शशांक मिश्र भारती की दो कविताएं

 

बसन्‍त

बसन्‍त-

वह गीत है

जिसमें लगी है सभी की प्रीत

आते ही जिसके

खिल जाते हैं कोमल पुष्‍प

महक उठते हैं उपवन

झूम उठते हैं सभी के मन,

मौसम-

बन जाता है सुहावना

नूतन सौन्‍दर्य छा जाता है चहुंओर

कई तरह के सतरंगी पुष्‍प खिलकर

बढ़ाते हैं शोभा

बगीचों की, और-

आकर्षित करते हैं

अपनी ओर मधुकरों को-

खिल-खिलाकर हंस पड़ती है

सरसों-

मधुआ के गेहूं के खेत में,

बोलती हैं कोयलें

हरिया के आम्रमंजरी से

झूमते बाग में,

तेा कहीं निकल पड़ते हैं

मस्‍तानों के झुण्‍ड

पीताम्‍बर डाले, गीत गुनगुनाते

मादकता, सरसता के मोहक

ऋतुराज के स्‍वागत

अभिनंदन को।

बसन्‍त के वंदन को!!

--

 

बसन्‍तऋतु

बसन्‍त

आने पर जिसके

करते हैं विभिन्‍न क्रीड़ाएं मोर

अपनी सुन्‍दर क्रीड़ाओं से,

छोटे खग-हिग भी करते हैं मधुर शोर

कोमल पंखुड़ियों व नूतन पुष्‍पों पर

मंडराते हैं मधुकर

और-

मुग्‍ध हो जाते हैं सभी जन

तेरा सौंन्‍दर्य देखकर

हे बसन्‍त ऋतु!

प्‍यारी सुगन्‍ध ऋतु।

--

हिन्‍दी सदन बड़ागांव शाहजहांपुर -242401 उ.प्र.

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