शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

रमाशंकर शुक्ल की लघुकथा - नानी

नानी
ननिहाल में नानी न हो तो फिर उसकी गरमाहट ही क्या। माँ से भी ज्यादा नानी के प्यार की तासीर यूं ही नहीं महसूस होती।


मेरे जीवन से नानी को निकाल देने का मतलब बचपन को खारिज कर देना। साठ  साल की नानी की देह पर झुर्रियों ने अभी हमला करना शुरू किया था, पर रौनक कम न हुई थी। फूल सी पीली देह में आप ही नेह का विश्वास उग आता। माँ से प्यार कम न था, पर नानी तो नानी ही थी


उसने कभी साबुन न लगायी। कहती, इसमें चर्बी होती है।
नानी कड़क मिजाज। पूरे मोहल्ले के लोग उसके सामने सकते में रहते। पर मेरे लिए उसके भीतर छुपा हुआ प्यार का सोता बहता रहता। रात की नीद नानी के पास होने में ही आती। सुबह का जागना भी उसी जुबान से। नहला-धुला चुटिया गूंथ स्कूल के लिए तैयार कर देती। पर मजाल है जो सीसा देख कंघी कर लूं। या फिर माथे पर बाल लटकते दिख जाएँ। खुद से कभी न तो तैयार हुई न तैयार होने की इजाजत। क्या पता लड़की की सूरत से छिछोरापन झलक जाए।


घर में मेहमान आये यो इकलौती संतान होने के बावजूद बराबर चौकी पर नहीं जमीन पर ही बैठने की इजाजत।


होली के पहले एक रात गुझिया बनाने के लिए माँ ने पड़ोस से गोठ्नी लाने भेजा। लौटी तो सीढ़ी के सुराग से बगल वाले के घर में गिर गया। माँ ने दो थप्पड़ रसीद कर दिए। नानी का गुस्सा सातवे आसमान। पास में पड़ी पह्सुल चला दी। माँ उछल न गयी होती तो अस्पताल ही ले जाना पड़ता। फिर भी गुस्सा कम न हुआ। दौड़कर घर में गयी और सारा गुझिया का मशाला और लोई एक में गूंथ डाला। बोली, ले अनजानी गलती पर मारा तो अब गुझिया भी खा ले। नानी उस दिन कुछ न खायी। बस मेरा हाथ पकड़ सोने चली गयी।

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