सोमवार, 18 मार्च 2013

उमेश मौर्य की दो कविताएँ

॥ हिन्‍दी॥

कुछ सोचो अंग्रेजी वालों, राष्‍ट्र की भाषा को अपना लो।

यदि अंग्रेजी के पंडित हो, काम करो जो देश के हित हो॥

सारी अंगरेजी किताब का, अंग्रेजी हर ज्ञान कोश का,

सारे कम्‍प्‍यूटर-सम्‍प्‍यूटर, हार्डवेयर और साफ्‌टवेयर का,

हिन्‍दी में अनुवाद बना लो, और अपनी भाषा में पा लो।

अपनी प्रतिभा और क्षमता से, भारत माँ की लाज बचा लो।

कितने देखे हो जापानी, जो बोले हैं इंगलिस्तानी,

वो हमसे कितने हैं आगे, बिन अपनी भाषा को त्‍यागे।

अपनी एक पहिचान बना लो, हिन्‍दी अपनी जान बना लो।

नकल-नकल में खो बैठोगे, अपनी इज्‍जत धो बैठोगे।

जब होगा सब सत्‍यानास, कुछ भी आयेगा न हाथ।

अपना दिवस प्रभात बचा लो, शरद पूर्णिमा रात बचा लो।

अंग्रेजी का तांडव देखा, घर-घर ऐठ रहें है पैसा।

मॉ का आँचल लुप्‍त हो रहा, गुप्‍त विषय अब गुप्‍त न रहा,

बची खुची अब लाज छुपा लो, शरम से अपनी आंख झुका लो,

अपना एक आधार बना लो, हिन्‍दी का परिवार बना लो।

पूरब से पश्‍चिम तक मिलकर, उत्‍तर से दक्षिण तक खिलकर,

मंत्री से सब्‍जी वालों तक, वैज्ञानिक, डाक्‍टर, नौकर, तक,

नदी और बहते नालों तक, गॉव, गली, घर-घर चालों तक,

केवल हिन्‍दी हिन्‍दी बोलो, इसको औरों से मत तोलो,

ये अपने भारत की भाषा, पूरी कर दो मॉ की आशा

 

A। अखण्‍ड भारत ॥

यदि पूरे भारत में हिन्‍दी चलती होती।

तो भारत की बुरी दुर्दशा, कभी न होती।

एक भाव और भाषा सबकी हो जाती।

पूर्ण एकता की परिभाषा बन जाती॥

माना अलग-अलग भाषा की फुलझड़ियाँ है,

लेकिन ये तो मात्र कल्‍पना की गुड़िया है,

कुछ कहकर के अपने मन को बहलाना है,

अलग है फिर भी एक हमें कहते जाना है।

भाषा से ही रक्‍त पिपासा बन जाती,

कभी मराठी और बिहारी लड़ जाती।

तमिल और हिन्‍दी में भौंहे तन जाती,

बंग और गुजराती क्‍यों न मिल पाती।

राष्‍ट्र की भाषा केवल नाम मात्र की है,

अंग्रेजी की माँग आज हर छात्र की है।

आपस के इस युद्ध मे अब तीजा आयेगा,

इंगलिस का बुखार सभी पे चढ जायेगा।

मंत्री जी के भाषण इंगलिस में होते हैं,

भारत के कितने जन उसे समझ पाते हैं।

कैसे कहें कि भारत फिर आगे आयेगा,

अपनी भाषा को घर में ही दफनायेगा।

जब तक मुट्‌ठी बंधे न उसमे जोर न होती,

एक बूंद से ध्‍वनि कभी घनघोर न होती।

मम्‍मी पापा, डैडी बनकर घर आये हैं,

अम्‍मा बाबू कहते बच्‍चे शरमाये हैं।

बोझ तले दब गया देश है अंग्रेजी के,

लूट रहे स्‍कूल नाम से अंग्रेजी के।

मम्‍मी पापा दिन भर सब्‍जी दाल बेचते,

बच्‍चों को अंगरेजी की राह भेजते।

भ्रम बहुत है भारत में सब कूच करेंगे,

एक दिन चुल्‍लू भर पानी में डूब मरेंगे।

2 blogger-facebook:

  1. उमेश भाई, कविता के भाव बहुत अच्छे हैं, हिन्दी प्रेम के लिये बधाई, चार लाईन मैने भी लिखी थी, आप के हिन्दी प्रेम को समपर्पित---
    मातृ - भाषा हिन्दी बहुत उदास है
    *************************
    आयातित हर चीज़ यहाँ पर ख़ास है
    अंगरेजी बोले उसको मधुमास है
    घर की भाषा भिखमंगी सी दिखी यहाँ
    मातृ - भाषा हिन्दी बहुत उदास है
    गिरिराज भंडारी

    उत्तर देंहटाएं
  2. गिरिराज जी,

    सचमुच मे आज अपनी भाषा भिखमंगी सी दिख रही है।
    मातृ-भाषा हिन्दी बहुत उदास है
    आपके हिन्दी प्रेम के लिये बधाई।
    धन्यवाद,

    उत्तर देंहटाएं

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