्र दास,1,सुविचार,1,सुशांत सुप्रिय,4,सुशील कुमार शर्मा,24,सुशील यादव,6,सुशील शर्मा,16,सुषमा गुप्ता,20,सुषमा श्रीवास्तव,2,सूरज प्रकाश,1,सूर्य बाला,1,सूर्यकांत मिश्रा,14,सूर्यकुमार पांडेय,2,सेल्फी,1,सौमित्र,1,सौरभ मालवीय,4,स्नेहमयी चौधरी,1,स्वच्छ भारत,1,स्वतंत्रता दिवस,3,स्वराज सेनानी,1,हबीब तनवीर,1,हरि भटनागर,6,हरि हिमथाणी,1,हरिकांत जेठवाणी,1,हरिवंश राय बच्चन,1,हरिशंकर गजानंद प्रसाद देवांगन,4,हरिशंकर परसाई,23,हरीश कुमार,1,हरीश गोयल,1,हरीश नवल,1,हरीश भादानी,1,हरीश सम्यक,2,हरे प्रकाश उपाध्याय,1,हाइकु,5,हाइगा,1,हास-परिहास,38,हास्य,51,हास्य-व्यंग्य,52,हिंदी दिवस विशेष,9,हुस्न तबस्सुम 'निहाँ',1,biography,1,dohe,3,hindi divas,6,hindi sahitya,1,indian art,1,kavita,3,review,1,satire,1,shatak,3,tevari,3,undefined,1,
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रचनाकार: दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - एक हसीन बस का सफ़रनामा
दीपक शर्मा 'सार्थक' का व्यंग्य - एक हसीन बस का सफ़रनामा
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