मोहसिन ‘तन्हा’ की ग़ज़ल - तुम दिल मेरा मेरे सामने तोड़ देते, कर गए फ़िर बात मोहलत की ।

ग़ज़ल

क्यों हमने ख़ुद ही आफ़त की,

जब भी नई उलफ़त की ।

 

हम भी ओरों की तरह शाद होते,

ख़ुद अपने हाथों ये हालत की

 

बेगुनाहों का गुनहगार हूँ मैं,

कभी न किसी से अदावत की ।

 

मैं न हूँ इतना संगदिल ऐ दोस्त,

ये है ग़लती मेरी आदत की ।

 

तुम रहो बुलंद, मैं हो जाऊँ ख़ाक,

मुझको फ़िक्र नहीं शोहरत की ।

 

छीनकर सब, क्यों बख़्श दी जाँ,

अच्छी मिसाल दी रहमत की ।

 

मैं न मुसलमा, हूँ मैं बादाख़्वार,

फिर क्यों उठाने की ज़हमत की ।

 

तुम दिल मेरा मेरे सामने तोड़ देते,

कर गए फ़िर बात मोहलत की ।

 

ख़ोफ़ नहीं सज़ा-ए- बुतपरस्ती का,

मैंने हर शै में तेरी इबादत की ।

 

‘तन्हा’ मुंतज़िर है एक अरसे से,

वो बात नहीं करते क़यामत की ।

 

 

मोहसिन ‘तन्हा’

सहा.प्राध्यापक हिन्दी

जे.एस.एम. महाविद्यालय,

अलीबाग (महाराष्ट्र)

मो. 09860657970

Khanhind01@gmail.com

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3 टिप्पणियाँ "मोहसिन ‘तन्हा’ की ग़ज़ल - तुम दिल मेरा मेरे सामने तोड़ देते, कर गए फ़िर बात मोहलत की ।"

  1. wah saheb, kya baat hai. chhote baher kafi kuchh kah gaye. shukriya!
    Manoj 'Aajiz'

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  2. Beshak achhi hai. chhote baher me bhi kafi kuchh kah gaye. shukriya!
    Manoj 'Aajiz'

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद ! मनोज जी आपको ग़ज़ल पसंद आई ।
    मोहसिन 'तन्हा'

    उत्तर देंहटाएं

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