गुरुवार, 28 मार्च 2013

ओम प्रभाकर की कविता - औरत

ओम प्रभाकर

औरत

1

रात के दो बजे हैं

और वो सो रही है

मैं जाग रहा हूँ

वो सो रही है और

घर भर के बिस्‍तर तहाकर

सभी कमरों में झाडू लगा रही है

मैं जागता हुआ

उसे सोते हुए

करवट बदलते देखता हूँ

अब वो झटपट चौका-बासन और

पानी से निपटकर

नहाकर

ठाकुर जी की पूजा कर रही है।

मैं जाग रहा हूँ और

कुछ नहीं कर रहा

वह सो रही है और

सब के लिए चाय-नाश्‍ता

तैयार कर रही है

चावल बीन रही है

आटा मल रही है और

ब्‍लाउज की उधड़ी सिलाई

पल्‍लू से ढाँकती

जल्‍दी-जल्‍दी रोटियाँ सेंक रही है

गोया उसी को ठीक टाइम पर

स्‍कूल या दफ़्‍तर पहुँचना है।

मैं जाग रहा हूँ सिर्फ�

वो सो रही है और

ढेर सारे काम चपेटे है...

मशीन और फटे कपड़े रखने से पहले

वो खाना खा कर लेटी है कि

पड़ोसिन के पुत्र की बीमारी का हाल जानने

छत पर चली गई है।

वो सो रही है लेकिन

खर्राटे लेने की फुर्सत के बिना

मैं जाग रहा हूँ और

कुछ न कहते हुए

देख रहा हूँ कि

वो सो रही है और

पिसाने के लिए

गेहूँ का कनस्‍तर तैयार कर रही है

घर खर्च का

हिसाब लिख रही है

बिटिया की उम्र के साल

और पुत्र की पढ़ाई के

दर्जे गिन रही है।

मैं जागते हुए

कुछ न करते हुए परेशान

देख रहा हूँ कि

वो सो रही है और

दुनिया भर का

लबाजमा उठाए

खु़दा जाने कहाँ-कहाँ

भटक रही है

 

2

बच्‍चों को तैयार करते हुए

अनाज के कंकड़ बीनते हुए

काम से लौटते आदमी की

प्रतीक्षा करते हुए

वे क्‍या कर रही हैं?

जबकि देश विकास कर रहा है।

स्‍कूल, अस्‍पताल और

दफ़्‍तर जाते हुए

जच्‍चाख़ाने से वापस आते हुए

खेतों में कटाई करते हुए

सड़कों पर गिट्टी और

बाँधों पर मिट्टी डालते हुए

वे क्‍या कर रही हैं?

जबकि देश विकास कर रहा है।

और वे घर की सफ�ाई कर रही हैं

बर्तन माँज रही हैं

सालों के फटे कपड़े सिलती हुई

तीज-त्‍यौहार मनाने में लगी हैं

जबकि देश विकास कर रहा है।

और वे

बच्‍चों को पढ़ा रही हैं

मरीजों को दवा पिला रही हैं

वर्षों से बलात्‍कार और

जलाए जाने पर सख्‍़त एतराज के बावजू़द

बलात्‍कार सहते हुए

जलाए जाते हुए वे

घर भर के बिस्‍तर ठीक कर रही हैं

रोटियाँ सेंक रही हैं सबके लिए

जबकि देश विकास कर रहा है।

लेकिन

वहाँ-कोने में

अकेली बैठी

वे क्‍या कर रही हैं?

क्‍या उन्‍हें मालूम है कि

देश विकास कर रहा है?

 

3

कुछ औरतों ने अपने सन्‍दूक

और कुछ ने अपनी पोटलियाँ

घरों से उठाकर

सड़कों पर रख दी हैं।

निस्‍तेज और अवाक्‌ हैं पुरुष

और बच्‍चे

उत्त्ोजित और सक्रिय।

घरों में एक बेहद बौखलाया हुआ

सन्‍नाटा व्‍याप्‍त है

भीतर से बाहर तक।

औरतों की इस कार्यवाई की ख़बर

भूमिहीन किसानों और मजदूरों तक

पहुँच गई है। और अब वे सब

आज के काम पर जाने के बारे मेंं

पुनर्विचार कर रहे हैं।

टैक्‍सीवालों ने अपने मीटर

ऊपर कर लिए हैं।

छोकरे बजाए धोने के

प्‍लेटें चाटने और

पटकने लगे हैं।

रिक्‍शे वाले खड़े हो गए हैं

हैन्‍डिल पकड़कर सड़क के बीचों बीच।

इक्‍कों-ताँगों के घोड़े करने लगे हैं

नाल दार मार्कटाइम।

अब दोपहर है और

सूर्य अत्‍यंत प्रखर

दफ्‍तरों में जो रोज़

होेता था इस समय

आज नहीं हो रहा।

जबकि औरतों ने अभी

अपने घर नहीं छोड़े हैं

केवल सन्‍दूक और

पोटलियाँ घरों से

लाकर रखी हैं

बाहर सड़कों पर

फिर भी

बहस का मुद्दा

बदलने लगा है

और हवा में

एक घुमाव भरा

भारीपन व्‍याप्‍त है।

--

(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

1 blogger-facebook:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (30-3-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

    उत्तर देंहटाएं

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