रविवार, 10 फ़रवरी 2013

मोहसिन ‘तन्हा’ की ग़ज़ल - तुम दिल मेरा मेरे सामने तोड़ देते, कर गए फ़िर बात मोहलत की ।

ग़ज़ल

क्यों हमने ख़ुद ही आफ़त की,

जब भी नई उलफ़त की ।

 

हम भी ओरों की तरह शाद होते,

ख़ुद अपने हाथों ये हालत की

 

बेगुनाहों का गुनहगार हूँ मैं,

कभी न किसी से अदावत की ।

 

मैं न हूँ इतना संगदिल ऐ दोस्त,

ये है ग़लती मेरी आदत की ।

 

तुम रहो बुलंद, मैं हो जाऊँ ख़ाक,

मुझको फ़िक्र नहीं शोहरत की ।

 

छीनकर सब, क्यों बख़्श दी जाँ,

अच्छी मिसाल दी रहमत की ।

 

मैं न मुसलमा, हूँ मैं बादाख़्वार,

फिर क्यों उठाने की ज़हमत की ।

 

तुम दिल मेरा मेरे सामने तोड़ देते,

कर गए फ़िर बात मोहलत की ।

 

ख़ोफ़ नहीं सज़ा-ए- बुतपरस्ती का,

मैंने हर शै में तेरी इबादत की ।

 

‘तन्हा’ मुंतज़िर है एक अरसे से,

वो बात नहीं करते क़यामत की ।

 

 

मोहसिन ‘तन्हा’

सहा.प्राध्यापक हिन्दी

जे.एस.एम. महाविद्यालय,

अलीबाग (महाराष्ट्र)

मो. 09860657970

Khanhind01@gmail.com

3 blogger-facebook:

  1. wah saheb, kya baat hai. chhote baher kafi kuchh kah gaye. shukriya!
    Manoj 'Aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  2. Beshak achhi hai. chhote baher me bhi kafi kuchh kah gaye. shukriya!
    Manoj 'Aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद ! मनोज जी आपको ग़ज़ल पसंद आई ।
    मोहसिन 'तन्हा'

    उत्तर देंहटाएं

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