रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मनोज 'आजिज़' की नज़्म - अधूरी खुशी

नज़्म 

अधूरी ख़ुशी 

          -- मनोज 'आजिज़'

रास्तों पर गिरे हुए 

दरख्तों से लाल पीले पत्ते 

आम के मंजर 

बगीचों को जन्नत का नूर देते 

खिले हुए गुल 

बहार के महीनों में।

नग्मों की लड़ी आती है दिमाग पर 

जान को जान मिलती है 

हवा भी खुश-रवां होती है 

जानो-नग्म की तर्ज़ पर ।

कोयल की कूक --

भूला देती है हर गमो-रंज 

बहार की बहार पूरी धरती में 

जुड़ जाते हैं पंख मन के साथ।

पर, सब कुछ ख़त्म हो जाता है 

ज़िन्दगी की आपाधापी में 

फिर वही जद्दो-जहद 

और लग जाना --

तसल्ली की खोज में

 

(शायर बहु भाषीय युवा साहित्यसेवी व संपादक हैं और अंग्रेजी के व्याख्याता हैं)

जमशेदपुर 

झारखण्ड 

09973680146 

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